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05.08.2014

 
खण्ड-खण्ड अग्नि
दिविक रमेश
 
कृति : खण्ड खण्ड अग्नि
लेखक : दिविक रमेश
विधा : नाटक
उपब्धता : इंटरनेट पर विभिन्न विक्रेताओं से
मूल्य : १०० रु.
पृष्ठ संख्या :  सजिल्द

सूत्र

Divik Rameshन कोई निरा व्यक्ति हो सकता है और न निरा समूह। व्यक्ति और व्यक्ति तथा व्यक्ति और समूह के बीच स्थिति विशेष की भी अत्यंत महत्व एवं हस्तक्षेपपूर्ण उपस्थिति होती है। यदि गतिशील स्थिति को केन्द्र में रख लें तो व्यक्ति और समूह दोनों ही की स्थिति उपग्रहों जैसी मानी जा सकती है। कब किस पर ग्रहण लगे यह समय-चक्र निर्धारित करता है। इसी से आज के समय में चरित्र की अवधारणा टूटी है और साहित्य में धीरे-धीरे स्थिति केन्द्र में आती चली गई है। यह बात अलग है कि स्थिति का कोई स्थायी या एक ही केन्द्र नहीं होता। यह स्थिति नियति का पर्याय नहीं है और न ही नियतिवाद तक की वाहक ही। बल्कि किसी समय और स्थान की मनोभूमि में उपजी क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से निर्मित, स्वीकार (समर्थन) और अतिक्रमण करती मानसिकता की ही पहचान है।

यह प्रश्न हमेशा उलझा हुआ रहेगा कि कहाँ व्यक्ति की (और समूह की भी) विवशता मान ली जाए और कहाँ उसकी कर्मण्यता पर आक्षेप। क्योंकि हर स्थिति में व्यक्ति (और समूह) का आकलन कुछ ऐसे प्रतिमानों पर होता आ रहा है जिसका आधार या जड़ें अधिकतर निकट या दूर के अतीत में होती हैं। यानी जिनकी समय और स्थान सापेक्षता एक ऐसे वर्तमान से होती है जो वस्तुतः होता ही नहीं और जो होता है उसकी न आवाज़ होती है, न उसका हस्तक्षेप होता है, प्रभुसत्ता का तो सवाल ही नहीं उठता। संभवतः आने वाला साहित्य-चिन्तन अतीत के उसी कृशकाय वर्तमान को खोजने का प्रयत्न किया करता है या करता रहा है क्योंकि उसके हाथ उस अतीत के एक सशक्त भविष्य की सुविधा भी लग चुकी होती है।

प्रस्तुत कृति की मूल प्रेरणा बाल्मीकि कृत रामायण का एक प्रसंग विशेष है। युद्ध हो चुका है। लंका पर राम का आधिपत्य है। विभीषण राजा घोषित हो चुके हैं। युद्ध-विजय और सीता-स्वतंत्रता का समाचार देने के लिए हनुमान को अशोक वाटिका भेजा जाता है। विभीषण सीता को राम तक लिवा लाते हैं। क्रोधित राम पर-घर में रह चुकी सीता के प्रति न केवल उदासीनता प्रकट करते हैं बल्कि उसे स्वीकार करने से मना कर देते हैं और साथ ही सीता को कहीं भी जाने की स्वतंत्रता दे देते हैं। उनका मुख्य तर्क है कि हरण के समय जब सीता को रावण ने उठाया था तो अवश्य ही उसकी देह ने सीता की देह का स्पर्श किया होगा। राम के उस देहवाद ने वैदेही को ज़रूर चकित किया होगा। चकित होने की बात ही है। विवाह से पूर्व राम ने अहल्या जैसी ऋषि-पत्नी का उद्धार किया था जिसने बाल्मीकि-रामायण के अनुसार पति-वेश में आए इन्द्र को पहचानकर भी न केवल उसके साथ समागम किया बल्कि उससे संतुष्ट होकर पति के आगमन से पूर्व ही उसे चले जाने का संकेत भी दिया।(1) ऐसी पत्नी को गौतम ऋषि द्वारा स्वीकार करने पर राम मौन ही रहे बल्कि खुश ही हुए होंगे। दूसरों के संदर्भ में राम के हृदय की उदारता का प्रमाण बाली-सुग्रीव प्रसंग में भी मिलता है। बाली ने अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी रूमा को बलपूर्वक अपने घर में रख लिया था तथा उससे कामेच्छा की पूर्ति भी करता था। राम ने सुग्रीव की सहायता कर रूमा को बाली के चंगुल से छुड़ाया था तथा सुग्रीव ने परवश पर-पुरुष के घर रह चुकी रूमा को सहर्ष स्वीकार कर लिया था जिस पर राम की कोई विपरीत टिप्पणी नहीं हुई। कदाचित् इसीलिए सीता राम की बात पर न केवल दंग रह जाती है बल्कि प्रश्नाकुल भी प्रतीत होने लगती है। तब भी अपने युग की मानसिकता के बोझ तले वह यही कह पाती है कि यदि उसे स्वीकार न करना तय था तो (यहाँ लाकर अपमानित करने की अपेक्षा) हनुमान से अशोक वाटिका में ही उसकी सूचना भिजवा देते ताकि सीता वहीं अपने को समाप्त कर लेती।


 (1)
मुनिवेशं सहस्त्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन।
मति चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात्! ।।
बालकाण्ड /48/19
अथाब्रवीत् सुरश्रेष्ठं कृतार्थेनान्तरात्मना।
कृतार्थास्मि सुरश्रेष्ठ गच्छ शीघ्रमितः प्रभो।।
बालकाण्ड /48/20
आत्मानं मां च देवश सर्वथा रक्ष गौत्मात्।
बालकाण्ड/48/20/1/2

अर्थात् - रघुनन्दन! महर्षि गौतम का वेश धारण करके आये हुए इन्द्र को पहचानकर भी उस दुर्बुद्धि नारी ने अहो! देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं इस कौतूहलवश उनके साथ समागम का निश्चय करके वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

रति के पश्चात् उसने देवराज इन्द्र से संतु्ष्ट होकर कहा - सुरश्रेष्ठ! मैं आपके समागम से कृतार्थ हो गयी। प्रभो! अब आप शीघ्र यहाँ से चले जाइये। देवेश्वर! महर्षि गौतम के कोप से आप अपनी और मेरी भी सब प्रकार से रक्षा कीजिये।


किन्तु इस सारे प्रसंग का जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण और आघातपूर्ण (शॉकिंग) पक्ष है, वह दूसरा है जो सूक्ष्म होते हुए भी अपने भीतर सोच की अनन्त संभावनाएं लिए हुए है। सीता के मन में एक सहज प्रश्न उठता है जिसे वह राम के समक्ष रखती है। सीता जानना चाहती है कि युद्ध के बाद यदि सीता को स्वीकार ही नहीं करना था तो उसके लिए वह कष्टदायी युद्ध ही क्यों किया गया ? बातचीत (या तर्क-वितर्क) में राम का एक ऐसा कथन भी था जिसने उस समय की सीता को भी अवश्य हिला दिया होगा, आज का व्यक्ति तो हिलेगा ही हिलेगा।

कथन इस प्रकार था-

विदितश्चास्तु भद्रं ते तोअयं रणपरिश्रमः।
सुतीर्णः सुहृदां वीर्यान्न त्वदर्थं मया कृतः।।
(युद्ध काण्ड/115/15)
रक्षता तु मया वृत्तमपवादं च सर्वतः।
प्रख्यातस्यात्मवंशस्य नयड़्ंग च परिमार्जना।।
(युद्ध काण्ड/115/16)

अर्थात् - तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मैंने जो युद्ध का परिश्रम उठाया है तथा इन मित्रों के पराक्रम से जो इसमें विजय पायी है, यह सब तुम्हें पाने के लिए नहीं किया गया है।

सदाचार की रक्षा, सब ओर फैले हुए अपवाद का निवारण तथा अपने सुविख्यात वंश पर लगे हुए कलंक का परिमार्जन करने के लिए ही यह सब मैंने किया है।

बाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में वर्णित उक्त कथन से जब पहले पहल मेरा सामना हुआ तो पत्नी सीता के संदर्भ में राम के वंशवाद या कुलवाद से मैं भी हिल गया। मैंने रामचरित मानस सहित राम सम्बन्धी अनेकानेक ग्रंथों एवं कृतियों में इस प्रसंग-विशेष को खोजा, पर इस प्रसंग की भयावहता के दर्शन कहीं नहीं हुए। कम से कम मुझे कोई संतोषप्रद उत्तर नहीं मिला। मिथ या पुरा-कथा या इस प्रकार के प्रसंगों को केन्द्र में रखकर लिखने के प्रति मैं विशेष उत्साहित भी कभी नहीं रहा हालांकि कई बार ललकता जरूर रहा हूँ। यूँ भी, आज के संदर्भों में, मेरी मान्यता है कि मिथ या पुरा-कथा कथ्य या उद्देश्य की अपेक्षा शिल्प अर्थात् क्राफ्ट या अभिव्यक्ति-उपादान ही अधिक हो सकता है - बल्कि वही होता है। कम से कम श्रेष्ठ कृतियों में। खैर, यह प्रसंग मुझसे निरंतर टकराता रहा और अपार बेचैनी पैदा करता रहा। मेरे सामने समस्या यह थी कि एक ओर मैं पुरा-कथा (या इतिहास कथा ही सही क्योंकि फिलहाल यह विवाद यहाँ प्रासंगिक नहीं है।) के सौन्दर्य, उसकी युगधर्मा गरिमा को भी नहीं भंग करना चाहता था और दूसरी ओर अपने युग की, अपने समय की मानसिक टकराहट के प्रहारों से भी नहीं बच सकता था। ऐसी स्थिति में मेरे समक्ष राम कुल बद्धता के प्रतीक के रूप में उभरते चले गए और सीता सम्बन्ध के उत्तरदायित्व के रूप में। लेकिन बात अब भी नहीं बन रही थी। ऐसा भी नहीं था कि मुझे पुरा-कथा से खेलने का थोड़ा बहुत भी अभ्यास न हो। मैं इसके पूर्व, एक दूसरी योजना के अन्तर्गत, दो लम्बी-लम्बी कविताएँ कवि-चिन्तन (संदर्भ बाल्मीकि) और प्रश्न चिन्ह लिख चुका था जो क्रमश: चण्डीगढ़ की पत्रिका अभिव्यक्ति-3 (दिसम्बर-मार्च, 1978-79) और नये पुराने नामक पत्रिका के वर्ष 2 अंक 2-3 में प्रकाशित भी हुई थीं। (अब 2010 में प्रकाशित मेरे कविता संकलन "वह भी आदमी तो होता है" में संग्रहीत हैं)।

पिछले दो सालों में यह प्रसंग मुझे और भी कटोचने लगा। और एक दिन मुझे खास ट्रीटमेंट हाथ लग गया। न सही व्यक्ति, न सही लोग, सृष्टि में कुछ और भी तो हो सकता है जो उन चीजों को भी अभिव्यक्त कर सकता है जिनका एक समय-स्थान में अभिव्यक्त होना अवि श्वसनीय लग सकता है। मुझे पात्र मिले सन्नाटा, विश्वास, सूचना, उद्घोषणा, संदेह आदि। यह मेरे लिए उपलब्धि थी और मार्ग प्रशस्ति भी। बस अब एक ही समस्या थी कि ये पात्र छायावादी मानवीकरण से बच सकें और मुझे विश्वास है कि उनमें से हरेक ने उससे बचने की कोशिश की है और बच भी सके हैं।

मुझे यह भी लगा है कि सीता पर पहला आघात तो तब ही हुआ होगा जब युद्ध-विजय के बाद उसने अपने पति राम के स्थान पर पहले हनुमान और बाद में विभीषण को पाया होगा। सीता की मानसिकता से सोचें तो उसने सहज रूप में यही कल्पना की होगी कि राम, जो उसके पति हैं, कैदी-प्रताड़ित निर्दोष सीता के रिहा होते ही, सबसे पहले दौड़कर उसके पास आएँगे और उसे गले से लगा लेंगे - वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति अपने पुत्र, पुत्री, बहन, माँ, पिता या अन्य आत्मीय संबंध के प्रति व्यवहार करता है।

शेष इस कृति के मननकर्त्ता समझें। मुझे विश्वास है यह उनके स्नेह का भाजन अवश्य बन सकेगी।

अन्त में इतना और कि इस कृति को इस रूप में जान बूझकर लचीला रखा गया है कि जहाँ इसे मंच पर नाटक के रूप में प्रस्तुत करने की सुविधा रहे वहाँ नृत्य-नाटिका के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सके। दूरदर्शन और रेडियो माध्यमों को भी ध्यान में रखा गया है।

मैं सर्वश्री नेमिचन्द्र जैन, असगर वजाहत, केवल सूद, एन.के. शर्मा, देवेन्द्रराज अंकुर, श्याम विमल, वी.के. जोशी, महेश आनन्द, प्रताप सहगल, प्रेम जनमेजय हरीश नवल, विजय विजन, डॉ. देवदत्त कौशिक, डॉ.. विनय जैसे मित्रों और अपनी पत्नी डॉ. (श्रीमती) प्रवीण शर्मा के प्रति कृतज्ञ हूँ जिन्होंने इस कृति का वाचन किया और अपने सुझावों एवं प्रतिक्रिया से अवगत कराया।

वाणी प्रकाशन के श्री अरुण माहेश्वरी को मेरी इस प्रथम अनूठी कृति को छापने का श्रेय है। मैं इस स्नेह के लिए उनका ऋणी हूँ।

दिविक रमेश
बी-295, सेक्टर-20
नोएडा-201301
मो० 9910177099
divik_ramesh@yahoo.com