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07.15.2014


खण्ड-खण्ड अग्नि
दिविक रमेश

दृश्य - 5

(राम का शिविर। लक्ष्मण आदि चुप खड़े प्रतीक्षारत हैं।)
सूचना :  (उदासीन)
सूचना हूँ मैं,

सूचना हूँ मैं
अपना कुछ नहीं जिसका।

आ रही हैं सीता
विभीषण के साथ-साथ
आ रही हैं धीमे-धीमे
दबीं
अपने ही मनोभावों के बोझ से।

(दर्शकों की ओर देखकर)

ठीक से ही किया है न मैंने सूचित।
पक्ष तो नहीं लिया न किसी का।
रह सकी हूँ न स्वायत्त ?
बहुत जरूरी है मेरा स्वायत्त होना।
नहीं ?

(कुटिल मुस्कान)

(सीता का आगमन ! राम हर्ष-विषाद के कगार पर, वह राजा के रूप में बैठे रहते हैं। मौन हैं लेकिन भीतर हलचल।)

राम : (अपराध बोध के साथ) आवाज पृष्ठभूमि से।
नहीं, मैं नहीं उठ सकूँगा सीता
नहीं हो सकूँगा निरा व्यक्तिगत संदर्भ ही।
चाह कर भी
नहीं दौड़ सकूँगा तुम्हें बाँधने आलिंगन में।

यह सिंहासन
बँधा हूँ जिससे
प्रतीक है समूह का।
द्वन्द्व ही यही है राम का
नहीं समझ पाया वह आज तक
कहाँ वह व्यक्ति है और कहाँ समूह !

जब चाहा समूह होना
व्यक्ति हो गया है राम
और जब जब
होना चाहिए था व्यक्ति
समूह भर रह गया राम।

राम युद्ध है
एक निरन्तर युद्ध।

(सब ओर खामोशी है। सबके भीतर उथल-पुथल है।)
सन्नाटा :  (विचलित एवं खेदजनक स्वरों में मंच के अग्रभाग पर एक
कोने में है। दर्शकों की ओर देखते हुए)
फिर वही...

बोल रहे हैं सब
भीतर ही भीतर।

मैं सुन रहा हूँ !
स्पष्ट हैं मुझ तक
सारे शब्द।

सब बोल रहे हैं
कोई नहीं सुन रहा एक-दूसरे को।
आखिर कब तक रहूँ मैं भी
कब तक देता रहूँ सहारा हालात को
सीमा तो मेरी भी है।
मुझे चलना ही होगा यहाँ से।

काश!
मैं होता बहरा।
या बोल ही पाता।
सीता : {स्वगत (आंखों में प्रश्न एवं उत्सुकता) आवाज पृष्ठभूमि से}

क्या सचमुच नहीं हो पा रही हूँ अभिव्यक्त
नहीं हो पा रही हूँ सम्प्रेषित
अपने राम तक ?

या महज लीला है राम की
एक नाटक भर।

कौन सा मोह है
जो आज बड़ा है सीता से विजयी राम को ?

क्या सचमुच है कोई मोह
सीता से भी बड़ा
राम को ?

यह क्या हो गया है मुझे ?
कौन डाल रहा है ये दरारें
मुझमें ?
आह ! टूट ही जाती।
असह्य है विभक्त होना सीता को
असह्य है उदासीनता राम की।
नहीं, सीता नहीं है मात्र नारी
पत्नी भी है राम की।
राम : (सीता को सम्बोधित तथा स्वयं को अविचलित प्रकट करते हुए)
मैंने विजय पाई है लंका पर
लिया है प्रतिकार अपमान का
समझो इस पुरुषोचित कार्य को सीता !

(राम सोचने लगते हैं। कुछ देर सीता को देखते रहते हैं।)
सीता :  (मन ही मन आघात महसूस करते हुए)
काश !
काश कह पाते राम
विजय हुई है हमारी
लंका पर।
यूँ तो न छिटको मुझे
शब्दों में।

करोड़ों तीरों से भी अधिक होती है
चुभन
असह्य शब्दों की।
राम :  (गर्व से) मैंने धो दिया है कलंक
अपने कुल का।

तुम वशीभूत रावण की
आज स्वतंत्र हो राम के पुरुषार्थ से।

(तटस्थ होकर)

तुम स्वतंत्र हो सीता
जैसे स्वतंत्र है विस्तार महासागर का
उन्मुक्त हो तुम
सृष्टि की हवाओं सी।
अब नहीं हो बँधी
बद्ध विचारों सी।

(कुछ रुक कर सीता की ओर देखते हैं। सीता की स्थिति विचित्र
है। राम के कहने का ‘तटस्थ’ सा लहजा उन्हें चौंकाए हुए है।)

तुम पुरुष नहीं, नारी हो सीता ?
समझना ही होगा तुम्हें युग-सत्य को ?
रही हो तुम छत्रछाया में रावण की

(राम की साँस तेज है और सीता भौंचक्की सी है। शेष सब
सहमे से)

तुम्हें जीतना कर्तव्य था मेरा
करना ही था मार्जन मुझे
वंश पर लगे कलंक का।

कोशिश करो सीता और समझो
तुम स्वतंत्र हो
स्वतंत्र हो किसी भी सूत्र से।

(सब चौंकते हैं। कुछ उलझे हुए से हैं। सीता, लगता है, जैसे
समझ रही है।)
सीता : (दृढ़ स्वरों में)
नहीं
सूत्रहीन स्वतंत्रता अराजकता है मेरे राम।
उच्छृंखल नहीं है सीता।
सीता नहीं है संदर्भहीन नारी।
पत्नी है सीता -
स्वतंत्र
पति की धुरी पर।
परतंत्र तो कभी नहीं थी सीता।

(आत्म विश्वास के साथ)

नहीं, मैं नहीं समझना चाहती कुछ भी
सीमा समर्पण है राम -
एक विनीत समर्पण।
रक्षित है आपसे
स्व
सीता का।

आप इसे समझें

भिन्न ही कहाँ है
सीता अपने राम से।

मेरे राम !
सीता नहीं,
आपने स्वतंत्र की है
देह, सीता की, विवश।

आत्मा तो यहीं थी
यहीं।
सदा आपके पास
अविजित।

(संदेह से)

यह कैसे घिर रहे हैं महामेघ
साँवले
आपके चेहरे पर।

(समझाने की मुद्रा में थोड़े कातर भाव के साथ)

रोको
रोको मेरे राम
उन आती हुई गर्जनाओं को
सम्भावित तूफानों को।

जीतो
विजयी राम

जीतो इन्हें।

मैं नहीं देख सकती आपकी पराजय
क्षेत्र कोई भी हो।

(सीता काफ़ी परेशान नज़र आती है लेकिन राम पूर्ववत्
बने रहते हैं।)
राम : (अविचलित)

सीता
भूलती हो तुम
तुम्हारी देह ने
स्पर्श किया है रावण का
तुम स्वयं तो नहीं बैठ गई थी न
उचक कर रथ में ?
लक्ष्मण : (आश्चर्य से) क्या ? (इधर-उधर देखता है। सब गर्दन झुकाए हैं)
सीता :  (आत्म विश्वास के साथ झुंझलाहट को रोकते हुए)
हाँ
यही तो मेरा भी पक्ष है राम
मैं स्वयं नहीं बैठ गई थी उचक कर रथ पर।
पर मैं कुछ नहीं समझ पा रही
कुछ भी तो नहीं।

कितने कठोर हैं ये क्रियापद आपके
भटका रहे हैं मुझे
अपरिचित जंगल के अथाह अर्थां में।

स्पर्श
किया नहीं देह ने
हुआ है राम।

मुझे मत मारो
यह भाषा की मार।
मत बुनो यह शब्दों का जाल
हमारे बीच।

मेरे लिए
जो हमेशा था अर्थ
क्यों हो रहा है सीमित
मात्र शब्द तक ?
राम :  (अविचलित)

कोशिश करो सीता
और समझो राम को।
हनुमान :  (विनीत किन्तु सरोष)
प्रभु क्षमा करें, क्षमा करें
अब और नहीं घुट सकता मैं भीतर ही भीतर।
अब और रहा चुप
चाटुकारिता हो जाएगी भक्ति।
ज़रूरत तो आपको है समझने की
आपने समझा ही कहाँ सीता को !
क्या सचमुच याद नहीं आपको
वह वृत्तान्त
जो बताया था मैंने
अशोक वाटिका से आकर
पहली बार।

पुत्रवत् मुझ हनुमान का प्रस्ताव तक
नहीं स्वीकार किया था माँ सीता ने।

(ठहर कर)

इसीलिए न
कि नहीं चाहा था इन्होंने
स्पर्श तक रामेतर पुरुष का
स्वेच्छा से ?

समझ सकें तो आप समझें सीता को प्रभु !

और आप तो उद्धारक हैं अहल्या के
अहल्या तक के
इन्द्र को पहचान कर भी
संकोच नहीं हुआ जिसे
समागम सुख भोगने में
पर पुरुष का।

तो भी
नतमस्तक था मैं आपके हृदय की विशालता पर
और आप से भी अधिक
ऋषि गौतम की महानता पर।

ऋषि को
यूँ छोटा तो न बनाओ प्रभु !
राम : मैं पुरुष हूँ
मैंने निभाया है कर्तव्य
कलंक मिटाया है वंश का
सीता को जीतकर।

(सीता की ओर देखकर)

तुम्हें
तुम जो रह रही थीं किसी और के घर में।
सीता :  (अफसोस के साथ)
फिर वही
फिर वही भाषा की मार
कठोर प्रहार क्रियापदों का।

डरो
डरो राम दुरुपयोग से भाषा के।

सीता
रह नहीं रही थी किसी और के घर में
रखी गई थी
बंदी बनाकर।
राम :  (सीता से निगाह मिलाए बिना। थोड़े क्रोध से)
ठीक है
पर अब स्वतंत्र हो तुम सीता।
जीता है
मैंने तुम्हें पुरुषार्थ से।
निभाया है कर्तव्य।
लक्ष्मण : (व्यंग्य से)
‘जीता है’......
सड़ाँध मारने लगा है यह शब्द बासी।
कितना घिनौना कर दिया है इस शब्द को
दुरुपयोग ने।

जीता नहीं
छुड़ाया है सीता को आपने।

(भावुक होकर)

अपनी सीता को। भाभी को।

(परेशान होकर)

मैं नहीं समझ पा रहा
कुछ भी तो नहीं समझ पा रहा।

(राम जैसे अनसुना कर देते हैं)
राम :  (बिना आँख मिलाए - लगभग आकाश की ओर ताकते हुए)
समझो सीता
राम विवश हैं तुम्हें त्यागने को
विवश थी जैसे सीता
किसी और के घर रहने पर।

(इधर-उधर देखते हुए)

तुम स्वतंत्र हो
वर लो चाहे किसी को।
मैं नहीं कर सकता स्वीकार तुम्हें।
लक्ष्मण : (झुंझलाकर) - उफ् !
सुग्रीव :  (आश्चर्य और क्षोभ के साथ)
यह क्या कह रहे हैं आप प्रभु
यह क्या कह रहे हैं ?
नहीं, इतने आत्मलिप्त तो नहीं हो सकते आप ?
कम से कम
ध्यान मेरा तो रखा होता !

झुलसा रही हैं
इस सुग्रीव के भी घर को
आग उगलते
आपके शब्दों की लपटें।

क्या अपमान नहीं कर रहे आप
बाली की षिकार हुई रूमा का ?

(भावुक होकर)

मेरी पत्नी रूमा का
जिसे मुक्ति मिली थी आपके ही प्रताप से ?
क्या ग्रहण नहीं किया मैंने उसे ?
क्या हुई थी आपत्ति आपको तनिक भी ?

सोच कर तो देखें अपने कथन पर प्रभु !

यह अपमान केवल सीता का नहीं
पुरुष की
पशुता की शिकार हुई हर नारी का है।

हर उस पुरुष का अपमान है प्रभु
जिसने स्वीकारा है अस्तित्व नारी का
सम्मान दिया है जिसने
नारी की आत्मा को।

आप तो मान हैं
कसौटी हैं सृष्टि की।
वानर हुए तो क्या
इतने गए गुजरे तो हम भी नहीं।
राम :  (थोड़ी देर चुप रहकर)
नहीं सुग्रीव
समझना ही होगा ब्रह्माण्ड को
सामान्य न सीता है
न पुरुषत्व ही राम का।

मुझे त्यागना ही होगा सीता को।
हनुमान :  यह कौन सा विधान है प्रभु।
यह दुहाई है किस पुरुषत्व की
क्या प्रभाव तो नहीं है यह लंका-भूमि का ?
क्या गहरा तो नहीं रहा है
राक्षसत्व का प्रेत लंका-आकाश पर !
(उत्तेजित होकर)

यहाँ से भाग चलें राम
स्वतंत्र कर दें लंका-भूमि को।

(राम अविचलित रहते हैं।)
सीता :  (शांत होकर) त्याग सकते हैं आप
शायद अधिकार हो आपको।
पर कहाँ
किसके साथ जाए सीता
अधिकार यह मेरा है।

मानती हूँ
स्वतंत्र है सीता।

स्वतंत्र तब भी थी
वरा था जब राम को।
स्वतंत्र तब भी थी
ठुकराया था जब प्रस्ताव रावण का।

(स्थिर होकर)

क्यों
क्यों है अधिकार पुरुष का ही
स्वतंत्र करना नारी को।

पत्नी हूँ मैं राम
बँधी उतनी ही आपसे।

(रुक कर)

कोई तो होगा ही न वह वृक्ष
बँधते हैं जिससे
दो प्राणी स्वतंत्र
होते ही विवाह !

संदर्भहीन नारी नहीं
उत्तरदायित्व हूँ मैं राम !
राम :  (सहसा)
उत्तरदायित्व ?
सीता :  (निश्चय के साथ)
हाँ ! उत्तरदायित्व हूँ मैं राम, उत्तरदायित्व।
कर सको
तो स्वतंत्र करो इस जड़वत खड़े विशिष्ट समुदाय को।
जबान पर चढ़ाए साँकल
बहुत देर तक नहीं रह सकता मूक
उत्प्रेरित मौन।
पूछो इनसे !

(सब की ओर निगाह घुमाती हैं। लक्ष्मण सहित सबके चेहरों पर अपराध-बोध, विवशता और राहत का भाव एक साथ। राम स्थिर हैं - कम से कम ऊपर से। जन आँखों ही आँखों में एक-दूसरे को स्वीकृति के भाव के साथ देखते हैं।)

सम्बन्ध
सामाजिक हो या वैयक्तिक
नहीं हो सकता खूबसूरत
और अर्थवान भी
बिना उत्तरदायित्व के
पिता का घर हो या पंचवटी
अशोक वाटिका हो
या यात्रा यहाँ तक की
सीता ने बाँधा है उसे पल्लू में।
सीता कभी नहीं हुई
उत्तरदायित्वहीन राम।
चाह ही लिया होता
यदि किसी और को भी सीता ने
तो चाहा होता पूरे उत्तरदायित्व से।

(और दृढ़ होकर)

सीता नहीं हो सकती द्वन्द्व।
मत दबाओ उसे
निर-अपराधी अपराध से।
सीता धँस जाएगी
धँस जाएगी सीता।

सीता नहीं खो सकती उत्तरदायित्व
सीता का सम्बन्ध पृथ्वी से है
अर्थ मिलता है जिससे और रूप भी।
सीता
होती कैसे होती उत्तरदायित्वहीन।

यही तो वह बिन्दु है
जहाँ अलग हो सकती है सीता
राम से भी।

(सब ओर चुप्पी छा जाती है। एक ओर से एक नए पात्र ‘उत्तरदायित्व’ का प्रवेश। एक कोने में खड़ा हो जाता है। दर्शकों की ओर देखकर)
उत्तरदायित्व :  (कुछ दबी-दबी आवाज में, आश्चर्यचकित भी)
मुझ
मुझ उत्तरदायित्व के लिए
सीता हो सकती है अलग
राम से भी ?
किसी असाध्य रोग से पीड़ित रोगी सा
मैं तो पड़ा था कहीं एकान्त उपेक्षित सा !
कहाँ थी आशा मुझे
ढूँढ़ लिया जाऊँगा कभी मैं भी ?
लौट भी सकूँगा कभी फिर केन्द्र में।

युद्ध से युद्ध की शेष मानसिकता तक
मैंने देखा है
खुद को रुलते
ठोकरें खाते पाँवों में।
(सीता की ओर देखकर)

मैं नत मस्तक हूँ सीता
मैं कृतज्ञ हूँ
आशीष देता हूँ हृदय से।

(चला जाता है।)
सीता :  (दुःखी स्वरों में) मत करो राम
सीता के सम्बन्ध को मत करो उत्तरदायित्वहीन।

किसी अन्य पर भी हो आसक्त
तो रहो
बाधा नहीं होगी सीता।
राम विश्वास है सीता का
सीता ही का होगा राम
सीता के समीप, जानती हूँ।
निभाएँ राम
कोई भी उत्तरदायित्व
और किसी का भी - व्यक्ति हो चाहे राज्य।
पर मत करो राम
सम्बन्ध मेरा
उत्तरदायित्वहीन।

(दयनीयता के भाव से मुक्त होते हुए)

यह करुणा नहीं
अधिकार है सीता का
और समझ भी।

सीता ही का क्यों
हर उस आदमी का है
स्वयंचेता है जो
जानता है स्वत्व को।

असीम है व्यक्ति राम
उसे समझो !
समर्थ है वह
हर अंश को
सम्पूर्णता देने में।
तभी तो सम्पूर्ण है।

सम्बन्ध पिता हो, चाहे माता
पत्नी हो या प्रेमिका
पुत्र हो या बंधु
नतिकता नहीं
टिका है उत्तरदायित्व पर ही ज़्यादा।
राम :  (अस्वीकृति में गर्दन हिलाते हुए) नहीं
वृत्त में मत बाँधो राम को
रहने दो रेखाओं में
बल्कि रेखाओं से भी
किन्हीं अन्य प्रयोगों में।

(थोड़े गुस्से से)

सीता !
कहाँ थी आवश्यकता इस समझ के वर्णन की ?
और है भी
तो राम का उत्तरदायित्व
यह समाज भी है और मेरा वंश भी, हाँ मेरा वंश भी।
राम नहीं हो सकता
मात्र यथास्थिति ही।

वर्तमान
हो ही नहीं सकता राम।
अतीत है।
या है वह भविष्य।
बल्कि भविष्य ही है राम ज्यादा।
लक्ष्मण :  (आहत होकर) ‘मेरा वंश।’
यह शब्द ‘मेरा’
क्या नहीं सोचना चाहिए इस पर राजन !
‘म’ निहित होकर भी
सम्बन्धहीन है कितना !
सोचो (उत्तेजना) भैया
क्या उचित था इसे कहना
सीता के संदर्भ में भी ?

(रुक कर)

क्या वंश से बाहर हैं भाभी ?
क्या वंश से बाहर होती है माँ ?
क्या गढ़ा जाता है वंश अकेले पिता से ही ?
क्या केवल श्रमिक है नारी
निर्माण होते ही भवन का
तिरस्कार कर दिया जाए जिसका ?

(सीता चुप है। राम विचार मग्न)
जन-समूह :  (स्वगत) (पृश्ठभूमि से आती हुई आवाज हृदय से निकली आवाज का प्रतीक। आकाश की ओर दोनों बाँहें उठाए हुए)

सोचो राम ! सोचो !
यह कैसी विचित्र बात है ?
हम साधारण जन तक
समझ रहे हैं जिस सच को
नहीं समझ पा रहे हैं राम ?

कैसे दीखते हैं आज
हमसे भी साधारण, हमसे भी आम।

स्वभाव तो हमारा है
दीखना उदार अन्य के संदर्भ में
और हो जाना कृपण
आते ही संदर्भ अपना।
सोचो राम, सोचो
राम तो नहीं है न सामान्य ?
तब इच्छा क्या है आखिर
राम की ?
सोचो राम, सोचो
क्या वही होकर रहेगा हर हाल
जो इच्छा है राम की ?

यह कैसी विचित्र बात है
सीता पर नहीं
जो हम पर भी आघात है।
सोचो राम, सोचो
राम :  (सीता की ओर सीधे देखते हुए) प्रश्न यह नहीं
कि मुझे कुछ समझना है, सोचना है, सोचना है।
प्रश्न तो यह है
कि मुझे समाज होकर जीना है।

जिस दिन
समझी जाएगी यह विवशता राम की
स्वयं जान ली जाएगी निरर्थकता
अपनी सोच की !
लक्ष्मण :  (थोड़ी उत्तेजना के साथ) पर कौन सा समाज राजा राम ?
क्या अनुकूलता ही परिभाषा है समाज की
क्या समाज वही है जिसे हम जीते हैं वर्तमान में ?
क्या स्थिर जल है समाज ?

समाज वह सागर भी है भैया
जो हमें डराता है।
रोकता है
खुद की था लेने से ।
आन्दोलित होता है
उग्र लहरों में जकड़ने को
माप के लिए उतरे व्यक्ति की भनक से ही।
(ठहर कर)
और समाज वह व्यक्ति भी है
जो उतरता है उसमें।
बाँधता हुआ बाँहों से उसकी लहरों को
पार उतर जाता है।
विषम तारों को
सम पर
एक नया संगीत देता है।
राम :  (चेहरे पर क्रोध का सा भाव) मुझे मत उलझाओ इन प्रश्नों में ?
दर्शन नहीं है महत्वाकांक्षा राम का
मुझे जीने दो व्यवहार में।

वृत्त नहीं है राम
मात्र रेखाएँ हैं।

और राम
नहीं है वह उत्तरदायित्वहीन भी।
वह तो उत्तरदायित्व है
पूरी सृष्टि का
विभीषण और रावण का भी।

(रुक कर दृढ़ स्वरों में)

मुझे
मेरे व्यक्ति को -
राम नहीं,
तलाश है रामत्व की
जिसे मुझे पाना है।
पाना है।
हर कीमत पर।

इस ऋजु राम में
मत ढूँढ़ो विरोधाभास सीता !
सोच सको
तो सोचो
अपनी सोच की निरर्थकता को।
सीता :  (स्वगत - आवाज पृष्ठभूमि से)
निरर्थकता ?
सोच की ?
(तिरस्कार प्रकट में)

हाँ ! राम !
सीता जानती है
सोच की निरर्थकता ।

सीता
चाहती है सामान्य होकर ही
विशिष्ट होना।

यही तो
नहीं न स्वीकार
राम के रामत्व को ?
सीता को जानना चाहिए
राम मात्र पुरुष हैं।
सीता को जानना चाहिए
जीना है उसे विशिष्ट होकर
जो अनुकूल है रामत्व के।

नहीं है अधिकार सीता का
विशिष्ट होना
अपने ढंग से
राम के समाज में ?

नहीं है न अधिकार सीता का
हस्तक्षेप करना
राम के रामत्व में ?
नहीं है न अधिकार सीता का
किसी सीतात्व की
रचना करना ?

(रुक कर)

मैं चाहती भी नहीं राम
रचना
सीतात्व ।

नहीं चाहती मैं
इतिहास देना अपने नाम को ।

पर सीता को
उत्तरदायित्व समझो राम।
उसे फेंक तो मत दो
निरर्थक कर
समुद्री हवाओं में।

रामत्व ही नहीं
सीता भी
तलाश है राम की।
सीता के अस्तित्व को
और न करो नग्न ।

सीता स्त्री भी है।
(चुप हो जाती है। ‘उत्तरदायित्व’ एक कोने में आकर)
उत्तरदायित्व :  उफ् !
और कितना होना है पददलित आज !

जो अर्थ भर दिया है सीता ने मुझमें-
मुझ उत्तरदायित्व में-
कितना बड़ा है।
कितना गौरवान्वित हूँ मैं आज !

सौन्दर्य सम्बन्ध का
और अर्थ भी
आज सम्भव है मुझसे ही।
पर राम !
आप भी तो समझें
आप भी तो समझें मुझे इस क्षण।
समझें
सीता के अर्थ को भी।
निरपेक्ष नहीं है सीता
परती पड़ी धरती सी।
उत्तरदायित्व है किसी की।

(बैठ जाता है)
राम :  (मुख पर विवशता) रहस्य नहीं है राम !
शायद यही है सबसे बड़ी त्रासदी राम की।

भीतर
बाहर
वही है राम।
सहज शब्द है वह।

मत खोजो कोई गूढ़ अर्थ
राम में।

राम की बुनियाद बंधन है।
स्वतंत्र कुछ नहीं है राम का।

एक सामूहिक
स्वीकृत मानसिकता से अलग
अस्तित्व ही क्या है राम का।

प्रयोग नहीं है राम
केवल आचरण है।

तुम्हरा होकर भी
तुम्हारा नहीं है केवल।

सीता !
समझो अपने राम को।
उत्तरदायित्व :  (निराशा के साथ - मंच के अगले भाग में खड़े होकर)
चलना ही चाहिए मुझे।

इतना अवांछित
शायद कभी नहीं हुआ था मैं।

इतनी बड़ी सभा में
केवल मैं हूँ
उपेक्षित
अपमानित भी।
जहाँ तर्क का उत्तर ही
तर्क न हो
कौन पूछता है वहाँ मुझे।

धधक रही है सीता तर्क बनी।

पर कब तक ?
कब तक ?

सीता विवश है
छोड़ दी गई है जलने को अकेली
तर्क की अग्नि में।

मैं चलूँ
मुझे चलना ही चाहिए इस भूमि से।

(हाथ को घुमाते हुए)

पर याद रहे
याद रहे काल और दिशाओं को
सहज नहीं होता
जाना उत्तरदायित्व का।

बड़े से भी बड़े भूचाल से भी ज़्यादा
हो सकता है अशिष्ट
प्रस्थान मेरा।

दे सकता है परिणाम
एक महा प्रायश्चित को जन्म

याद रहे।
याद रहे।

(उत्तरदायित्व चला जाता है - उदास, गर्दन लटकाए, विवष सा।
इसी भाव के साथ सन्नाटा का प्रवेश।
सन्नाटा :  (आकाश की ओर देखते हुए)
जाओ
चले जाओ
सीता नहीं हो तुम
जो ठहरे रहते अपमानित होकर भी।
जाओ।
तुम क्यों रहो सीता-से उपेक्षित।

अकेली सीता को
आज और भी हो जाने दो अकेला।

(संभल कर)

किन्तु
किन्तु
भले ही कर दे कोई सीता को अकेला
नहीं किया जा सकता
स्त्री को।

भले ही न जी पाए सीता
होकर सीता
पर कौन रोक सकता है
स्त्री को।

जाग गया यदि स्त्रीत्व सीता में
तो हिल जाएगी नींव
रामत्व की भी।

(सोचते हुए)

पर दूर की बात है अभी
बहुत दूर की।

(गहरा साँस लेकर)

अभी तो
जाने कब तक लड़खड़ाना है समय को
जीत के इस मदिरालय में।

करनी ही होगी प्रतीक्षा
अभी समय को
करनी ही होगी।

(चला जाता है)
(‘विश्वास’ का आगमन जो पगलाया-सा है।)
विश्वास :  क्षमा हो धरती !
क्षमा हो आकाश !
मैं करूँ भी तो क्या
मैं विश्वास हूँ
महज एक भाव
क्रिया नहीं हूँ मैं।
एक खिलौना भर हूँ।
जब जिसने चाहा है
खेला है मुझसे।

(बैठ जाता है प्रकाश राम पर)
राम :  (क्रोध से लेकिन अपराध बोध की भावना के साथ)
विवश न करो सीता !
क्या कहना ही होगा राम को-

हो भी अगर विश्वास तुम पर
तो कैसे करे विश्वास
वह रावण पर।
नपुंसक तो नहीं था रावण।
लक्ष्मण :  (क्रोध से दाँत भींचकर घृणा से कानों पर हाथ रखते हुए)
बस बस
बस करो राजा राम !
बस करो मर्यादा पुरुषोत्तम !

(झुंझलाकर)

मुझे हट जाना चाहिए यहाँ से।

(एक ओर मुँह फेर लेता है।)
सीता :  (अफसोस और झुंझलाहट के साथ) ओह ! विश्वास ! विश्वास !

किसी और पर नहीं
अपने आप पर सीखें विश्वास करना राम !
अपने आप पर।
हल तभी है
संबंधों के ताप का।
अपने आप पर सीखें विश्वास करना राम
जैसे करती है सीता।

पार्थिव अगर रावण था
तो राम भी नहीं है अपार्थिव।

(ग्लानि)

सोचे भी तो कैसे सोचे सीता ?
यह क्या सोच रहे हैं राम ?

करें विश्वास
अपने आप पर !

नहीं था क्रूर
रावण-प्रस्ताव भी इतना।

नहीं थी क्रूर
धमकियाँ भी इतनी राक्षसियों की।

समेट लो इसे राम
यह आघात मेरी आत्मा पर है
जो पास है सदा तुम्हारे ही।

चाहो
तो झकझोर लो किसी वृक्ष को टहनियों से
नोंच लो खाल क्रूर होकर
पर क्षार मत डालो जड़ों में।

विश्वास करें आप
अपने आप पर।

(ठहर कर)

मत बनाओ सीता को याचिका
यूँ मत बिठाओ चौराहे पर
सीता को।
सीता पत्नी है।
राम :  (असहमित से) नहीं सीता !
समस्या यह नहीं
कि मैं करता हूँ विश्वास या नहीं
अपने आप पर।

समस्या यह नहीं
कि मैं स्वीकार कर सकता हूँ कि नहीं
तुमको।

पर मैं
जो कि पुरुष है
समझता हूँ पुरुष को।

हर ‘मैं’
जो कि पुरुष है
अधीन है ‘पुरुष’ के।

इसे समझो सीता
नहीं है पुरुष का ‘मैं’
पुरुष से निरपेक्ष।
मैं नहीं चाहता
विस्तार से कहना
करना तुम्हें लज्जित।

तुम स्वतंत्र हो
थाम लो हाथ किसी का भी।
(रुककर-आदेश के स्वर में)
निर्णय है यह सीता
कोई परीक्षा नहीं है।
सीता :  (व्यंग्य से) वाह ! मेरे पुरुष राम ! वाह !
यह आप कह रहे हैं
थाम लूँ हाथ किसी का भी।
कितना सहज है यह वाक्य पुरुष के पक्ष में।

(क्रोध से)

जूठन नहीं है सीता
फेंकी गई पत्तलों की।

(व्यंग्य हँसी हँसकर)

मेरे राम !
यदि न होता विश्वास सीता पर
तो सच कहो
कह सकते थे यह वाक्य कभी।

सोचो
अगर ओछे आदेश पर आपके
थाम ही लूँ हाथ मैं
नीच नारी सा किसी का भी
तो हिल न जाएगा आपका यह वंश
और हिल न जाएँगे
खुद आप भी।
समझो राम
यह विश्वास ही है सीता के प्रति
जो कह गए हो ऐसा वाक्य भी।

क्षमा नहीं किए जाओगे राम
सीता सी नारियों से
किसी भी युग में ?
नहीं किए जाओगे क्षमा
ऐसे
ओछे वाक्य पर।

आर्य हो राम
ऐसा तो शायद
नहीं कहते राक्षस भी।
विश्वास :  (राहत की साँस लेकर घुटनों के बल बैठ कर) मैं धन्य हूँ।
धन्य हूँ सीता।
यह दास विश्वास
धन्य है।

भाव ही नहीं
मैं हो सकता हूँ विशेषण भी।

मुझे तारा है आज
एक बीहड़ नदी से।
(बैठ जाता है।)
राम :  (मुख पर झुंझलाहट और गुस्सा) हठ न करो सीता
तर्क नहीं है राम
आस्था है।

आस्था है जन-समुदाय की।
आस्था की थपकियों में
सोने दो समुदाय को
मत दिखाओ चिन्गारी तर्क की।
राम मुक्ति नहीं
बंधन है।
निर्लज्ज न बनो सीता
देखो
किस ओर से नहीं उठ रही तुम पर
संदेह की मूक उँगलियाँ

राम नहीं काट सकता उन्हें सीता !

एक भी अगर की कोशिश
राम खुद कट जाएगा
राम की हिल जाएगी प्रभुसत्ता।

राम पर्याय है
समर्थन का
समझो, इसे सीता।

नहीं होती घर किसी की
कोई भी
राजनीति।

सत्य कुछ नहीं है राजनीति में
पर ढोंग भी नहीं है।
केवल अटकलें हैं।

मत करो व्यर्थ अपने शब्दों को
बहुत तेज होती है धार
अटकलों की।
लक्ष्मण :  (उपहास की मुद्रा में) तब कहाँ रह गया फर्क
आप में और रावण में।
हनन तो हर हाल
इच्छा का ही हुआ न सीता की ?

विवश तो हर हाल
हुई न सीता ही ?

(दृढ़ होकर)

पर लड़नी होगी
लड़नी होगी लड़ाई सीता को
खुद ही।

आप पर छा गए रावण से भी
लड़ेगी सीता।

(सब सन्न रह जाते हैं। एक ओर ‘सन्नाटा’ और एक
महिला - ‘उत्सुकता’ का प्रवेश)
सन्नाटा :  (चौंककर) क्या
क्या कह गए हैं लक्ष्मण
राम की तुलना रावण से ?

राम ! राम !
रक्षा हो। रक्षा हो।

बिदक गए अगर पक्षधर राम के
धरे रह जाएँगे तर्क
काट दिए जाएँगे
वनस्पतियों से।

(उत्सुकता की ओर देखकर)

सुना तुमने उत्सुकता
क्या कह गए लक्ष्मण ?
भले ही दम हो बात में
पर
पर क्या पचा पाएँगे
पक्षधर राम के ?
उत्सुकता :  (हिस्स कह कर चुप कराते हुए)
अभी चुप रहो सन्नाटा
हो जाओ और गहरे।

देखने दो
देखने दो क्या होता है आगे।

वह देखो
एक और विधा
उतर आई है सीता के मुख पर।
सीता :  (लम्बा साँस लेकर) ठीक है मेरे राम, ठीक है
शायद नहीं जानते आप
खुद को ही नहीं
गिरा दिया है सीता को भी
बहुत नीचे।

भुला दिया है आपने
सीता के असाधारण को।
विश्वास :  (बैठे-बैठे हाथ उठाकर) क्षमा हो धरती।
क्षमा हो आकाश।
कैसा दाह है सीता के हृदय का।
कैसी अग्नि है आँखों में राम की।

मैं देख सकता हूँ
जलता हुआ लक्ष्मण
पूरा का पूरा।
यह कैसा अग्निकांड है ?
बुझा पाएँगे क्या
प्रलयंकारी मेघ भी
युगों के ?
सीता :  (आकाश की ओर देखकर)
ओ देव ! ओ अग्नि !
दाह मत करो मेरा
मात्र भीतर से
मुझे भस्म कर दो पूरा का पूरा
जला डालो
रावण स्पर्शित इस विवश देह को।

भस्म कर दो देव !
सीता नहीं जी सकती
नहीं जी सकती अब और ।

मुझे ले लो अपनी गोद में ओ देव ! ओ अग्नि !
नहीं लांघ सकती सीता
एक और
लक्ष्मण रेखा सी मर्यादा
युद्ध नहीं है सीता
सीता संघर्ष है
बस।
समर्पण ही लक्ष्य है सीता के युग का
सीता को ग्रहण करो देव !

(धरती की ओर देखते हुए)

ओ माँ ! ओ धरती !
देख रही हो न
अपनी इस बेटी को ?
रोक लो
एक और हरण सम्भावित।
अब और नहीं है धैर्य
किसी भी कैद में रहने का
सीता में।
प्रकट करो अग्नि को माँ ?
प्रकट करो।
(विचलित घुटनों में मुँह छिपाये बैठ जाती है। सब ओर मौन है)

(गिरते-पड़ते से एक पात्र ‘संदेह’ का प्रवेश)
संदेह :  (विवश, दार्शनिक स्वर में) मुझसे बढ़कर
अपने आपको
और जानता भी कौन है ?
संदेह हूँ मैं।

जो नहीं होता
होता हूँ मैं
और नहीं भी होता।
अभिशप्त हूँ मैं रहने को मूक
मैं नहीं अपना समाधान स्वयं।
सूली तक पर नहीं चढ़ सकता अपनी इच्छा से।
जानता हूँ सत्य
पर नहीं कर सकता उजागर उसे।

मेरी मृत्यु ही पर मुक्ति है मेरी।

जानता हूँ सीता का सत्य
पर समाधान तो नहीं हूँ न मैं
सिर्फ प्रश्न हूँ या फिर स्वीकार भर।

सूर्य को ओट में लिए
अंधकार हूँ मैं काले मेघों का।
भूली राहों का
एक भयावह जंगल हूँ मैं।

मुझे काट डालो
जला डालो मुझे।

ओ अग्नि देव
सीता ही नहीं -
विनती यह मेरी भी है।

हो जाओ प्रकट अग्निदेव !
हो जाओ प्रज्ज्वलित
हो सके
तो कर दो अस्तित्व ही समाप्त मेरा।
(पागल सा निकल जाता है।)

(पूर्ण अंधकार हो जाता है। फिर धीरे-धीरे अग्नि-प्रकाश फैलने लगता
है और लपटों का दृश्य पूरे मंच पर छा जाता है। अग्नि प्रकट होता
है।)
अग्नि : (विवश, दर्शकों की ओर देखकर) अग्नि हूँ मैं
नहीं हूँ सूत्रधार
रह गया हूँ एक पात्र भर।

मुझे आना ही पड़ा है
फिर एक बार।
नहीं जानता
समय उपयुक्त है भी कि नहीं ?

क्या
कोई भी समझ पाएगा कभी
समझ पाएगा कोई भी युग
जब जब जला है मुझमें जो भी
मैं खुद जला हूँ।
गुजरा हूँ
उतनी ही उतनी ही पीड़ा से मैं भी।

मुझे लगा है अपना रूप
कभी कभी षाप भी।
यह कैसी परीक्षा है मेरी ?
रह गया हूँ एक पात्र भर।

क्या सचमुच
कोई भूमिका नहीं है मेरी स्वतंत्र ?
क्या सचमुच ?

(रुकता है। सब ओर देखता है। फिर सीता को सम्बोधित करता है।)

आओ सीता !
लोगों की दृष्टि में
आ जाओ मेरी गोद में।

पर हूँ आज मैं यंत्र ही
तुम्हारी पवित्रता की जाँच भर।

(अत्यंत विव्श भाव के साथ)

कहाँ फँस गया हूँ मैं
स्थिर कर दिया है मुझे
किस जलधारा ने घेर कर
आज नहीं समझ पाएगा कोई भी।

शायद आएगा कोई युग
जब हर ओर आतंक होगा
जल रहा होगा
विश्वास धूँ धूँ अपनों तक का।
अपनों तक से मिलने के लिए
होगी जाँच पूरी।
गुजरना होगा
किसी न किसी जांच-यंत्र से
शायद समझ पाएगा
समझ पाएगा तब ही
निरुपायता विश्वास की।

आज तो आओ सीता
लोगों की दृष्टि में
आ जाओ मेरी गोद में।
विश्वास :  (भय से काँपते हुए) नहीं। नहीं।
ऐसा मत कहो अग्नि देव !
कथन नहीं
यह शाप होगा विश्वास को।

वर्तमान में हारे इस विश्वास का
भविष्य तो छोड़ दिया होता ?
छोड़ दिया होता भविष्य तो
दाँव पर लगाने से ?

अच्छा होता
मुझे छोड़ दिया जाता महासमुद्र की परतों में।
भोज्य बनकर प्राणियों का
इतना निरर्थक तो न हुआ होता
कोई तो वर्तमान हुआ होता मेरा भी।

मैंने देखा है अग्निदेव
देखा है उन्हें
न वर्तमान है जिनका न भविष्य ही।
मुझे मत छोड़ो अग्निदेव
मत छोड़ो अब किसी भी युग के लिए
बनने को भोज्य
संदेह के बाणों का।
मैं नहीं चाहता
अब नहीं चाहता और देखना
खराब होते अपनी मिट्टी।

(चला जाता है।)
अग्नि :  (ग्लानि के साथ) आओ सीता ! आओ !
अब एक यंत्र भर हूँ मैं जाँच का।

यह हस्तक्षेप मेरा
कितना कृत्रिम है और अवांछित
मैं जानता हूँ

कितना ही क्यों न दिखता हो यंत्र स्वचालित
नियंत्रित तो होता ही है न कहीं न कहीं ?
किसी न किसी कक्ष में ?

आओ सीता ! आओ
आओ इस प्रकोष्ठ में
मुझे करनी ही होगी जाँच उस आरोप की
न जिसका बीज है न वृक्ष ही।

(अग्नि सीता का हाथ थामे प्रकोष्ठ में ले जाता है। सब मूक खड़े
रहते हैं - प्रकोष्ठ की ओर देखते हुए। सर्वत्र मौन है। प्रकाश
सन्नाटा और उत्सुकता पर)
उत्सुकता :  (सन्नाटा को धकेलती सी)
नहीं सन्नाटा नहीं
यह तुम्हारी भूमिका नहीं
मेरी है - मुझ उत्सुकता की।

मौन तुम्हारा ही नहीं
सखा मेरा भी है।

(सन्नाटे को मंच से बाहर कर देती है)

कभी थी सीता प्रतिरूप मेरी
याद आती है अशोक वाटिका
आज राम हैं बिम्ब मेरा

देखो तो
देखो तो

(कुटिल सी मुस्कुराहट)

चेहरे लोगों के।

(प्रकाश उत्सुकता पर से हट जाता है। अग्नि सीता को लेकर प्रकोष्ठ के बाहर आते हैं। सीता का सिर झुका हुआ है और वह मौन है। सब लोग जिज्ञासा के साथ देख रहे हैं। राम भी टकटकी लगाए हुए हैं। एक ओर से बात करते हुए ‘उद्घोषणा’ और ‘सूचना’ का प्रवेश।)

सूचना :  तुम कहो न उद्घोषणा
साँप तो नहीं सूँघ गया
तुम्हारे चहकने
और मटकने को।

(मुस्कराती हुई)

बोलो बोलो
छोड़ो भी यह लाज-शर्म ?

(गम्भीर होकर)

पर मूल्य है भी कोई अब इन शब्दों का
युग के इस निर्लज्ज पड़ाव में ?
उद्घोषणा :  नहीं
तुम्हीं कहो सूचना।
कितना थक गई हूँ न मैं ?

शायद हम दोनों ही ?

क्या अब भी
कोई शेष है भूमिका हमारी ?

आओ सूचना आओ
कम से कम
हम तो न बनें सहभागी
गिद्ध से।

जहाँ कहीं भी हो
पड़ा रहने दो शव विश्वास का।
खाने दो खाना हो जिन्हें
नोंचे
जिन्हें नोंचना हो।

हम तो चलें
आओ
हम क्यों बने सहभागी इस दृश्य की।
(चली जाती हैं। उदास-उदास, गम्भीर-गम्भीर।)
उत्सुकता :  (गम्भीर)
पर मेरी तो अभी शेष है भूमिका।

सब कुछ
होते हुए साफ भी
मेरी तो अभी शेष है भूमिका।
उत्सुकता हूँ मैं।
परिचित कथानक में भी
हर आने वाला मोड़
प्रतीक्षा होती है मेरी ही।
जाएँ, जिन्हें जाना हो
मेरी तो अभी शेष है भूमिका।

(नाचता-कूदता सा ‘हर्ष’ मंच पर प्रवेश करता है। उत्सुकता को
गम्भीर देखकर उसे सम्बोधित करता है।)
हर्ष :  (चकित) उत्सुकता ?
तुम ?
तुम अभी तक बनी हो गम्भीर
यह क्या हो गया है तुम्हें ?

कहाँ हैं सूचना
और उद्घोषणा भी ?

क्या सभी भूल गए हैं अपनी भूमिकाएँ ।

क्या सचमुच याद नहीं
किसी को भी
संवाद अपने।
यह कैसे युग का संकेत है ?

कोई बंध ही नहीं रहा किसी सूत्र में।

क्यों लग रहा है मुझे
क्यों दिख रहे हैं मुझे
सब
स्वतंत्र होते हुए
अपनी-अपनी इकाई पर।

यह किस युग का संकेत है जहाँ
खोजे
नहीं मिल पा रहा है कोई केन्द्र
मुझे क्यों बदलती नजर आ रही हैं
परिधियाँ
केन्द्रों में
और केन्द्र परिधियों में।

यह कैसी
कैसी देख रहा हूँ गडमड।

कहीं भ्रम तो नहीं है मेरी आँखों का ?

(दोनों हाथों से हथेलियाँ ढाँपकर)

मुझे मूंद ही लेनी चाहिएँ आँखें उस ओर से।
मैं क्यों देखूँ
क्यों देखूँ उस ओर
जो मेरा युग ही नहीं
और न संदर्भ ही।

(थोड़ी देर को चुप रहता है। सब की ओर देखता है।)

अरे !
सब मौन क्यों है ?

(इधर-उधर देखते हुए)

मुझे तो नहीं दीखता
कहीं सन्नाटा भी।
रहो
रहो चुप जिसे रहना है।
मैं क्यों रहूँ ?

मैं हर्ष हूँ - अपार हर्ष
कब रह सका हूँ मौन ?
मेरा नहीं है धर्म
रहना रहस्य की गुफाओं में।

फक्कड़ हूँ मैं
कब पच सकी है बात मेरे पेट में ?

अरे ! अरे !
देखो तो कितना दर्द हो रहा है मेरे पेट में।

(पेट की ओर देखते हुए और उस पर हाथ फेरते हुए)

कितना फूल गया है कम्बख्त ?

कोई है
कोई है जो अभिव्यक्त करे
मेरे पेट को
मुक्त करे इसे पीड़ा से ?

(कूदता है)
(मंच पर विश्वास भी आ जाता है। बुढ़ाया-बुढ़ाया सा है।)
विश्वास :  हाँ
है साँस अभी कुछ मुझ में।
चौंकिए मत।
मैं विश्वास ही हूँ।
कभी कभी
बिना आयु के भी देखा होगा
वृद्ध होते आपने।

विश्वास हूँ मैं
कम से कम
मुझ पर तो विश्वास कीजिए।
न सही व्यक्तियों पर
मुझ पर तो कीजिए।

(हर्ष को देखते हुए)

नाच ले हर्ष
नाच ले चाहे जितना

खबर मुझे भी है
बल्कि थी ही
पर नहीं हो सकता
छिछोरा मैं ?

मैं नहीं हूँ मात्र वर्तमान
न ही अतीत हूँ महज ।
फैलती है मेरी भूमिका भविष्य तक
भविष्य के भी भविष्य तक।

भले ही
कोई भविष्य न हो मेरा
कम से कम दीखता।

आज हुई है हत्या मेरी
मात्र अपमान नहीं,
हत्या भी।
मैं नहीं नाच सकता।
नाच ले हर्ष
मैं नहीं हूँ अबोध बालक।

(चला जाता है। पीछे-पीछे हर्ष भी।)
अग्नि :  (सिर नीचा किए हुए सीता की ओर देखकर दृढ़ता के साथ)
तुम्हारा नहीं पुत्री
इतिहास देखना चाहता है
सिर नीचा किसी और का।

इन तमाम लोगों का
जो बन नहीं सके
आवाज तक प्रतिरोध की।

कास ये पत्थर से लोग
पत्थर ही बन जाते
और रोक पाते उस राह को
ले गई जो तुम्हें
परीक्षा-प्रकोष्ठ में।

तुम ऊँचा करो सिर, सीता
तुम ऊँचा करो।

लोक साक्षी हूँ मैं, न्यायाधीश
शुद्धता का माप हूँ।

सिर ऊँचा करो।

क्या सचमुच नहीं जानते थे ये लोग
और स्वयं राम भी
कि तुम पवित्र थी
जितनी की हो।

(संगीत-ध्वनि। सब के चेहरों पर राहत। प्रसन्नता भी। राम भी
थोड़े तनाव हीन।)
जन-समूह :  जय हो
अग्नि की जय हो।
अग्नि :  (झुंझलाकर) फिर वही स्तुति !
और अगर
प्रतिकूल होता निर्णय
क्या तब भी जय होती ?

और अगर अपेक्षित थी अनुकूलता ही -
नहीं अभीप्सित
तो फिर
क्या अर्थ भी कोई है
इस जय को
कंधों पर उठाने का ?
(मंच के अगले सिरे पर आकर रुकता है।
दर्शकों को देखते हुए)

सब में निहित है
कहीं न कहीं
जय और पराजय।

कहीं न कहीं निहित है
कसौटी भी
पहचान की।

कौन नहीं है अग्नि ?

क्या नहीं है स्वयं राम ?
क्या नहीं है
एक एक जन ?
या स्वयं सीता ही ?
फिर जय क्यों ?

क्यों यह अग्नि प्रणाली ?
काश कि मैं कर पाता
खण्ड खण्ड इसे
खण्ड-खण्ड
खण्ड-खण्ड

(चुप हो जाता है। जन-समूह भी चुप खड़ा है।)
(अग्नि फिर सीता को सम्बोधित करता है। सीता का सिर अब भी
झुका है मानो गढ़ी जा रही हो।)

अग्नि :  (तीव्र स्वरों में) मैं जानता हूँ
अन्याय है यह
पक्षपात है।
जानता हूँ
प्रतीक है एकछत्र सत्ता की
केवल तुम्हारी जाँच।

(उत्तेजित होकर)

और कह कर रहूँगा मैं आज
चुनौती है मेरी
आज नहीं रोक सकते स्वयं राम भी

(नरम पड़ते हुए)

पर जानता हूँ
तुम नहीं कर सकती माँग
राम की जाँच की।

नहीं कर सकती माँग
हिल जाएगा ब्रह्माण्ड ही।
कंधों पर टिके पुरुषार्थ के
यह ब्रह्माण्ड भी।

व्यक्ति का ही नहीं
पूरे युग का भी होता है
एक संस्कार फौलादी।
नहीं भेद पाओगी तुम
उसे इस युग में।

तुला पर तुम्हें ही चढ़ना होगा पुत्री
मैं नहीं जानता
कब तक।

(थोड़ी देर चुप रहता है)

पर कितना विशाल हो वक्ष समुद्र का
कितना ही सीमित कर दे निगाहों को
यह विशालता समुद्र की
छोर तो होता ही है न दूसरा भी।

प्रतीक्षा करो सीता
प्रतीक्षा करो उस युग की
जब तुम्हारा नहीं,
झुकेगा शीश
लोगों का
और राजा का भी।

(दृढ़ होकर राम की ओर देखते हुए)

आदेश है मेरा राम को
स्वीकार करें वे
तुम्हें
इसी क्षण।
ग्रहण करें एक दण्ड भी
नहीं कर सकेंगे राम
प्रायश्चित भी।

घुटेंगे
केवल घुटेंगे भीतर ही।
नहीं कर सकेंगे व्यक्त मन को।
मन के जल में लगी
उस आग को।

(राम सब कुछ स्वीकार करने की मुद्रा में।)

घुटूँगा स्वयं मैं भी
मैं भी, मृत न्याय के इस अध्याय पर।
(टूटी गति से प्रस्थान)
(सीता राम की ओर हल्का सा सिर उठाकर देखती है। राम सीता को
स्वीकार करने की मुद्रा में। पर सीता विचार मग्न हो जाती है।)
सीता :  (भारी मन से। आवाज पृ्ष्ठभूमि से)
देख रही हूँ भविष्य
अग्नि ने लिया है पक्ष सत्य का
स्वीकार भी हुई है सीता, राम को
पर कौन सी सीता ?

कहाँ रह गई है सीता
अब वही।

नहीं है सीता केवल पशु
वह सोचती भी है।

जुड़ा भी हो राम का खण्डित विश्वास
पर नहीं होगा क्या
दिखावा भर ?

विश्वास जुड़ता भी कहाँ है टूट कर
रस्सी भी तो नहीं होता विश्वास।
कभी भी फुत्कार सकता है सर्प
खण्डित विश्वास का।
राम नहीं है नारी।
सीता मर चुकी है
मर चुकी है सीता स्वयं।
कितनी भयंकर थी जाँच
अग्नि की ?
कितनी भयंकर थी
भीतर तक लगी आग और लपटें।
कितना भयंकर था
स्वाहा होते स्वाभिमान का दृश्य ?

ओह !
गोद में उठाए
यह शव स्वाभिमान का
सीता जीवित ही कहाँ है ?

(राम की ओर देखती है। राम सीता के लिए खड़े हुए हैं।)

कहाँ जीवित हैं
अब राम भी ?
मूर्छित संदेह को लाश सा उठाए
कहाँ जीवित हैं
मेरे राम भी ?

यह कैसा समझौता है
दो मृतकों का ?
यह कैसा समझौता है विधाता ?
आह !

(सीता धीमे से उसी भाव में एक पाँव आगे बढ़ाती है। राम
की बाँहें फैल जाती हैं।)

(मंच पर पागल सा हर्ष)
हर्ष :  (धीमी और प्रयत्न साध्य हँसी हँसते हुए)
आ हाहा हा हा !
आ हाहा हा हा !

क्या मैं भी हूँ
बस एक संज्ञा भर मृत

नहीं, नहीं
मैं हर्ष हूँ।

पर कुंठित क्यों है मेरे विशेषण।
किस रोग से ग्रसित है यह हँसी
यह खु्शी
सब।

यह कैसा समझौता है विधाता !

यह क्या था लोगों के चेहरों पर ?
मुख पर राम के ?
और स्वयं सीता के ?

यह कौन सा ह्र्ष था
जिसे खुद मैं नहीं पहचानता ?

(दर्शकों की ओर देखकर)

क्या आप पहचानते हैं ?
पहचाना आपने ?
(मुँह लटकाए माथा पकड़ कर बैठ जाता है। अधमरे संदेह का प्रवेश)
संदेह :  (मरी हुई आवाज में)
आह ! आह !
न मृत हूँ मैं न जीवित ही
यह कैसा अभिशाप है युग को
न्याय होकर भी कहाँ हुआ न्याय ?
मैंने देखी है हत्या होते हुए विश्वास की
मैंने देखा है आत्महत्या की ओर जाते हुए अग्नि को।
आह !
कितनी क्रूर होती है बेवजह की गई जाँच भी !
कितनी अपमानजनक !
साक्षी हूँ मैं

(अपनी ओर इंगित कर)

साक्षी है यह संदेह।
ओ काल ! क्या छोड़ दिया गया है मुझे ? छोड़ दिया कारण को ही ?
अब कौन सी भूमिका है जिसे निभाना है।
थका हुआ मैं -
अब और नहीं उतरना चाहता मंच पर।
बस
अब और नहीं। और नहीं उतरना चाहता मंच पर।
(गिर जाता है। पृथ्वी के प्रकट होने का दृश्य)
पृथ्वी:  (व्यग्र)
ठहरो समय। ठहरो दिशाओ
अभी शेष है मंच पर आना मेरा।
शेष है मुझ पृथ्वी की भूमिका।

जानती हूँ अनाहूत हूँ मैं।
मुझे नहीं दी गई है कोई भूमिका
नहीं दिए गए हैं संवाद भी।
माँ हूँ पर - जीया है एक-एक क्षण मैंने पुत्री का
चुप रही हूँ मैं - प्रतिमा बनी सहिश्णुता की
मुझे याद है जनक वाटिका, याद है स्वयंवर का वह हर्षित समय खंड
भी।
याद है पंचवटी और भूली नहीं हूँ अशोक वाटिका भी।
छुप ही क्या सकता है मेरे विस्तार में ?
पर माँ भी तो हूँ मैं ब्याहता सीता की ?
क्या सचमुच हस्तक्षेप नहीं हो सकती माँ ब्याही पुत्री के समझौते में ?
किसी भी समझौते में ? क्या सचमुच नहीं ?
(संदेह की ओर देखकर)
नहीं
मैं हूँगी हस्तक्षेप भी। मैं हूँगी।

क्या यही है प्रतिफल समझौते का ?
यह कैसा परिणाम है अग्नि परीक्षा का ? संदेह मर कर भी जीवित !

(एक दिशा विशेष में देखते हुए जिधर राम-सीता गए थे)

नहीं नहीं पुत्री - भले ही न दी गई हो, कोई भूमिका माँ को
पर जीवित है जब तक यह अधमरा संदेह
नहीं हो सकती माँ भूमिकाहीन भी।
(संदेह कराहता है। उठने की कोशिस करता है पर गिर जाता है)

पृथ्वी :  सावधान पुत्री ! सावधान !
खोजनी होगी स्वयं एक भूमिका अपने लिए
खोजने ही होंगे संवाद इस भूमिकाहीन मंच पर।
लो पकड़ कर भविष्य की गर्दन खाती है कसम यह माँ
मैं तुम्हारे साथ हूँ पुत्री, साथ हूँ हस्तक्षेप सी
अब और नहीं होगा कोई मृत समझौता।

(व्यंग्य से)

उहँ ! क्या खूब दिया है संरक्षण राम ने -
क्या इसीलिए ब्याहा था तुम्हें कि हरण हो तुम्हारा ?
क्या इसीलिए ब्याहा था तुम्हें कि एक दिन भी न भोगो
पति का ऐश्वर्य ?
क्या इसीलिए ब्याहा था क्या इसीलिए
कि पहुँचा दिया जाए तुझे एक मृत समझौते पर, झोंक दिया जाए
आग में ?

(सम्भलती है)

जाओ पुत्री जाओ
नहीं हो सकता किसी काल का विस्तार मुझसे बड़ा।
न अयोध्या अछूती है मुझसे, न कोई वन भूमि ही।

साक्षी रहे युग-खण्ड
अब हुआ यदि कोई और अपमान, बंद हुई बाँहें राम की
तो यह पृथ्वी देगी गोद स्वाभिमान की, यह पृथ्वी तुम्हारी जननी,
पुत्री!
कोई अग्नि नहीं, कोई भी अग्नि नहीं, खण्ड-खण्ड अग्नि भी नहीं।

(इति)


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