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06.28.2014


खण्ड-खण्ड अग्नि
दिविक रमेश

दृश्य - 4

(अशोक वाटिका। राक्षसनियाँ खड़ी हैं। विभीषण पत्नी सरमा (सीता की हितैषणी) भी मौजूद है। सीता के समक्ष हनुमान हाथ जोड़े खड़े हैं। एक कोने में हर्ष है)
हनुमान : (विनीत होकर)
माँ !
हम धन्य हुए।
विजयी हुए हैं श्री राम माँ !
हम स्वतंत्र हैं।

(सीता के मुख पर अपार प्रसन्नता पर चुप्पी साधे हुए)
हर्ष : (धीमे धीमे)
हर्ष हूँ मैं
चुप्पी है
अतिरेक मेरा ही।
हर्ष हूँ मैं।

ज्वार हूँ
हृदय में सीता के
मैं धन्य हूँ।
बढ़ता हूँ
ज्यों ज्यों देखता है हृदय
सीता के मुख को।
संभलता हूँ..... संभलता हूँ।
(ऐसी मुद्रा बनाता है मानो सीता को हर्षातिरेक की स्थिति से
उबार रहा हो। चला जाता है।)
सीता : (खुश होकर संतोष से)

तो माया नहीं थी उद्घोषणा।
हनुमान !
तुम प्रमाण हो सृष्टि के।
जानती थी मैं
विजयी ही होंगे राम।
मैंने कभी नहीं मानी हार
मेरा मन जानता है।
हनुमान : तुम ही हो माँ
जीते हैं प्रभु
तुम्हारे ही पथ-बल पर।
सीता : (हर्ष के साथ थोड़ी झुंझलाहट भी)
ओ !
मुझे नहीं चाहिए कीर्ति
मुझे नहीं चाहिए श्रेय,
स्तुति। (रुक कर)
कैसे हैं प्रभु
आदेश क्या उनका
सरमा : समझें हनु
समझें सीता को। सीता की उत्सुकता को।
अब ठीक नहीं और देरी।
साक्षी है यह सरमा - भार्या विभीषण की,
साक्षी है सीता के मन की।
वह सेतु
जो पड़ा है भंग अब तक
उसे जोड़ें हनु !
(विचार मुद्रा में)
बहुत कठिन होती हैं ये नदियाँ मन की।
अब कह भी दें।
कह भी दें - संदेश प्रभु के मिलन का।
हनुमान : (सीता की स्थिति को समझते हुए)
माँ !
निश्चिन्त हों आप अब
प्रभु का संदेश है
उपनिवेश है अब लंका
घर है आपका।
संतुष्ट हैं प्रभु।
हुई है प्रतिज्ञा पूरी
आपके उद्वार की।
सार्थक हुआ है समुद्र का बँधना,
नींदें व्यर्थ करना रातों की
और वध
रावण का !

अब राजा हैं विभीषण
भक्त
यानी मित्र हैं प्रभु के।
सीता : (राहत की साँस लेते हुए)
मैं धन्य हूँ
चन्द्रमा आ
आ मुझ पर छा जा।

(कुछ रुकती हैं, सोचती हैं और रहस्यमयी दिखती हैं)

साधारण नहीं है यह संदेश !
साधारण रहा ही कब
सीता के जीवन में ?

श्रृंखला है सीता
असाधारण की।

तत्पर है सीता।
(कुछ और जानने के लिए हनुमान की ओर देखती हैं।
तदन्तर लाचार सी सरमा को निहारती है।)
सरमा : वह बात भी कहो न हनु
जिसे नहीं कह पा रहे आप
आदेश ही क्यों न हो जो
जिसे सुनने को
सीता ने की है प्रतीक्षा

समझें हनु, कुछ तो समझें।
सीता (प्रश्नाकुल)
क्यों है शून्य हनुमान
क्यों नहीं हो रही अभिव्यक्त
मेरे नेत्रों की प्यास ?

क्या हो गई है अर्थहीन
घिसे हुए शब्दों सी।
हनुमान : (करबद्ध भारी मन से)
अब आज्ञा दें माँ !
सीता : (चौंक कर)
आज्ञा ?
मैं ?
सीता !
आज्ञाकांक्षिणी है जो
उससे माँगते हो आज्ञा ?

(सीता मानो अपने आप से बोलती है - आवाज पृष्ठभूमि से)

यह कैसे मेघ हैं?
दीखते हैं
बोझिल जल बिन्दुओं से।
पर कितने निष्क्रिय
क्यों नहीं बरसते ये ?

यह कैसा मधुछत्ता है
लबालब भरा।
पर टपकता क्यों नहीं ?
तो क्या नग्न हो जाए सीता
निर्लज्ज कर दे भाव को
क्या....
(सीता के ध्यान को बीच में तोड़ते हुए हनुमान बोलता है)
हनुमान : (हाथ जोड़कर)
माँ !
संदेश दो प्रभु के लिए।
कितने उत्सुक होंगे वे ?
सीता : (स्वर में कष्ट)
और मैं ?
देखो हनुमान
देखो इस मन को
अब भी छाप है जिस पर....
(रुककर)

संदेश ?
सीता का संदेश ?

पहले पूरा तो करो वत्स
संदेश प्रभु का...

(बावली सी सीता थोड़ी देर चुप हो जाती हैं। कुछ सोचती हैं।
फिर दृढ़ मन होकर कहती हैं।)

हाँ !
अगर इतना ही था संदेश प्रभु का
अगर इतना ही था
तो कहना हनुमान प्रभु से
नई नहीं है कथा विजय की
तो भी बधाई हो प्रभु को
फिर प्रमाणित हुआ है उनका बल ही।

(व्यंग्य से)

कहना हनुमान प्रभु से
सीता वस्तु नहीं, नारी है
कुछ प्राण भी हैं उसमें
पत्नी है उनकी, हृदय वल्लभा।

(रुक कर - गहरा साँस लेते हुए)

तो भी
छोड़ कर मर्यादा युग की
माँगती है, हाँ मांगती है हनुमान
दर्शन
अपने ही प्रभु के।

चाहती है
चिर-प्रतीक्षित वह आलिंगन
तिल तिल जी है
सीता जिसके लिए।

वह तूफान चाहिए प्रभु का
जो शांत कर दे
उठे तूफान को
सीता के हृदय में

(लाचार सी)

बस !
और मत झुकने दो हनुमान
इन पेड़ों
इन हवाओं के नेत्रों को
लाज से।

बस।

(रुक कर)

क्या सचमुच नहीं दिया आदेश
या संदेश ही
मेरे बुलावे का
प्रभु ने ?

विजय पहली तो नहीं
कि भूल जाएँ मद में
स्वाभिमान सीता का ?

(हनुमान विचलित नज़र आते हैं।)
हनुमान : माँ !
माँ !
(और कुछ बोल नहीं पाते। खिन्न-मौन लौट आते हैं। मंच पर एक
पात्र ‘विश्वास’ का प्रवेश)
विश्वास : (गम्भीर)
कितना भयंकर होता है
मेरा डिगना !
संदेह की एक उठी हुई उँगली भी
ढहा सकती है
पूरा भवन ही।
मैं विश्वास हूँ
मेरा होना ही
सागर है लहराती प्रेरणाओं का।
मेरा होना ही
जीवन है क्रिया का
मेरा होना ही
अमृत है संबंधों का।

माने, न माने कोई
मैं ही हूँ सत्य।
मैं ही हूँ सुन्दर।
मैं ही हूँ शिव।

नहीं है यह आत्म प्रवंचना
मूढ़ता भी नहीं है।
साधना और सिद्धि
जहाँ खोए होते हैं मिलन में
वहाँ भी
होता हूँ मैं ही।

(मंच से प्रस्थान)
सीता : कितना अविश्वसनीय है सब !

हनुमान का मौन ?
लौट जाना निरुत्तर।
कितना अविश्वसनीय है सब ?

(विचलित सी मंच के एक कोने सक दूसरे कोने की ओर चलती है। सरमा सम्भालती है। सीता को बैठा देती है।)
(एक ओर से उद्घोषणा और दूसरी ओर से सन्नाटा का प्रवेश)

उद्घोषणा : (प्रसन्न चित्त)
सुनें सब ! विजयी हुए हैं राम ।
सम्मानित हैं राक्षस-राक्षसियों से।
सुनें सब !

सीता भी सुने
विजयी हुए हैं राम।

अब राजा हैं विभीषण
भक्त
हाँ, मित्र राम के।
सन्नाटा : (झुंझलाहट के साथ मुँह बनाकर)
उफ्
कैसी है उद्घोषणा !
कितनी मुखर है यह
इसे बस बोलना है।

और मैं ?

मैं जिसे ज्ञात है ‘मौन’ राम का
जिसने झांकी है
‘चुप्पी’ सीता की ?

(विवशता का भाव)

बोलूँ तो कैसे बोलूँ ।
क्या बोलूँ ?
मैंने सुना है राम को।

मैंने सुना है
एकान्त
चुप राम के
ध्वनि-विस्फोटों को।

क्यों नहीं हो गया मैं बहरा ?
(धीमे-धीमे मंच से बाहर चला जाता है। सूचना का प्रवेश-हर्ष
का हाथ थामे हुए)
सूचना : आओ हर्ष आओ।
मुझे गुंजाना है संदेश राम का।
हो जाए कोई बहरा, या अन्धा ही
मुझे क्या ?
सूचना हूँ मैं
मुझे तो सूचित ही करना है
भाव तो नहीं हूँ न मैं, न विचार ही।
जो हैं -
क्या गुजरती है उन पर
मुझे क्या ?

(कुटिल मुस्कान)

स्वायत्त हूँ मैं।

(गम्भीर होकर)

सूचित हो, राम ने
भेजा है विभीषण को
लिवा ले जाएंगे जो
सीता को राम तक।
(चले जाते हैं। सन्नाटा पहले ही जा चुका है। मंच पर एक
कोने में सीता। दूसरी ओर से विश्वास का आगमन)
विश्वास : (दुखी होकर)
आह !
एक और आघात !
एक और प्रहार इतना गहरा।

पर सहूँगा
होने दो आघात पर आघात
सहूँगा।

(गर्दन झुका लेता है)

विवश मैं
कर भी क्या सकता हूँ ?

बंधा हूँ

खुद अपने ही संस्कार में।

(विवश होकर)
अधिक से अधिक
एक घटना ही तो हूँ मैं।
प्रतिकार तो नहीं है न
मेरा धर्म ?

(प्रकाश सीता पर)
सीता : स्तम्भित (भौंचक्की-सी)
यह क्या सुन रही हूँ मैं - यह क्या हो रहा है सूचित
लिवा ले जाएँगे विभीषण सीता को राम तक !
विभीषण ?

(सरमा की ओर देखकर)

सुना तुमने सरमा
सीता जो ब्याहता है राम की
सीता जो प्यार है राम का
लिवा ले जाएँगे उसे विभीषण राम तक !

(थोड़ी व्यंग्य मुद्रा के साथ)

वही है न मेरे राम
जिन्हें देखकर पहले पहल
मुंद गए थे
झट पलकों के द्वार ?

उतर आए थे राम
भीतर से भीतर तक।

वही हैं न राम
पिता की विवशता पर
जिन्हें क्षण भर को भी नहीं हुई थी दुविधा ?
वहीं है न राम
कितनी तत्परता से खा लिए थे बेर शबरी के ?
क्षण नहीं लगा था जिन्हें
अहल्या के उद्धार में !

(उलाहने के स्वर में)

फिर कौन सी थी बाधा आज
जो दौड़े नहीं आए राम
दौड़े नहीं आए मुझ तक ?

सरमा शांत हों आप !
राम वनवासी हैं
शायद वर्जित हो उनके लिए
प्रवेश
लंकापुरी में,
आप शांत हों महारानी।
नारी हैं हम। अनुकर्त्ता हैं।
हो तो नहीं सकती न अनुकरणीय
सीता : अनुगतिक कहो सरमा
अनुगतिक

(बैचेन हो उठती है)
विश्वास : (एक कोने में निराष)

आह !
वही हुआ न
भयभीत था जिसे मैं सोचकर
चिन्दी-चिन्दी उड़ने को है मेरी।
मुझे बचाओ।
मुझे बचाओ वनस्पतियो !
मुझे बचाओ हवाओ !
आदमी के संदर्भ में
मुझे बचाओ पक्षियो, प्राणियो !

(कातर स्वर में)

अकाल मृत्यु की गोद से
मुझे बचाओ सब मिलकर।
लील लेगा मुझे
यह प्रश्नों का महासमुद्र
सीता के मुख पर।

(घुटनों के बल बैठ जाती है। सिर नीचे है। धीरे-धीरे निगाहें
उठाती जाती हैं)
सीता : (अपने पूर्व विचारों के क्रम में ही पर आत्म विश्वास के साथ)
क्या प्यार पत्नी का
नहीं रखता कुछ आग ?
क्या देना एक प्यार महत्व
लज्जा है समाज में ?
क्यों ?
क्या सम्बन्ध नहीं है सामाजिक
यह पत्नी का ?

(धीरे धीरे खड़ी हो जाती है।)

यूँ भी
अगर आत्मसात् सत्ता ही है पत्नी
तो दौड़ नहीं पड़ते क्या हाथ
किसी भी अंग के
होते ही क्ष्ट में ?

(ऊपर से नीचे की ओर इशारा करते हुए)

देखी है मैंने तो
पूरी देह ही समर्पित
समाधान में।

(विवशता के भाव के साथ)

पर प्रश्न कोई भी हो
कोई भी हो समस्या
एकालाप में तो
नहीं हो सकता हल।

और राम ?
क्या समूह ही हैं केवल ?

(भाव मुद्रा बदलती है। सरमा का हाथ पकड़ लेती है।)

भले ही
आता हो आड़े स्वाभिमान
जाना ही होगा सीता को सामने राम के।
मानना ही होगा आदेश
विजयी राजा का।
सीता तत्पर है। मुझे तैयार करो सरमा !
विश्वास : (कातर)
क्षमा हो धरती !
क्षमा हो आकाश !
दि्शाओ ! क्षमा हो।
क्षमा हो हवाओ !
मैं विश्वास हूँ -

क्यों
और कहाँ
नहीं है विषय मेरा।
विश्वास हूँ मैं बस !
सहूँगा
हो आघात पर आघात
सहूँगा।

(प्रस्थान करने लगता है)
सीता :  (दुःखी एवं बेचैन) ऊपर की ओर देखते हुए।
डिगो नहीं, डिगो नहीं, ओ मेरी आस्था।

अनचाहे शब्दों
मत आओ तुम भी विचार बन कर।

कहीं विवश तो नहीं मेरे राम ?
होंगे विवश ही।

(थोड़ी सामान्य होकर अर्द्ध-दीर्घ साँस लेते हुए)

और फिर
भले ही कहें लोग हत्स्वाभिमानिनी
सीता प्रतीक है
संघरर्ष का।
सीता को
संघर्ष ही होना है।

ओ मेरी आस्था
रहने दो सीता को समर्पण ही !

(भाव मुद्रा बदलती है)

एक बार भी
बन गई अगर प्रश्न सीता
बुनियाद ही हिल जाएगी सत्ता की
रहने दो सीता को समर्पण ही
ओ मेरी आस्था !
(मंच पर अंधकार)


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