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05.28.2014


खण्ड-खण्ड अग्नि
दिविक रमेश

दृश्य - ३

(राम का शिविर स्थल। स्थान-स्थान पर हर्षोत्सव मनाए जा रहे हैं)
  एक जन समूह का सामूहिक गान -

जय हो राम जय हो राम
जय हो राजा राम की।

तुम्हें बधाई, हमें बधाई
जय हो राजा राम की।
हम जीते हैं तुम जीते हो
जय हो राजा राम की।

राम न होते तो क्या होता
जो होता था वो ही होता
रावण के हम चाकर होते
हम भोजन वह भक्षक होता

जय हो राम जय हो राम
जय हो राजा राम की
हम जीते हैं, तुम जीते हो
जय हो राजा राम की।

मूरख था सीता को पकड़ा
दिया राम ने अच्छा रगड़ा
पति धरम को खूब निभाया
सिया सती को अजी छुड़ाया
हम जैसे साधारण नाहीं।
और लोक से ये हैं आहीं।

जये हो राम जय हो राम
जय हो राजा राम की।
हम जीते हैं तुम जीते हो।
जय हो राजा राम की।

(राम का एकान्त में चिन्तन। सन्नाटा और उद्घोषणा छिपे हुए हैं।)

राम : (एकान्त में द्वन्द्व विचलित)
नहीं ! नहीं !
मैं नहीं हो सकता लोकोत्तर
अपवाद नहीं हूँ मैं अपनी दृष्टि में।
स्वीकार्य है मुझे, स्वीकार्य है
हूँ मैं सन्देहग्रस्त

केवल व्यक्ति नहीं हूँ मैं, न आत्मा ही
एक वश भी हूँ, लोक भी हूँ।

राम
एक समाज भी है
जन्मना-देहधारी।
नहीं है राम का कोई व्यक्तिगत संदर्भ।
शायद इसीलिए
माना जाता हूँ भगवान भी।
(सन्नाटा और उद्घोषणा छिपे-छिपे ही धीमी आवाज में बात करते हैं)
सन्नाटा :  (व्यंग्य मुद्रा)
सुना तुमने उद्घोषणा
सुना तुमने राम को और समझा भी ?
पर कहाँ सुन सकती हो तुम ?
सुनाना ही धर्म है तुम्हारा तो
नहीं हो न
किसी वाचाल स्त्री से कम

(हँसता है।)
(गंभीर होता है।)

पर मैं हूँ
जो सुन सकता है
आदमी को भीतर से भीतर तक

सन्नाटा हूँ मैं
जितना गहन होता हूँ
उतना ही स्पष्ट हो जाता हॆ आदमी मुझमें।

मैंने सुना है राम को
सूखे बाँस-तन सा
खा रहा है रगड़ हृदय
राम का।

(मुँह बनाते हुए)

उहूँ।
कहते हैं, नहीं है राम का कोई व्यक्तिगत संदर्भ !
उद्घोषणा : (भोलेपन से)
पर मैंने तो कुछ नहीं सुना
न ही सुनाया गया है मुझे कुछ नया।
आखिर क्या है जो छिपाया गया है मुझसे ?
मुझे क्यों लग रहा है डर तुम्हारी बातों से?
मेरा क्यों डिग रहा है उत्साह ?

कहो, कहो कि यह तुम्हारी ईर्ष्या है।

पर तुम, तुम चुप क्यों हो इतने
यही घड़ी जबकि हर ओर उल्लास है
तुम क्यों दिख रहे हो मनहूस से।

(गम्भीर होकर तथा थोड़े भय के साथ)

मैंने देखा है तुम्हें, सन्नाटा, देखा है तुम्हें
तुम जितना हो गए हो चुप
उतना ही उलझा है पेड़ों में कोहरा।
अँटी हैं तमाम राहें उतनी ही धूल से।

कितना कठिन हुआ है कुछ भी सूझना
और उद्घोषित करना मेरे लिए।
राम :  (एकान्त में)
केवल पति नहीं है राम
है वंश भी
और मात्र वंश भी नहीं
समाज है पूरा।
मूल्य है राम
एक आस्था है ब्रह्माण्ड की।

(इधर-उधर देख कर)

हाँ! समाज भी है राम
कोई रह जाए स्तब्ध सुनकर
तो रहे
कुल भी है राम
कोई हो जाए भ्रमित
तो भी स्वीकार है राम को।

नहीं कर सकता राम
स्वीकार
अपना ही विग्रह।

न सही सीता पर
पर क्यों न करे राम
सन्देह रावण पर ?

ये जो शान्त लहरों से
नजर आते हैं जन-समुदाय
बंधे हैं
शासक की साँकलों में।
होते ही जर्जरित साँकलें
धर दबोचेंगे वर्तमान को।
बोल उठेंगे ये
उठी हुई उँगलियों की भाषा में।

(दृढ़ता के साथ - लेकिन थोड़े अपराध-बोध के साथ भी)
नहीं
राम नहीं कर सकता स्वीकार
देहधारी सीता को।
सन्नाटा :  (कानों पर हाथ रखकर निराशा के साथ)
नहीं, नहीं, नहीं
मैं नहीं हूँ कान
एक स्थिति भर हूँ
मैं कुछ नहीं सुनता
नहीं सुनना चाहिए मुझे कुछ भी
पर अभागा भी हूँ कितना
सुन सकता हूँ आदमी को
भीतर से भीतर तक
गुण सकता हूँ।

भले ही

कालबद्ध हों जनसमुदाय
मैं कालातीत हूँ।

(हर्ष का एक ओर से प्रवेश। सारा प्रकाश हर्ष पर। दृश्य
अशोक वाटिका का। प्रसन्नचित है हर्ष)
हर्ष :  हर्ष हूँ मैं।
मैंने सुना है उद्घोषणा को
हर्ष हूँ मैं।

(सब ओर देखते हुए)

सब गाओ आज विजय गीत।
विजयी हुए हैं राम
तोड़ो यह सन्न चुप्पी।

सुना है न
पूरी की है प्रतिज्ञा राम ने।
किया है मुक्त सीता को
बाँधकर समुद्र।
सुना है न
विजयी हुए हैं पति सीता के।
सीता ?
भर्तुर्विजयकांक्षिणी

(प्रकाश - फिर सन्नाटा पर)
सन्नाटा :  (परेशान)
उफ्
क्यों नहीं हो जाता मैं बहरा।
(दोनों हाथ जमीन की ओर। प्रकाश-निर्मित समुद्र
की ओर फैलाकर)

आ समुद्र आ
ले समाहित कर मुझे अपने घोष में।
कर दे मुझे बहरा ध्यानस्थ मुनि सा।
कर दे मुझे बहरा आत्मलिप्त राजा सा।

यह कैसी भूमिका है मेरी
एक खोखला अन्तराल भर हूँ मैं।
(माथा पकड़कर घुटनों के बल बैठ जाता है। मंच पर
अँधेरा छा जाता है। सूचना का प्रवेश)
सूचना :  (उदासीनता और निराशा के भाव से)
हाँ मैं विवश हूँ
विवश हूँ मैं दास सी
नहीं झूम सकती सौभाग्य कह ?

सूचना हूँ मैं - स्वायत्त

(व्यंग्य की हँसी हँसती है)

स्वायत्त !
हाहा हाहा (अट्टहास)

(उदास और गम्भीर होकर रहस्यमय मुद्रा में)

उतना ही स्वायत्त
जितना चाहते हैं स्वामी।

(राम की ओर देखती है - हल्की मुस्कान ओंठों पर)
राम :  (एकान्त में - आत्म चिन्तन)
हूँगा मैं देवता
भगवान
अन्तर्यामी
सब कुछ।

पर छिपा तो नहीं सकता कोई अपना रूप
खड़ा हो जाए अगर
दर्पण के सामने।
थिर जल में
साफ दिखता है चेहरा।

पुरूषोत्तम ही सही
आदमी हूँ मैं
पुरुष हूँ भीतर तक पूरा
कैसे ग्रहण करूँ
सीता को ?

कोई वस्तु तो नहीं है न सीता
न कोश
न शस्त्र
न भूमि ही ?
सूचना :  (उदासीनता - व्यंग्य)
सूचना हूँ मैं
स्वायत्त

(अट्टाहास करती है)
उद्घोषणा नहीं
सूचना हूँ - तटस्थ
न मैं हर्ष हूँ, न विषाद
एक सपाट चेहरा हूँ -
उगलती हुई शब्द।
(दर्शकों की ओर चेहरा कर)

जानती हूँ
क्या असर होगा किस बात का।
जानती हूँ
कौन बात कहाँ के लिए होती है उपयुक्त।

पर सूचना हूँ मैं - मुझे कुछ नहीं सोचना।
मुझे खुद गला घोटना होता है अपनी जानकारी का !

मैं सूचना हूँ महज
अपना जिसका कुछ नहीं ‘स्वायत्त’।

राम : (एकान्त में विवशता के भाव के साथ)

आह!
कितना सुखद होता है
रहना कार्यरत।

कितना सुखद होता है
संघर्ष लक्ष्य का।
और कितना कठिन होता है।
समय निर्णीत।

यह चिन्तन
जो चल रहा है मेरे भीतर
कहीं बोध तो नहीं
होने वाले अपराध का।
कहीं पलायन तो नहीं
सीता के तेज से ?

(मानो सचेत होते हैं)

नहीं नहीं
यह किस राह चल दिया मैं विपरीत !
देखता हूँ
चेहरों को देखता हूँ।

(सब ओर हाथ घुमाकर)

राजा बनकर देखता हूँ चेहरों को।

उजागर न सही
पर भीतर से क्यों लगते हैं मुझे
सब राम ही।

नहीं
सीता नहीं है कोई आम नारी
भावी महारानी है
‘खबर’ है वह।

हर व्यक्ति
जो खबर है अपने मूल में
नहीं हो सकता
साधारण जन सा।

(सोचते हुए)

मुझे फिर करनी होगी एक तैयारी।
फिर लड़ना होगा एक युद्ध।
कितना अभागा है राम।
यह शान्त, गम्भीर पुरुषोत्तम
कितना अभागा है
जिसने लड़ने ही हैं युद्ध
ज़मीन हो या मनोभूमि।
जिसे लड़ने ही हैं युद्ध
और दिखना है शान्त, निर्द्वन्द्व भी।
मुझे होना ही होगा तैयार
एक अपरिचित भूमिका के लिए।
सूचना : (उदासीनता एवं गाम्भीर्य)
पर तय है न मेरी भूमिका तो। सूचना जो हूँ ?
चलती हूँ
देखती हूँ क्या सूचित कर रहे हैं हनुमान
सीता को

(दर्शकों की ओर कुटिल मुस्कान)

याद रहे
स्वायत्ता हूँ मैं
उतनी ही
जितना चाहते हैं स्वामी।

(मंच पर अंधकार)

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