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05.28.2014


खण्ड-खण्ड अग्नि
दिविक रमेश

दृश्य - 2

(मंच पर धीरे-धीरे प्रकाश उभरता है और क्षणों में ही पूरे मंच पर अग्नि-प्रकाश फैल जाता है। अग्नि (पात्र) चिन्तित और प्रश्नाकुल स्थिति में दृष्टिगत होता है। यह प्रभाव संगीत के द्वारा भी दिया जा सकता है।)
अग्नि : अग्नि हूँ मैं
नहीं हूँ सूत्रधार
रह गया हूँ एक पात्र भर ।

समझा जाता हूँ देवता
नहीं जानता
भय से...या मोह से ?

बनाया होगा देवता मुझे इतिहास ने
वैदिक हूँ मैं
सदियों से आ रहा हूँ पुजता।

शुद्ध कर्त्ता ही नहीं
मुझे माना गया है
शुद्धता का माप भी
लोक-साक्षी हूँ मैं

नहीं जानता
पूजा है या गुण
गिरने नहीं देता जो मुझे
महिमा की मचान से
पर
सिर्फ जानता हूँ मैं ही
अनुचर होकर
मुझे लगा है अपना रूप
कभी कभी शाप भी।
(प्रश्नाकुल होकर। माथे पर सलवटें)

सुन रहा हूँ
किया जा रहा है सन्देह
सीता पर -
यह कैसी परीक्षा है मेरी ?

निरा अग्नि नहीं हूँ मैं
पति हूँ मैं भी स्वाहा का।
क्या सोचेगी स्वाहा
धिक्कारेगी नहीं क्या
वह कन्या प्रजापति* की ?
सामना कर सकूँगा क्या
अग्नि से भी ज्वलंत
अग्नि-क्षेपक नेत्रों का ?
___________________________________________
* प्रजापति-दक्ष प्रजापति

(परेशान सा)

उफ् !
यह कैसी परीक्षा है मेरी ?

यह कैसा कुचक्र है ?
आन्दोलित है, मेरा देवत्व ही !

(हताश स्वरों में)
पर कहाँ हूँ सूत्रधार
रह गया हूँ
एक पात्र भर बन कर

चलता हूँ
फिर आना होगा मुझे

पात्र हूँ मैं
का्श ! हो पाता हस्तक्षेप
समय के शिविर पर !
अभी तो मुझे जलना है । केवल जलना है धूँ धूँ।
  (अग्नि चला जाता है। मंच पर प्रकाश भी गायब हो जाता है। अब किसी भी प्रकार की ध्वनि नहीं।)

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