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05.08.2014


खण्ड-खण्ड अग्नि
दिविक रमेश

दृश्य - १

(दूर से उद्घोषक संगीत सुनाई पड़ता है। तीव्र होता है और फिर मंद हो जाता है। मंच पर उद्घोषणा की उपस्थिति हो जाती है। एक ओर से आकर वह दूसरे कोने में खड़ी हो जाती है। उसी ओर से उसी कोने में काले वस्त्र पहने सन्नाटा भी दर्शकों की ओर पीठ करके खड़ा हो जाता है। प्रकाश उद्घोषणा पर।)

उद्घोषणा :  (प्रसन्नचित)
विजयी हुए हैं राम....?
त्याग कर निन्द्रा, बाँध कर समुद्र
विजयी हुई है राम की प्रतिज्ञा!
विजयी हुई है प्रतीक्षा राम की।
सुने सब
हर्ष-विषाद, काल-अकाल
मृत-जीवित, सुने सब
मुझ उद्घोषणा को।
समाप्त हुई है प्रभुसत्ता रावण की।
   (सन्नाटा की ओर देखती है। निस्तब्धता के बीच प्रकाश सन्नाटा पर केन्द्रित होने लगता है।)

तुम्हें क्या साँप सूँघ गया है सन्नाटा?
सन्नाटा :  (व्यंग्य से)
मात्र प्रभुसत्ता ?
आ हाहा हाहा
मात्र प्रभुसत्ता ?
कोई और शब्द चुनो मित्र, कोई और शब्द।
क्या सचमुच नहीं दीखती तुम्हें
खण्डहर सी
वीरान पड़ी यह लंका
टिकाए
ओठों पर उँगली।
उद्घोषणा :  (गम्भीर स्वर)
हाँ! वीरान पड़ी है लंका, महामौन।
और मैं ?
मुझे तो बोलना है निरन्तर।
गर्जना है हर क्षण समुद्र सा।
मैं नहीं हो सकती मूक तट के रेत सी।

मुझे तो बोलना है।

जब भी जो चाहा है विजेता ने, मुझे तो बोलना है।
नहीं मैं
कुछ भी अपने से
उद्घोषणा हूँ मैं।
सन्नाटा : और मैं ?
(अत्यंत गम्भीर होकर)

निस्तेज
महाचुप्पी में डूबी
क्या लाशें हूँ योद्धाओं की ?

या हूँ रावण-दासियों के
भीतर तक छायी हुई निस्तब्धता ?

या अतिरेक में
चुप्पी हूँ हर्ष की
सीता के मुख पर ?

क्या हूँ ?

सम्भव हुआ हूँ किस से ?
उद्घोषणा: (खुश होकर) हाँ
सीता भी सुने
(चारों ओर स्तब्धता देखती है)

शायद सीता ही सुने।
विजयी हुए हैं राम युद्ध में
मायावी नहीं मैं
सबूत है
नतमस्तक पराजय रावण की।
सन्नाटा: (गम्भीर होकर) हाँ
और साक्षी हूँ मैं
मैंने देखा है अट्टाहासों को
खुद मुझ में बदलते हुए

विजयी हुए हैं राम और खुद मैं भी।
उद्वेलित हों चाहे मन में
खुद राम पर
फहरा रही है मौन की पताका

जानता हूँ, शायद मैं ही जानता हूँ
कौन सी है हलचल
जो खाए जा रही है राम को।

कुछ क्षण पहले
युद्ध में संलग्न
समग्र राम !
मैंने देखा है उन्हें
बिखरते बिखरते।
उद्घोषणा : और सीता ?
(उद्घोषणा का धीरे-धीरे मंच से प्रस्थान सन्नाटा अपने में ही डूबा है।)
सन्नाटा : (चिन्तन)
कौन समझ पाया है मुझे
मेरी गहराई को
सिवा उसके
छाया होता हूँ जिस पर मैं।

चुप्पी है पूरी लंका में।
यहाँ तक सुना जा सकता है
हर्षोल्लास राम के शिविर का।

पर सीता ?
क्या सचमुच चुप है सीता भी ?
मगर क्यों बोलूँ मैं
चुप रहना है मेरा स्वभाव
दुबके हुए रहस्य सा
महाचुप !
पड़े रहना है
ओठों पर लगाए अर्गला ?
(चौंक कर)

कहाँ गई उद्घोषणा ?
निकल गई है शायद दूर।

पूरा होते ही उद्देश्य
कितनी निरर्थक हो जाती है साधना।
या शायद निरर्थक हो जाता है साधक ही ?
पर सिद्धि ?

(व्यंग्य और निराशा का मिश्रित स्वर)

बस सिद्धि ही गाई जाती है परिणाम की तरह
उठायी जाती है कंधों पर विजेता सी
और पड़ी रह जाती है कोने में
आम जन सी साधना
खिसयाई।
चलूँ
जरा पीछा करूँ
उद्घोषणा का।
(मंच से जाता है पर कुछ क्षणों बाद लौट आता है।)
सन्नाटा : (दर्शकों की ओर देख कर)
कितनी खुश है उद्घोषणा
निकल गई
फिर निकल गई विचार सी दूर

कर्तव्य तक ही सीमित हैं हम
हमारा संस्कार है
पालन करना।

हम नहीं हैं प्रश्न

कितनी खुश है उद्घोषणा ?
चलता हूँ। ढूँढता हूँ उसे
ज़रूर गई होगी राम के षिविर में।
कितनी खुश है उद्घोषणा !
(चला जाता है।)
   


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