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06.28.2008

जीने के लिए
रचनाकार
: डा. महेंद्र भटनागर

दरिद्र-नारायण
डॉ. महेंद्र भटनागर

दो जून
रोटी तक जुटाने में
नहीं जो क़ामयाब,
ज़िन्दगी
उनके लिए -
क्या ख़ाक होगी ख़्वाब !
कोई ख़ूबसूरत ख़्वाब !
उनके लिए तो
ज़िन्दगी -
बस,
कश-म-कश का नाम,
दिन-रात
पिसते और खटते
हो रही उनकी
निरन्तर
उम्र तमाम !

वंचित
उच्चतर अनुभूतियों से जो -
भला
उनके लिए
संस्कृति-कला का
अर्थ क्या ?
उपयोग क्या ?

सब व्यर्थ !
(जो न समर्थ।)
यद्यपि; सतत श्रम-रत;
किन्तु जीवन-भर
निराश-हताश !
जिनके पास
थोड़ा चैन करने को
नहीं अवकाश !

उनके लिए है
नृत्य-नाटक-काव्य के
सारे प्रदर्शन,
दूरदर्शन
व्यंग्य मात्र !
वे - केवल हमारे
खोखले ओछे अहं के
तुष्टि-पूरक-पात्र !

पहले चाहिए उन्हें-
शोषण-मुक्ति,
महिमा-युक्त गरिमा,
मान की सम्मान की रोटी,
सुरक्षा और शिक्षा !
चाहिए ना एक कण भी
राज्य की या व्यक्ति की
करुणा, दया, भिक्षा !


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