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06.28.2008

जीने के लिए
रचनाकार
: डा. महेंद्र भटनागर

इतिहास-स्रष्टाओ!
डॉ. महेंद्र भटनागर

इंसान की तक़दीर को
बदले बिना-
इंसान जो
अभिशप्त है : संत्रस्त है
जीवन-अभावों से !
इंसान जो
विक्षत प्रताड़ित क्षुब्ध पीड़त
यातनाओं से, तनावों से !

उस दुखी इंसान की
तक़दीर को बदले बिना ;
संसार की तसवीर को
बदले बिना-
संसार जो
हिंसा,
विगर्हित नग्न पशुता ग्रस्त,
रक्त-रंजित,
क्रूरता से युक्त
घातक अस्त्र-बल-मद-मस्त !

उस बदनुमा संसार की
तसवीर को बदले बिना ;
इतिहास-स्रष्टाओ !
सुखद आरामगाहों में
तनिक सोना नहीं, सोना नहीं !
संघर्ष-धारा से विमुख
होना नहीं, होना नहीं !

हर भेद की प्राचीर को
                     
तोड़े बिना,
पैरों पड़ी जंजीर को
                      
तोड़े बिना,
इतिहास-स्रष्टाओ !
सतत श्रम-साध्य
निर्णायक विजय-अवसर
अरे, खोना नहीं, खोना नहीं ।

इंसान की तक़दीर को
बदले बिना,
संसार की तसवीर को
बदले बिना,
सोना नहीं, सोना नहीं !


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