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06.01.2008

जीने के लिए
रचनाकार
: डा. महेंद्र भटनागर

जीने के लिए
डॉ. महेंद्र भटनागर

दहशत दिशाओं में
हवाएँ गर्म
गंधक से, गरल से;
           किन्तु मंज़िल तक
           थपेड़े झेलकर
           अविराम चलना है !

शिखाएँ अग्नि की
सैलाब-सी
रह-रह उमड़ती हैं ;
           किन्तु मंज़िल तक
           चटख कर टूटते शोलों-भरे
           वीरान रास्तों से
           गुज़रना है,
           तपन सहना
           झुलसना और जलना है !

सुरंगें हैं बिछी
बारूद की
चारों तरफ
नदियों पहाड़ों जंगलों में ;
           किन्तु मंज़िल तक
           अकेले
           खाइयों को ; खंदकों को
           लौह के पैरों तले
           हर बार दलना है !


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