अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
02.26.2009
जन-गण-मन
द्विजेन्द्र ’द्विज’
41

आसमानों में गरजना और है
द्विजेन्द्र ‘द्विज’


आसमानों में गरजना और है
पर ज़मीं पे भी बरसना और है

सिर्फ़ तट पर ही टहलना और है
और लहरों में उतरना और है

दिल में शोलों का सुलगना और है
और शोलों से गुज़रना और है

बिजलियाँ बन टूट गिरना और है
बिजलियाँ दिल में लरज़ना और है

रतजगे मर्ज़ी से करना और है
रोज़ नींदों का उचटना और है

है जुदा घर में उगाना कैक्टस
रोज़ काँटों में गुज़रना और है

ख़ुशबुओं से ढाँपना ख़ुद को जुदा
पर पसीने से महकना और है

इस घुटन में साँस लेना है अलग
आग सीने में सुलगना और है

जाम भर कर ‘द्विज’, पिलाना है जुदा
क़तरे- क़तरे को तरसना और है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें