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02.07.2009
जन-गण-मन
द्विजेन्द्र ’द्विज’
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कैसी रही बहार की आमद न पूछिए
द्विजेन्द्र ‘द्विज’


कैसी रही बहार की आमद न पूछिए
इन मौसमों के साथियो मक़सद न पूछिए

ये तो ख़ुदा के राम के बंदे हैं इनसे आप
पूजा-घरों के टूटते गुंबद न पूछिए

इस युग में हो गया है चलन ‘बोनसाई’ का
यारो, किसी भी पेड़ का अब क़द न पूछिए

है आज भी वहीं का वहीं आम आदमी
किस बात पर मुखर है ये संसद न पूछिए

ये ज़िंदगी है अब तो सफ़र तेज़ धूप का
वो रास्तों के पेड़ वो बरगद न पूछिए।


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