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02.07.2009
जन-गण-मन
द्विजेन्द्र ’द्विज’
26

सुबह-सुबह यहाँ मुरझाई हर कली बाबा !
द्विजेन्द्र ‘द्विज’


सुबह-सुबह यहाँ मुरझाई हर कली बाबा !
ये दिन में रात-सी कैसी है अब ढली बाबा !

उतार फेंकेगा अपनी वो केंचली बाबा !
वो शख़्स जिसको समझता है तू वली बाबा !

हुए थे पढ़ के जिसे तुम कभी वली बाबा !
किताब आज वो हमने भी बाँच ली बाबा !

ख़्याल तेरे पुराने , नया ज़माना है
उतार फेंक पुरानी तू कंबली बाबा !

सियाह रात को हम दिन नहीं जो कह पाए
मची है तब से ही महफ़िल में खलबली बाबा !

गुज़ार दी है यूँ काँटों पे ज़िन्दगी हमने
न रास आएगी अब राह मखमली बाबा !

उन्होंने फेंक दिया ऐसे अपने ईमाँ को
कि जैसे साँप उतारे है केंचली बाबा !

गया ज़माना जहाँ ‘ झूठ ’ ‘सच’ से डरता था
बना है झूठ का अब सच तो अर्दली बाबा !

हवा चली है ये कैसी कि सब के सीनों पर
हर इक ने तानी है बन्दूक की नली बाबा !

बयान अम्न के, खेतों में आग के गोले
समझ में आई नहीं बात दोग़ली बाबा !

सबूत गुम हुए सारे गवाह बी गुम-सुम
गुनाह पालने की अब हवा चली बाबा !

ये हर क़दम पे नया इक फ़रेब देती है
निगोड़ी ज़िन्दगी है कोई मनचली बाबा !


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