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01.16.2009
जन-गण-मन
द्विजेन्द्र ’द्विज’
17

देख, ऐसे सवाल रहने दे
द्विजेन्द्र ‘द्विज’


देख, ऐसे सवाल रहने दे
बेघरों का ख़याल रहने दे

तेरी उनकी बराबरी कैसी
तू उन्हें तंग हाल रहने दे

उनके होने का कुछ भरम तो रहे
उनपे इतनी तो खाल रहने दे

मछलियाँ कब चढ़ी हैं पेड़ों पर
अपना नदिया में जाल रहने दे

क्या ज़रूरत यहाँ उजाले की
छोड़, अपनी मशाल रहने दे

भूल जाएँ न तेरे बिन जीना
बस्तियों में वबाल रहने दे

काट मत दे रहा है आम ये पेड़
और दो -चार साल रहने दे

जिसको चाहे ख़रीद सकता है
अपने खीसे में माल रहने दे

वो तुझे आईना दिखाएगा ?
उसकी इतनी मज़ाल, रहने दे

काम आएँगे सौदेबाज़ी में
साथ अपने दलाल रहने दे

छोड़ ख़रगोश की छलाँगों को
अपनी कछुए -सी चाल रहने दे।


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