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01.16.2009
जन-गण-मन
द्विजेन्द्र ’द्विज’
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इन्हीं हाथों ने बेशक विश्व का इतिहास लिक्खा है
द्विजेन्द्र ‘द्विज’


इन्हीं हाथों ने बेशक विश्व का इतिहास लिक्खा है
इन्हीं पर चंद हाथों ने मगर संत्रास लिक्खा है

हमारे सामने पतझड़ की चादर तुमने फैलाई
तुम्हारे उपवनों में तो सदा मधुमास लिक्खा है

जहाँ तुम आजकल सम्पन्नता के गीत गाते हो
अभावों का वहाँ तो आज भी आवास लिक्खा है

फ़रेबों की कहानी पर यक़ीं कैसे हो आँतों को
तुम्हारे आश्वासन हैं, इधर उपवास लिक्खा है

अँधेरे बाँटना तो आपकी फ़ितरत में शामिल है
उजालों का हमारे गीत में उल्लास लिक्खा है

बताओ किस तरह बदलें हम उलझी भाग्य-रेखाएँ
बनाएँ घर कहाँ ‘द्विज’, वो जिन्हें बनवास लिक्खा है।


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