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09.23.2007
 
७ - दान
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

शतहस्त समाहार सहस्त्र हस्त सं किर।
कृतस्य कार्यस्य चहे स्फातिं समावह।।

हे मनुष्य! तू सौ हाथों वाला बनकर धनार्जन कर और हजार हाथों वाला बनकर दान कर। इस प्रकार अपने कर्त्तव्य से उन्नति कर।

- सामवेद

 

         आप जानते हैं कि देवताओं के पास सारे सुख होते हैं -  उनका शरीर स्वस्थ और सुन्दर होता है, उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय होता है, उनके पास अपना वाहन होता है, वे विमान से यात्रा करते हैं, उनका निवास स्वर्ग में होता है, आदि-आदि।

         हम लोग देवताओं को इन सुखों के कारण ही जानते हैं। इन सुखों के कारण ही हम उन्हें देवता मानते हैं।

         पर, क्या वे सचमुच इसी कारण से देवता बने हुए हैं?
                 
नहीं!

         क्या कोई सुख के इन लक्षणों से ही देवता बन सकता है?
                  
बिल्कुल नहीं!

         देवताओं के सुख उनकी पहचान तो बन गये हैं, पर ये उनके देवता होने का वास्तविक कारण नहीं हैं। ये सुख तो देवताओं के वे लक्षण हैं जो हमें दिखाई देते हैं।  वास्तव में ये सारे के सारे वे ही सुख हैं जिनके लिये हम स्वयं लालायित रहते हैं।

         हाँ, तो हम यह मान कर चलते हैं कि हमारे देवतागण इतने अधिक सम्पन्न हैं कि उनकी अपनी कामनाओं की पूर्त्ति के बाद भी उनके पास बहुत कुछ बचता है। इस कारण देवता हम लोगों को भी देने की स्थिति में होते हैं। फिर हम चाहते हैं कि उनकी सम्पन्नता का कुछ हिस्सा हमें भी मिल जाये। इसी आशा से हम लोग देवताओं की पूजा करते हैं।

         यहाँ पर एक बात सोचने वाली है - हजारों सालों से हमलोग देवताओं से माँगते चले आ रहे हैं, और हजारों सालों से ही देवता हमें देते चले आ रहे हैं।  लेकिन आज भी सारी सुख-समृद्धि देवताओं के पास है, हमारे पास नहीं। हम लोग पहले भी उनसे माँगते थे, आज भी उनसे माँग रहे हैं। देवतागण पहले भी हमें देते थे, आज भी दे रहे हैं। अन्तर कोई नहीं पड़ा। हम लोग आज भी वहीं के वहीं हैं - माँगने में लगे हुए हैं।

         और माँगने का यह काम हम बड़ी होशियारी के साथ करते हैं। हम जानते हैं किसी एक व्यक्ति में सब प्रकार के सामर्थ्य नहीं हो सकते। यही बात हम ने देवताओं पर भी लागू कर दी है। किसी एक देवता में परमात्मा की सारी शक्तियाँ नहीं हो सकतीं, इसलिये हम ने परमात्मा की शक्ति को विभिन्न देवताओं में बाँट दिया है। अलग-अलग देवता हैं, अलग-अलग देवियाँ हैं, अलग-अलग सामर्थ्य हैं। कोई देवता आग जलाने में सक्षम है, तो कोई देवता धरती को जल से भर देने में, तो कोई संसार को हवा से भर देने में। कोई देवता आपको जन्म देता है, तो कोई आपका पालन-पोण करता है। एक देवी आपको विद्या सिखाती है, तो दूसरी आपको धन-धान्य से परिपूर्ण करती है। हम लोग यह बात भी अच्छी तरह से जानते हैं कि देने वाला हम को वही चीज दे सकता है जो उसके पास है। इसीलिये हमें जिस चीज की कामना होती है, पूजा के लिये हम उसी के अनुरूप देवी या देवता को चुनते हैं। धन-वैभव के लिये हम लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं, विद्या के लिये सरस्वती जी की। यदि हमें शारीरिक शक्ति और बल चाहिए तो हम हनुमान जी के चरणों में झुकते हैं। लेकिन चाहते हम यही हैं कि देवी-देवताओं से हमें कुछ मिल जाये। उन से कुछ प्राप्त कर लेना ही हमारा एक-मात्र उद्देश्य होता है। फिर अपनी माँग हम लोग इस विश्वास के साथ करते हैं कि हमारे माँगने पर देवता इन्कार नहीं करेंगे।

         यह बड़ी महत्त्वपूर्ण बात है - हम यह मानकर ही चलते हैं कि माँगने पर देवता अवश्य देगा। यहीं पर देवता की प्रमुख विशेषता सामने आती है -

         देना ही देवता का असली गुण-धर्म है।
                 
देवता देता है। जो देता है वही देवता है।

         देवता तो देते हैं - खुशी से देते हैं। देना उनका स्वभाव है। देने के कारण ही उनका सम्पन्न होना सार्थक होता है। हम लोग यह बात भी अच्छी तरह से जानते हैं कि देने वाला ही देवता बनता है। देवता यदि कृपण होते तो हम लोग उनके आगे हाथ कभी नहीं फैलाते।

         सम्पन्न होते हुए भी देवता यदि आप को देने से इन्कार करते तो क्या आप उनकी पूजा करते?

         बिल्कुल नहीं!!

         अब देखिये! लक्ष्मी और कुबेर दोनों ही धन के प्रतीक हैं। लक्ष्मी और कुबेर दोनों ही धन-सम्पन्न माने जाते हैं। फिर भी पूजा लक्ष्मी की होती है, कुबेर की नहीं।

         क्यों?

         क्योंकि लक्ष्मी देती है। लक्ष्मी बाँटती है। कुबेर के खजाने धरे-के-धरे रह जाते हैं।

देना ही देवता की वास्तविक विशेषता है।

         यहाँ पर एक बात विशेष रूप से समझने वाली है - देवता न केवल देता है, बल्कि स्वयं भी परिपूर्ण होता है। देवता स्वयं को भी देता है और दूसरों को भी। जिसने स्वयं को न दिया वह दूसरों को क्या देगा? हम लोग अक्सर कहते हैं - अमुक व्यक्ति बड़ा कंजूस है, वह किसी को कुछ नहीं देता। यह बात ठीक है कि कंजूस दूसरे को नहीं देता, पर देखा जाये तो कंजूस अपने को भी कहाँ देता है? वह तो एक गरीब की तरह रहता है और गरीब की तरह ही मर जाता है।

देने से हमारी सम्पन्नता सार्थक होती है।

         हमारे शास्त्र कहते हैं कि धन की तीन गतियाँ होती हैं -

(१) उपभोग, (२) दान, और (३) नाश। जिसने धन का उपभोग नहीं किया, जिसने धन का दान नहीं किया, उसके धन के लिए तो एक ही गति बचती है - नाश। देवता धन का नाश नहीं होने देते। वे स्वयं भी उपभोग करते हैं, दूसरों को भी देते हैं। देने के कारण ही देवता का सम्पन्न होना सार्थक होता है।

         देने और देते रहने में ही सम्पन्नता की पूर्णता है। देने में ही हमारी गरिमा है। देना ही जीवन है। विंस्टन चर्चिल कहते थे कि आप जो लेते हो, वह तो आपकी जीविका है, आप जो देते हो, वही आपका जीवन है।

जो हम अर्जित करते हैं, वह हमारी जीविका है।
 
जो हम देते हैं
, वह हमारा जीवन है।

         धन हमारे जीवन का केन्द्र नहीं है। धन एक संसाधन है जिससे हम अपनी जिम्मेवारियों को निभाते हैं। धन एक सहायता-सामग्री है जिससे हम जीवन के उद्देश्यों की पूर्त्ति करते हैं। धन का काम है कि वह हमें सुख दे। यह सुख हमें तीन क्रियाओं से  मिलता है - धन के अर्जन से, धन के उपभोग से और धन के दान से। इन तीन क्रियाओं से धन आपकी सेवा करता है। बाकी क्रियाओं से हम धन की सेवा करते हैं। कंजूस धन को बचा लेते हैं, अपव्ययी उसे उजा देते हैं, लाला उसे उधार देते हैं, चोर उसे चुरा लेते हैं, धनी उसे बढ़ा देते हैं, जुआरी उसे गँवा देते हैं, और मरने वाले उसे पीछे छो जाते हैं।

         लेकिन, देवता उसे दे देते हैं और देकर के सुख पा जाते हैं।

         यह बड़े अचम्भे की बात है कि देने वाले को सुख मिलता है। लेकिन, इस बात को समझना इतना कठिन नहीं है। इसके लिये हम आप को ईशावास्योपनिषद के महामंत्र की ओर ले जाते हैं -

 ईशा वास्यम इदं सर्व यत किंचित जगत्यां जगत।
तेन त्यक्तेन भुंजीथाः मा गृधः कस्यस्वित धनम।।

         इस महामंत्र के चार टुकड़े हैं, और प्रत्येक टुकड़ा एक महावाक्य है -

                   हर चीज में ईश्वर का वास है।
        
          संसार क्षण-क्षण परिवर्तित हो रहा है।
                 
 छो देने की भावना से भोग करो।
        
          किसी के धन के लालच में मत पड़ो

         यदि हम इस मंत्र को आत्मसात कर लें तो हम भी परम भोग के भागी हो जाते हैं।

         वह सब कुछ जो हमें दिखाई देता है, (और जो नहीं भी दिखाई देता) उसमें ईश्वर बसा हुआ है। दिखाई देने वाले जगत को हम संसार कहते हैं। जगत का क्या अर्थ है? गच्छति इति जगत अर्थात जो चल रहा है, वह जगत है। यह जगत हमेशा गतिमान रहता है, इसलिये वह अस्थिर है। जगत में प्रत्येक क्षण परिवर्तन हो रहा है। संसार इतना अस्थिर है कि उसमें स्थिर दिखाई देने वाला भी अस्थिर है। जो पृथ्वी हमें स्थिर दिखाई देती है वह भी चलायमान है - आदि काल से। संसार एक न रुकने वाला प्रवाह है। एक घटना घटती है, तत्क्षण वह आगे ब जाती है। संसार रूपी नदी का यह प्रवाह आगे-आगे बता जा रहा है। संसार भ्रम नहीं है, पर वह टिकने वाला भी नहीं है।

         आप जानते हैं कि जो जहाँ बसा हुआ है, वही उस स्थान का मालिक होता है। संसार के कण-कण में ईश्वर व्यापत है, इसलिये वह ही कण-कण का मालिक है। कितनी विशाल धरती है! कितने विशाल समुद्र हैं! ये नदियाँ हैं, पहा हैं, जंगल हैं - सब में वही समाया हुआ है। बड़े-बड़े लोक हैं, महालोक हैं, सूर्य हैं, चन्द्रमा हैं, तारे हैं - सब में वह ही बस रहा है। वह ही सबका मालिक है। हमारे पास भी जो धन-सम्पत्ति आती है, उसका भी असली मालिक तो वह ही होता है, लेकिन हम उसे अपना मान बैठते हैं। यही हमारी भूल है। जिस किसी के पास जो कुछ भी है, उसका मालिक वह नहीं है। उसका मालिक तो परमात्मा है। इसलिये हमें जो कुछ  मिला है, उसका भोग तो करना है, लेकिन ईश्वर की देन समझ कर - उसका मालिक बन कर नहीं। इसलिये हमें भोगना तो है, पर छो देने की भावना से। तेन त्यक्‍तेन भुंजीथा का अर्थ है कि आप उसका त्याग-पूर्वक भोग करें। आप भोग करें लेकिन उसके साथ चिपटें नहीं।

         देखा जाये तो संसार के भोग इसी प्रकार से ही भोगे जा सकते हैं। जहाँ भोग कर छोने की भावना नहीं है, वहाँ भोगी स्वयं ही भोग बन जाता है। हम भूख लगने पर खाना खाते हैं, लेकिन पेट भर जानेके बाद खाना बन्द कर देना होता है। यदि हम ऐसा न करें तो हमारी इन्द्रियों में खाने की शक्ति ही न रह जायेगी। यही बात हर प्रकार के भोग पर लागू होती है। आप धन-सम्पत्ति का भोग कीजिये और फिर उसे आगे बढ़ा दीजिये - दूसरों के लिये। हमारी सारी सम्पत्ति परमात्मा की है। हमें भोगने का अधिकार तो है, पर मालिक बन जाने का नहीं। जो उसे परमात्मा की देन समझ कर भोगता है, वह तो सुख पा जाता है, लेकिन जो मालिक बनना चाहता है, वह मार शा जाता है। जो इस बात को अपने आप नहीं समझता, उसकी आँख खोलने के लिये कहीं न कहीं, कोई न कोई थपेड़ा उसे प ही जाता है।

         ईशावस्योपनिपद के इस मंत्र का चौथा महावाक्य है - किसी के धन के लालच में मत पड़ो। जो धन मेरा नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह किसी दूसरे का है। न मेरा है, न उसका है - हम में से किसी का नहीं। जब धन किसी का है ही नहीं तो फिर उस के लिये लालच कैसा? फिर अधिक धन वाले से ईर्ष्या कैसी? इस बात को समझ कर हम अनेक दुखों से छुटकारा पा लेते हैं।

         क्या त्याग देने के भाव से भोग किया जा सकता है? क्या संसार में रह कर भी संसार में न फँसना सम्भव है? उपनिषद कहता है कि न केवल यह संभव है, बल्कि जीने का ढंग भी यही है। संसार में रहना भी है, संसार का भोग भी करना है, फिर भी उसमें लिप्त नहीं होना। त्यागपूर्वक भोग ही जीने की कला है। आप कर्म करें, धन-सम्पत्ति पैदा करें, उसका भोग करें, और उसे धरोहर के रूप में अपने पास रखें। आप धन-सम्पत्ति के मालिक मत बनिये। यह सोचिये कि आपका धन परमात्मा की देन है। देन का अर्थ है - परमात्मा का दिया हुआ प्रसाद। प्रसाद को अपने पास समेट कर नहीं रखा जाता - उसे तो बाँटा जाता है। जब आप ऐसी भावना से भर जाते हो तो देना आसान हो जाता है, देवता बनना संभव हो जाता है। याद रखिये! देकर के हम किसी पर अहसान नहीं करते - देना तो हमारी अपनी आवश्यकता है। देने से तो हमारे अपने ही सुख में वृद्धि होती है। हमारी परिपूर्णता देने में होती है, धन के एकत्र करने में नहीं।

         धन एकत्र करने में हमें सुरक्षा नजर आती है। हम सोचते हैं कि हमारा धन हमें आड़े समय काम आवेगा। यह बात एक सीमा तक ठीक भी है, लेकिन जब धन बढ़ जाता है तो वह सुरक्षा का नहीं, असुरक्षा का विचार पैदा करता है। तब हमें धन के खो जाने का डर लगने लगता है। हम जानते हैं कि लक्ष्मी बड़ी चंचल है - कभी भी रूठ के जा सकती है। पता नहीं कब शेयर बाजार ( stock market ) डूब जाये। पता नहीं कब कोई चोर लूट कर ले जाये। कोई नहीं जानता कि कब, कैसे और किस समय हमारा धन हम से छिन जाये। फिर क्या होता है? जितना अधिक धन होता है उतना ही हम सिकुड़ने लगते हैं। फिर हमारे भीतर का आकाश उतना ही छोटा होता चला जाता है।

         धन में सुख देने की क्षमता तो होती है, लेकिन एक सीमा के अन्दर। धन से आप भोजन खरीद सकते हैं - भूख नहीं। धन से आप बिस्तर खरीद सकते हैं - नींद नहीं। धन से आप किसी का शरीर खरीद सकते हैं - उसका प्रेम नहीं।

         हमें धन को अपने सुख का साधन तो बनाना है, लेकिन बड़ी सतर्कता के साथ। कहीं ऐसा न हो कि हमारा अना धन हमारे दुख का कारण बन जाये!

         जी हाँ, हमारा अपना धन हमें दुख भी दे सकता है।

         हम आपको केनेडा का एक किस्सा सुनाते हैं। नाम और स्थान तो हमने बदल दिये हैं, किन्तु घटना-क्रम वही है।

         तीन साल पहले की बात है। सेठी साहब की बेटी का विवाह होना था। सेठी साहब बड़े पैसे वाले हैं - वैंकूवर में इनका काफी बड़ा कारोबार है। रश्मि और मनोज एक दूसरे को दो साल से जानते थे। जैसे कि आजकल होता है, शादी से पहले भी इन दोनों की मुलाकातें होती रहती थीं। मनोज अक्सर अपनी कार में रश्मि को घुमाने-फिराने ले जाया करता था।

         हाँ, तो यह बात विवाह के दिन की है। थोड़े से लोगों के बीच फेरों की रस्म तो दिन में हो गई थी, लेकिन उसी रात को एक बड़े होटल में भव्य स्वागत समारोह (reception) का आयोजन किया गया था। इस समारोह में सैंकड़ों मेहमान आमंत्रित थे।

         विवाह के उपलक्ष में सेठी साहब ने एक नई मर्सेडीज़ कार अपनी बेटी को दी, जिसका अनावरण फेरों के तुरन्त बाद उन थोड़े से मेहमानों के बीच में किया गया। खूब तालियाँ बजीं और फिर सब लोग लँच करके चले गये। मनोज को रात के समारोह की व्यवस्था का निरीक्षण करने होटल जाना था। उस नई-नवेली मर्सेडीज़ में उसने अपनी नई-नवेली दुल्हन को बैठाया और वे दोनों वहाँ से चल पड़े।

         जब वे जा रहे थे तो उस नई कार की तेज रफ़्तार को देखकर रश्मि ने मनोज को टोका- अरे, गाड़ी इतनी तेज क्यों चला रहे हो? स्पीड थोड़ी कम करो न!  मनोज उस नई मर्सेडीज़ को चलाने का मजा ले रहा था। रश्मि की बात को टालते हुए उसने उत्तर दिया- क्यों बेकार में इतनी परेशान हो रही हो। तुम तो जानती हो कि मैं गाड़ी ऐसे ही चलाता हूँ। आज कोई नई बात नहीं है।

ठीक है, ठीक है, रश्मि रुष्ट होकर बोली, लेकिन तुम्हारा कार का इस तरह चलाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा।

अच्छा कैसे लगेगा? यह कार तुम्हारे पिता की दी हुई जो है, जाने-अनजाने मनोज के मुँह से निकल गया।

         फिर क्या था? रश्मि का पारा तो सातवें आसमान पर पहुँच गया। क्रोध में फुँफकारते हुए बोली- आज ही हमारी शादी हुई है और आज से ही तुमने मेरे माँ-बाप को उछालना शुरू कर दिया! अभी से तुम्हारा यह हाल है तो पता नहीं आगे तुम क्या करोगे? अच्छा हुआ जो तुमने मेरी आँखें खोल दीं। मैं तुम्हारे साथ अब एक पल भी नहीं रह सकती।

         मनोज हक्का-बक्का रह गया। उसने माफी माँगते हुए रश्मि को शांत करने के लिये कहा- रश्मि! मुझ से भूल हो गई है। मैं माफी माँगता हूँ। देखो, रात को बहुत सारे महेमान आने हैं। अभी रिसेप्शन के कई काम बाकी हैं, पहले -

         रिसेप्शन! कौन सा रिसेप्शन? किसका रिसेप्शन? अब कुछ नहीं होगा। अब तुम्हारा-हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है, कहते हुए रश्मि ने बात खत्म कर दी।

         बस, बात ऐसी उलझी कि सुलझ ही नहीं सकी। सेठी साहब ने अपनी बेटी को बड़ा समझाया, लेकिन वह नहीं मानी। स्वागत-समारोह स्थगित हो गया। तलाक की तैयारी शुरू हो गई। सेठी साहब की क्या दशा हुई होगी, इसका अनुमान आप खुद ही लगा सकते हैं। उन्होंने तो कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनका अपना धन उन्हें इतना दुख देगा।

हम लोग यह बात नहीं समझते कि जो धन स्वर्ग से वरदान बन कर आता है, वही धन हमारे लिय नरक का टिकट भी कटा सकता है।

जो धन स्वर्ग से वरदान बन कर आता है, वही धन हमारे लिये नर्क का टिकट भी कटा सकता है।

         जी हाँ, आपका अपना धन आपको डुबा सकता है। कबीर जी ने इसकी तुलना नाव में पानी के भर जाने से की है। कबीर दास कहते हैं कि जब नाव में पानी भरने लगे तो तुरन्त दोनों हाथों से उसे उलीचना शुरू कर दो, अन्यथा डूब मरोगे। इसी प्रकार जब घर में धन बढ़ना शुरू हो जाये तो शीघ्रता से उसे लुटाना शुरू कर दो। इसी में बुद्धिमानी है।

जो जल बाढ़े नाव में घर में बाढ़े दाम।
दोनों हाथ उलीचिये
, यही सयानो काम।।

         अधिक धन दुख का कारण न भी बने, तो भी नीरसता का कारण तो बन ही जाता है। धन के बढ़ते-बढ़ते एक ऐसा समय आता है, जब सब कुछ फीका और स्वादहीन लगने लगता है।

         हम एक बहुत अच्छे और प्रसिद्ध डाक्टर को जानते हैं। कानपुर में इनकी प्राइवेट प्रेक्टिस अपने शिखर पर है। सुबह-शाम इनके क्लिनिक में मरीजों की भीड़ लगी रहती है। अनाप-शनाप धन आ रहा है इनके पास। लेकिन, उनका अपना क्या हो रहा है? इसके लिये आपको हम उनकी अपनी कही हुई एक बात बताते हैं- क्या करूँ इतने पैसों का? कुछ समझ में नहीं आता! कभी कभी तो दिल करता है कि सारे नोटों को बोरे में भर कर आग लगा दूँ!

         दूसरों का इलाज करने वाले स्वयं एक बड़ी बीमारी का शिकार बने हुए हैं - अपने नीरस जीवन से ऊबने लगे हैं। देवता बन कर ये सज्जन अपने जीवन में सरसता को वापस ला सकते हैं।

         फिर, ऐसा भी नहीं है कि देने से किसी के पास कुछ कम हो जाता है। देवतागण हजारों सालों से हमें देते चले आ रहे हैं। देने से यदि कम होता तो अब तक सारे देवता कंगाल हो गये होते। लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ। आज भी सब कुछ देवताओं के पास है। आज भी वे साधन-सम्पन्न हैं। आज भी हम लोग ही माँगने में लगे हुए हैं।

         देना देवता का विशेष गुण है और देने वाले के पास कोई कमी नहीं रहती। दान देने वाला कभी गरीब नहीं होता।

         मेरे पिताजी इस बात को समझाने के लिये ऊगने वाली घास और घास को खाने वाले जानवर का उदाहरण देते थे। जानवर जब घास चर जाता है, तो क्या होता है? दूसरे दिन वह फिर भूखा हो जाता है। लेकिन घास दूसरे दिन फिर हरी हो जाती है।

         देने वाला हमेशा हरा-भरा रहता है। पिता जी हमें यही बात समझाते थे- बेट! घास बनो, जानवर नहीं।

         रवीन्द्रनाथ टैगोर के एक गीत में, एक बड़ी सुन्दर कहानी का चित्रण हुआ है। इस गीत की कहानी को ओशो भी बड़े चाव से सुनाते थे।

         त्यौहार का दिन है। एक भिखारी सुबह-सुबह अपने घर से निकलता है। उसे आशा है कि आज बहुत मिलेगा। अपनी झोली में एक मुट्ठी  चावल डाल कर चल पड़ता है। चावल के दाने झोली में डाले हैं ताकि वह भरी नजर आये। झोली भरी हो तो दूसरों को भी देने की इच्छा होती है। लोग सोचते हैं - औरों ने दिया है, हमें भी देना चाहिए।

         सुबह का समय है। सूरज निकलने ही वाला है। लोग अभी उठ रहे हैं।  सड़क खाली है। अचानक सामने से एक चमचमाता   हुआ रथ नजर आता है। राजा का रथ देख कर वह बड़ा खुश होता है - आज तो राजा से भिक्षा मिलेगी!

         रथ आकर उसके सामने रुक जाता है। इससे पहले कि वह राजा के आगे अपनी झोली खोले, राजा रथ से उतर कर अपनी झोली (अपने वस्त्र का आँचल) भिखारी के सामने फैला देता है। भिखारी घबरा जाता है- अरे आप! आप झोली फैलाते हैं, महाराज!

         हाँ, राजा उत्तर देते हैं, ज्योतषियों ने कहा है कि देश पर हमला होने का खतरा है। मगर यह खतरा टल सकता है यदि आज मैं सड़क पर मिने वाले पहले व्यक्ति से भीख माँगू। तुम्हीं पहले व्यक्ति हो। कृपा करो, कुछ भीख में दे दो, देश की खातिर।

         भिखारी की जान सूख गई। हमेशा कुछ माँगा ही था। देने की तो कभी कल्पना भी नहीं की थी। दिया कैसे जाता है, इसका  तो अनुभव ही नहीं था। अरे, यह क्या हो गया? कुछ मिलने की बात तो दूर रही, अब मुझे ही देना पड़ेगा! यह उल्टी बात कैसे हो गई?

         अब वह झोली में से मुट्ठी भरता है, लेकिन फिर छोड़ देता है। हिम्मत नहीं होती देने की।

         राजा फिर कहता है- मना मत करना, कुछ तो दे दो। देश का सवाल है! बड़ी मुश्किल से वह चावल का एक दाना अपनी झोली से निकाल कर राजा के वस्त्र में रख देता है। राजा रथ में बैठ कर चला जाता है। भिखारी का दुख रह जाता है - एक दाना चावल का चला गया।

         शाम को घर आकर वह अपना झोला पत्नी को देता है।  अनाज से भरा झोला देख कर वह बड़ी प्रसन्न होती है, लेकिन भिखारी के मन में दुख है एक दाना कम होने का। फिर वह अपनी पत्नी को राजा वाली कहानी सुनाता है।

         पत्नी जब झोला खोलती है तो सारे दाने गिर पड़ते हें। अरे, यह क्या? उनमें एक दाना सोने का होता है। भिखारी का दुख बढ़ जाता है। उसे पता लग जाता है कि बड़ी भूल हो गई - क्यों न मैंने सारे दाने ही राजा को दे दिये? लेकिन अब क्या हो सकता था। तब उसकी पत्नी कहती है- तुम्हें पता नहीं क्या? जो हम देते हैं वही सोना बन जाता है। जो हम जमा कर के रखते हैं वह तो मिट्टी हो जाता है।

         बुद्ध पुरुष यही कहते आये हैं - जो दिया है, वही सोने का हो गया है।

जो हम देते हैं, वही सोना होता है।

         लेकिन, देना हम भूल गये हैं। हम सार-सूत्र को ही भूल गये हैं। हम भूल गये हैं कि जो कुछ हम देते हैं, वही हमें मिलता है। कृपण बनने में क्या लाभ है? कट्ठा करना ही क्यों? जिसने आज दिया है, वह कल भी देगा। वह तो प्रतिपल दे रहा है।

         हमें भी उसके काम में हाथ बँटाना है - देने का काम हमें भी करना है। देने की आवश्यकता के बारे ऋग्वेद में इस प्रकार से कहा गया है-

पृणीयादिन्नाधमानाय तव्यान्द्राधीयासमनु पश्येत पन्थाम।
ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रान्यमन्यमुप तिष्ठन्त रायः।।

         समर्थ मनुष्य को चाहिए कि याचना भाव से आने वाले  को निश्चित ही धनादि द्वारा संतुष्ट करें। ऐसे दाता को स्वर्गीय सुपथ प्राप्त होते हैं। ऊपर-नीचे परिभ्रमण करने वाले रथ चक्र के समान ही धन-सम्पदा कभी स्थिर नहीं होती। वह एक दूसरे के पास आती जाती है।

         ऋग्वेद की यह बात ध्यान देने योग्य है। आधुनिक अर्थशास्त्र भी इसी ऋषिमत पर अधारित है। धन का संचय धन को  निष्क्रिय बनाता है। धन का आदान-प्रदान, (मुद्रा का परिचलन) अर्थनीति का महत्त्वपूर्ण सूत्र है। इसी के कारण आर्थिक उन्नति होती है। इस मूल सिद्धान्त को न मानने से कई विकृतियाँ पैदा होती हैं।

         पके देने से सभी लाभान्वित होते हैं। परमात्मा हमें इसलिए देता है ताकि हम किसी और को दें और देने का प्रवाह बनाये रखें।

         प्रवाह मुक्ति है - अवरोध बन्धन है।

         देने से सुख बढ़ता है, देने से प्रेम बढ़ता है, देने से ताजगी बढ़ती है। बढ़ने के लिये सतत प्रवाह चाहिए। प्रवाहित होती है तो नदी बढ़ती है, स्वच्छ रहती है, ताजी रहती है। प्रवाह रुक जाये तो वह डबरा बनकर सने लगती है।

         आप में ब्रह्म की ऊर्जा है - उसे रोको मत, बहने दो। जो ऊर्जा अवरुद्ध हो जाती है, वह दुख देती है - क्रोध बन कर, अहंकार बन कर। लेकिन जो ऊर्जा प्रवाहित होती है, वह सुख बन जाती है।

         अभी तक हमने जिन सुखों की चर्चा की है, वे तो केवल सुख के माध्यम हैं। ुख की वास्तविकता तो हमारी मनःस्थिति में होती है।

         आइये! अब सुख की इस वास्तविकता का समझते हैं।



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