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08.24.2007
 
६ -- स्वर्ग
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

पात्रता अर्जित किये बिना यदि स्वर्ग पहुँच भी
जाओ तो क्या; स्वर्ग के सुख तो फिर भी नहीं पाओगे।

--  जार्ज बर्नार्ड शॉ

 

 

 

           हम लोग मानते हैं कि देवतागण स्वर्ग में रहते हैं।

            लेकिन स्वर्ग है क्या?

     

            जापान की एक पुरानी कथा है --

 

            ज़ेन गुरु (बौद्ध-धर्म के गुरु) कुछ समुराई-गण (योद्धाओं) के बीच अपना व्याख्यान दे रहे थे, तो एक गुस्सैल समुराई  ने प्रश्न पूछा। उस गुस्सैल समुराई का प्रश्न था, स्वर्ग और नरक क्या होता है? (इसे आप यों समझिये जैसे गुरुद्रोणाचार्य कौरवों और पांडवों को धर्म की शिक्षा दे रहे हों, और दुर्योधन ने यह प्रश्न पूछा हो)

            प्रश्न की अवहेलना करते हुए गुरु ने उत्तर दिया, अरे, तुम्हारे जैसे गँवार इसे क्या समझेंगे! मेरे पास ऐसे व्यर्थ के प्रश्नों के उत्तर देने के लिए समय नहीं है।

            बस, अब क्या था! वह समुराई आग बबूला हो उठा। उसके आत्म-सम्मान पर ऐसी चोट लगी, कि वह क्रोध की आग में उबल पड़ा। उसके नथुने फूलने लगे। पैर पटकते हुए उसने म्यान से तलवार निकाल ली और फ-ँफकार कर चिल्ला पड़ा, तुम्हारी यह धृष्टता! मैं इसी समय तुम्हारी गर्दन काट सकता हूँ।

            गुरु तब बडी नम्रता और शांति के साथ बोला - यह नरक है।

            समुराई एकदम चौंक पड़ा। उसे अपनी भूल समझ में आ गयी। गुरुजी ने तो उसके प्रश्न का ही उत्तर दिया है -- इस माध्यम से। और वह है कि हिंसा और क्रोध के उन्माद में इस बुरी तरह से जकड़ गया है। जैसे ही उसे अपनी गलती समझ में आई, शर्म के मारे उसने सिर नीचा किया, तलवार म्यान में वापस ड़ाली और गुरु के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। धीरे से बोला, मुझे क्षमा कीजिये।  आपने मुझे जो बोध करवाया, उसके लिये मैं आपका कृतज्ञ हूँ।

            तब गुरु बोला, और यह स्वर्ग है।

           

            स्वर्ग कहीं बाहर नहीं है, नर्क कहीं बाहर नहीं है। स्वर्ग और नर्क हमारे अन्दर होते हैं। स्वर्ग और नर्क हम अपने आप निर्मित करते हैं -- अपने ही मन में, अपने ही विचारों से, अपनी ही धारणाओं से। स्वर्ग हमारी सद्‌भावना में हैं, नर्क हमारी दुर्भावना में है।

स्वर्ग हमारी सद्‍भावना में है, नर्क हमारी दुर्भावना में है।

            स्वर्ग कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ पर मृत्यु के बाद सुख भोगने के लिये किसी को भेजा जाता है। स्वर्ग आपकी वह मनःस्थिति है जिसमें आप अपने अन्दर की जागृति से परमात्मा की कृपा से मिलने वाले हर्ष और उल्लास की अनुभूति करते हैं। इसी प्रकार नर्क भी कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ पर पापियों को यंत्रणा दी जाती है, जहाँ पर किसीको जलती आग की लपटों में झोंका जाता है। नर्क हमारी वह मानसिक दशा है जिसमें हम अपने अस्तित्त्व की घोर यातना और अवसाद का अनुभव करते हैं। नर्क की यह स्थिति भी हम स्वयं ही निर्मित करते हैं।

            कोई आपको स्वर्ग नहीं भेजता। कोई आपको नर्क नहीं भेजता। स्वर्ग आपका अपना दृष्टिकोण है, नर्क आपका अपना दृष्टिकोण है। स्वर्ग और नर्क आफ देखने के ढंग हैं। स्वर्ग और नर्क दोनों आप की अपनी मर्जी से बनते हैं और आपके साथ ही चलते हैं। देवतागण जहाँ भी जाते हैं, स्वर्ग उनके साथ चलता है।

            अक्सर लोग कहते हैं कि सन्त स्वर्ग जाते हैं, लेकिन ऐसा कहना बिल्कुल गलत है। वास्तविकता तो यह है कि सन्त जहाँ भी जाता है, वहीं स्वर्ग बन जाता है। देवता जहाँ भी होगा, वह स्वर्ग ही होगा।

            स्वर्ग और नर्क के निर्णायक आप हो -- कोई और नहीं। हर व्यक्ति अपना स्वर्ग अपने साथ लेकर चलता है। हर व्यक्ति अपना नर्क अपने साथ लेकर चलता है।

            नर्क की संकल्पना (concept) वेदों में कहीं नहीं है। उपनिषदों में तो भय के लिये कोई स्थान ही नहीं है।  वहाँ तो निर्गुणता का साम्राज्य है। ऐसी बातें तो बाद की पौराणिक कथाओं में आती हैं।

            देवताओं के पास तो सुख ही सुख हैं। देवता तो जहाँ भी होंगे, वहीं स्वर्ग होगा। जिनके पास इतने सारे सुख हैं वे तो स्वर्ग में ही हो सकते हैं। देवतागण स्वर्ग बनाते हैं -- नर्क नहीं।

            जो लोग अपने जीवन से असंतुष्ट हैं, जो लोग जीवन में कुछ अधिक पाना चाहते हैं किन्तु नहीं पा सकते, वे अपने आप को तसल्ली देते हैं -- बाकी सब हमें स्वर्ग में मिलेगा। जिन को इस जीवन में सुख नहीं मिला, वे ही स्वर्ग की कल्पना करते हैं। जो लोग सुख के लिये तरसते हैं, वे ही स्वर्ग की कामना करते हैं, वे ही स्वर्ग की प्रतीक्षा करते हैं।

            कल्पना का स्वर्ग और कल्पना का नरक एक दुखी व्यक्ति ही बना सकता है। सुखी व्यक्ति तो जहाँ है, वहीं स्वर्ग है। नरक की बात तो वह कभी सोच ही नहीं सकता। जहाँ सुख है, वहाँ नरक नहीं होता। जहाँ देवता हैं, वहाँ नरक का सवाल ही नहीं उठता। परमात्मा नरक नहीं बनाता। हम लोग ही नरक बनाते हैं। स्वर्ग के सुख भी हमारी कल्पना के अनुसार होते हैं, नरक के दुख भी हमारी अपनी कल्पना से बनते हैं।

 जो सुखी है, वह स्वर्ग में ही है।

            भारत में गर्मी हमारे लिये दुख का प्रतीक है। हमारा सुख ठण्डक में होता है। हमारी कल्पना का सुख वहाँ है जहाँ शीतल मन्द पवन बहता है, जहाँ पेड़ की डालियाँ ठंडी हवा में झूमती हैं। हमारे दश में गरम हवा दुख दायक मानी जाती है। गरम हवा से बचे रहना एक बहुत बड़ा सुख है। इसीलिये हमारे पंजाबी बड़े-बूढ़े जब आशीर्वाद देते हैं तो कहते हैं-- परमात्मा तुम्हें तत्ती वा तों (गरम हवा से) बचाये।

            करीब तीस साल पुरानी बात है। हम लोग केनेडा से एक महीने के लिये भारत आए थे। मेरी माताजी ने कहा - अरे बेटे, तुम लोग तो केनेडा जाकर केनेडा के ही हो गये।  हर साल घूमने फिरने तो चले आते हो लेकिन वापस लौटकर यहाँ बस जाने की कोई बात ही नहीं करते। कहना तो उनका ठीक था। मुझे कोई उत्तर भी नहीं सूझ रहा था। जल्दी से बोल पड़ा, माँ, इसमें मेरा कोई दोष नहीं है, दोष तो आपका है, और आपके आशीर्वाद का है।

            क्या मतलब? मेरी माँ हैरान होकर मेरा मुँह देखने लगी। मैंने हँसते हुए कहा --

            आप मुझे हमेशा एक ही आशीर्वाद देती रही हैं कि भगवान तुम्हें तत्ती वा (गर्म हवा) से बचाकर रखे। अब बच गये हैं हम तो गरम हवा से! अब तो हमारी जन्दगी ठण्डी हवाओं में ही गुजर रही है। आपको तो खुश होना चाहिए कि आपका आशीर्वाद फल गया है।

            लेकिन हम लोग केनेडा में ठंडी हवा नहीं, गरम हवा चाहते हैं। हमें ठंडी नहीं, गरम हवा अच्छी लगती है। केनेडा में तो गर्मी की कद्र होती है। दिसम्बर, जनवरी और फरवरी -- ये तीन महीने तो बहुत ही ठण्डे होते हैं। इन दिनों यहाँ के लोग छुट्टियाँ मनाने के लिये पास के गरम देशों में जाते हैं। कोई जमैका (वेस्ट इंडीज़) जाता है तो कोई क्यूबा। कोई मेक्सिको जाता है तो कोई फ़्लोरिडा। गरम मौसम इन्हें सुखद लगता है। सूरज की चमकती किरणें इन्हें सुहानी लगती हैं। ठण्डक, बरसात, बादल, बरफ - ये सब बडी कष्टदायक लगती हैं।

            ऐसे ही जहाँ बरसात नहीं होती, वहाँ के लोग बारिश के लिये तरसते हैं। जहाँ बादल नहीं दिखाई देते, वहाँ के लोग बादलों कि लिये लालायित होते हैं।

            एक बार हम मुम्बई में थे। शाम को शेरेटन होटल गये हुए थे। उस समय यह होटल नया-नया बना था। अरब पोशाक पहने हुए बहुत से लोग होटल में घूमते-फिरते नजर आ रहे थे। हमें ऐसा लगा कि अरब देशों का कोई सम्मेलन चल रहा है, शायद इसीलिए इतने सारे अरब लोग यहाँ आये हुये हैं। थोड़ी देर बाद जिज्ञासावश होटल के मैनेजर से पूछ ही लिया, अरब के इतने सारे लोग यहाँ क्या कर रहे हैं? मैनेजर तपाक से बोला, भाई साहब, ये सब पर्यटक हैं, इन दिनों ये बम्बई आए हुए हैं -- काले बादल देखने के लिये, मूसलाधार बारिश देखने के लिए। जैसा कि आप जानते हैं इनके देशों में सूरज ही सूरज है, धूप ही धूप है। घने काले बादल इन्हें देखने को नहीं मिलते। इसीलिए बरसात के मौसम में भारत का पर्यटन करने आते हैं।

            मनुष्य के पास जो कुछ होता है, वह उसे अच्छा नहीं लगता -- जो नहीं होता वह उसके पीछे भागता है। हम भारतीयों की चमड़ी का रंग भी हमसे ज्यादा गोरे लोगों को भाता है। इसीलिये वे रेतीले तट (beach) पर जाकर कपड़े उतारकर धूप में लेटकर  अपने शरीर को तपाते हैं ताकि चमड़ी की सफेदी में कुछ कमी हो, ताकि रंग में कुछ गेहुँआपन आये। गोरों के देश में एकदम गोरा चिट्टा रंग पसन्द नहीं किया जाता। ताँबे या काँसे जैसे रंग को अच्छा माना जाता है। उनके लिये शरीर के रंग का सफेद होना साधारण होने की बात है, विशिष्ट होने की नहीं।

            बड़ी पुरानी बात है। आफिस में मेरी गोरी केनेडियन सेक्रेटरी दो हफ़्ते की छुट्टी लेकर गई थी। पूरी छुट्टियों में उसने रेतीले तट (beach) पर जाकर सारा-सारा दिन अपने शरीर को तपाया -- चमड़ी में साँवलापन लाने के लिये, त्वचा को गेंहुआ रंग देने के लिये (टेन होने के लिये)। छुट्टियों के बाद पहले दिन जब वह आफिस आई तो अपने टेन (tan) हुए शरीर की सुन्दरता के कारण बड़ी खुश थी। सुबह-सुबह मेरे कमरे में आई। उस दिन मैं आधी बाँहों वाली कमीज पहने था। उसने आकर मेरा हाथ पकड़ा, अपनी बाँहों को मेरी बाँहों के साथ लगाया, दोनों बाँहों को मिलाकर देखा और खुशी के मारे खिल उठी -- देखो, देखो! हम दोनों की बाँहों को रंग अब एक जैसा लगता है। उस दिन मुझे अपने हिन्दुस्तानी रंग से बड़ी तसल्ली मिली।

 हमारे पास जो होता है उस का मूल्य नहीं जानते, जो नहीं होता उस के पीछे भागते हैं।

जिसको जो कुछ मिलता है उसका मूल्य उसे नजर नहीं आता। जो नहीं मिलता उसीको मूल्यवान समझता है, उसी के पीछे भागता है। जहाँ एक ओर, गोरा होने के लिये हिन्दुस्तानी लड़कियाँ फेयर एंड लवली क्रीम की दीवानी होती हैं, वहीं दूसरी ओर केनेडियन लड़किाँ टेनिंग लोशन लगा-लगा कर अपने आपको धूप में तपाने में लगी रहती हैं। दोनों ही सुन्दर दिखना चाहती हैं। सुन्दर तो दोनों ही हैं - भारतीय लड़की भी सुन्दर है, विदेशी लड़की भी। लेकिन दोनों को अपनी सुन्दरता नहीं भाती। दोनों के देखने की दृष्टि अलग है।

            सारा खेल हमारी दृष्टि का है। स्वर्ग और नरक दोनों ही हमारी कल्पनाएँ हैं। स्वर्ग की कल्पना हम उन सुखों के लिये करते हैं जो हमें इस जीवन में नहीं मिल पाते। लेकिन हमारी उपलब्धि तो इसी लोक में सुख पाने में है। प्रमुखता इसी लोक की है, इसी जीवन की है। जब हम अपना सारा सामर्थ्य इसी जीवन को सफल बनाने में लगा देते हैं तो परलोक के होने या न होने का कोई महत्त्व नहीं रह जाता।

 जो इस जीवन-काल में सुख भोगता है, उसे स्वर्ग के सपने देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

 


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