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08.15.2007
 
५ - सुरापान
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

सोमो जत्रस्य चेतति।

 

सोम विजय-प्राप्ति का उत्साह देता है।

- सामवेद

 

            क्या आप जानते हैं कि देवतागण मदिरा-पान भी करते हैं?

            वेद कहते हैं कि देवतागण मदिरापान आमोद-प्रमोद के लिये करते हैं। सोमरस देवता को आनन्द देता है, स्फूर्ति देता है, शक्ति देता है।

      सुरापान देवता भी करते हैं और दानव भी। देवता सुरापान के बाद शांत रहते हैं। लेकिन दानव सुरापान के बाद उत्पात मचाते हैं। देवता सुरापान के बाद प्रसन्न रहते हैं। पर, दानव का सुरापान दुख का कारण बनता है - उनके अपने लिये भी और दूसरों के लिये भी। इसलिये वेदों में देवता को सुरापान के लिये जितना योग्य कहा गया है, दानव को उतना ही अयोग्य घोषित किया गया है। वेद कहते हैं कि सुरापान से सुर ही लाभान्वित होते हैं, असुर नहीं। देवतागण न केवल सुरापान के अधिकारी हैं, बल्कि सुरापान देवता के लिये गौरव की बात है। सुरापान देवताओं की शान बढ़ाता है। सामवेद से ली गई इन ऋचाओं में सोमरस के उपभोग करने वाले देवताओं की महिमा गाई गई है। जरा इन पर नजर डालिये --

इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं नस्वप्नाय स्पृहयन्ति।

यन्ति प्रमाद मतन्द्राः।

            यज्ञ के निमित्त सदैव सोमरस तैयार करने वाले साधकों से देवगण प्रसन्न रहते हैं, उन्हीं की कामना करते हैं। आलस्य-रहित देवगण आनन्द प्रदान करने वाले सोमरस का सदा पान करते हैं।

 

            इस सूक्ति का एक और अर्थ इस प्रकार से दिया गया है -

 

            सोम यज्ञ करने वालों से देवगण प्रसन्न रहते हैं, आलसियों से नहीं। परिश्रमी साधक ही परम आनन्द दायी सोमरस प्राप्त करते हैं।

 

प्र स्वानासो रथा इवार्वन्तो न वस्यवः।

सोमासो राये अक्रमुः।।

            अश्वों एवं रथों की भाँति वेगपूर्वक ध्वनि करता हुआ सोमरस पवित्र हो रहा है। शोधित सोम हमें अपार यश एवं वैभव प्रदान करता है।

 

पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभु पभुर्गात्राणि पर्योषि विश्वतः।

अतप्ततनूर्न तदामों अश्नुते श्रृतास इद्वहन्तः सं तदाशत।।

            हे वेदपते सोम! आप के पवित्र अंग (अंश) सर्वत्र विद्यमान हैं। आप शक्तिशाली होने के कारण पान करने वालों की देह में स्फूर्त्ति की वृद्धि करते हैं। तप से जिसका शरीर तेजयुक्त नहीं हुआ है, उसे वह फल प्राप्त नहीं होता। साधना परिपक्व होने के पश्चात ही साधक उसे प्राप्त करने में समर्थ होता है।

 

एवा नः सोम परिषिच्यमान आ पवस्य पूयमानः स्वस्ति।

इन्द्रमा विश बृहता मदेन वर्घया वाचं जनया पुरंधिम्।।

            हे सोमदेव! जलमिश्रित तथा शुद्ध होते हुए आप हमारे कल्याण के लिये शोधित हों, आनन्दपूर्वक इन्द्रदेव को तृप्त करें। हमारी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए सद्‍बुद्धि प्रदान करें।

 

            वेदों में सुरापान के सम्बन्ध में एक बड़ी चेतावनी दी गई है।  सोमरस शक्ति और स्फूर्त्ति तो प्रदान करता है, लेकिन इसे पीने का अधिकार केवल उन्हीं को है जिन का विकास पूरा हो चुका है, जो पूर्ण रूप से वयस्क और परिपक्व हो चुके हैं। जो लोग अपना काम पूरी तरह से निभाते हैं तथा जिन की साधना पूरी हो जाती है, वे ही सोमरस के अधिकारी हैं। आलसी लोग मदिरापान के लिये अयोग्य ठहराये गये हैं।

            आपने देखा है कि वेद की एक ऋचा में सोमदेव से सद्‍बुद्धि की प्रार्थना की गई है। क्या अर्थ है इसका? हम चाहते हैं कि सुरापान के बाद भी हम अच्छे बने रहें। मदिरापान हमारे अन्दर की असलियत को बाहर लाता है। मन में यदि अच्छाई है तो मदिरा पान के बाद वह बाहर आ जाती है। मन में यदि बुराई है तो फिर बुराई ही सामने आती है। हम अन्दर से जैसे हैं, वैसे ही सामने आ जाते हैं। यदि आप देवता हैं तो सुरापान के बाद आपका देवत्त्व ही बाहर आयेगा। यही कारण है कि केवल देवतागण ही सुरापान के अधिकारी हैं और इसीलिये सुरापान को देवोचित माना गया है।

            इतना ही नहीं, वेद की सूक्तियाँ हमें सुरापान के सम्बन्ध में और भी कई बातें बताती हैं -

प्र सुन्वानायान्धसो मर्तो न वष्ट तद्वचः।

अप श्वानमराघसं हता मखं न भृगवः।।

            शोधित होते समय सोम के शब्द-नाद को हीन कर्म की इच्छा वाले न सुने। हे साधको! अयोग्य और श्वान-वृत्ति वालों को इस श्रेष्ठ कार्य से दूर रखो (राक्षसों को मदिरा मत पीने दो)।

 

पवस्व सोम देववीतये वृषेन्द्रस्य हार्दि सोमधानमा विश।

पुरा नो बाधाद दुरिताति पारय क्षेत्रविद्ध दिश आहा विपृच्छते।।

            हे बलशाली सोमदेव! देवों के लिये आप अपना रस प्रदान करें, इन्द्र देव के निमित्त उनके पात्र में स्थापित हों तथा कष्ट पहुँचाने वाले पापियों से हमारी रक्षा करें। मार्ग का ज्ञाता जिस प्रकार पथिक का मार्ग दर्शन करता है, उसी प्रकार आप श्रेष्ठ कर्मों के लिये हमारा मार्ग दर्शन करें।

 

इन्द्राय सोम सुषुतः परि स्रवापामीवा भवतु रक्षसा सह।

मा ते रसस्य मतसत द्वयाविनो द्रविणस्वन्त इह सन्तिवन्दवः।।

            हे सोम! आप श्रेष्ठ रीति से रस निकालने के बाद इन्द्रदेव के पीने के लिये प्रवाहित हों और रोग-राक्षसों से रहित हों। दो प्रकार का (छल-युक्त) व्यवहार करने वाले दुष्टों को सोमरस न प्राप्त हो। इस यज्ञ में यह सोमरस ऐश्वर्ययुक्त बने।

 

सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते

तयोर्यत्सत्यं यत रहजीय स्तदितसोमो-वति हन्तयासत्।

            ज्ञान प्राप्त करने वाले मनुष्य के लिये यह विशिष्ट ज्ञान कहा जाता है कि सत्य और असत्य भाषणों में स्पर्धा रहती है। उनमें से जो सत्य और सरल हैं उसकी सोम रक्षा करता है और असत्य का नाश करता है।

       

            बड़े ध्यान देने योग्य बातें हैं इन सूक्तियों में! देखिये जरा - जो सत्य है, जो सरल है, सोम उसकी रक्षा करता है। देखने में यह बात बड़ी अटपटी लगती है, लेकिन वास्तव में यह वही व्यवहारिक बात है, जो पहले बता चुके हैं। मदिरापान के बाद केवल सत्य ही उभर कर सामने आता है। जो मन के अन्दर होता है, वही जुबान पर आ जाता है। शराब पीने के बाद मन के छल-कपट को छुपाना मुश्किल हो जाता है। इसीलिये वेदों में छल-कपट का व्यवहार करने वाले को सुरापान से दूर रहने की चेतावनी दी गई है।   वेदों में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि छल-कपट का व्यवहार करने वाले को सुख नहीं मिलता।

 

या ते रसस्य मत्सत द्व याविनः

            दोहरा आचरण करने वाले आनन्दित नहीं होते।

 सुरापान के बाद छल-कपट को छुपाना मुश्किल हो जाता है।

            जैसे कि आप जानते हैं कि देवतागण छल-कपट का व्यवहार नहीं करते, इसीलिये देवतागण बिना किसी डर के सुरापान कर सकते हैं।

                   वेदों में लिखी सुरापान सम्बन्धी ये ऋचाएँ आज के युग में भी उपयुक्त बैठती हैं। वेद की सूक्तियाँ आज भी प्रसंगानुकूल हैं। जब आप देर तक काम करके थके हुए घर आते हैं, तो मदिरापान आपके लिये एक पुरस्कार बनता है। मदिरापान आप की थकावट दूर करता है - दूसरे दिन सुबह आप फिर अपने काम में जुट जाने के लिये तैयार हो जाते हैं। लेकिन, सारा दिन निठल्ला बैठे रहने वाला यदि सुरापान करता है तो उसे न तो समाज से कोई आदर मिलता है, न ही उसे स्वयं किसी प्रकार की तृप्ति मिलती है। इसीलिये सोमरस आलस्यरहित देवताओं को ही आनन्द प्रदान करता है, दूसरों को नहीं।

            यदि आप संयमपूर्व सुरापान करते हैं, तो सुरापान सुखदायक है। यदि सुरापान करके आप अपनी जिम्मेवारी नहीं निभा सकते तो सुरापान दुखदायी है। सुर और असुर होने में यही अन्तर है। सुरापान करने मात्र से कोई सुर या असुर नहीं बनता। सुर या असुर तो बनते हैं अपने कर्मों से - चाहे उन्हें हम सुरापान से पहले करते हैं या सुरापान के बाद।

सुर या असुर हम अपने कर्म से बनते हैं, सुरापान करने या न करने से नहीं।

                        एक लेटिन कहावत है कि सोम्यता और गंभीरता (sobernesss) जिसे छुपाती है, मदमत्ता (drunkenness) उसे उघाड़ देती है। चूंकि मदिरापान से पीने वाले का असली रूप ही सामने आता है, इसलिये देवता को डरने की जरूरत नहीं होती। सुरापान के बाद तो उसका देवत्व ही सामने आता है। यही कारण है कि देवता को सुरापान के लिये योग्य पात्र माना गया है।

            देवता बनकर आप भी सुरापान की पात्रता अर्जित कर लेते  हैं।



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