अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
06.25.2007
 
२ -- शरीर
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

प्र च्यवस्व तन्व सं भरस्व मा ते गात्रा वि हायि भो शरीरम्।
मनो निविष्टमनुसंविशस्व यत्र भूमेर्जुषसे तत्र गच्छ।।

 

            आगे बढ़। शरीर का उत्तम ढंग से पालन-पोषण कर। तेरे हाथ पैर न छूटें। जहाँ तेरा मन हो वहाँ इच्छानुसार जा और जिस भूमि में प्रीति हो, उस देश में जा।।

-- अथर्व वेद

 

देवता का पहला सुख है - उसकी निरोगी काया।

                        देवताओं का शरीर स्वस्थ और सुन्दर होता है, इसकी जानकारी आप सबको है। आपने कई देवताओं के चित्र देखे हैं, आपने कई देवताओं के शरीर के वर्णन पढ़े हैं, सुने हैं। क्या आप किसी ऐसे देवता को जानते हैं जिसका शरीर स्वस्थ न हो? जिसके मुख पर आभा न हो? जो किसी रोग से ग्रस्त हो?

                        नहीं जानते?

                        कोई बात नहीं -- हम दोनों भी नहीं जानते।

                        देवता स्वस्थ होते हैं, इसलिये सुन्दर भी होते हैं। वे तो निरोगी काया की साक्षात मूर्त्ति होते हैं। और यह कोई संयोग की बात नहीं है -- स्वस्थ और सुन्दर होना तो देवता होने का आवश्यक अंग है।

                        निरोगी काया हमारा पहला सुख है। निरोगी काया सुख की प्राथमिक आवश्यकता है। इसके बिना आप कोई भी सुख नहीं भोग सकते। प्रजापति का पहला सूत्र भी यही था -- शरीर को समझो, शरीर को संभालो।

                        जहाँ स्वास्थ्य नहीं है, वहाँ सुख नहीं हो सकता। जहाँ शरीर रोग-ग्रस्त है, वहाँ शांति नहीं हो सकती। यदि देह में स्फूर्त्ति नहीं, मस्तिष्क में चेतना नहीं, स्नायुओं में बल नहीं, अंगों में दृढ़ता नहीं, तो न में उमंग नहीं उठ सकती। आप चाहे कितना ही धन कमा लें, कितना ही नाम कमा लें, कितनी ही प्रतिष्ठा पा लें, फिर भी  यदि शरीर स्वस्थ नहीं है तो जीवन में कोई स्वाद नहीं रह जाता। रोग-ग्रस्त जीवन एक बोझ बनकर रह जाता है। धमनियों में शक्ति का संचार ही आपके जीवन का जीवन है। स्वस्थ शरीर वह बुनियाद है जिस पर सुख का भवन खड़ा रहता है। बिना इस बुनियाद के सारा भवन चिरमिरा कर गिर पड़ता है।

स्वस्थ शरीर वह बुनियाद है जिस पर सुख का भवन खड़ा होता है।

                        स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन हो सकता है। शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा के लिये वेदों में भी प्रार्थना की गई है। देखिये, यजुर्वेद की यह ऋचा क्या कह रही है-

            आयुर्मे पाहि प्राणं में पाह्म पानं में पाहि व्यानं में पाहि चक्षुर्मे पाहि श्रोत्रं में पाहि वाचं में पिन्व मनो मे जिन्वातमानां में पाहि ज्यातिर्मे यच्छं।

                                    हे ईश्वर! मेरी आयु की रक्षा कर, मेरे प्राणों की रक्षा कर, अपान व व्यान वायु ( श्वास-प्रश्वास) की रक्षा कर, मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा कर, मेरे दोनों कानों की रक्षा कर, मेरी वाणी व मन को प्रसन्न कर, मेरी आत्मा की रक्षा कर और मुझको तेज प्रदान कर।

 

                        जहाँ हमारे वेद हमें शरीर की रक्षा और उसकी देखभाल की बात सिखाते हैं, वहीं पर हमारे बहुत सारे साधु-महात्मा शरीर को नश्वर कहकर उसकी उपेक्षा करने की बातें करते हैं। याद रखिये! आप को देवता का अनुसरण करना है -- महात्माओं का नहीं।

                        जिसका शरीर निरोगी नहीं है, वह देवता नहीं हो सकता। वह ऋषि हो सकता है, मुनि हो सकता है, साधु हो सकता है, महात्मा हो सकता है, पर देवता नहीं हो सकता। स्वस्थ और निरोगी काया देवता होने की पहली आवश्यकता है।

                        यदि देवता हमेशा स्वस्थ और निरोगी रहते हैं, यदि देवता हमेशा युवा दिखाई देते हैं, यदि देवता हमेशा सुन्दर वस्त्रों से सजे-सँवरे रहते हैं तो इससे हमें क्या शिक्षा मिलती है? इस से हमें यह शिक्षा मिलती है कि  हमारा शरीर हमारी प्राथमिकता है। अपने आपको निरोगी बनाना हमारा धर्म है। अपने आप को स्वस्थ बनाये रखना हमारी साधना है। ऐसी ही बात स्वामी विवेकानन्द के इस कथन में गूँज रही है --

                        यह ठीक है कि परमात्मा की पूजा के लिये आप मन्दिर बना सकते हो, लेकिन एक सुन्दर और उत्कृष्ट मन्दिर तो आप के पास पहले से ही है। वह मन्दिर है -- आपका शरर।

                        उन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध अमरीकन कवि वाल्ट व्हिटमैन  भी स्वामी विवेकानन्द की  बात को इस प्रकार से कह रहे हैं --

                        यदि कोई चीज पवित्र है, तो वह मनुष्य का शरीर है।

आपका शरीर आपका मन्दिर है।

                        एक व्यक्ति कई-कई दिनों तक बाहर रहता था। कई बार  तो पड़ोसियों को भी पता नहीं लगता था कि वह कब चला जाता था। एक दिन मौका मिलने पर एक पड़ोसी ने पूछ ही लिया, “आजकल आप क्या कर रहे हैं? यहाँ बहुत कम दिखाई देते हैं।

            उसने उत्तर दिया, “अरे भई! अब शरीर की तीसरी अवस्था चल रही है। भगवान की सेवा और पूजा-परमार्थ में समय लग जाता है।

                        पड़ोसी को शक हुआ कि अवश्य ही चोरी-छुपे कोई अनुचित काम कर रहा है, तभी तो यह दिखाई नहीं देता। पूजा-पाठ तो घर में रह कर भी किया जा सकता है। उसने छिप-छिप कर जब तलाश की तो पता चला कि वह गाँव-गाँव जाकर व्यायामशालाएँ खुलवाता है। अपना सारा समय उसी में लगाता है। कोई पूजा-पाठ नहीं करता।

                        लौटने पर पड़ोसी उससे बोला, “आप तो कहते हैं कि पूजा-पाठ करते हैं, जबकि तथ्य यह है कि आप लोगों को व्यायाम की शिक्षा देते हैं।

                        जब उन दोनों में यह बात चल रही थी तो उधर से समर्थ गुरु राम दास जी गुजर रहे थे। उनको जब इस चर्चा का विषय मालूम पड़ा तो वे बोले, “भाइयो, जो आदमी अपने सामर्थ्य को सत्प्रयोजन में लगाता है, वह भगवान का सब से बड़ा भक्त है। राष्ट्र को समर्थ और सशक्त बनाने की भावना लेकर यह व्यक्ति परमार्थ ही कर रहा है। इसका यह पवित्र कार्य परमात्मा का नाम जपने से कहीं अधिक पुण्यकारी है। फिर उस व्यक्ति को आशीर्वाद देते हुए बोले, “परमात्मा तुम्हें शक्ति दे! तुम्हारा कार्य सराहनीय है।

 

                        एक बार गुरुनानक देव जी शेख़ फ़रीद से मिलने  उनके निवास स्थान पर गये। शेख़ फ़रीद की गद्दी पाकपटन नामक स्थान में थी और उस समय गद्दी पर थे -- शाह ब्राहम (शेख़ फरीद द्वितीय)। पाकपटन पहुँच कर नानक जी को मालूम पड़ा कि शाह ब्राहम तो तपस्या करने के लिये जंगल में गये हुए हैं। शाह ब्राहम कठिन तपस्या इस उद्देश्य से करते थे, ताकि वे आध्यात्मिक उ!ति करके परमात्मा का साक्षात्कार कर सकें।

                  शाह ब्राहम वहाँ नहीं मिले तो गुरु नानक जी उनसे मिलने जंगल चल दिये। जब शाह ब्राहम ने नानक जी के सुगठित हृष्ट-पुष्ट शरीर तथा उनके ओज-युक्त मुख-मंडल को देखा तो उन्हें यह भ्रम हुआ कि नानक जी अपने शरीर-निर्माण की ओर अधिक ध्यान देते हैं और आत्मोन्नति की ओर कम। जब औपचारिक मिलन समाप्त हुआ तो शेख़ ब्राहम गुरुनानक जी की ओर देख कर बोले -- आप पहने तो फकीरी लिबास हैं, पर आपका शरीर तो ऐसा है जो भोगियों के रीर को  भी लज्जित करता है। ऐसा नहीं होना चाहिए - तपस्वी और त्यागी का शरीर तो दुबला-पतला होना चाहिए --

                        नानक जी ने उनकी बात सुनी तो मुस्कुरा दिये। फिर धीरे से बोले --

                        मेरे दोस्त अपने शरीर को भूख-प्यास से सुखा कर आत्मा का हनन मत करो। खुदा को पाने के लिये न तो दुनिया को छोड़ने की ज़रूरत है, और न ही शरीर की उपेक्षा करने की ... यह शरीर व्यर्थ नहीं है। इसके माध्यम से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है। हमारा जीवन परमात्मा की प्राप्ति के लिये एक रथ के समान है। शरीर इस रथ का घोड़ा है और आत्मा उसका परिचालक। हमें शरीर और आत्मा दोनों की आवश्यकता है। हमने इन दोनों का संतुलन बना कर रखना है। साधक जब दोनों का उचित उपयोग करता है, तभी परमात्मा की प्राप्ति होती है। शरीर को उग्र और आसुरी तपों से तपाना उतना ही पाप है जितना कि आत्मा के प्रति विमुख हो जाना। दोनों का सामंजस्य अनिवार्य है, दोनों का उपयोग आवश्यक है। स्वस्थ शरीर से परमात्मा के प्राणियों की सेवा करो और आत्मा को परमात्मा के अखण्ड ध्यान में नियोजित करो। दोनों के सहयोग से प्रेम, सेवा और भक्ति पथ का अनुसरण करो। परमात्मा की प्राप्ति के लिये यही वास्तविक विधि है।

                        नानक जी की बात शेख़ फरीद समझ गये। नानक जी जब वहाँ से जाने को तैयार हुए तो शेख़ जी भी लौट चले -- अपने निवास-स्थान पाकपटन को।

                        देवता शरीर की उपेक्षा नहीं करते।

                        हमारे वेद कई ऐसी सूक्तियों से भरे पड़े हैं जिनका एक मात्र उद्देश्य शरीर को निरोगी एवं स्वस्थ रखने से है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं --

 

वर्च आ धेहि मे तन्वां सह ओजो वयो बलम्।

मेरे शरीर में तेज, साहस, ओज, शक्ति और बल स्थापन कर।

-- अथर्व वेद

 

शं में चतुर्भ्या अंगेभ्यः शमस्तु तन्वे मम।

मेरे चारों अंगों के लिये आरोग्य हो, मेरे शरीर के लिए निरोगिता हो।

-- अथर्व वेद

           

                        तनुपा अग्नेसि तन्वं पाह्यायुर्दा अग्ने--यायुर्मे देहि वर्चोदा अग्नेसि वर्चो में देहि।

            हे अग्ने! तू शरीर का रक्षक है, अतः मेरे शरीर की रक्षा कर। तू आयु देने वाला है, अतः मुझे दीर्घायु दे। तू तेजस्विता देने वाला है, अतः मुझे तेजिस्वता दे।

-- यजुर्वेद

 

                        हमारे धर्म के नियम स्वस्थ और निरोगी शरीर की महत्त को ध्यान में रखकर ही बनाये गये हैं। जैसे आप जानते हैं  कि मनु ने शौच (भीतरी और बाहरी सफाई) को धर्म के लक्षण के रूप में ही प्रस्तुत किया है। महर्षि पतंजलि ने तो अपने पाँच नियमों में शौच को प्रथम स्थान दिया है। सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान के चार नियम शौच के बाद आते  हैं।

                        जिस शरीर में आत्मा का निवास है, उसकी देशभाल करना आपका प्रथम कर्त्तव्य है। यह आपकी साधना है। देवताओं के लिये यह आवश्यक है तो फिर आफ लिये क्यों नहीं?  जब आप अपने आहार द्वारा, अपने व्यवहार द्वारा, अपने कर्मों द्वारा अपनी काया की सेवा करते हैं तो आप देवोचित कार्य ही करते हैं।  देवत्व की ओर बढ़ने का यह पहला कदम है। यजुर्वेद कहता है कि विद्वान जागृत रहते हुए  विविध प्रकार  से शरीर की स्तुति  करते  हैं  और परमात्मा  को  भली-भाँति प्रकाशित  करते  हैं --

 

            तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते। विष्णोर्यतपरम पदम्।।

 

                        शारीरिक निरोगिता हमारा पहला सुख है। इसके बिना बाकी क सारे सुख व्यर्थ हो जाते हैं। इसीलिये आनन्द तक पहुँचने की यात्रा शरीर से ही प्रारम्भ होती है।

                        शरीर की देशभाल आपका कर्त्तव्य है। यही देवता के अनुसरण का प्राथमिक बिन्दु है। शारीरिक सुख को स्वीकार करके ही देवता आनन्द तक पहुँचते हैं।

                        आप अपने आप को देखिये। क्या आप स्वस्थ हैं? क्या आप निरोगी हैं? यदि हाँ, तो देवता होने का पहला लक्षण आप में मौजूद है। यदि नहीं, तो आज से इसे अपनी प्राथमिकता बना लीजिये।



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें