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07.12.2007
 
३ - संयुक्ति
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

रजता हरिणीः सीसा युजो युज्यन्ते कर्मभिः। अश्वस्य वाजिनस्त्वाचि सिमाः शम्यन्तु शमयन्तीः।

 

            प्रेममयी मन मोहने वाली, गृहकार्य में लगी हुई स्त्रियाँ धर्मानुकूल आचरण के कारण  श्रेष्ठ व बलवान पुरुष के साथ सदा के लिये संयुक्त कर दी जाती हैं। वे नियम व अनुशासन में रहकर स्वयं और पति को सुख प्रदान करें।

- यजुर्वेद

           

            आपने देखा होगा कि अक्सर देवता की पत्नी भी देवता के साथ बैठी होती है। हम अपने हजारों देवताओं में सबको तो नहीं जानते, लेकिन हमारे बहुत से प्रमुख देवता ऐसे हैं, जिनकी पत्नी उन के साथ बैठी होती है। कोई भी चित्र देखिये, कोई भी मूर्त्ति देखिये। राम के साथ सीता  बैठी हैं, शिव के साथ पार्वती बैठी हुई हैं, विष्णु के साथ लक्ष्मी बैठी हुई हैं।

            साथ में बैठे रहने का क्या अर्थ है?

            देवता की पत्नी का उसके साथ बैठे होना एक प्रतीक है। यह प्रतीक है सामीप्य का, घनिष्टता का, एक-जुटता का, दाम्पत्य सुख का। लेकिन सबसे अधिक यह प्रतीक है उन की संयुक्ति एवं सन्तुलन का। पति-पत्नी का जुड़ना पूर्णता की ओर बढ़ने का कदम है, सुख की ओर बढ़ने की सीढ़ी है, परमात्मा के साथ जुड़ने की कड़ी है। संयुक्ति में परमात्मा अवतरित होता है।

संयुक्ति में हमारा सन्तुलन है।

            यजुर्वेद में कही गई संयुक्ति वाली बात बड़ी महत्त्वपूर्ण है। इसे थोड़ा समझना होगा -

            जुड़ना बड़ा सुखदायक होता है। जुड़ना सुख का प्रतीक है, परमात्मा का प्रतीक है। आप जानते हैं कि भारतीय संस्कृति में आध्यात्म विद्या की पुरानी पद्धति को योगविद्या के नाम से जाना  जाता है। योग का अर्थ है जोड़। जुड़ने से परमात्मा अवतरित होता है। जोड़ में ही सब कुछ समाया है। सबसे बड़ा जोड़ सृष्टि है, परमात्मा है। जोड़ में, जोड़ने में और जुड़ने में परमात्मा उतरता है। तभी तो संयुक्ति सुखदायक होती है।

            देवता की पत्नी का साथ बैठना इसी जोड़ का प्रतीक है। पत्नी की समीपता उनकी घनिष्टता का द्योतक है।

            आधुनिक युग में घनिष्टता पर बड़े शोधकार्य हुए हैं, विशेष कर पश्चिमी देशों में। आज के मनोवैज्ञानिकों और समाज शास्त्रियों ने स्पष्ट रूप से दर्शाया है कि जीवन में किसी के साथ घनिष्ट होना बड़ा लाभदायक है। जो लोग किसी के साथ घनिष्टता से जुड़े होते हैं उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता (immune system) अधिक अच्छी होती है तथा उनमें क्लोस्ट्रोल (cholostrol) की मात्रा कम होती है। घनिष्ट संबंध रखने वाले लोगों में कैंसर की बीमारी कम होती है तथा श्वास की बीमारियाँ (respiratory diseases) भी कम होती हैं। हृदय का दौरा पड़ जाने पर इन लोगों का बच जाना अधिक संभाव्य होता है। ये लोग किसी बड़ी शल्य चिकितसा (major surgery) के बाद पुनः स्वस्थ होने में भी अधिक सफल होते हैं।

            घनिष्टता में न केवल शारीरिक लाभ ही मिलते हैं, बल्कि घनिष्टता से जुड़े हुये व्यक्तियों की मानसिकता भी अधिक स्वस्थ होती है। डाक्टर डेन मेक एडम्स ने इस विषय पर कई पुस्तकें लिखी हैं। उन्हों ने घनिष्टता के बारे बताते हुए कहा है - घनिष्टता में हमारी आत्मा में किसी से जुड़ जाने की कामना होती है। इसी कामना के कारण हम काम-वासना से उबरकर सच्चे प्रेम की ओर यात्रा कर पाते हैं।

            वासना से प्रेम का रूपान्तरण एक लम्बी प्रक्रिया है। इस में एक लम्बी यात्रा होती है। मार्क ट्वेन ने कहा है कि पुरुष और स्त्री दोनों ही परिपूर्ण प्रेम का अर्थ तब तक नहीं समझ सकते, जब तक वे एक चौथाई शताब्दी तक विवाहित न रहे हों। उन के अनुसार पच्चीस साल विवाहित रहने के बाद ही स्त्री-पुरुष का प्रेम परिपूर्ण और परिपक्व हो पाता है।

            मार्क ट्वेन की इस बात के पीछे एक बड़ा तथ्य छिपा हुआ है। विवाह के उपरांत सामान्यतः पति-पत्नी तीन चरणों (stages) में से गुजरते हैं। पहला चरण बड़ा रोमांटिक होता है। पत्नी की हर बात प्यारी लगती है। उसकी हर अदा पर आप फ़िदा होते हैं। पति की हर बात मीठी लगती है, पत्नी का हर रूप सुन्दर लगता है। दिन सुहावने होते हैं, रातें रंगीन नजर आती हैं। सब तरफ हरा ही हरा दिखाई देता है। उठते-बैठते, सोते-जागते प्यार का ही आभास होता है। सारा संसार सौन्दर्यमय नजर आता है। वासना और शारीरिक सम्बन्ध इस चरण की प्रमुखता होती है।

            यह चरण कितने दिन चलता है, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इस चरण की अवधि निश्चित नहीं होती। हो सकता है यह चरण दस दिन ही चले, हो सकता है दस साल तक चले। लेकिन, एक न एक दिन इस चरण का अन्त हो जाता है।

            फिर शुरु होता है दूसरा चरण - संघर्ष का चरण। बात-बात पर लड़ाई होती है - तुम गलत कह रहे हो, मैं ठीक कह रही हूँ, पता नहीं मुझे क्या सूझा था जो तुमसे शादी कर ली। रोज-रोज ताने सुनने पड़ते हैं - अब पछताने के अलावा बचा ही क्या है, मुझे मालूम होता कि ऐसी हालत होनी है तो मैं कुँआरी ही रह जाती। बात-बात पर शक्ति-परीक्षण का खेल होता है - तुम मेरी बात तो सुनते ही नहीं, अपनी ही मारे जाते हो। ऐसी जली-कटी बातें रोज की ज़िन्दगी बन जाती हैं पर कर कुछ सकते नहीं। छोटे-छोटे बच्चे होते हैं - किसी को स्कूल भेजना है तो किसी को ट्यूशन पर। किसी के लिये किताबें लानी हैं तो किसी के लिये कपड़े। इतना ही नहीं, और भी बहुत कुछ होता रहता है - माँ की तबियत और भी खराब होती जा रही है, पिता जी की बाइपास सर्जरी होनी है। सब तरफ मुसीबत, सब तरफ परेशानी, सब तरफ खट पट। पति सारी मुसीबतों की जिम्मेवारी पत्नी पर डालता है। पत्नी कहती है, ये अगर अक्ल से काम लेते, तो यह सब नहीं देखना पड़ता। न जाने कब समझेंगे ये! इस चरण में तपस्या होती है - असली अर्थ में।

            दूसरे चरण की समयावधि भी सब के लिये अलग होती है। किसी के लिये एक साल हो सकती है, किसी के लिये पाँच साल और किसी के लिये बीस साल। लेकिन इसके पार होने की प्रतीक्षा करना जरूरी होता है। दाम्पत्य जीवन का असली सुख इस चरण को पार कर लेने के बाद ही शुरु होता है। जब आप इस चरण को पार कर लेते हो, तो आप के जीवन में चमक आती है, निखार आता है - सोना आग से गुजर कर कुन्दन बन जाता है।

            अब आप प्रेममय होकर तीसरे चरण में प्रवेश करते हैं।

            विवाहित जीवन का तीसरा चरण सबसे अधिक प्यारा, सबसे अधिक मधुर होता है। तपस्या फलित होती है। केवल शरीर से नहीं, अब आप मन से भी जुड़े होते हो, हृदय से भी जुड़े होते हो, आत्मा से भी जुड़े होते हो। इस चरण पर हर काम में एक दूसरे का सहयोग मिलता है। पति कहता है, देखो, मेरी पत्नी ने जीवन भर कितना कष्ट उठाया। आज हमें जो सुख मिल रहा है उसका सारा  श्रेय इसी को जाता है।  पत्नी  कहती है- इनका साथ न होता, इनका प्यार न मिलता तो मैं अकेली क्या कर सकती थी? बस, दोनों ही ऐसा जीवन-साथी पाकर धन्य हो जाते हैं। दोनों को लगता है कि इससे अच्छा जीवन-साथी तो मिल ही नहीं सकता था। तीसरे चरण की स्थिति जीवन-पर्यन्त बनी रहती है। फिर हम चाहते हैं कि जन्मों-जन्मों तक यही पति मिले। फिर हम कहते र्हैं जन्मों-जन्मों तक यही स्त्री मेरी जीवन-साथी बने।

            आप जब देवता की पत्नी को पति के समीप बैठा देखते हैं तो वह उनके विवाहित जीवन का तीसरा चरण होता है। यही चरण स्थायी रूप से मधुर होता है। देवताओं को तो आप तीसरे चरण में ही देख पाते हो। देवताओं को आप तभी देख सकते हैं जब उनका सुख स्थायी बन जाता है, जब उनका प्रेम स्थायी हो चुका होता है, जब उनमें परमात्मा का अवतरण हो चुकता है।

            यदि आप विवाहित  जीवन के तीसरे चरण तक पहुँच चुके हैं, या पहुँचने वाले हैं, तो हम दोनों आपको बधाई देते हैं। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि आप की यात्रा सही दिशा में हो रही है। आप ठीक मार्ग पर चल रहे हैं। जहाँ पर पति-पत्नी की संयुक्ति पूर्ण होती है, वह आपकी यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। मील का यह पत्थर आपकी वास्तविक सफलता का प्रमाण है। यहाँ तक पहुँच जाना इस बात की पुष्टि करता है कि आप वास्तव में  देवत्व की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

            जुड़ने की इस प्रक्रिया में पूर्णता का आभास होता है। संयुक्ति की इस पूर्णता में एकात्मता का अनुभव होता है। लगता है कि दीवार गिर गई - दो ऊर्जाएँ मिल गईं। दो प्राण मिल गये, संयुक्त हुए, एक हो गये। इस उपलब्धि के लिये हम दोनों ही नहीं, गुरुबाणी भी आप को बधाई देते हुए यह कहती है कि इस स्थिति को उपलब्ध होने वाले धन्य हैं -

एक जोत दोई मूर्त्ति

धन फिर कहिए सोइ।

            मूर्त्तियाँ दो होती हैं, पर प्राण एक हो जाते हैं, दीपक दो होते हैं, पर ज्योति एक होती है।

            यजुर्वेद चाहता है कि ऐसी स्थिति सौ वर्ष तक चलती रहे -

 

अस्थूरि णौ गार्हपतयानि सन्तु शतं हिमाः।

            हम दोनों (पति-पत्नी) गृहस्थ संबंधी कर्त्तव्य सौ वर्ष तक निभाते रहें।

            और अथर्व वेद इस स्थिति को इस प्रकार चित्रित करता है-

 

अक्ष्यौ नौ मधुसंकाशे अनीकं नौ समफृनम।

अन्तः कृणुष्व मां हृदि मन इन्नौ सहासति।

            हम दोनों (पति-पत्नी) की आँखें मधु सदृश मधुर हों। हम दोनों की आँख के अग्रभाग उत्तम अञ्जन से युक्त हों। (एक-दूसरे के) हृदयों में रहते हुए, हम  दोनों का मन सदैव एक रहे।

           

            दोनों का मन एक रहना ही प्रेम है।

            संयुक्ति ही प्रेम है।

            अनेकता से एकता की ओर बढ़ना प्रेम की प्रक्रिया है। अनेकता से एकता की ओर जाने की यात्रा में सत्य अवतीर्ण होता है। अनेक से एक की ओर बढ़ना ही परमात्मा को प्रकट करना है।  इसलिए प्रेम परमात्मा है। इसीलिये प्रेम सत्य है। और जो सत्य है, वह शाश्वत है।

            इसीलिये प्रेम शाश्वत है।

            प्रेम का क्षय नहीं होता। प्रेम कभी मिटता नहीं। प्रेमी मिट जाते हैं - प्रेम रह जाता है। प्रेमी लुप्त हो जाते हैं - प्रेम बना रहता है। प्रेमी बदल जाते हैं - लीला वही चलती है। पात्र बदल जाते हैं - कहानी वही होती है।

            प्रेम का कथानक शाश्वत है।

            प्रेम सुख है। इसीलिये संयुक्ति में इतना सुख है। लेकिन  कोई सुख बिना कर्म के नहीं मिलता। पाने के लिये कुछ करना पड़ता है। दाम्पत्य सुख पाने के लिये भी बहुत कुछ करना पड़ता है। सम्बन्धों की मधुरता का स्वाद लेने के लिए भी मेहनत करनी पड़ती है - सतत रूप से। यह ठीक है कि जोड़याँ बनाने वाला ईश्वर है लेकिन निभाने का काम तो हमें स्वयं ही करना पड़ता है। और निभाने की प्रक्रिया ही संयुक्ति की प्रक्रिया है। निभाने की यात्रा ही संयुक्ति की यात्रा है। इसी यात्रा के लिये मार्क ट्वेन ने पच्चीस साल का समय माँगा है। इसी यात्रा में काम-वासना की ऊर्जा प्रेम की ऊर्जा में रूपांतरित होती है। तीसरे चरण पर पहुँचकर आपकी काम-वासना का रूपांतरण हो जाता है - आप की वासना अब प्रेम बन जाती है।

            यह सब हो पाता है वासना को स्वीकार कर लेने से, वासना का दमन करके नहीं। वासना को स्वीकार करके ही आप वासना से उबर सकते हैं, वासना से लड़कर नहीं। वासना को स्वीकार करके ही आप यात्रा कर सकते हैं, अन्यथा संयुक्ति से मिलने वाले इस देवोचित सुख से वंचित रह जाते हैं।

संयुक्ति की प्रक्रिया हमारी काम-वासना को प्रेम में रूपांतरित कर देती है।

            संयुक्ति की प्रक्रिया एक पवित्र प्रक्रिया है। यह हमारा सौभाग्य है कि इस की पवित्रता से प्रेम और प्रसन्नता का अवतरण होता है। यही इस प्रक्रिया का वास्तविक उद्देश्य है। बेशक इस प्रक्रिया का आरम्भ हमारी शारीरिक आवश्यकता से होता है, लेकिन बाद में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इस प्रक्रिया की तो बहुत बड़ी महिमा है। फिर तो यह बात भी समझ में आ जाती है कि संभोग एक उत्सव है जिसमें परमात्मा के ही गौरव की अभिव्यञ्जना होती है। संभोग तो ऊर्जा के आदान-प्रदान की प्रक्रिया है जो सारे ब्रह्माण्ड में घटित हो रही है - हर क्षण!

            यहाँ पर एक बात ध्यान देने योग्य है -

            देखने में लगता है कि संयुक्ति की प्रक्रिया में दूसरा हमें कुछ दे रहा है जिसके कारण हम प्रेममय होते जा रहे हैं। लेकिन यह हमारा भ्रम है। हम स्वयं ही देते हैं, स्वयं ही पाते हैं। हमारे देने में ही हमारा पाना छिपा होता है। इस बात की विस्तृत चर्चा तो हम आगे जाकर करेंगे, लेकिन अभी हम आपको इतना ही बताना चाहते हैं कि दाम्पत्य जीवन में (या किसी भी परिस्थिति में) यदि देने की भावना नहीं है, तो निराशा ही हाथ लगती है। संयुक्ति की प्रक्रिया में प्रेम कहीं बाहर से खोज कर नहीं लाया जाता, बल्कि प्रेम का सृजन होता है। खोजने से कुछ नहीं मिलता - परमात्मा भी नहीं। सब कुछ सृजन करना होता है। जीवन सृजन की प्रक्रिया है। संयुक्ति की प्रक्रिया भी सृजन की प्रक्रिया है, जिसमें प्रेम और पूर्णता का सृजन होता है।

            जब तक हम प्रेम से परिपूर्ण होते हैं, हम उम्र में काफी बड़े हो जाते हैं। जब तक हम प्रेम की इस अवस्था तक पहुँचते हैं, तब तक हम वृद्ध हो चलते हैं। लेकिन प्रेम की उपलब्धि के कारण हमारी वृद्धावस्था में भी निखार आ जाता है।

            बुढ़ापा एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। बुढ़ापा हमारे लिये एक बहुत बड़ी सम्पदा लाता है। इस सम्पदा के कारण ही बुढ़ापे का इतना महत्त्व है। प्रेम की इस सम्पदा के कारण वृद्धावस्था भी एक सुन्दर अवस्था बन जाती है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है कि जो सौन्दर्य बुढ़ापे का है, वह किसी और अवस्था का नहीं है। इस सौन्दर्य के कारण ही वृद्धावस्था आदरणीय बनती है। प्रेम की यह उपलब्धि वृद्धों को सत्कार के योग्य बनाती है।

            संयुक्ति स्त्री और पुरुष दोनों के लिये ही लाभदायक है।                     

            वन में पेड़ खड़ा था। उसके साथ लिपटी हुई लता भी बढ़ने लगी। बढ़ते-बढ़ते पेड़ के बराबर हो गई और फलने फूलने लगी। बेल को फलते-फूलते देखकर, पेड़ ने उसे धमकी देना शुरु कर दिया - देख! मेरे कारण ही तू इतनी ऊँची उठी है। मुझ से डर कर रहना, नहीं तो तुझे मार भगा दूँगा। लता बेचारी चुप रही। पेड़ की डाँट सुनकर भी कुछ न बोली।

            थोड़ी देर में दो यात्री वहाँ से निकले। एक ने कहा, भाई, इस पेड़ के नीचे थोड़ी देर आराम क्यों न कर लें? देखो, इस पर पुष्पित लता कितनी सुन्दर लग रही है।

            पेड़ की समझ में आ गया कि लता के कारण तो उसका महत्त्व बढ़ गया है। अब उसने लता को धमकाना छोड़ दिया।

            स्त्री के साथ संयुक्ति में पुरुष की शोभा है। नारी के साथ जुड़े रहने में नर का महत्त्व है। दोनों एक दूसरे के सहयोगी हैं, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। संयुक्ति ही स्त्री को पुरुष की अर्द्धांगनी बनाती है।

            संयुक्ति की प्रक्रिया में सन्तुलन की प्रक्रिया छिपी हुई है। सन्तुलन संयुक्ति का महत्त्वपूर्ण अंग है।

            पुरुष और स्त्री के चारित्रिक गुण-धर्म बड़े भिन्न हैं। यह भिन्नता इतनी गहरी है कि अमरीका के एक प्रसिद्ध लेखक जॉन ग्रे कहते हैं कि पुरुष और स्त्री इस पृथ्वी पर दो अलग-अलग लोकों से आये हैं - पुरुष मार्स ग्रह से आया है और स्त्री वीनस ग्रह से। लोकों का यह भेद इस बात का प्रतीक है कि स्त्री और पुरुष दोनों के गुण-धर्म बिल्कुल भिन्न हैं।

            स्त्री और पुरुष की भिन्नता बड़ी गहरी है। शरीर, मन और हृदय में ही नहीं, यह भिन्नता तो उनकी आत्मा में भी समायी हुई है -

            पुरुष जीतना चाहता है, लेना चाहता है। पुरुष आधिपत्य जमाना चाहता है। वह दूसरे को मिटाना चाहता है। पुरुष में कठोरता है।

            स्त्री में कोमलता है - वह जीतती है अपने कोमल गुणों के कारण। स्त्री में ममता है, करुणा है, दया है। वह देना जानती है, वह मिटना जानती है।

            पुरुष महत्त्वकाँक्षा है, अहंकार की होड़ है, विजय की ज्वाला है - पुरुष आक्रमण है।

            स्त्री शान्त सरोवर है, शीतल झरना है - स्त्री निमंत्रण है।

            पुरुष की प्रवृत्ति होती है - इकट्ठा कर लो, कब्जा कर लो, मालिक बन जाओ।

            स्त्री कहती है - छोड़ दो यह सब, दे दो किसी को।

            पुरुष में हिंसा है। बहुत जोर लगाया तो वह अहिंसा तक आ जाता है।

            स्त्री एक कदम आगे जाती है - वह प्रेम करती है।

            हिंसा का अर्थ है - दूसरे को दुख देना।

            अहिंसा का अर्थ है - दूसरे को दुख न देना।

            प्रेम का अर्थ है - दूसरे को सुख देना।

            स्त्री अहिंसा को आत्मसात कर लेती है। अहिंसा उसके अन्दर घर बनाकर बैठ जाती है। जब आप के अन्दर अहिंसा का घर बन जाए तो उसमें प्रेम का जन्म होता है।

            पतंजलि जी अपने योग-शास्त्र में अहिंसा की परिभाषा इस प्रकार देते हैं -

            शारीरिक, वाचिक और मानसिक सभी प्रकार सदैव, सभी प्राणियों को पीड़ा न पहुँचाना तथा उन्हें पीड़ा देने की भावना न रखना अहिंसा है।

          

            महात्मा बुद्ध अहिंसा के अर्थ को इस प्रकार समझाते हैं  -

            सबको अपने समान जानकर न मारना और न ही मारने की प्रेरणा देना अहिंसा है।

            महात्मा बुद्ध ने जिस बात पर जोर दिया है, वह है - सबको अपने समान जानना। अहिंसा का मूल इसी बात में है।

            सबको अपने समान जान लिया तो फिर बात ही क्या है! जब आप दूसरे को अपने समान जान लेते हो, तो फिर उससे प्रेम ही करोगे - वैमनस्य नहीं। जिसे हम अपने समान जान लेते हैं, उसे हम पीड़ा दे भी कैसे सकते हैं? जो आफ समान हो गया, उससे तो आप कोई द्वैत रख ही नहीं सकते!

            जिससे आप प्रेम करते हो, उसे आप अपने समान ही मानते हो - अन्यथा वह प्रेम नहीं, कुछ और है। प्रेम का अर्थ ही यही  है कि जो आपने अपने अन्दर देखा है, अब आपको बाहर भी वही नजर आने लगा है।

            स्त्री प्रेम करती है। प्रेम की भावना दूसरे को सुख देने की भावना है। दूसरे को सुख देने की भावना ही स्त्री के अपने सुख का कारण बनती है।

            हाँ, तो बात हो रही थी स्त्री और पुरुष की भिन्नता की। स्त्री और पुरुष भिन्न अवश्य हैं, लेकिन असमान नहीं हैं। भिन्न होना एक बात है, असमान होना दूसरी बात है। भिन्न होने का अर्थ है - इनके गुण-धर्म अलग हैं, इनकी चारित्रिक विशेषताएँ अलग हैं। असमान होने का अर्थ है - एक बड़ा है, दूसरा छोटा। एक ऊँचा है, दूसरा नीचे है।

            भिन्नता के कारण स्त्री का व्यक्तित्त्व अलग होता है और पुरुष का अलग। लेकिन हम लोग भिन्नता को असमानता समझने की भूल कर बैठते हैं। शारीरिक बल के कारण पुरुष अपने आप को शक्तिशाली समझने लगता है और स्त्री को कमजोर। इसीलिये पुरुष आधिपत्य जमाने के चक्कर में पड़ जाता है - मालिक बनने के फेर में पड़ जाता है। पुरुष बड़ा बनना चाहता है।

            शारीरिक शक्ति तीन प्रकार की होती है। पुरुष में जिस शक्ति की अधिकता होती है, उसे बल (strength) कहते हैं। जिस शक्ति से हम दूसरों को चोट पहुँचा सकते हैं, वह बल है। जिस शक्ति से हम भारी वजन उठा सकते हैं, वह बल है। पहाड़ उठा कर ले जाना हनुमान जी के बल का प्रतीक है।

            लेकिन, एक और शारीरिक शक्ति होती है जिसे अँग्रेजी में एंड्रयोरेंस (endurance) कहते हैं। यह शक्ति स्त्री में अधिक होती है। एंड्रयोरेंस का अर्थ है - सहने की क्षमता, लम्बे समय तक टिके रहने की शक्ति, डटे रहने का दम। पुरुष और स्त्री दोनों को यदि एक जैसी यातना से गुजरना पड़े तो पुरुष जल्दी टूट जाता है। स्त्री देर तक टिकी रह सकती है - उस पीड़ा को सहते हुए। प्रकृति ने यह शक्ति स्त्री को ही अधिक दी हुई है। गर्भधारण से लेकर प्रसव तक स्त्री को एक लम्बी और कठिन पीड़ा से गुजरना पड़ता है। इसी सहनशक्ति के कारण स्त्री न जाने और भी कितनी पीड़ा सह लेती है। इसी सहनशक्ति के कारण वह दुख और दमन के बीच भी जीवित रहती है। न केवल जीवित रहती है, बल्कि मुस्कुरा भी सकती है।

             स्त्री की इस शक्ति के साथ सहमत होकर यजुर्वेद कहता है -

 

      मा भेर्मा सं विक्था ऊर्ज धत्स्व धिषणे वीड्वी सती वीडयेथामूर्ज दधाथाम्। पाप्मा हतो न सोमः।

            हे स्त्री ! तू शरीर और आत्मबल से युक्त होती हुई पति से मत डर, मत काँप, तथा बल और पराक्रम को धारण कर। तुम दोनों (स्त्री-पुरुष) बुद्धि और पराक्रम को धारण करो जिससे सुदृढ़ बल वाले हो और उत्तम व्यवहार करते हुए अपने दोष दूर करो और चन्द्र-तुल्य गुण बढ़ा कर परस्पर एक दूसरे को आनन्दित करते रहो।

            हम लोग कुँआरी लड़की को कन्या कहते हैं। कन्या का अर्थ है - कान्तिमान, दीप्तिमान, प्रतिभावान। स्त्री अपने अन्दर ऐसे गुणों का विकास कर सकती है जिसके कारण वह हर क्षेत्र में उत्कृष्ट बन जाती है। किसी भी समाज का भविष्य उसके बच्चों की उत्तमता पर निर्भर करता है। इसीलिये स्त्री ही समाज और देश के भविष्य की रूप-रेखा बनाती है। माँ की भूमिका में बहुत बड़ी गरिमा है। धैर्य, सहिष्णुता, देख रेख और पालन-पोषण की क्षमता आदि ऐसे गुण हैं जिनके कारण स्त्री एक स्वाभाविक प्रशिक्षिका है। इतना ही नहीं, प्रबन्धकीय-निपुणता (managerial-skill) भी पुरुष की अपेक्षा स्त्री में अधिक होती है जिसके कारण वह एक सुयोग्य और सफल गृहणी बनती है। एक गृहणी का दर्जा कहीं से भी छोटा नहीं है। इस बात को समझ लेना पुरुष के हित में है, समाज के हित में है, राष्ट्र के हित में है, विश्व के हित में है।

            रामचरित मानस में उमा, सीता, कैकई, शबरी, मन्दोदरी आदि अनेक स्त्रियों के चरित्र का वर्णन आता है। विश्व-विख्यात ब्रह्मर्षि विश्वात्मा बावरा जी ने अपनी पुस्तक मानस महाकाव्य में नारी में इन चरित्रों पर बड़ी सुन्दर विवेचना की है। इस विवेचना के लिये उन्होंने नारी को ही क्यों चुना? बावरा जी के अपने ही शब्दों में दिया गया उत्तर पढ़ने योग्य है -

 

            मेरी दृष्टि में नारी मानव ही नहीं मानवता की भी जन्मदात्री है क्योंकि मानवता के आधार रूप में प्रतिष्ठित सम्पूर्ण उदात्त गुणों की वह अधिष्ठात्री है। आर्जव, दया, करुणा, उदारता, स्नेहसिक्त सेवा, परार्थ, समर्पण, साहस, सहनशीलता, लज्जा, मृदुता, सौशील्य, वात्सल्य आदि समस्त दैवी गुणों की वह खान है अर्थात् ये सम्पूर्ण गुण उसमें सहज ही आविर्भूत होते हैं, इसीलिए तत्त्वद्रष्टा मनीषियों ने भूतल पर मूर्त्त रूप में देवी भाव की उद्‌भावना का प्रथम समाश्रय मातृ-शक्ति को ही घोषित किया है।

            नारी के सुव्यस्थित तथा सुप्रतिष्ठित जीवन के अभाव में सुव्यवस्थित समाज के प्रतिष्ठापन की कल्पना निरर्थक ही नहीं निराधार भी है। सुव्यवस्थित तथा सुविकासशील मानव समाज की संरचना के लिए उसकी जन्मदात्री, विधात्री नारी का अपने यथार्थ स्वरूप, स्थान और दायित्व के प्रति सजग होना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। क्योंकि यदि नारी सदाचार से च्युत हो जाये तो वह अपने दूषित प्रभाव से समाज के बहुत बड़े समुदाय को दूषित ही नहीं करती, उसे पतन के गर्त में ढकेल देती है।

            अतः मानव एवं मानवता दोनों को सुरक्षित एवं प्रतिष्ठित करने के लिए नारी को भोग्य एवं कामिनी के रूप में नहीं, निर्मात्री एवं पालिका, परिपोषिका मातृशक्ति के रूप में सुप्रतिष्ठित करना अनिवार्य है। और यह तभी सम्भव हो सकेगा जब नारी अपने गौरव को जानेगी, पहचानेगी।



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