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06.06.2007

 
लेखक : चाचरा दम्पति - केनेडा वाले
प्रकाशक: जागृति प्रकाशन, वाटरलू, ओण्टेरियो, केनेडा
सम्पर्क : jagritiprakashan@gmail.com
   

प्राक्कथन

     उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध अमरीकन निबन्धकार, कवि और दार्शनिक हेनरी डेविड थोरो कहते हैं -

           मनुष्य सफल होने के लिये पैदा हुआ है, असफल होने के लिये नहीं।

           लेकिन, कितने लोग इस बात को जानते हैं? फिर, कितने लोग इस बात को मानते हैं? और कितने लोग वास्तव में सफल होते हैं?

           बहुत ही कम।
          
क्यों
?
          
क्योंकि हम जानते ही नहीं कि सफलता क्या है। कोई धन एकत्र करने को अपनी सफलता समझता है तो कोई पुण्य एकत्र करने को। कोई बड़ी हवेली बनवाकर अपने को सफल समझ लेता है तो कोई ऊँचा पद पाकर। कोई अपने ज्ञान और पाँडित्य को सफलता मान लेता है, तो कोई अपनी नैतिकता और सदाचार को।

           क्या ये सब वास्तव में सफलता के प्रतीक हैं?
          
नहीं!

           यदि बड़ी हवेली में रहकर भी किसी की ज़िन्दगी कलह-क्लेश में गुज़रे तो क्या आप उसे सफल कहेंगे? यदि कोई धनवान धन की चिन्ता में रात को सो नहीं सके तो क्या वह सफल कहलायेगा? परलोक को सुधारने की लालच में यदि कोई घर-गृहस्थी छोड़कर, महात्मा बन जाये तो क्या वह सफल हो जाता है?

           हम लोग दूसरों से बड़ा बन जाने को अपनी सफलता समझते हैं, इसलिये हम अपने आप को दूसरों की नजरों में ऊँचा सिद्ध करना चाहते हैं। फिर हम सफलता की ऐसी विभिन्न परिभाषाओं में उलझ कर रह जाते हैं जो दूसरों के द्वारा बनाई हुई होती हैं। पर, वास्तव में तो सफलता की एक ही परिभाषा है - जो अपने ढंग से जीने में पूरी तरह से सन्तुष्ट है, वह सफल है।

           आपका सुख ही आप की उच्चतम सफलता है। जो सुखी नहीं है, उसे सफल नहीं कहा जा सकता। जब हम अपने आप को दूसरों की दृष्टि से आँकते हैं, तो हमारा अपना सुख गौण हो जाता है। हम भूल जाते हैं कि हमारा सुख हमारी अपनी दृष्टि में है, दूसरों की दृष्टि में नहीं। इसलिये आप की सफलता को किसी दूसरे की परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता।

            तो फिर क्या करना चाहिए? किस की बात सुननी चाहिए?

           आप को केवल उन की बात सुननी है जिन्हें स्वयं आप सर्वोच्च रूप से सफल मानते हैं, जिनकी आप सुबह-शाम पूजा करते हैं, जिनकी आप आरती उतारते हैं - जिन्हें आप देवता कहते हैं। फिर, आप को भी वही करना है, जो देवता करते हैं। आपका काम देवता की पूजा करने से नहीं, देवता जैसा आचरण करने से बनता है। आप की सफलता देवता की पूजा में नहीं, स्वयं देवता बन जाने में है।

           क्या ऐसा होना संभव है? क्या हम लोग देवता बन सकते हैं? जी हाँ! देवता बनना न केवल संभव है, बल्कि देवता बनना ही हमारा एक-मात्र धर्म है। लेकिन हम लोग ऐसा नहीं करते। हम दूसरों की बातों से हतोत्साहित होते हैं। हम से कहा जाता है - आप देवता कैसे हो सकते हो? देवता के पास तो विलक्षण और दिव्य शक्ति होती है! आप तो छोटे-मोटे साधारण निर्बल जीव हो।

           लेकिन हम दोनों ऐसा नहीं मानते। इस पुस्तक के माध्यम से हम आप को यह बताना चाहते हैं कि आप छोटे-मोटे साधारण मनुष्य नहीं हैं, आप जीते-जागते देवता हैं। यही हमारे वेदान्त का वह सन्देश है जिस की हम उपेक्षा करते आ रहे हैं। इस उपेक्षा के कारण हम अपने अन्दर के देवता को नहीं देख पाते। इसीलिये हम उस सम्पूर्णसुख को नहीं भोग पाते जिस पर हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है। हम इस प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं कि एक दिन परमात्मा का अवतार इस धरती पर उतरेगा और हमारे दुख हर ले जायेगा। लेकिन वह अवतार कोई और नहीं, स्वयं आप हैं। आप के जाग जाने से उसका अवतरण हो जाता है।

            आपकी भूमिका बहुत बड़ी है।

           परमात्मा आप को निमंत्रण दे रहा है। परमात्मा आप से कह रहा है - उठो! अपने आप को जानो! अपनी शक्ति को पहचानो! आप ही अवतार हैं, आप ही देवता हैं। देवताओं वाले सारे सुख आप के लिये ही हैं।

           पर, सुख को हम पहचानते नहीं हैं। हम लोग यह नहीं जानते कि सुख कहीं बाहर से नहीं आता। सुख कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे कोई दूसरा आप की जेब में डाल देगा और वह आप का हो जायेगा। सुख तो एक प्रक्रिया (process) है जिसमें हमारे अपने भाव जागते हैं - भौतिकता के माध्यम से भी, और अध्यात्मिकता के माध्यम से भी। इस प्रक्रिया से हम लोग स्वयं ही अपने सुख का सृजन करते हैं।

           देवताओं के माध्यम से, सुख-सृजन की इस प्रक्रिया पर हमने प्रकाश डाला है, अपनी छोटी सी पुस्तक में। आशा है, आप हमारे इस प्रयास से लाभान्वित होंगे।

           इस पुस्तक में कई किस्से हैं, कई कहानियाँ हैं, कई घटनाओं के वर्णन हैं। बहुत सारी कहानियाँ कपोल-कल्पित हैं, लेकिन कुछ कहानियाँ सच्ची भी हैं। कई कहानियाँ सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं जिनमें हमने पात्रों और स्थानों के नाम बदल दिये हैं। इन प्रसंगों का उपयोग हमने अपने  दृष्टिकोण की पुष्टि के उद्देश्य से किया है, किसी की बड़ाई या बुराई करने के लिये नहीं।

           हम दोनों अपने आप को संस्कृत के ज्ञाता नहीं मानते। इसलिये, वेदों और उपनिषदों के जो प्रसंग इस पुस्तक में उद्धृत हैं, उनके अर्थ हमने अन्य पुस्तकों से लिये हैं। वेदान्त के कई वृतान्त और समीक्षाएँ स्वामी विवेकानन्द की व्याख्याओं पर आधारित हैं। संयम और सामर्थ्य के कई प्रसंग प्रज्ञा-पुराण से लिये गये हैं।

           आप इस पुस्तक को पढ़िये, आत्मसात करके व्यवहार में लाइये और अपने आप को देवता बनते हुए देखिये। यदि चाहें तो आप अपने अनुभव और सुझाव लिख कर हमें भेज सकते हैं।

चाचरा दम्पति
फकीर बाबा एवं सरोज रानी
केनेडा वाले

June 14, 2005
27-121 University Ave. E.
Waterloo, Ontario
Canada  N2J 4J1
Email - fchachra@gmail.com