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01.16.2009
 
१ - अनुसरण
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे।

       हे मनुष्यो ! विष्णु के पुरुषार्थ को देखो और विचार कर उनका अनुसरण करो।

                                                                   - सामवेद

            इन्द्र देवता और विरोचन दैत्य जिज्ञासा लेकर प्रजापति के पास गये। दोनों जीवन के मार्ग को समझना चाहते थे। प्रजापति ने दोनों को एक सूत्र बताया - अपने शरीर को देखो, अपने शरीर को समझो।

      दैत्य विरोचन ने इसे अन्तिम सत्य मान लिया। उसने अपने परिजनों को भी यही बताया कि अपने शरीर को सम्भालो, उसे पुष्ट रखो, उसे बढ़ाओ, इसी में जीवन की सार्थकता है।

      लेकिन इन्द्र की जिज्ञासा बनी रही। जब अन्न (आहार) द्वारा निर्मित शरीर की बात समझ में आ गई तो उसे प्राणों का आभास हुआ। वह फिर प्रजापति के पास गया। प्रजापति ने उसे प्राणों की जानकारी दी। जब उसने प्राणों को समझा तो उसे मन की प्रतीति हुई। वह फिर प्रजापति के पास गया। यह क्रम चलता रहा। इस प्रकार इन्द्र ने हमारे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोशों का रहस्य समझा और पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया।

      छान्दोग्योपनिषद में तो यह कथा काफी लम्बी है, किन्तु गायत्री ज्ञानपीठ के आचार्य पंडित श्रीराम जी शर्मा ने अपने प्रज्ञा पुराण में इसे सरल और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है। छोटी होते हुए भी इस कथा में कई बड़ी बातें छुपी हुई हैं-

      - आनन्द तक पहुँचने के लिये देवता यात्रा करते हैं।

      - आनन्द तक पहुँचना एक लम्बी प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया ही हमारे जीवन की यात्रा है।

      - आनन्द पाने की प्रक्रिया हमारे शरीर से आरम्भ होती है।

      - जब तक हम अपने शरीर को नहीं संभाल लेते, हमारी यात्रा आगे नहीं बढ़ सकती। इसलिये शरीर की उपेक्षा करने वाला आनन्द तक नहीं पहुँच सकता।

      - जो ज्ञान हमें आनन्द तक पहुँचाता है, वही सच्चा और पूर्ण ज्ञान है।

       वेद कहते हैं कि न केवल हमारी बुद्धि देवताओं जैसी हो, बल्कि हमारा तेज भी देवताओं जैसा हो। इसके लिए वे हमें देवता का अनुसरण करने की मंत्रणा देते हैं।

            यह अनुसरण कैसे करना है?

            जो यात्रा देवता करते हैं वह यात्रा हमें भी करनी है।

      लेकिन क्या हम ऐसा करते हैं?

      नहीं! इस विषय में तो हम कोई बात ही नहीं करते।

      क्या हम लोग देवता जैसी लम्बी यात्रा करने की कामना करते हैं?

      नहीं! इस में तो हम कोई रुचि ही नहीं दिखाते।

      क्या हम देवता के पूर्णज्ञान को जानने का प्रयत्न करते हैं?

      नहीं! इसके बारे में तो हम उनसे कुछ नहीं पूछते।

      हम तो बस देवता की पूजा करते हैं। हम तो बस देवताओं से माँगते हैं।

            हम लोग तो इतना जानते हैं कि देवता साधन-सम्पन्न होते हैं, जीवन यापन के लिये इन के पास बड़ी सुविधाएँ होती हैं। जैसे मंत्री के पास बंगला होता है, मोटर-गाड़ी होती है, नौकर-चाकर होते हैं, ऐसे ही देवता के पास भी अनेक विलास-वस्तुएँ (Luxuries) होती हैं। देवता के पास अपना वाहन होता है, उनका निवास स्वर्ग में होता है, उनके दरबार में संगीत की महफ़िल सजती है, अप्सराओं का नृत्य होता है। हम तो उनके ठाठ-बाठ से प्रभावित होते हैं। हम तो उनकी शान-शौकत से ही चौंधिया कर रह जाते हैं।

            जब हम देख लेते हैं कि देवताओं के पास सुख ही सुख हैं तो हम चाहने लगते हैं कि उनके छलकते प्याले से जो सुख टपके, वह हमें मिल जाये। इसी लालसा से हम देवताओं की पूजा करते हैं। हम चाहते हैं कि हम से प्रसन्न होकर देवता अपनी कुछ धन-सम्पत्ति हमें भी दे दें, इसके लिये हम उनकी आरती उतारते हैं। हमें देवता से कुछ मिल जाये, यही हमारी पूजा का उद्देश्य होता है। कुछ माँगने के लिये ही हम देवता की आरती उतारते हैं। हमारी हर आरती माँग के साथ जुड़ी होती है।

      देखिये जरा -

दीनन की लाज राखो शम्भु सुतवारी।
कामना को पूरा करो जग बलिहारी।।

 -गणेश जी की आरती

 

श्रीसत्यनारायण जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मन वांछित फल पावे।।

-सत्यनारायण जी की आरती

 

श्रीअम्बे जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी
, सुख सम्पत्ति पावे।।

- अम्बा जी की आरती

 

ओम जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता
, मन वांछित फल पाता।।

- गंगा जी की आरती

 

            हमारी पूजा का वास्तविक कारण होता है- हमारी मनोकामना! हम जो चाहें, वह हमें मिल जाये! मनवांछित फल की कामना ही हमारी पूजा का आधारभूत कारण होता है। इसके अतिरिक्त सब कुछ गौण हो जाता है।

            इतवार के दिन हम मन्दिर गये थे। जब हम अन्दर जाकर बैठे तो एक सज्जन गीता पर प्रवचन दे रहे थे -

            ...हमारा अधिकार तो केवल कर्म पर है ... फल की इच्छा नहीं होनी चाहिए ... आदि आदि।

            फिर पाँच मिनट के बाद वही सज्जन थाली में पूजा की ज्योति लिये आरती करने लगे -

...जो ध्यावे, फल पावे, दुख बिनशे मन का,
सुख सम्पत्ति घर आवे
...

            यह कैसी विडम्बना है!

            हमारी पूजा में कर्म के लिये कोई स्थान  नहीं है - हमारी पूजा में केवल फल की माँग होती है। सारे देश में गीता की चर्चाएँ होती हैं, बड़े-बड़े व्याख्यान होते हैं, फल की इच्छा न रखने के उपदेश दिये जाते हैं, फिर भी हमारी सारी धार्मिकता फल पर ही केन्द्रित होकर रह जाती है। गीता का गुण-गान करने से तो हम नहीं थकते, लेकिन हमारा आचरण गीता के विपरीत होता है।

कर्म की तो हम बातें ही करते हैं। हमारा आचरण तो फल की कामना पर केन्द्रित होता है। क्या गीता को सम्मान देने का यही अर्थ है?

      यही हमारी निद्रा है। हम सोये हुए हैं।

            हम जानते ही नहीं कि हम क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं, क्या चाहते हैं और क्या करते हैं। हम शायद यह समझते हैं कि कुछ माँग कर हम देवता का सम्मान करते हैं। लेकिन क्या हमारे माँगने से देवता का सम्मान हो जाता है?

            नहीं! देवता से माँगने का यह अर्थ नहीं कि हम उनका सम्मान करने लगे हैं। माँगने वाला कभी किसी का सम्मान नहीं कर सकता - सम्मान के नाम पर तो वह अपनी बात मनवाना चाहता है। पूजा और सम्मान के नाम पर तो हम देवताओं से मनवांछित फल चाहते हैं। जैसे हम लोग अपना मतलब निकालने के लिय अफसरों और मंत्रियों के आगे पीछे घूमते हैं, ऐसे ही हम देवताओं के आगे हाथ जोड़ते हैं। हमारी प्रवृत्ति वही होती है - कुछ मिल जाय! इसे देवता का सम्मान नहीं कहा जा सकता। जो सम्मान किसी माँग के साथ जुड़ा हुआ है, वह सम्मान सच्चा नहीं हो सकता। इसलिये देवता के प्रति दर्शाया गया हमारा सम्मान दिखावटी है।

माँगने वाला किसी का सम्मान नहीं कर सकता।

      तो फिर देवता को सच्चा सम्मान कैसे दिया जा सकता है?

                  देवताओं को सच्चा सम्मान देने का अर्थ है - उनका अनुसरण करना, उनके पद-चिन्हों पर चलना, उनके दिखाये गये मार्ग पर यात्रा करना, उनके जैसे बनने का प्रयत्न करना। देवताओं के जैसा हो जाना ही उनके प्रति हमारे सम्मान का असली सूचक है।  देवताओं का अनुसरण ही उनका वास्तविक सम्मान है। स्वयं देवता बन कर ही हम देवता का सच्चा सम्मान कर सकते हैं - इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।

देवताओं का अनुसरण करके ही हम उन्हें सच्चा सम्मान दे सकते हैं। देवता को सम्मान देने का और कोई उपाय नहीं है।

            तो, क्या हम सचमुच में देवता बन सकते हैं?

            बिल्कुल! जो यात्रा देवता करते हैं, वह यात्रा आप भी कर सकते हैं। वास्तव में तो हम सब देवता हैं, लेकिन जानते नहीं - क्योंकि हम सोये हुए हैं।

            देवताओं की तरह हमें भी आनन्द तक पहुँचने के लिये यात्रा करनी है। जागकर हमें भी अपने अन्दर के देवता को उघाड़ना है।

            क्या हम भी देवता जैसे साधन-सम्पन्न हो सकते हैं?

            हाँ! देवता वाला सारा सामर्थ्य आपके अन्दर भी है। इसकी पूरी जानकारी हम आगे चल कर देंगे। अभी तो हम आपको इतना बताना चाहते हैं कि जो सुख देवता को मिलते हैं, वे सारे सुख आपको भी मिल सकते हैं।

            क्या हैं देवता के सुख?

            देवता के जिन सुखों से हम लोग परिचित हैं, वे हैं -

      - देवता का शरीर स्वस्थ और सुन्दर होता है,

      - देवता की पत्नी उसके साथ होती है,

      - देवता विद्वान होते हैं, अपने काम में कुशल होते हैं,

      - देवता के पास अपना वाहन होता है,

      - देवता विमान से यात्रा करते हैं,

      - देवता आमोद-प्रमोद के लिये सुरा-पान करते हैं,

      - देवता स्वर्ग में रहते हैं।

            यह बात बड़े ध्यान देने वाली है कि देवता सारे सुख भोगते हैं। वे अपने आप को सुख से वंचित नहीं रखते। देवता बन कर हमें भी सारे सुख भोगना है। सुख के भोग का जो अधिकार देवता को है, वही अधिकार आपको भी है। अधिकार ही नहीं, यह आप का धर्म भी है।

            लेकिन हमारी धार्मिक शिक्षा इसके बिल्कुल विपरीत दिशा में चलती है। विभिन्न प्रकार के तर्कों से सुख का तिरस्कार किया जाता है-

            सुख क्या है? यह तो बड़ी क्षुद्र उपलब्धि है, ऐसा कहकर छोटे-बड़े अनेक महात्मा अपना नाक-मुँह सिकोड़ने लगते हैं। वे सुख भोगने वाले को अज्ञानी कहते हैं। उनका तर्क होता है कि हर सुख के साथ दुख जुड़ा होता है। साथ ही वे यह भी कहते हैं --

            सुख तो सांसारिक है! हमें तो परमात्मा से मिलने वाला परम सुख चाहिए। सुख तो क्षणिक है - आता है, चला जाता है। हमें तो अपार आनन्द चाहिए।

             फिर वे सुख और आनन्द के अन्तर को समझाते हुए कहते हैं -

            आनन्द जो है वह अन्दर का प्रसाद है। सुख जो है वह बाहर के संसर्ग से आता है। इसलिये सुख स्थायी नहीं हो सकता। सुख के बाद दुख तो आयेगा ही।

            सुख के विरोध में दिया गया यह तर्क नया नहीं है, लेकिन इस प्रकार के सारे तर्क त्रुटिपूर्ण हैं। सुख छोटा हो सकता है, अस्थायी हो सकता है, लेकिन वह आता अन्दर से ही है। सुख का साधन बाहर हो सकता है, सुख का माध्यम बाहर हो सकता है, लेकिन सुख की वास्तविकता हमारे अन्दर की भावना में ही होती है। इसकी विस्तृत चर्चा भी हम आगे जाकर करेंगे। अभी तो हम आपको इतना बताते हैं कि सुख और दुख हमारे अपने देखने की दृष्टि है।

                       

            एक दिन स्वामी विवेकानन्द अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। रास्ते में एक मन्दिर बन रहा था। वहाँ पर तीन मजदूर काम कर रहे थे। विवेकानन्द जी ने उत्सुकतावश एक मजदूर से पूछा, क्यों भाई, क्या कर रहे हो?

      देख नहीं रहे? गधे की तरह काम में जुटे हैं! मजदूर ने झल्लाते हुए उत्तर दिया, दिन भर काम करने पर थोडा बहुत मिल जाता है, लेकिन इतने पैसों के लिये ठेकेदार जान निकाल लेता है।

            विवेकानन्द जी कुछ नहीं बोले। फिर वे दूसरे मजदूर के पास गये और वही प्रश्न फिर से दोहराया। दूसरे मजदूर ने उत्तर दिया, मन्दिर बन रहा है। हमारी किस्मत में तो मजदूरी करना लिखा हुआ है, सो कर रहे हैं। और कुछ तो हम कर नहीं सकते।

            अब विवेकानन्द जी की उत्सुकता थोड़ी और बढ़ गई। वे तीसरे मजदूर के पास पहुँचे और फिर वही प्रश्न उससे किया, कहो भाई, क्या कर रहे हो? उसका उत्तर दोनों से अलग था। वह बड़े प्रेम से बोला, भगवान का घर बन रहा है। मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि मेरे पसीने की कुछ बूँदें इस में लग रही हैं। जो भी मिलता है, उस में मुझे खुशी है। हमारा गुजारा चल जाता है। प्रभु का काम भी हुआ जा रहा है साथ के साथ।

            अब देखिये उन तीन व्यक्तियों की दृष्टि का अन्तर! एक ही परिस्थिति है,पर तीनों उस परिस्थिति को अलग-अलग ढंग से देख रहे थे। एक सचमुच ही गधे की तरह काम कर रहा था और दुखी हो रहा था। वह जो क भी करता, समें उसे दुख ही दिखाई देता। दूसरा यंत्रवत कार्य कर रहा था और भाग्य की दुहाई दे रहा था। उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि वहाँ पर कोई मन्दिर बन रहा है या किसी सेठ की कोठी; किसी बीमा कम्पनी का दफ्तर बन रहा है या कोई अस्पताल बन रहा है। उसे तो बस काम करना है और मजदूरी लेनी है। न सही सुख में, पर वह दुख में भी नहीं था। तीसरा मजदूर समर्पण के भाव से काम में मग्न था। हर क्षण उसे प्रसन्नता हो रही थी जैसे वह कह रहा हो - देखो, मेरा भी नाम लिखा है भगवान के काम में! मैं ने भी हाथ बंटाया है मन्दिर के निर्माण में! यह मेरा कितना अहोभाग्य है!

            काम तो तीनों एक जैसा ही कर रहे थे, लेकिन तीनों के देखने की दृष्टि अलग थी।

         हमारी अपनी दृष्टि हमें सुख देती है। हमारी अपनी ही दृष्टि हमें दुख देती है। हमारी अपनी दृष्टि हमारे सुख का निर्धारण करती है और हमारी अपनी ही दृष्टि हमारे दुख का निर्धारण करती है। सुख या दुख हमारी परिस्थिति में नहीं, हमारी मनःस्थिति में होता है। यह ठीक है कि परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं जिसके कारण हम कहते हैं कि सुख-दुख तो आते जाते रहते हैं, लेकिन फिर भी हम अपनी मनःस्थिति को तो अपने वश में रख ही सकते हैं। आगे जाकर यह बात भी स्पष्ट होगी कि मनःस्थिति का विनियमन (regulation) ही देवता की यात्रा है। इस यात्रा के कारण ही देवता सारे सुख भोगते हैं।

            यह एक अजीब बात है कि हमारे महात्मागण सारे सुख भोगने वाले देवता की तो पूजा करते हैं, किन्तु आपको वे देवता का अनुसरण नहीं करने देते। वे तो आपको सुख से वंचित करने का उपदेश देते हैं। वे सुख को दो वर्गों में बाँटते हैं - एक को वे सांसारिक सुख कहते हैं, दूसरे को वे परमात्मा का सुख कहते है। एक को वे भौतिक सुख कहते हैं, दूसरे को अध्यात्मिक सुख कहते हैं। उनका आशय होता है कि सांसारिक सुख छोटा है, क्षणिक है, तुच्छ है, अर्थहीन है। परमात्मा का सुख बड़ा है, असली है। इस बड़े सुख को कोई परम सुख कहता है, तो कोई आनन्द कहता है।

            हमारे महात्मा सुख को आनन्द से अलग रखना चाहते हैं।

            फिर हम संसारी भी उनकी बातों में आ जाते हैं। जैसे बार-बार घिसते हुए रस्सी भी कुएँ के पत्थर पर निशान बना देती है, ऐसे ही साधु-महात्माओं की बातें सुनकर हम लोग भी सुख को दो वर्गों में बंटा हुआ समझने लगते हैं।

            फिर हम लोग भी कहने लगते हैं कि सांसारिक सुख छोटा होता है, अर्थहीन होता है। उनकी तरह हम लोग भी कहने लगते हैं कि परमात्मा का सुख ही बड़ा होता है, असली होता है।

      तो क्या सुख को छोटा समझकर अस्वीकार कर देना चाहिए?

      नहीं! लेकिन हमारे धार्मिक गुरु ऐसा ही कहते चले आ रहे हैं।

      क्या सुख को अस्वीकार कर देने से आनन्द मिल जाता है?

      बिल्कुल नहीं! लेकिन हम लोग इस बात को नहीं समझ पाते।

      क्या सुख को क्षुद्र कह देने से वह परमसुख बन जाता है?

      नहीं! ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता। सुख का तिरस्कार कोई उपलब्धि नहीं है।

            इसीलिए देवता हर सुख को स्वीकार करते हैं। सुख भौतिक है या अध्यात्मिक, देवता इसका भेद-भाव नहीं रखते। सुख लौकिक है या अलौकिक, देवता इसकी चिन्ता नहीं करते। वे तो सारे सुखों को भोगते हुए आगे बढ़ जाते हैं - वे तो यात्रा करते हैं।

            भौतिकता, अध्यात्मिकता, लोक, परलोक सब एक ही परमात्मा के हैं। जो परमात्मा भौतिक है, वही परमात्मा दिव्य है। जो परमात्मा परलोक में है, वही परमात्मा इस लोक में है। इसलिये देवता-गण सुख को दो हिस्सों  में नहीं बाँटते।

                  सांसारिकता और अध्यात्मिकता हमारे विचार में होती है, भावना में नहीं। लेकिन सुख हमारी भावना में होता है। भावना छोटी नहीं होती, भावना बड़ी नहीं होती। भावना सांसारिक नहीं होती, भावना अध्यात्मिक नहीं होती। भावना तो भावना होती है।  हर सुख की भावना में परमात्मा होता है। जो सुख पहले भौतिकता को अपनाने में मिलता है, वही सुख भौतिकता को पीछे छोड़ देने से मिलता है। बात भौतिकता या अध्यात्मिकता की नहीं है - बात तो यात्रा की है। आपकी यात्रा ही आप को सुख देती है। इस यात्रा से ही आप देवता बनते हैं।

            हम आप से यह नहीं कहते कि सुख के भोग मात्र से ही आप देवता बन जाते हैं, हम तो आप से इतना कह रहे हैं कि सुख को स्वीकार किये बिना आपकी यात्रा आगे नहीं बढ़ सकती। सुख का भोग आनन्द तक पहुँचने वाली सीढ़ी का पहला पायदान है। सुख की भावना में प्रगाढ़ता लाने के लिये इस सीढी पर चढ़ना पड़ता है। सुख की भावना में स्थायित्त्व लाने के लिए यात्रा करनी पड़ती है। देवता सुख को अपना कर आनन्द तक पहुँचते हैं।

            मान लीजिये, कोई प्यासा है और उसे एक झरना मिल जाता है। झरना उसकी प्यास बुझा सकता है, लेकिन फिर भी वह उसे स्वीकार नहीं करता, क्योंकि वह कहता है - यह छोटा सा झरना मेरे किस काम का? मुझे तो सागर चाहिए!

            ऐसी मानसिकता को आप क्या कहेंगे? सोचिये जरा! प्यास और झरने के बीच में सागर माँगने की शर्त कहाँ से आ गई? फिर सबसे बड़ी बात यह है कि सागर माँगा नहीं जाता - सागर की ओर तो चला जाता है। ऐसे ही आनन्द माँगा नहीं जाता - उसके लिये यात्रा करनी होती है।

            जरा गंगा की ओर देखिये - गंगा जब गंगोत्री से निकलती है तो एक झरना ही होती है। सागर को वह नहीं जानती, फिर भी धारा फूट पड़ती है, चलने लगती है। वह पत्थरों से टकराती है, फिर भी गुनगुनाती है। वह पहाड़ों को चीरती है, फिर भी इठलाती है और आगे बढ़ती जाती है।

            फिर क्या होता है?

            फिर तो इस में बड़ी-बड़ी नदियाँ भी मिलने लगती हैं। फिर तो बड़े-बड़े संगम होने लगते हैं। यमुना के साथ संगम होता है, गोमती के साथ संगम होता है, घाघरा के साथ संगम होता है। संगम होते जाते हैं और गंगा बढ़ती जाती है।

            अब गंगा की चौड़ाई बढ़ने लगती है, गहराई बढ़ने लगती है। इठलाहट कम होती जाती है, सौम्यता और गंभीरता बढ़ती जाती है। अब वह अधिक उपयोगी होने लगती है। पहले हम उसका पानी पीते थे, उसमें स्नान करते थे, लेकिन अब तो वह खेतों में सिंचाई भी करने लगती है। उसके वक्ष पर नावों का आवागमन भी होने लगता है।

            ऐसे ही चलते-चलते, ऐसे ही बढ़ते-बढ़ते गंगा का मिलन होता है - अपार सागर से।

            क्या अन्तर है झरने में और सागर में?

            एक यात्रा का।

            झरने और सागर में एक यात्रा का अन्तर है - एक लम्बी यात्रा का। झरने के साथ चल पड़ो तो सागर तक पहुँच सकते हो। सुख के साथ चल पड़ो तो आनन्द तक पहुँच सकते हो। सारा खेल यात्रा का है।

            लेकिन हम लोग यात्रा नहीं करते। हमारे कदम सागर की ओर नहीं बढ़ते। हम बैठे-बैठे सागर का गुणगान करने में लगे हुए हैं। जगह-जगह प्रवचन हो रहे हैं, जगह-जगह सत्संग हो रहे हैं, जगह-जगह समागम हो रहे हैं। हर कोई परमात्मा की बड़ी-बड़ी बातें करने में लगा हुआ है। हर कोई आनन्द की चर्चा को लेकर बैठा हुआ है। हम लोग सागर की बातें करने में इतने लीन हो गये हैं कि यात्रा को तो हम भूल ही गए हैं। सागर की चर्चा करने वाला महात्मा कहलाता है, लेकिन सागर की ओर चलने वाला देवता हो जाता है। याद रखिये! आपको देवता बनना है, महात्मा नहीं।

महात्मा आनन्द की चर्चा करता है, देवता आनन्द की ओर अग्रसर होता है।

            फिर एक बात और है - सागर तक पहुँच कर ही सागर को जाना जा सकता है, उससे पहले नहीं। आनन्द तक पहुँच कर ही आनन्द को जाना जा सकता है, उस से पहले नहीं। उन्मुक्त भाव से सुख को भोगने वाला ही आनन्द को जान पाता है। फिर आनन्द तक पहुँच कर यह भी देखा जा सकता है कि सुख और देवत्व एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहाँ देवत्व नहीं है, वहाँ सुख नहीं हो सकता और जहाँ सुख नहीं है, वहाँ देवत्व नहीं हो सकता। सुख और देवत्व एक साथ ही घटित होते हैं - एक को छोड़ कर दूसरा नहीं पाया जा सकता।

सुख और देवत्व एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक के बिना दूसरा नहीं हो सकता।

            हमें आनन्द चाहिए - ऐसी बातें करना फल की लालसा है। यात्रा में लीन हो जाना हमारा कर्म है।

            हमार दृष्टि दर तक नहीं देख सकती। फिर भी जब हम चल पड़ते हैं, तो आगे का रास्ता भी दिखाई देने लगता है। आनन्द तक पहुँचने की यात्रा ऐसे ही होती है।

            आइये! हम भी यात्रा करते हैं। पहले देवताओं के सुखों का विश्लेषण करते हैं, फिर हम उस स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ से यह दिखाई देता है कि देवता की वास्तविक विशेषता क्या है। आप यह भी देखेंगे कि देवताओं वाले सारे सुख आपको भी प्राप्य हैं। इनका उपभोग कर आप देवताओं का ही अनुसरण करते हैं।

            सुख का स्वीकार आनन्द की ओर उठने वाला पहला कदम है। सुख का तिरस्कार हमारी नासमझी है। सुख की कामना में कर्म की ऊर्जा है। सुख की कामना में यात्रा की प्रेरणा है। सुख को लक्ष्य बना कर यात्रा करना हमारा धर्म है।

सुख के लक्ष्य के साथ चलने वाला आनन्द तक पहुँच जाता है।


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