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11.05.2007
 
९ - त्याग
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

 

सद्यों दाशुषे क्षरसि।

 

देने वाले को कर्म का फल तत्काल मिलता है।

- सामवेद

 

        

                 

देने की महिमा तो आप जान चुके हैं, लेकिन यहाँ पर एक चेतावनी की आवश्यकता है - कहीं ऐसा न हो कि देने के नाम पर आप त्याग करने लगो। जिस देने में परिपूर्णता का अहसास नहीं होता, उस देने में देवत्व नहीं, त्याग होता है।

जी हाँ, त्याग करके जो देता है, वह देवता नहीं बन सकता। देवता के देने में और त्यागी के देने में अन्तर है। देवता जब देता है तो उसे तत्काल ही सुख मिलता है। देना अपने आप में ही सुख है, इसलिये देने वाला तत्काल ही लाभान्वित होता है। सामवेद की उपरोक्त ऋचा में यही सन्देश गूँज रहा है। जिस देने में उसी समय सुख नहीं मिला तो समझो कि उस देने में देवत्व की भावना नहीं, त्याग का विचार है। जिस देने में  आप तत्कालिक सुख के अतिरिक्त कुछ और पाना चाहते हैं, वह त्याग है।  चलिये, कुछ उदाहरण लेकर इस बात को समझते हैं -

एक माँ अपने शिशु को दूध पिलाती है। शिशु दूध पीकर प्रसन्न होता है, उस का चेहरा खिल उठता है। माँ अपने तृप्त शिशु की मुस्कान में ही सब कुछ पा जाती है। यह उस माँ का देवत्व है। लेकिन जो माँ यह सोचकर दूध पिलाती है कि वह शिशु बड़ा होकर उसके दूध की कीमत चुकायेगा, यह उसका त्याग है।

एक पिता अपना सब कुछ देकर पुत्र को पढ़ाता है। यदि उसे इस कर्म में प्रसन्नता होती है, तो यह उसका देवत्त्व है। यदि वह बदले में कुछ पाने की इच्छा रखता है, तो पुत्र को पढ़ाना उसका त्याग है।

यदि किसी व्यक्ति को अपना घर-बार छोड़ कर किसी आश्रम में जाकर रहने में प्रसन्नता होती है, तो वह यह काम अपने सुख के लिये करता है। लेकिन, जो व्यक्ति घर-संसार छोड़ कर अपने आप को महान कहलवाने की इच्छा रखता है, तो यह उसका त्याग है।

देकर भूल जाना देवत्व है, याद रखना त्याग है।

जिस देने में हम किसी पर अहसान नहीं करते, उसी देने में परिपूर्णता का भाव होता है। लेकिन आज, हम लोग दे कर दूसरों पर अहसान करते हैं। दे कर के हम महान बनना चाहते हैं। महान बनने के लालच से हम अब त्याग करने लगे हैं। आज हर कोई चाहता है कि त्याग करके मैं देवता बन जाऊँ, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता। त्याग को देवता बनने का आसान तरीका (short-cut) नहीं बनाया जा सकता। त्याग और देवत्त्व में बुनियादी अन्तर है। त्यागी का विचार अलग होता है, देवता की भावना अलग होती है। इसलिए देवता और त्यागी के भेद को समझना जरूरी है।

देवता देकर प्रसन्न होता है - देने में उसे तृप्ति होती है। लेकिन त्यागी के त्याग में तृप्ति नहीं होती - उसके मन में कुछ और पाने की लालसा रह जाती है।

देवता देकर परिपूर्ण होता है। त्याग के विचार में वंचित होने की धारणा है।

त्यागी त्याग करके बैठ जाता है- उसकी यात्रा उसके त्याग पर समाप्त हो जाती है। इसलिये त्यागी आनन्द तक नहीं पहुँच पाता।

देवत्व कर्म है, त्याग फल की लालसा है।

देवत्व में कर्म की भावना है। त्याग में फल की लालसा है।

त्याग नकारात्मक है। जब कुछ नहीं कर सके तो साधु बन गये। जब कुछ करने की इच्छा न रही तो महात्मा बन गये। कुछ न करने में ही त्यागी की महानता है। महात्मा का बड़प्पन उसकी अकर्मण्यता है। स्वामी विवेकानन्द जी कहते थे कि वे तिलक लगा कर भीख माँगने वाले सन्यासी से एक ड़ाकू को श्रेष्ठ समझते हैं। किस कारण से? इसका उत्तर ब्रह्मर्षि बावरा जी अपने गीता कर्म विज्ञान में देते हैं -

वह (स्वामी विवेकानन्द) कहते थे कि वह (ड़ाकू) अपने जीवन में सक्रिय है तथा सन्यासी निष्क्रिय बैठा हुआ है। उनका (सन्यासी का) रास्ता गलत है। वह ड़ाकू जो है वह कभी वाल्मीकि बन सकता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है, क्योंकि उसमें लगन है, तत्परता है। जितनी शक्ति से वह गलत रास्ते पर जा रहा है, वह उतनी ही शक्ति से जब वह बदलेगा तो ठीक रास्ते पर भी चलेगा। जो बिल्वमंगल चिन्तामणि के पीछे मर रहा था, वह कभी कृष्ण के पीछे भी मर सकता है। जो तुलसी स्त्री के चाम के पीछे दौड़ रहा था, वह कभी राम के पीछे भी दौड़ सकता है, लेकिन जो निकम्मा है, उस से कुछ नहीं होने का, वह तो केवल रोटी माँग कर खा सकता है, राम-राम कर सकता है। ऐसे लोगों से कोई भी महत्त्वपूर्ण काम अपने जीवन में दूसरों के लिये नहीं होगा।

देवता निष्क्रिय नहीं होता - देवता तो कर्मशील होता है। देवता अपने कार्य में कुशल होता है। देवता को जो कार्य सौंपा जाता है, उसे वह निष्ठा-पूर्वक पूरा करता है। देवत्व सकारात्मक है।

त्यागी वह व्यक्ति है जिसे भोग में सुख नहीं मिला तो वह भोग के विरोध में खड़ा हो गया। त्यागी क्रुद्ध है - जो उसे भोग में नहीं मिला, वह उसे त्याग में पाना चाहता है। उसकी लालसा तो अभी भी बनी हुई है। वह यह नहीं जानता कि भूल उसकी अपनी लालसा की है, भोग की नहीं। त्यागी उस छोटे बच्चे की तरह है जो दीवार से टकरा जाने पर दीवार को मारता है। वह सोचता है कि दोष उसका नहीं, दीवार का है।

लेकिन, बुराई भोग में नहीं, भोग के साथ चिपट जाने में है। सारी समस्या चिपटने के कारण होती है। चिपटना ही दुख की जड़ है। इस बात से कोई अन्तर नहीं पड़ता कि आप भोग के साथ चिपटते हैं, या त्याग के साथ। भोग में लिप्त होना गलत है तो त्याग में लिप्त होना भी गलत है। निर्लिप्ति की जो बात भोग पर लागू होती है, वही बात त्याग पर भी लागू होती है। इसीलिए  देवता भोग को स्वीकार करते हैं, फिर उस से ऊपर उठ जाते हैं। देवता भोग के विरुद्ध नहीं जाते, देवता सुख के विरुद्ध नहीं जाते, देवता संसार के विरुद्ध नहीं जाते। इसीलिये देवता ही परमात्मा के निकट हैं, त्यागी नहीं।

त्याग में कोई बड़प्पन नहीं है, त्याग का कोई गौरव नहीं है। त्याग में कोई धार्मिकता नहीं है, त्याग में कोई उपलब्धि नहीं है। देने के नाम पर त्याग हमारी भूल है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि बहुत से लोग इस भूल के शिकार बनते जा रहे हैं।

त्याग कोई विरक्ति नहीं है - यह तो आसक्ति का ही छद्म रूप है। संसार का त्याग करने वाला तो संसार के साथ अटक कर रह जाता है - जीवन पर्यन्त।

        

सन्‌ १९९३ की बात है। जून के महीने में हम दोनों अपने बेटे अनीत के साथ वैष्णव देवी गये थे। दर्शन के बाद रात को वहीं रुके। दूसरे दिन सुबह मन हुआ कि वापस लौटने से पहले भैरव जी तक चला जाये। थकावट तो अभी भी थी, लेकिन मन में आ गया तो चल पड़े भैरव जी की ओर।

कटरा से वैष्णव देवी के रास्ते में तो हमेशा काफी लोग होते हैं। अच्छी खासी भीड़ साथ चलती है। लेकिन वैष्णव देवी और भैरव जी रास्ते में कम लोग होते हैं। थोड़ी-थोड़ी देर में इक्के-दुक्के लोग ही नजर आ रहे थे। रास्ते में हमारी मुलाकात गेरुए कपड़े पहने हुए एक साधु के साथ हो गई। इनके साथ एक स्त्री भी थी जो साध्वी के वेश में नहीं थी। उसने सामान्य साड़ी पहनी हुई थी।

रास्ते में साधु जी से हमारी बातें होने लगीं। साथ हो तो रास्ता जल्दी कट जाता है। हमें उनका साथ बड़ा अच्छा लग रहा था। वे अच्छी-अच्छी धर्म-कर्म बातें कर रहे थे। सुनने में बड़ा आनन्द आ रहा था। फिर बातों ही बातों में उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में बताना शुरू कर दिया।

उन्होंने बताया कि वे कानपुर के रहने वाले हैं। वहाँ पर उनका बहुत बड़ा कारोबार था। अभी भी वहाँ पर उनका घर है, बहुत सारी दुकानें हैं, लेकिन दस साल से उन्होंने  सब कुछ त्याग दिया है। मुझे अब माया से कोई प्रेम नहीं है, मेरे बेटे जानें और उनका काम जाने, कहते हुए उन्होंने स्त्री की ओर इंगित करते हुए बताया कि वे इनकी पत्नी हैं। फिर वे बोले, हम लोग साथ में रहते हैं, किन्तु गृहस्थ की तरह नहीं। दस साल हो गये हैं, मैं अपनी पत्नी के साथ नहीं सोया। भैरव जी पहुँचने तक वे अपने अतीत की ही बातें करते रहे।

अब देखिये! ये सज्जन अपने अतीत के साथ बँधे हुए हैं। इनका मन संसार में अटका हुआ है। ये अपने त्याग पर ही रुक गये हैं। इनकी यात्रा आगे नहीं बढ़ रही। दस साल से भ्रमण कर रहे हैं लेकिन फिर भी वे अपनी स्मृतियों में अटके हुए हैं। वे अपना घर नहीं भूले, अपनी दूकानें नहीं भूले, अपना कारोबार नहीं भूले। वे सब आज भी उनके साथ हैं। आज भी उनकी याद आती है। आज रास्ते में मिलने वाले अपरिचितों को भी यह बताने की इच्छा होती है कि हम तो बहुत बड़े व्यापारी थे, हमने तो धन-दौलत को लात मार दी है, हम तो काम वासना से दूर हो गये हैं।

लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। त्याग देने से तो इनका संसार हमेशा के लिये इनके साथ चिपक चुका है। देखा जाये तो एक संसारी से अधिक तो एक त्यागी ही संसार में फँसा होता है। संसार इनका सबसे बड़ा साथी होता है। संसार इनका सबसे बड़ा सम्बन्धी होता है।

संसार का त्याग क्या होता है? क्या त्यागी संसार को छोड़कर कहीं और चला जाता है?

नहीं! वह इसी संसार में रहता है।

संसार का त्याग तो एक विचार है, जो त्यागी से कहता है –

 संसार तुच्छ है, तुम्हारे योग्य नहीं। संसार तो निम्न श्रेणी के संसारियों के लिये है, तुम्हारे जैसे उच्च श्रेणी के लोगों के लिये नहीं, इस विचार में कोई उपलब्धि नहीं है। स्वर्गीय ब्रह्मर्षि बावरा इस बात को यों समझाते हैं-

 शास्त्र में लिखा हुआ है कि जो लोग शास्त्र की जिज्ञासा से उद्वेलित होकर के अपने परिवार की सीमा को छोड़कर परमात्मा की अराधना में लगते हैं, वे तो परमतत्त्व को प्राप्त कर लेते हैं लेकिन जो लोग घर-गृहस्थी के प्रपंच से घबरा कर संसार छोड़कर महात्मा बनके रोटी माँग कर खाते हैं, ऐसे लोग दोनों लोक नष्ट करते हैं। ऐसे लोगों का यह लोक भी जाता है और वह भी जाता है। तुलसीदास जी ने लिखा है - उभय लोक निज हाथ नसावहिं -अपने हाथों से दोनों लोक नष्ट करते हैं क्योंकि पूर्ण जिज्ञासा भी नहीं और पूर्ण त्याग भी नहीं। पूर्णत्व को प्राप्त करने की चेष्टा नहीं की और जो कर सकते थे, वह छोड़ दिया। किसके द्वारा छोड़ा? किसी ने कह दिया कि यह दुनिया नाशवान है, गृह-गृहस्थी कीचड़ है, छोडो क्या लेना-देना है, मरने पर कौन साथ देगा। छोड़ तो दिए, छोड़ना तो आसान था लेकिन छोड़ने के बदले में जो पाना था, वह इतना आसान नहीं, बड़ा कठिन है। संसार के कर्तव्य को छोड़ देना, एक अलग बात है लेकिन इसके बदले में जिसको पाने लिए छोड़ा जाता है, उसको पाना बड़ी मुश्किल बात है। उसके लिए तो साधन करना पड़ता है, प्रयत्न करना पड़ता है, उपासना करनी पड़ती है।

हमें वंचित नहीं होना - हमें तो परिपूर्ण होना है। महत्त्व छोड़ने का नहीं है, महत्त्व तो पाने का है। महत्त्व इस बात का नहीं है, कि आपने कितना संसार त्यागा, महत्त्व तो इस बात का है कि आपने कितना देवत्व पाया। संसार को छोड़ने के बाद भी जब त्यागी को सुख नहीं मिलता तो फिर वह कुछ और चाहता है। उसकी यह कामना छोड़ने की अपूर्णता का द्योतक है। त्याग का विचार अपूर्णता का विचार है।

महत्त्व इस बात का नहीं कि आप कितने वंचित हुए हो, महत्त्व तो इस बात का है कि आप कितने परिपूर्ण हुए हो।

त्याग का विचार दुख का विचार है। त्याग का विचार महात्माओं को ही नहीं, संसारियों को भी पीड़ा देता है। केवल साधु-महात्मा ही नहीं, बहुत से संसारी भी त्याग करके प्रतिष्ठा चाहते हैं। कोई पत्नी के लिये त्याग करता है तो कोई बच्चों के लिये। वंचित होने की हर घटना उसके स्मृति-पटल पर छाने लगती है - और वह असन्तुष्ट रहने लगता है। हर छोटी बात पर उसे शिकायत होती है, हर छोटी बात पर उसे टेन्शन होती है। उस के अन्दर जो घाव हो जाते है, उनका तो एक मल्हम होता है - दूसरे सब उसकी महानता का गुण-गान करें। यदि वे ऐसा नहीं करते तो उसकी मानसिक पीड़ा और भी बढ़ जाती है।

त्याग करने वाला हमेशा तनाव-ग्रस्त रहता है।

करीब तीन महीने के बाद कपूर साहब की बेटी बीस वर्ष की हुई। जब हमने शुभकामना के लिये फोन किया तो हमें यह उत्तर मिला - अरे भाई साहब, बच्चे तो घर पर हैं ही नहीं! उन के बिना न तो कोई पार्टी हो सकती है, न ही कोई रौनक। हमारी बेटी का जन्मदिन सूखा ही निकल रहा है।

अब देखिये - कितनी हैरानी की बात है! जब बच्चे घर में थे और पार्टी मनाई गई थी तो कपूर साहब को दुख हो रहा था। अब बच्चे घर में नहीं है और पार्टी नहीं हो सकी तो भी उन्हें दुख हो रहा है।

त्यागी हमेशा अपने दुख को ही गौरवान्वित करता है।

अगली बार तो और भी गजब हो गया। फोन उठाते ही निराशाजनक स्वर में बोले-

 चाचरा साहब! घर में बड़ी टेन्शन चल रही है।

 क्या हुआ? मैं ने उत्सुकतावश पूछा।

 क्या बताऊँ! कपूर साहब रुँधे गले से बोलने लगे, कल रचना (उनकी पत्नी) को दिल्ली जाना है। महेश (रचना के बड़े भाई) ने अपना घर बनवाया है। परसों गृह-प्रवेश का समारोह है। घर में  इतनी समस्याएँ हैं, पर रचना को तो भेजना ही पड़ेगा।

जब मैंने सन्त्वना देने के लिये कुछ कहा तो वे एकदम व्यथित होकर बोले - भाई साहब! आपको  मालूम नहीं है कि हमारे घर में कितना खर्चा हो रहा है। केवल बच्चों की पढ़ाई पर ही चालीस लाख खर्च हो चुके हैं।

अब मेरा माथा ठनका - मुझे उनकी समस्याओं की वास्तविकता समझ में आने लगी। उन्हें यह नहीं दिखाई देता कि उनके पास परमात्मा का दिया हुआ कितना कुछ है - घर है, कारोबार है, सुशील पत्नी है, होनहार बच्चे हैं। नहीं! कपूर साहब ये सब नहीं देखते - वे तो अपने आप को फोकस में रखकर ही देखते हैं और दुखी होते हैं। जहाँ उन्हें हरदम परमात्मा को धन्यवाद देते हुए हमेशा प्रसन्नता से भरा रहना चाहिए था, वहाँ उनका जीवन रोने-धोने में कट रहा है।

मैं ने उन्हें समझाते हुए कहा - कपूर साहब! आप कैसी बातें करते हो? जिस बात पर आप को खुश होना चाहिए, उसी बात पर आप दुखी हो रहे हो! आप को तो हमेशा परमात्मा का शुक्र-गुजार होना चाहिए कि आप के बच्चे इतने होशियार हैं, इतने सुशील हैं, पढ़ लिख कर काबिल बनते जा रहे हैं...

 हाँ, लेकिन मेरा तो चालीस लाख खर्च हो गया है, मेरी बात को बीच में ही काटकर वे जोर से बोले।

कौन समझाये उेसे लोगों को? वे तो यह जानते ही नहीं कि वे कितने भाग्यशाली हैं! वे तो यह भी नहीं समझना चाहते कि यदि बच्चे नहीं होते तो क्या करते अपने लाखों का? या करोड़ों का?

कपूर साहब भूल गये हैं कि परमात्मा ने उन्हें कितना दिया हुआ है। उन्हें तो अपना दिया हुआ ही याद रहता है। त्याग करने वाला तो हमेशा यह चाहता है कि दूसरे उसके प्रति कृतज्ञ हों। यही दुख की जड़ है।

त्याग का विचार कभी कृतज्ञ नहीं होने देता।  कृतज्ञता के अभाव में दुख की जड़ें पनपती हैं। त्याग के विचार में अपूर्णता है।

त्याग के विचार में अपूर्णता है। कृतज्ञता की भावना में पूर्णता है।

कृतज्ञ होकर ही हम सुखी हो सकते हैं, त्याग कर के नहीं।

कृतज्ञता की भावना में परिपूर्णता है। कृतज्ञता में नमन है, कृतज्ञता में अभिवादन है। कृतज्ञता में विनम्रता है, कृतज्ञता का भाव झुकने का भाव है। किस के आगे झुकते हैं, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। झुकने का भाव ही महत्त्वपूर्ण है। झुकने का भाव ही बहुमूल्य है। झुकना ही पाना है। झुकना ही नम्रता है।

लेकिन, हम नम्रता की केवल बातें करते हैं, उसे अपनाते नहीं।  सब लोग नम्रता की बातें करके ही संतुष्ट हो जाते हैं। सब लोग नम्रता को भाषण देने का विषय समझते हैं। सब लोग नम्रता का उपयोग दूसरों को उपदेश देने के लिये करते हैं। मालिक कहता है कि नम्रता तो उसके नौकर को सीखनी चाहिए। माँ-बाप कहते हैं कि नम्रता तो उनके बच्चों के सीखने के लिये है। धर्मगुरु सोचते हैं कि नम्रता तो जन-साधारण को सीखनी चाहिए, हम तो उन से ऊपर हो गये हैं। आम जनता सोचती है कि नम्रता की जरूरत तो तब पड़ती है, जब हम किसी से कुछ माँगें, वरना हमें इससे क्या लेना देना? पुण्यात्मा बनने के लिये तो बहुत से लोग तैयार हैं, लेकिन नम्र बनने के लिये कोई उत्सुक नहीं नजर आता।

नम्रता हमारी पूर्णता की अभिव्यक्ति है।

नम्रता हमारी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है। कृतज्ञता में पाने का भाव है और पाने के इस भाव में ही सुख है। कृतज्ञता की भावना प्राप्ति की अनुभूति है, वंचित होने की नहीं। लेकिन, त्याग का विचार वंचित होने का विचार है। इसलिये, त्यागी कभी धन्यवाद नहीं दे सकता। इसलिये, त्यागी कभी कृतज्ञ नहीं हो सकता। इसलिये, त्यागी कभी झुक नहीं सकता। त्यागी तो केवल अपने त्याग का गुण-गान चाहता है।

हमें नम्र तो होना है, पर माँगना नहीं। हमें देना तो है, पर त्याग नहीं करना। हमें देवता बन कर देना है, त्यागी बन कर नहीं।

और यह तभी हो सकता है जब हम में इतना सामर्थ्य हो कि हम बिना वंचित हुए ही दे सकें। देवता बनने के लिये यह आवेयक है कि  हम में न केवल देने की इच्छा (कल्याणकरी प्रवृत्ति) हो, बल्कि देने की क्षमता (सामर्थ्य) भी हो। देवता बनने के लिये इन दोनों का एक साथ होना आवश्यक है। किसी एक से काम नहीं चल सकता। सामर्थ्य दानव में भी हो सकता है, पर कल्याणकारी प्रवृत्ति नहीं होती। साधु में कल्याणकारी प्रवृत्ति हो सकती है पर सामर्थ्य नहीं होता। जहाँ देने की इच्छा और देने की क्षमता का संगम होता है, वहीं देवता का अवतरण होता है।

जहाँ देने की इच्छा और देने की क्षमता का संगम होता है, वहीं पर देवता का अवतरण होता है।

यदि देने की इच्छा प्रबल हो तो सामर्थ्य का प्रबन्ध हो सकता है। आप देने की इच्छा बनाइये,  हम आप को सामर्थ्य पैदा करने की विधि बताते हैं।

 



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