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10.16.2007
 
८ - कृतज्ञता
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

 

कृतज्ञता का भाव आफ अन्तर्मन से उगा हुआ सबसे सुन्दर फूल है।

- हेनरी वार्ड बीचर

 

        

एक अमीर आदमी था। जीवन के तीसरे चरण में पहुँच चुका था। उसे लगा कि अभी तक बहुत कुछ पा लिया- धन, पद, प्रतिष्ठा, हीरे, मोती, लेकिन कभी सुख नहीं देखा। धन तो है, पर सुख नहीं है। जीवन के अन्तिम दिन हैं। जिन्दगी का क्या भरोसा! कभी भी मृत्यु हो सकती है। कुछ किया जाय - मृत्यु से पहले सुख को जाना जाए। ज्यादा न सही, थोड़ा ही मिल जाए! पूरा न सही, सुख की एक झलक ही मिल जाए!

दूसरे दिन वह सुबह-सुबह उठा, एक झोले में अपने सारे बहुमूल्य हीरे-मोती भरे और घोड़े पर सवार होकर चल पड़ा - सुख की तलाश में। फकीरों के पास गया। साधुओं के पास गया। उनको बताया कि यदि कोई उसे सुख की झलक दिखा दे तो वह अपना सारा धन उसको देने को तैयार है।

मगर कौन दिखाये सुख! कैसे दिखायें सुख की झलक! खुद के पास सुख न हो तो दूसरे को कैसे दिखाया जा सकता है। हाँ, झोला पाने के लिये सभी लालायित थे। झोले के हीरे देखकर सबके मुँह में लार अवश्य टपकने लगती थी। आँखें तो सभी की चौंधिया जाती थीं, लेकिन मन मसौस कर रह जाते थे। ऐसा आदमी फिर नहीं मिलेगा। धन का झोला लिये घूम रहा है! धन देने को तैयार है! लेकिन बदले में सुख चाहिए। बस, एक बार सुख देख ले तो सब कुछ न्योछावर कर देगा। लेकिन कोई उसको सुख नहीं दिखा सका। और तो और, अब तो उन सबके अपने अन्दर भी खलबली मचने लगी। यह कैसा अमीर है? यहाँ आकर अपने धन से हमारे लालच को जगा रहा है! न जाने कितने  दिनों की साधना डगमगाने लगी है। न जाने हमारी कितनी तपश्चर्या स्वाह हो गई। इतने  सालों की मेहनत बर्बाद कर दी इस आदमी ने।  बड़ा क्रोध आया उन्हें उस धनवान आदमी पर।  अब तुम जाओ यहाँ से और हमें अपना काम करने दो, यह कहकर उन साधु सन्तों ने उसे वहाँ से भगा दिया।

अमीर आदमी बड़ा निराश हुआ। लगता है सुख की झलक के बिना ही जीवन का अन्त हो जायेगा, ऐसा सोचकर वह आदमी वहाँ से चलने लगा। इतने में एक साधु उसके पास आकर बोला, देखो, यहाँ से चार मील दूर एक गाँव है। उस गाँव के आगे एक मील तक जंगल है। वहाँ एक फकीर रहता है। हो सकता है वह तुम्हारा काम कर सके। मैंने उसकी बड़ी तारीफ सुनी है।

अमीर आदमी गया और ढूँढा उस फकीर को। अपना घोड़ा एक वृक्ष के नीचे बाँध कर, वह उससे मिला। फकीर को अपनी पूरी कथा सुनाई। फकीर ने बड़े ध्यान से उसकी बात सुनी। फिर अमीर आदमी ने अपना झोला खोलकर दिखलाया। सचमुच में ही वह हीरे-जवाहरात से भरा पड़ा था।

 बन्द कर यह झोला, फकीर बोला, मुझे इस कचरे को देखने की जरूरत नहीं है।

उस अमीर ने झोला बन्द कर दिया। उसे लगा कि यहाँ कुछ बात बन सकती है। दूसरे फकीर तो उसके झोले से प्रभावित हो रहे थे,  उनके मुँह में लार आने लगी थी। क्या रस था इस झोले में, उन लोगों के लिये! लेकिन यह फकीर तो झोला देखने को भी तैयार नहीं है। उस को यह फकीर जँच गया। आशा बँध गई कि यहाँ कुछ हो सकता है, उसका काम बन सकता है।

उसे लगने लगा कि यह फकीर जरूर उसे सुख की झलक दिखाने की योग्यता रखता है। बड़ी तसल्ली के साथ झोला उठा कर  एक तरफ रख दिया।

अरे, यह क्या! फकीर एकदम उठा और झोला लेकर भाग खड़ा हुआ। एक क्षण तो उस अमीर को समझ ही नहीं आया कि यह क्या हो गया। फकीर ने ऐसी फुर्ती के साथ यह काम किया कि वह बस देखता ही रह गया। जब तक उसे मामला समझ में आया तो फकीर वहाँ से आगे निकल चुका था।

अब वह भी भागा उसके पीछे - बेतहाशा! भूल ही गया कि उसके पास तो घोड़ा भी है। बस, भागता ही गया चिल्लाते हुए, शोर मचाते हुए- अरे मैं लुट गया, बर्बाद हो गया। इस फकीर ने मेरी जिन्दगी भर की कमाई पर हाथ साफ कर दिया। यह कोई फकीर नहीं है। यह तो लुच्चा लफंगा है। यह तो बड़ा चोर है।

उस फकीर के लिये जंगल परिचित था, साथ में बसा गाँव भी परिचित था। लेकिन उस अमीर आदमी के लिये तो सब कुछ अनजाना था। फिर भी भागे जा रहा था, चिल्लाते हुए - पकड़ो! पकड़ो! चोर है!!

भागते चिल्लाते वह अमीर गाँव तक पहुँच गया। लोग खड़े होकर उसे देख रहे थे। गाँव वाले तो उस फकीर को जानते थे। इस प्रकार की हरकतें उसके लिये कोई नई नहीं थी। इसलिये वे लोग हँसते-हँसते चुपचाप तमाशा देखने लगे। कोई भी उसे पकड़ने के लिये उत्सुक नहीं था। अमीर आदमी तो और भी हैरान हुआ। जरूर यह पूरा गाँव लुच्चे लफंगों का ही है और यह फकीर उनका सरदार है। तभी तो गाँव वाले भी कुछ नहीं कर रहे हैं। उसने सारे गाँव वालों को ही गालियाँ देना शुरू कर दिया।

लेकिन गाँव के लोगों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। वे खिलखिला कर हँसते रहे। उसका क्रोध और भी भड़कने लगा- मेरी तो जान पर बन पड़ी है और ये लोग हँसते जाते हैं। कोई भी फकीर को पकड़ने में मेरी सहायता नहीं करता। वह हाँफता हुआ फकीर के पीछे भागता गया।

फकीर आगे जाकर वापस उसी वृक्ष के नीचे जा पहुँचा। अमीर का घोड़ा अभी भी वहाँ खड़ा था। फकीर ने वहीं पर झोला रख दिया और छुप गया एक झाड़ के पीछे।

थोड़ी देर के बाद अमीर आदमी भी हाँफता हुआ, भागता हुआ, पसीने से लथपथ, वहाँ पर पहुँच गया। जीवन में इतना कभी नहीं भागा था। ऐसा पसीना तो कभी नहीं बहा था। जरूरत ही नहीं पड़ी थी इतना भागने की। थका हारा वहीं बैठ गया पेड़ के नीचे, घोड़े के पास। एकाएक उसकी नजर अपने झोले पर पड़ गई। एकदम खड़ा हुआ और उठा लिया झोले को। फिर उसने झोले को सीने से लगाया, ऊपर आसमान की ओर देखा और बोला, हे भगवान! तू बड़ा दयालु है! मैं तेरा बड़ा आभारी हूँ! किन शब्दों में तुझे धन्यवाद दूँ? आत्मा को यह कैसी शांति मिल रही है! ऐसा सुख मिल रहा है जो पहले कभी नहीं मिला!

 अच्छा! तो तुम्हें सुख मिल ही गया! झलक मिली या पूरे दर्शन हुए सुख के? पीछे से फकीर की आवाज आई।

उस अमीर को मालूम न था कि फकीर वहीं वृक्ष के पीछे छिपा हुआ था। वह बाहर आकर अपनी जगह पर बैठ गया। अब तू अपने घर जा, वह फकीर बोला, तुमने कहा था कि सुख की झलक दिखा दो। वह झलक तुमने देख ली। अब तुम एक काम करो - अपना झोला लेकर चलते बनो।

अमीर आदमी को अब पूरी बात समझ में आ गई - यह सारा उपक्रम उसने मुझे सुख की झलक दिखाने के लिये ही किया था। मैं ने सुख दिखाने के लिये कहा था, इसने दिखा दिया। यह सोचकर वह उसके चरणों में गिर पड़ा, मुझे क्षमा कर दो। मैं ने आपको गालियाँ दी, आपको लुच्चा लफंगा कहा। मैंने आपको पहचाना नहीं। पूरे गाँव को मैं ने चोर और बदमाश समझा। पूरे गाँव को मैं ने गालियाँ दीं। लेकिन आपने तो सचमुच ही कमाल कर दिया।

फकीर थोड़ा मुस्कुराया, फिर बोला, मैं भी तुमसे क्षमा माँगता हूँ। तुमको इतना दौड़ाया! इतना थकाया! इतना हैरान परेशान किया! लेकिन मेरे पास तुझे सुख की झलक दिखाने के लिये इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। यह परमात्मा की विधि है। यही समस्त सदगुरुओं की विधि है। यही विधि मुझे मेरे सदगुरु ने सिखाई है। जब तक कोई चीज तुमसे हटा नहीं ली जाये तब तक तुम्हें कुछ समझ में नहीं आता। आज तुम्हें अचानक सुख मिल गया! लेकिन यह झोला तो सदा से तुम्हारे पास था। पहले कभी परमात्मा को धन्यवाद नहीं दिया। आज ही क्यों इतना धन्यवाद दे रहे हो?

अब थोड़ा समझना है कि यहाँ पर क्या हुआ। सुख कहाँ से आ गया? यह तो पक्का है कि सुख उस झोले में नहीं था। उन हीरों में नहीं था, जवाहरात में नहीं था। ये सब चीजें तो उस अमीर आदमी के पास पहले भी थीं - पहले कभी सुख क्यों नहीं मिला? फिर आज कहाँ से आ गया?

यहाँ पर तीन बातें हुई हैं। पहली - अमीर आदमी का धन से भरा झोला उसके हाथ से चला गया। दूसरी - उसका झोला उसको वापस मिल गया। तीसरी - उस धन के वापस पा लेने पर उसने परमात्मा के प्रति आभार प्रकट किया।

थैले के खोने में सुख नहीं था। यदि उसके खोने में सुख होता तो उसके पीछे भागता नहीं। इतना परेशान नहीं होता, ऐसी बदहवासी नहीं होती। किसी चीज के खोने में सुख नहीं हो सकता। यदि खोने में सुख होता तो संसार में कोई समस्या ही नहीं होती। जिसके पास जो कुछ है वह तुरन्त ही उसे फेंक सकता है। लेकिन ऐसा नहीं होता। हम सब कहते जरूर हैं कि मैं धन के कारण दुखी हूँ, लेकिन सच्चाई नहीं है इस बात में। बस कहने की बातें हैं। वास्तव में हम धन के कारण नहीं, स्वयं अपने कारण दुखी होते हैं।

हमारे एक परिचित हैं, बड़े धनाड्य हैं। अच्छा काम है, लेकिन बड़े व्यस्त रहते हैं।  जब कभी काम-धन्धे की परेशानियों का जिक्र करते तो वे एक बात हमेशा कहते थे - हम से अच्छे तो गरीब मजदूर हैं! आराम की नींद तो सोते हैं! हमें तो जरा भी चैन नहीं मिलता।

जब मैं बहुत बार उनकी यह बात सुन चुका तो एक दिन मैं बोल ही पड़ा, भाई साहब, आपको क्या दिक्कत है गरीब बनने में? काम बन्द कर दीजिये, सब कुछ दान में दे दीजिये और शुरू कर दें सुख से रहना। आप चाहें तो यह शुभ काम आज से ही आरम्भ हो सकता है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। हाँ, उन्होंने अब ऐसी बातें कहना बन्द कर दिया है।

हाँ, तो बात हो रही थी कि झोले के खोने में सुख नहीं था। तो क्या सुख झोले के वापस मिलने में था? नहीं! झोले के माल ने यदि पहले सुख नहीं दिया तो बाद में कैसे दे सकता है? उसकी कीमत में कोई वृद्धि नहीं हुई, उस की उपयोगिता में कोई वृद्धि नहीं हुई। वह झोला उसके पास पहले भी था, अब भी है।

फिर सुख आया कहाँ से? फिर सुख उसे मिला कैसे?

सुख आया उस धन्यवाद से, जो उसने परमात्मा के प्रति प्रकट किया था। सुख आया उस कृतज्ञता से जो उसने ईश्वर को प्रति व्यक्त की थी। कृतज्ञता की भावना में सुख की अनुभूति होती है। जहाँ कृतज्ञता है, वहाँ सुख है।  जहाँ कृतज्ञता नहीं है, वहाँ सुख नहीं है। कृतज्ञता का भाव सुख का भाव है। हमें सुख तभी मिलता है, जब हम कृतज्ञ होते हैं।

सुख की प्राप्ति के लिये कृतज्ञता वाली बात बड़ी महत्त्वपूर्ण है। यहाँ पर दो बातें और समझने वाली हैं।

पहली बात - कृतज्ञता किस के प्रति है, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। पुत्र अपने पिता के प्रति कृतज्ञ हो सकता है, पिता अपने पुत्र के प्रति कृतज्ञ हो सकता है। आप की कृतज्ञता गुरु के प्रति हो सकती  है, आप की कृतज्ञता मालिक के प्रति हो सकती है, आपकी कृतज्ञता नौकर के प्रति हो सकती है। पति अपनी पत्नी के प्रति कृतज्ञ हो सकता है, पत्नी अपने पति के प्रति कृतज्ञ हो सकती है। आप की कृतज्ञता किसी पत्थर के प्रति हो सकती है, किसी नदी के प्रति हो सकती हे, किसी पुस्तक के प्रति हो सकती है, किसी ग्रंथ के प्रति हो सकती है।

कृतज्ञता आपके मन की भावना है और इस भावना में ही सुख है। इस भावना में ही देवता है।

आचार्य चाणक्य ने लिखा है-

 

न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृन्मये।

भावे ही विद्यते देवस्तामम्दावोहि कारणम्।।

देवता न काष्ठ में है, न पत्थर की मूर्त्ति में है। देवता केवल भावना में रहते हैं। इसलिये भावना ही सब कुछ है।

 

देवता कहीं और नहीं होता। देवता तो आपकी अपनी भावना में होता है। देवता का अस्तितव आपकी भावना में है। जैसे कि तुलसीदास जी हमें बता रहे हैं, परमात्मा का स्वरूप आपकी अपनी भावना में है -

 

जिन्ह की रही भावना जैसी।

प्रभु मूरति तिनु देखी तैसी।।

 

दूसरी बात - कृतज्ञता आपकी अपनी अनुभूति है। कृतज्ञ होकर आप किसी पर उपकार नहीं करते। कृतज्ञता जताकर आप किसी पर एहसान नहीं करते - परमात्मा पर भी नहीं। कृतज्ञता तो आपकी अपनी आवश्यकता है। कृतज्ञता की अभिव्यक्ति आप को जो अनुभूति देती है, उसमें ही आप सब कुछ पा जाते हैं।

कृतज्ञता की भावना हमें सुख देती है।
कृतघ्नता के विचार में हमारे तनाव पनपते हैं।

कृतज्ञता की भावना में सुख की अनुभूति है। हमारे आभार का प्रदर्शन इस भावना को जगाने की प्रक्रिया है। हमारे धन्यवाद में परमात्मा का अवतरण होता है।

लेकिन यह धन्यवाद तो तभी उठ सकता है,जब आप जानें कि आपको कितना कुछ मिला हुआ है। यह धन्यवाद तो उठेगा  जब हम यह जानें कि हमें जो मिला हुआ है, वह कितना मूल्यवान है। आप अपने अन्दर झाँक कर देखें तो आप पायेंगे कि आप के पास बहुत कुछ है - आप मालामाल हैं।

क्या आप जानते हैं कि आप प्रकृति के कितने बड़े चमत्कार हो?

आप परमात्मा की अनूठी रचना हो। आप के माध्यम से परमात्मा अपना अलौकिक रूप लेकर इस धरती पर उतरता है। आप प्रकृति के सौंदर्य का अंग हो। न केवल आप सृष्टि की रचना हो, बल्कि सृष्टा स्वयं आप में समाया हुआ है। आप अपने से प्रेम करो, अपने प्रति सद्रभावना रखो। परमात्मा के दिये इस शरीर की प्रेमपूर्वक देखभाल करो। आपको जो जीवन मिला है, उसे संवारो, सजाओ। इस जीवन का सम्मान करो, इस जीवन का सत्कार करो।

लेकिन, हम लोगों को जीवन सस्ता लगता है, दूसरी चीजें महंगी नजर आती हैं। धन कमाने के लिये तो काम करना पड़ता है,  मेहनत करनी पड़ती है। जीवन तो हमें मुफ्त में ही मिला हुआ है। इसीलिये न तो हम जीवन का मूल्य समझते हैं, और न ही उसके लिये कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

एक बार मरदाना ने श्री गुरुनानक देव जी से पूछा, सभी ग्रंथ और धार्मिक व्यक्ति कहते हैं कि जीवन एक अनमोल रत्न है, फिर भी हम इस जीवन को व्यर्थ में गँवा देते हैं। ऐसा क्यों करते हैं?

नानक जी ने इस प्रकार का उत्तर दिया- देख मरदाना, यह जीवन सचमुच में ही परमात्मा की अनुपम देन है, किन्तु बहुत कम लोग ही इस सत्य का अनुभव करते हैं। जो लोग इस मनुष्य-जीवन रूपी रत्न के अनन्त मूल्य का अनुमान नहीं लगा सकते, वे इसे कूड़ा-करकट समझकर फेंक देते हैं।

 किन्तु महाराज! मरदाने ने फिर प्रश्न पूछा, यह कहा जाता है कि सच्चा रत्न छिपा कर नहीं रखा जा सकता। जो कोई भी देखेगा, उसकी जगमगाहट से अवश्य आकर्षित होगा। फिर हम लोग इस अमूल्य रत्न को न समझने की भूल क्यों करते हैं?

 भा मरदाना, केवल पारखी जौहरी की सधी आँखें ही रत्न की कीमत आँकने में समर्थ होती हैं। जो, पारखी जौहरी की बात पर विश्वास नहीं करते, उनके लिये यह हीरा एक साधारण पत्थर का टुकड़ा मात्र है। वे इसे निरर्थक समझते हैं। ऐसा कहते हुए नानक जी ने मरदाना को वह हीरा याद दिलाया जो उसे कुछ दिन पहले मिला था (इसकी अलग कथा है)।

 भाई मरदाना, नानक जी फिर बोले, तुम उस हीरे को बाजार में ले जाओ, इसका मूल्यांकन करवाओ, तब तुम्हें मेरी बात समझ में आयेगी।

मरदाना उस रत्न को लेकर शहर गया। एक कुंजड़े ने उस रत्न का मूल्य एक मूली लगाया, दो मूलियाँ भी उसके बदले में देने को तैयार न हुआ। उसने कहा, भाई, यह पत्थर मेरे किस काम का है?

एक हलवाई आधा सेर मिठाई देने पर राजी हुआ। कपड़े की दूकान वाले ने दो गज कपड़ा देना मंजूर किया। बनिये ने तीन सेर अनाज उसका मूल्य लगाया। एक और दूकानदार ने ताम्बे के कुछ पैसे देना चाहे। एक सुनार ने कुछ रुपये देने का वादा किया।

अन्त में वह शहर के प्रसिद्ध जौहरी सालसराय के पास पहुँचा। जौहरी ने रत्न को हाथ में लिया और उसे बड़े ध्यान से परखा। जिस समय जौहरी उस रत्न को अपने हाथ में लिये उसे बारीकी से परख रहा था, उस समय मरदाना के चेहरे पर एक आभा चमक रही थी। जौहरी ने उस हीरे को परखकर लौटाते हुए कहा, दोस्त, यह रत्न अमूल्य है। मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं इसका मूल्य दे सकूँ। आप इसे अपने मालिक के पास वापस ले जाइये।

मरदाना आश्चर्य से भरा था। गुरु महाराज के पास पहुँचकर जब सारी घटना और अपने अनुभव का वर्णन किया तो गुरुनानक जी ने हँसकर कहा, तुमने देख लिया किस प्रकार संसार के लोगों के पास परखने की न आँखें हैं और न ही बुद्धि है। तुम यदि जौहरी की बातें उनसे कहो, तो वे तुम्हें पागल समझेंगे या मूर्ख समझकर तुम पर हँसेंगे। अधिकांश मनुष्यों का यही दृष्टिकोण जीवन रूपी रत्न के साथ भी होता है।

कृतज्ञता के भाव से भरे रहना ही परमात्मा की सच्ची पूजा है।

जब तक हम अपने जीवन की कीमत नहीं समझते तब तक सुख की ओर हमारे कदम नहीं उठ सकते। हम परमात्मा का आभार तो तभी मान सकते हैं जब हम इस रत्न का मूल्य समझें।

अपने  जीवन की महिमा को जानना हमारी जिम्मेवारी है। कृतज्ञता के भाव को जगाते रहना हमारा धर्म है। अहोभाव से भर जाने के सारे उपक्रम परमात्मा की सच्ची पूजा हैं। इसीलिये पुरातन काल से ही भारत में ऐसे उपक्रमों को दैनिक जीवन का अंग बनाया जाता रहा है। यों कहना चाहिए कि भारतीय संस्कृति ने कृतज्ञता के भावों में डूबने के जितने सुन्दर साधन दिये हैं, वे संसार में कहीं और कम ही दिखाई देते हैं। सुख की भावना को जगाने की विधि तो सदियों से हमारे धर्म और हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। आप जरा नजर डालिये अपनी परंपराओं पर -

हमारी संस्कृति में सूर्य उगने से पहले उठने की परम्परा है। क्यों? क्योंकि अब हम तैयार हैं उगते हुए सूरज से मिलने के लिये। हम सूर्य-नमस्कार करते हैं। हम झुकते हैं सूरज के सामने। हम सूरज की कृपा स्वीकार करते हैं। हम सूरज के प्रति अनुगृहीत होते हैं। हम उसे धन्यवाद देते हैं - हे सूरज देवता, तुम्हारी बड़ी कृपा है! तुमने फिर प्रकाश किया! आज फिर फूल खिलेंगे! आज फिर पक्षी गीत गायेंगे! आज फिर जीवन की लहर उठेगी! यह हमारा अहोभाग्य है। हम तुम्हारे आभारी हैं। हम तुम्हें धन्यवाद देते हैं।

फिर हम उस नये नवेले सूरज के सामने खड़े होकर उस का प्रकाश पीते हैं। हृदय में उठने वाले भावों से पुलकित होते हैं। आखिर क्यों न हों? हमारा अस्तित्व सूरज के कारण ही तो है। सूर्य ही सृष्टि को जीवन प्रदान करता है। वृक्ष-वनस्पति, जीव-जन्तु, मनुष्य सब का जीवन सूर्य की जीवन-दात्री किरणों के कारण ही तो है।

सूर्य नमस्कार को हमारे देश ने व्यायाम की एक प्रक्रिया बना दी है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की एकुजुटता की झलक मिलती है इसमें। शरीर और मन अलग नहीं हैं, इस बात की वैज्ञानिक पुष्टि तो आज हो चुकी है। लेकिन यह बड़ी हैरानी की बात है कि शरीर और भावनाओं के जोड़ के महत्त्व को हमारा देश पहले भी समझता था।

हम नदी पर जाते हैं। स्नान करने से पहले नदी को प्रणाम करते हैं। नदी के साथ एक भाव का सम्बन्ध जोड़ते हैं। आखिर नदी कितनी दयालु है - वह हमारा शरीर धोती है। हमारी मलिनता दूर करती है। हमें स्वच्छ बनाती है, हमें पवित्र करती है। यह हमारा अहोभाग्य है। इस भावना को लेकर जब नहाते हैं तो फिर हमारा भीतर भी धुल जाता है। एक ओर नदी का पानी हमारे शरीर को स्वच्छ करता है, दूसरी ओर हमारी कृतज्ञता की भावना हमारे मन को स्वच्छ करती है। यही भावना हमारे अन्दर सुख का संचार करती है। फिर हम नदी में केवल स्नान ही नहीं करते, अपने अन्दर के भावों को भी सघन करते जाते हैं।

नदी परमात्मा की है, नदी पवित्र है। भावों की इस सघनता में परमात्मा के दर्शन होते हैं। इसलिये हम नदी को तीर्थ मानते हैं।  लेकिन असली बात नदी की नहीं, हमारी भावना की है। नदी का तीर्थ होना इस भावना के कारण ही है। आप की अपनी भावना की पवित्रता ही नदी को तीर्थ बनाती है।

हम वृक्ष के पास जाते हैं - वृक्ष की परिक्रमा लगाते हैं। हम वृक्ष की पूजा करते हैं। हम वृक्ष के आगे हाथ जोड़ते हैं। यह हमारे आभार का प्रदर्शन है। वृक्ष हमें फूल देता है, फल देता है, छाया देता है। और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वृक्ष हमें प्राण वायु (Oxygen) देता है। वृक्ष हमारे लिये पूज्य है।

जब हम भोजन करते हैं तो परमात्मा का स्मरण करते हैं। हम अन्न को ब्रह्म मानते हैं। अन्न हमारा जीवन दाता है। अन्न के प्रति हम आभार व्यक्त करते हैं। खाने से पहले भोग लगाने की प्रथा में इसी आभार की अभिव्यंजना है।

आप वेद पढ़ें - क्या है उनमें? जीवन के उपयोग के हर जड़ तत्त्व को, हर चेतन तत्त्व को  देवता के रूप में देखा गया है। सब के प्रति कृतज्ञता है - सब का धन्यवाद है। भाव ही भाव हैं - रस ही रस है।

जो हमारे जीवन के साधन हैं, हम उन सब के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। हम उनको देवता मान कर पूजते हैं। सूरज देवता है, जल देवता है, अग्नि देवता है। धन-दौलत हमारी देवी है - हम उसे लक्ष्मी के रूप में पूजते हैं। विद्या हमारी देवी है - हम उसे सरस्वती के रूप में पूजते हैं। हमने और भी सैंकड़ों देवी-देवता मान कर रखे हुए हैं। क्यों? ताकि सब तरफ से हमारे भावों को झंझोड़ा जा सके।

जब मन में कृतज्ञता की भावना होती है तो सारी प्रकृति हमें सुन्दर लगने लगती है। फिर हम सारी प्रकृति से प्रेम करना सीखते हैं। हमें सूर्योदय भी सुन्दर लगता है, सूर्यास्त भी। कोयल की कुहुक में हमें संगीत उठता दिखाई देता है। खिलते हुए फूलों को देखकर हमारा मन भी खिल उठता है। कृतज्ञता की मनःस्थिति सुख की मनःस्थिति है।

देने में और कृतज्ञता में बड़ा गहरा सम्बन्ध है। कृतज्ञता का भाव प्राप्ति का भाव है। हमारा देना प्राप्ति के इस भाव की पुष्टि करता है।   देने का अर्थ है - हमारे पास बहुत है! देने का अर्थ है - हे परमात्मा!  तूने हमें बहुत दिया है! देने का भाव परिपूर्णता का भाव है। देने की क्रिया परिपूर्ण होने की क्रिया है। देना हमारी कृतज्ञता की ही अभिव्यक्ति है। देने की क्रिया हमारी कृतज्ञता को व्यवहारिक रूप देती है।

देना हमारी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है।


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