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04.04.2009
 
२४व्यवहारिक सूत्र
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

  

हो सकता है कि हर कर्म आप को सुख न दे, किन्तु यह निश्चित है कि कर्म के बिना सुख नहीं मिल सकता।

बेंजिमन डिज़राइली

  

हम जान चुके हैं कि देवता की सफलता का रहस्य उसकी यात्रा है। यह यात्रा हम सब कर सकते हैं। हम यह भी जान चुके हैं कि हमारी यात्रा का उद्देश्य है अपने स्वयं का रूपांतरण करना। यह काम न तो धर्म की व्याख्याओं से होता है और न ही धर्म के व्याख्यानों से। यह काम न तो पाठ रटने से होता है और न ही नाम जपने से। यह काम हमारी बातों से नहीं, हमारे आचरण से होता है। हमारा आचरण ही हमारा कर्म है। हम अपने कर्म से ही देवता बनते हैं, किसी और उपाय से नहीं। कर्म का संकल्प लेकर आप भी यात्रा शुरू कर सकते हैं।

सर्वोच्च सफलता आप के अपने हाथ में है। देवता बनना आप का अपना संकल्प है। यह संकल्प आप आज ही ले सकते हैं। देवता बनने के सारे सूत्र आप के संकल्प से शुरू होते हैं।

 

१.  संकल्प लीजिये कि आप अपने मन की शांति भंग नहीं होने देंगे।

कोई भी बात, कोई भी परिस्थिति, कोई भी घटना आप से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। आप की सुख-शांति से बढ़कर कुछ भी नहीं है। उद्विग्न होने से क्या लाभ? आप की व्याकुलता किस काम की? आज तक किसी ने भी अपनी व्याकुलता से किसी समस्या का समाधान नहीं किया।

२. संकल्प लीजिये कि आप अपने मित्रों, रिश्तेदारों और मिलने-जुलने वालों को स्वस्थ और सुखी रहने की प्ररेणा देंगे।

साईं बाबा कहते हैं सुख चाहो ता सुख दो। दूसरों को सुखी और समृद्ध देखने की कामना में आपके अपने सुख का रहस्य छुपा हुआ है। अपने आप को प्रफुल्लित रखना चाहते हो, तो किसी और को प्रफुल्लित कीजिये।

३. संकल्प लीजिये कि आप दूसरों को उनके दोषों से नहीं, उनके गुणों से अवगत करायेंगे।

हर व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा छिपी हुई है। किसी दूसरे के विशिष्ट गुण को उजागर करने में उसकी सहायता कीजिये और उसे उसकी प्रतिभा का विकास करने के लिये प्रोत्साहन दीजिये। आप के सहयोग से यदि किसी का जीवन सुख से भर जाये तो क्या आप के लिये यह प्रसन्नता की बात नहीं होगी?

४. संकल्प लीजिये कि आप के पास जो कुछ है उसके लिये आप कृतज्ञता से भरे रहेंगे।

हम सब मालामाल हैं। बस, हमें अपना ध्यान उन चीजों पर केन्द्रित करना है जो हमारे पास हैं, न कि उन पर जो हमारे पास नहीं हैं। जो हृदय कृतज्ञता से भरा होता है उस में निराशा नहीं टिक सकती।

५. संकल्प लीजिये कि आप अपना काम निष्ठा और लगन के साथ करेंगे।

यह एक बड़े आश्चर्य की बात है कि जो व्यक्ति अपना काम पूरी जिम्मेवारी और मेहनत के साथ करता है, उसकी परिस्थितियाँ अपने आप उसके अनुकूल होती चली जाती हैं।

६. संकल्प लीजिये कि दूसरों की सफलता में भी आप उतनी ही रुचि लेंगे जितनी अपनी सफलता में।

हम सब अपनी सफलता के प्रति उत्साह से भरे होते हैं। क्या वही उत्साह हम दूसरों की सफलता के लिये नहीं दिखा सकते? आप चाहें तो आपके भाई-बहिनों, मित्रों और रिश्तेदारों की सफलता भी आप को उमंग से भर सकती है। जो बेगानी शादी में भी नाच सकता है, उसके लिये मौज की कोई कमी नहीं।

७. संकल्प लीजिए कि आप भूतकाल की गल्तियों पर पश्चाताप नहीं करेंगे।

आप का काम पश्चाताप से नहीं, सुधार से बनता है। अपनी ऊर्जा को पश्चाताप में नष्ट मत होने दीजिये उसे अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के प्रयत्न में लगाइये।

८. संकल्प लीजिये कि आप के चेहरे से हमेशा प्रसन्नता ही झलकती रहेगी।

लटका हुआ चेहरा किसी को कुछ नहीं दे सकता स्वयं अपने को भी नहीं। आप की मुस्कान बड़ी संक्रामक (contagious) है। अपने चेहरे पर मुस्कान लाइये और फिर देखिये कि कितनी जल्दी आप के आसपास सभी के चेहरों पर मुस्कुराहट फैल जाती है।

९. संकल्प लीजिये कि आप अपने परिष्कार में इतने तल्लीन रहेंगे कि दूसरों की आलोचना करने का समय ही न बच पाये।

हमारी सफलता अपने आप को सुधारने में है, दूसरों की निन्दा करने में नहीं। जो समय हम दूसरों की बुराई में नष्ट करते हैं, वह समय अपने आप को सुसंस्कृत बनाने में लगाया जा सकता है।

१०. संकल्प लीजिए कि आप संसार का भोग तो अवश्य करेंगे, लेकिन उसमें लिप्त नहीं होंगे।

भोग कर के भोग से ऊपर उठ जाना देवता की विशेषता है। जो भोग कर के आगे बढ़ जाता है, उस की चिन्ताएँ पीछे रह जाती हैं। जो पाने के बाद देने में रुचि लेने लगता है, उसका क्ोध कम हो जाता है। जिसे अपने आप पर विश्वास हो जाता है, उसका भय दूर हो जाता है। जिसका लक्ष्य ही सुख की प्राप्ति है, उसे खलेथों की उपस्थिति का पता ही नहीं चल पाता।

११. संकल्प लीजिये कि आप अपना हर काम जागरूक रह कर करेंगे।

अपने हर विचार का जागरूक रह कर निरीक्षण कीजिये, क्योंकि आपका विचार आप का कथन बनता है।

अपनी हर बात को जागरूक रह कर कहिए क्योंकि आप का कथन आपका कर्म बनता है।

अपने हर कर्म को जागकर कीजिये, क्योंकि आपके कर्म से आपकी आदत बनती है।

अपनी हर आदत को जागकर देखिये क्योंकि आप की आदत आप का चरित्र बनती है।

अपने चरित्र को जाग कर देखिये, क्योंकि आप का चरित्र ही आप का जीवन है।

संक्षेप में,

आपका जागरण ही आपकी सफलता है।

जागिए!!!


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