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02.26.2009
 
२२-अन्तरात्मा
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

  

अनजाना परमात्मा प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर सुप्तावस्था में (dormant) विद्यमान है। हर धार्मिक शिक्षा उसे जगाने से रोकती है। 

स्वामी विवेकानन्द

 

आप को हम एक कपोल-कल्पित कहानी सुनाते हैं।  

आँखों के डाक्टर के पास जाकर एक आदमी ने कहा — “डाक्टर साहब! मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता है कि मेरी आँखें कमजोर हो गई हैं शायद मुझे चश्मे की जरूरत है।

 “चिन्ता की कोई बात नहीं। लो, यह चश्मा पहन लो,” कहते हुए डाक्टर ने अपना चश्मा उतार कर उस के हाथ में रख दिया।

डाक्टर के कहने पर उसने वह चश्मा पहन तो लिया, लेकिन उस चश्मे को लगाते ही वह हड़बड़ा कर बोला — “डाक्टर साहब! यह क्या हो गया? इस चश्मे से तो कुछ भी दिखाई नहीं देता सब कुछ धुंधला हो गया है।

 “क्या बात करते हो?” डाक्टर ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा — “मैं इस चश्मे को कई सालों से लगाता आया हूँ, मुझे तो बिल्कुल ठीक नजर आता है। और भी कई लोग इसी चश्मे को पहन चुके हैं। तुम घबराओ नहीं, इस चश्मे को लगा लो, धीरे-धीरे सब ठीक नजर आने लगेगा।

 यदि यह कहानी सच्ची हो जाये तो क्या होगा? क्या वह आदमी दोबारा कभी उस डाक्टर के पास जायेगा?

नहीं!

क्या आप कभी ऐसे डाक्टर के पास जाना चाहेंगे?

कदापि नहीं!

आपको जिस (नम्बर के) चश्मे की जरूरत है, उसका निर्णय कोई भी डाक्टर अपनी मर्जी से नहीं कर सकता। तभी तो जाँच के दौरान डाक्टर अपने हर मरीज से पूछता है कि किस लैन्स से उसे ठीक दिखाई देता है। आपके लिये कौन सा चश्मा उपयुक्त है, उसका अन्तिम निर्णय तो आपके हाथ में होता है, डाक्टर के हाथ में नहीं। महत्व डाक्टर का नहीं, आपकी दृष्टि का है। जिस डाक्टर के पास केवल एक ही चश्मा हो और वह हर किसी को वही चश्मा पहनाना चाहे, उसके तो आप नजदीक भी नहीं जायेंगे।

लेकिन धर्म के मामले में हम ऐसा नहीं करते हम हर किसी का चश्मा पहनने के लिये तैयार हो जाते हैं। हमारे महात्माओं के पास केवल एक ही चश्मा होता है उनके अपने सिद्धान्तों का, उन के अपने मत का। वे चाहते हैं कि हर कोई उनके वाला चश्मा पहने। वे चाहते हैं कि दूसरे लोग उन्हीं की पद्धति को अपनाएँ, उन्हीं के नियम के अनुसार चलें। उनके चश्मे से आप को क्या नजर आता है, यह तो वे जानते ही नहीं। जब हम लोग कोई भी चश्मा लगाने को राजी हैं, तो उन्हें जानने की जरूरत भी क्या है? यदि हम लोग स्वयं ही अपने सुख के प्रति जागरूक न हों, तो दूसरों का क्या दोष? हम अपने सुख के प्रति उदासीन हैं। हम अपनी स्वयं की जिम्मेवारी भूल गये हैं। हम भूल गये हैं कि हमारा ब्रह्म हम में है, दूसरों में नहीं। हम सब के मार्ग अलग-अलग है, हम सब की यात्रा अलग अलग है। अपने मार्ग को देखना हमारी अपनी जिम्मेवारी है, दूसरों की नहीं। इसलिये हम सबको एक अलग चश्मे की जरूरत होती है। दूसरों के चश्मों से हम नहीं देख सकते।

सब के मार्ग अलग हैं महात्मा बुद्ध इस बात पर विशेष बल देते थे। इसलिये उनके उपदेश उनके श्रोताओं की आवश्यकता और उनकी समझ शक्ति के अनुसार हुआ करते थे। महात्मा बुद्ध के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने पचास वर्षों के भ्रमण के दौरान ६४,००० ढंग से उपदेश दिये थे। इसलिये बौद्ध लोगों में एक कहावत है धर्म के ६४,००० द्वार हैं।

अब देखिये! महात्मा बुद्ध के पास ६४,००० प्रकार के चश्मे थे। वे दूसरों को ऐसा चश्मा देते थे जो उनकी अपनी आवश्यकता के अनुरूप हो। इसके बावजूद वे यह चेतावनी दिया करते थे

किसी भी उपदेश को इसलिये मत ग्रहण करो क्योंकि शिक्षा  देने वाले को महापुरुष माना जाता है, या वह उपदेश किसी ग्रंथ में लिखा हुआ है, या आपके मित्र और पड़ोसी उसमें विश्वास रखते हैं। हर बात को स्वयं जाँच-परख कर समझो। यदि उपयुक्त लगे, तभी उसे ग्रहण करो, और फिर  उस पर आचरण करो।

इसी बात को ब्रह्मर्षि बावरा इस प्रकार कहते हैं

 किसी बात को तुम इसलिये मत मानो कि अमुक ग्रंथ में लिखा हुआ है, किसी बात को तुम इसलिये मत मानो कि किसी बड़े आदमी ने कहा है, किसी बात को तुम इसलिये मत मानो कि बहुत पुरानी है। किसी भी बात को यदि मानना है तो इसलिये मानो कि वह बुद्धि सम्मत है, बुद्धि ग्राह्य है।

 अर्जुन ने भगवान कृष्ण से कहा — “भगवन्! मैं आप की शरण में हूँ, मुझे उपदेश दीजिये।(शाधि मां त्वां प्रपन्नम)

भगवान कृष्ण का उत्तर था — “मेरी शरण में नहीं, पहले तू बुद्धि की शरण में जा।(बुद्धं शरणमन्विछ)

भगवान कष्ण की इस बात पर टिप्पणी करते हुए बावरा जी कहते हैं

वेद (ग्रंथों) की मान्यताओं से जनता का विचार हटाकर बुद्धि की शरण में भेजने का साहस भगवान ही कर सकते थे, इन्सान नहीं। उस समय की यह बहुत बड़ी क्रांति है। दुर्भाग्य की बात यह है कि कृष्ण के बाद हम कृष्ण को पूजते रहे लेकिन उन की बात मानने को तैयार नहीं। यदि भारत का हिन्दू भगवान कृष्ण की बात माना होता तो उस की यह दुर्गति नहीं होती ....

और यदि मैं यह कह दूँ कि बुद्धि मनुष्य के लिये परमात्मा की सबसे बड़ी देन है, तो इस में कोई अतिशोयक्ति न होगी। मेरे पास जो लोग आते हैं, उन्हें मैं बताता हूँ कि यदि तुम धार्मिक होना चाहते हो तो पहले अपनी विवेक-शक्ति का उपयोग करो, क्योंकि विवेक परमात्मा की सबसे बड़ी भेंट है। तुम विवेक को कारण ही मनुष्य हो, यदि तुम अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं करते तो इस का अभिप्राय यह है कि तुम परमात्मा की सबसे बडी देन की उपेक्षा कर रहे हो।          

यही वेदान्त का सन्देश है। ब्रह्म आपके अपने अन्दर है अपने आप को देखो, दूसरों को नहीं। सारा खेल आप के अपने विवेक का है, क्योंकि अन्तिम निर्णय आपका है, किसी और का नहीं। केवल आप ही अपना मार्ग देख सकते हैं। और, आप को अपने मार्ग पर ही चलना है। लेकिन हर धार्मिक शिक्षा आप से कहती है हमारे मार्ग पर चलो।

स्वामी विवेकानन्द जी कहते हैं

हमारे गुरु, हमारे महात्मा तो एक ही बात की रट लगाये रखते हैं। वे कहते हैं तुम हमारी बात सुनो। तुम हमारे  पीछे चलो हम सब जानते हैं। हम तुम्हें एक ऐसा पासपोर्ट देंगे जिसे लेकर मृत्यु के बाद सीधे परमात्मा के साम्राज्य में प्रयोग कर जाओगे।

कितने आश्चर्य की बात है! सब आप को वेदान्त के विपरीत ले जाना चाहते हैं कोई आप को अपनी दिव्यता नहीं देखने देता। कोई महात्मा आप से यह नहीं कहता — “मुझे नहीं, अपने आप को देखो। कोई गुरु आप से यह नहीं कहता — “मुझे नहीं, अपने आप को समझो।कोई आप से यह नहीं कहता कि आप का मार्ग अलग है। जाओ, अपना मार्ग खोजो और उसी पर चलो।

इंग्लैंड के प्रसिद्ध रहस्यवादी कवि विलियम ब्लेक (William Blake, 1757 -1827) कहते हैं

मुझे अपनी प्रणाली का निर्धारण स्वयं ही करना है। यदि मैं ऐसा नहीं करता तो फिर मुझे किसी दूसरे की प्रणाली की दासता में बंध कर रहना पड़ेगा।

हमारी अपनी प्रणाली ही हमारा मार्ग है। हमारी अपनी प्रणाली ही हमारा धर्म है जिसे भगवान कृष्ण ने स्वधर्म कहा है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं

                 

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेयः पर धर्मो भयावहः।।

अपना धर्म विगुण (गुण-रहित) हो तो भी वह दूसरे के भली-भान्ति अनुष्ठित धर्म से श्रेष्ठ है। पर-धर्म (दूसरे का धर्म) भयावह है।

इस श्लोक पर टिप्पणी करते हुए स्वर्गीय बावरा जी कहते हैं कि मनुष्य के लिये इस से उत्तम बात नहीं कही जा सकती। वे हमें यह भी बताते हैं कि स्वधर्म का अर्थ वर्ण-धर्म से नहीं है। स्वधर्म का अर्थ हिन्दू धर्म, मुसलमान धर्म, यहूदी धर्म व ईसाई धर्म नहीं है। स्वधर्म का अर्थ ब्राह्मण-धर्म, क्षत्रिय-धर्म, वैश्य-धर्म या शूद्र-धर्म नहीं है। फिर स्वधर्मक्या हैं? स्वधर्म का अर्थ है — ‘स्वका धर्म’, आपका अपना व्यक्तिगत धर्म, किसी और का नहीं। हमारी मुक्ति हमारी अपनी प्रणाली में है। दूसरों की प्रणाली में तो हमारा बन्धन है।

अपने मार्ग पर चलना ही आप का धर्म है, दूसरों के मार्ग पर नहीं। इसीलिये दलाई लामा कहते हैं

प्रत्येक व्यक्ति का धर्म अलग है। संसार में  यदि पाँच सौ करोड़ लोग हैं तो फिर पाँच सौ करोड़ धर्म (सम्प्रदाय) भी होना चाहिए।

क्या अर्थ है उनके इस कथन का?

अधिकतर तो लोग कहते हैं कि धर्म एक होना चाहिए, क्योंकि अनेक धर्मों के कारण लडाइयाँ होती हैं। अधिकतर तो लोग यही सोचते हैं कि परमात्मा एक है, इसलिये धर्म भी एक होना चाहिए। फिर दलाई लामा ऐसा क्यों कह रहे हैं?

इसमें कोई शक नहीं कि परमात्मा एक है। लेकिन हम सब अलग-अलग स्थानों पर खडे हैं। इसलिये परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग हम सब के लिये अलग-अलग होता है, हम सब की दिशा अलग होती है। भोपाल पहुँचने के लिये दिल्ली वाला दक्षिण की ओर जाता है, पर चिन्नई वाला उत्तर की ओर, मुम्बई वाला पूर्व की ओर जाता है, तो प्रयाग वाला पश्चिम की ओर। इसी प्रकार परमात्मा तक पहुँचने की यात्रा भी हम सब के लिये अलग-अलग होती है। इसी कारण हर व्यक्ति को एक अलग मार्ग-दर्शन चाहिए। सबका अपना अलग धर्म होने का यही अर्थ है।

प्रत्येक व्यक्ति को एक स्पष्ट और सुनिश्चित मार्ग-दर्शन की आवश्यकता है। हमारे अपने अलग धर्म होने का अर्थ है कि सबको अपने एक विशिष्ट चश्मे की आवश्यकता है दूसरों के चश्मों से काम नहीं चलेगा।

क्या आप जानते हैं कि ऐसा एक विशिष्ट चश्मा हम सबके पास है?

आप को यह जान कर खुशी होगी कि परमात्मा ने सबके मार्ग-दर्शन की उपयुक्त व्यवस्था कर के ही हमें संसार में भेजा है। हम सबके पास अपना-अपना एक ऐसा चश्मा है जो विशेष रूप से हमारी     अपनी आँखों के लिये बना है। केवल इसी चश्मे से आपको स्पष्ट दिखाई देता है केवल यही चश्मा आप को सही मार्ग दिखा सकता है।

आपका यह चश्मा है

आपकी अन्तरात्मा!

जी हाँ, आपकी अपनी अन्तरात्मा हर समय, हर परिस्थिति में आप का ठीक-ठीक मार्ग-दर्शन करती है।

हमारी अपनी अन्तरात्मा ही हमारा ठीक-ठीक मार्ग दर्शन कर सकती है, दूसरा कोई नहीं।

अब आप दलाई लामा से कह सकते हैं — “संसार में पाँच सौ करोड़ धर्म (सम्प्रदाय) नहीं हैं तो क्या हुआ? पाँच सौ करोड़ अन्तरात्माएँ तो हैं!और बड़ी बात यह है कि प्रत्येक अन्तरात्मा हम सब को अपना-अपना मार्ग दिखाने के लिये पूरी तरह से सक्षम है।

आप अनुपम हैं आप जैसा इस सृष्टि में कोई नहीं है।  आप की अन्तरात्मा भी अनुपम है। आप की अन्तरात्मा किसी और की नकल नहीं हो सकती। हम लोग बहुमत के पीछे चलते हैं, लेकिन हमारी अन्तरात्मा बहुमत के नियम को ानने से इन्कार करती है।

बहुमत के सिर तो बहुत होते हैं, पर उसका मस्तिष्क नहीं होता। एक विदेशी कहावत है कि ज्ञानी अपनी समझ से निर्णय लेता है, पर अज्ञानी बहुमत के साथ चलता है। हमारी अन्तरात्मा हमें बहुमत के पीछे चलने से रोकती है। वह हमें याद दिलाती है कि जीवन हमारे अन्दर से निकलता है, बाहर से नहीं आता। एक बीज से अंकुर फूटता है और बाहर फैलते हुए एक बड़ा वृक्ष बन जाता है। हम जो बाहर देखते हैं, वह हमारे जीवन का विस्तार है इस की जड़ें तो हमारे भीतर ही होती हैं। लेकिन हम लोग जीवन को बाहर खोजते हैं और निराश होकर पूछते हैं — “कहाँ है जीवन? हमें तो कहीं नजर नहीं आ रहा!

आप का जीवन आप के भीतर है बाहर नहीं। आप अपना जीवन बाहर वालों में नहीं देख सकते, और न ही बाहर वाले आप   को आप का जीवन दिखा सकते हैं। जीवन की जड़ें तो आपके अपने भीतर हैं। अपनी जडों को सींचो, अपनी जडों को सँवारो। जड़ों की परवरिश करने से ही सुन्दर फूल खिलते हैं, पेड़ को झाड़ने पोंछने से नहीं।

हमारी अन्तरात्मा हमें अपने भीतर का जीवन दिखाना चाहती है। आप की अन्तरात्मा आप की विश्वसनीय मार्ग-दर्शक है। वह आपका सब से बड़ा खजाना है। यह वह खजाना है जो हमेशा आप के साथ होता है, हमेशा आप के पास रहता है। अन्तरात्मा का सीधा सम्बन्ध परमात्मा से है। इसकी आवाज परमात्मा की आवाज है।  लेकिन, यह आवाज बड़ी मद्धम होती है। एक पाश्चात्य दार्शनिक ने कहा है

अन्तरात्मा की आवाज स्पष्ट तो होती है, परन्तु बड़ी धीमी होती है। स्पष्ट इतनी कि हम उसे पहचानने में भूल नहीं कर सकते, पर धीमी इतनी होती है कि गला दबाकर हम उसे घोंट सकते हैं।

और हम लोग यही पाप करते आ रहे हैं हम अपनी अन्तरात्मा का गला घोंटते आये हैं।  हम अपनी अन्तरात्मा की तो अवहेलना करते हैं और महात्माओं के आगे माथा टेकते हैं। हम अपने सब से बड़े खजाने का तो तिरस्कार करते हैं और दूसरों के आगे नाक रगड़ते हैं। हम यह नहीं जानते कि हमारी अपनी अन्तरात्मा से बड़ा कोई नहीं हो सकता। जितना विश्वसनीय मार्ग-दर्शन आपकी अन्तरात्मा कर सकती है, उतना कोई भी गुरु नहीं कर सकता।

गुरु तो केवल उँगली से इशारा ही कर सकते हैं, लेकिन आपके साथ नहीं चल सकते। आप की अन्तरात्मा तो हमेशा आपके साथ चलती है। गुरु तो मील के पत्थर की तरह हैं जो अपनी जगह पर खड़े होते हैं। मील के पत्थर आपका गन्तव्य नहीं होते वे तो गन्तव्य की ओर इंगित करते हैं। इन्हें तो पीछे छोड़ना पड़ता है। इनको छोड़े बिना आपकी यात्रा नहीं हो सकती।

यदि कोई मील के पत्थर पर डेरा लगा कर बैठ जाये तो आप उस पर हँसेंगे कैसा मूर्ख आदमी है! लेकिन धर्म के मामले में हम ऐसा ही करते आये हैं मील के पत्थरों के आगे ही भीड़ इकट्ठी होने लगती है। हम गुरुओं पर ही रुक जाते हैं यात्रा को भूल जाते हैं। इसीलिये धार्मिक शिक्षा हमें जागने नहीं देती। इसीलिये धार्मिक शिक्षा हमें अपनी दिव्यता नहीं देखने देती। धार्मिक शिक्षा हमें पाँडित्य दे सकती है, आत्मबोध नहीं दे सकती। धार्मिक शिक्षा हमें धर्मात्मा बना सकती है, ब्रह्मज्ञानी नहीं। धार्मिक शिक्षा हमारी यात्रा में अवरोध बन कर रह जाती है।

जिसे हम धार्मिक शिक्षा कहते हैं, वह हमारे जागरण में बाधा बनती है।

आप को याद होगा कि आप की धार्मिकता आप की कर्त्तव्य-परायणता है। आप के कर्त्तव्य का बोध आप से अधिक किसी और को नहीं हो सकता। आप की धार्मिकता आप की अपनी है किसी और की नहीं। इसीलिये दूसरों के द्वारा सिखाई गई धार्मिक शिक्षा आप को जगा नहीं सकती। इसीलिये धार्मिक शिक्षा आपको अपनी दिव्यता नहीं दिखा सकती। फिर आपके अन्दर का सोया हुआ परमात्मा सोया ही रह जाता है।

फिर भी हम दूसरों की बात सुनते हैं। दूसरे हमें परिचित लगते हैं, अन्तरात्मा हमें अपरिचित लगती है। हम इस अपरिचित की  बात सुनने से कतराते हैं। इसीलिये तो वह अपरिचित ही बनी रहती है। तभी तो किसी शायर ने कहा है

रूह और जिस्म का रिश्ता भी अजब है,

सारी उम्र साथ रहे लेकिन तअर्रुफ़ नहीं हुआ।

अपनी अन्तरात्मा से परिचित होने की प्रक्रिया ही वह यात्रा है जो आपको देवता बनाती है।


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