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02.06.2009
 
२१ रूपांतरण
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

यदि आप संसार को सुधारना चाहते हो, तो पहले अपने देश को सुधारो, यदि अपने देश को सुधारना चाहते हो, तो पहले अपने घर को सुधारो, यदि अपने घर को सुधारना चाहते हो तो पहले अपने आप को सुधारो।

कन्फ्यूशस

 

जागे हुए व्यक्ति की दृष्टि में जो परिवर्तन होता है, उस से तो सारा दृश्य ही बदल जाता है। फिर इस संसार का रूप वैसा नहीं रह जाता। फिर यह संसार कोई कैद-खाना नहीं लगता वह तो एक क्रीड़ा-स्थल बन जाता है। उस बदले हुए संसार में तो हमेशा ही वसन्त त्रतु रहती है, हमेशा ही फूल होते हैंहमेशा ही भँवरे होते हैं, हमेशा ही तितलियाँ होती हैं। उस संसार में अशोभनीय भाग दौड़ नहीं होती, अभद्र प्रतिस्पर्धा नहीं होती। जहाँ पहले बन्धन था, अब वहाँ मुक्ति है। जहाँ पहले पीड़ा थी, अब वहाँ सुख है परम सुख। जो जाग गया है, वह सिर उठा कर कह सकता है कि यह संसार तो बड़ा सुन्दर है! इस में तो सुख ही सुख भरा पड़ा है!

जिसे यह आत्मज्ञान हो जाता है, उसे कुछ भी बुरा नहीं नजर आता। उसे सब अच्छे लगते हैं, सब अपने लगते हैं। उसे कोई शत्रु नहीं दिखाई देता। फिर तो वह साधु का भी आदर करता है, असाधु का भी। उसे तो रात्रि के अन्धेरे में व्यस्त गणिका भी सती सावित्री नजर आती है। वह सब की पृष्ठभूमि से जो परिचित हो जाता है!

आपका आत्मज्ञान आप को पूरी तरह से रूपांतरित कर देता है। फिर आप अपने को ही नहीं, दूसरों को भी देवता के रूप में देखते हैं। इस धरती पर आप को देवता ही नजर आते हैं सब तरफ देवता विचर रहे हैं, हर तरफ देवता खेल रहे हैं। देवता ही नाच रहे हैं, देवता ही कूद रहे हैं। ब्रह्मज्ञानी को एक देवता दूसरे देवता के साथ कदम मिलाते हुए नजर आता है, एक देवता ही दूसरे देवता से प्रेम करते हुए नजर आता है।

उसे तो हर मनुष्य के चेहरे में देवता ही दिखाई देता है। ब्रह्मज्ञानी मिट्टी के पुतलों से नहीं, जीते-जागते देवता से प्यार करते हैं। फिर, जिन से आप प्रेम करते हैं, वे छोटे-मोटे क्षुद्र प्राणी नहीं रह जाते। वे भी जीते-जागते देवता हो जाते हैं। फिर तो आपके प्रेम में भी रस होता है, प्रगाढ़ता होती है, आत्मीयता होती है। फिर तो हर स्त्री देवी होती है, हर पत्नी मीरा होती है, हर पति कृष्ण होता है। फिर तो सारी धरती स्वर्ग बन जाती है।

         क्या ऐसा होना सँभव है?

         बिल्कुल है!

         न केवल यह संभव है, बल्कि इस स्थिति को उपलब्ध होना हम सबका अधिकार है और, इस स्थिति को उपलब्ध होना हम सब की जिम्मेवारी भी है। यही हमारा धर्म है। यह काम उतना कठिन नहीं है जितना कि आप को बतलाया जाता है। आप को बस जाग कर देखना है कि सारा अस्तित्व आपका है। आप इस अस्तित्व के उतने ही बड़े अंग हो, जितना कोई राजा-महाराजा, जितना कोई सम्राट, जितना कोई उद्योगपति, जितना कोई मनिस्ट्र, जितना कोई महात्मा, जितना कोई धर्मात्मा, जितना कोई महन्त, जितना कोई धर्म-गुरू। याद रखिये स्वामी विवेकानन्द की बात परमात्मा किन्हीं इने-गिने लोगों की जागीर नहीं है। परमात्मा पर किसी का भी एकाधिकार नहीं है, और न ही परमात्मा किसी की मुट्ठी में बन्द है। परमात्मा तो हम सबका है आपका भी, हमारा भी। हम संसारी ब्रह्मज्ञानी होने की पूरी क्षमता रखते हैं।

यह सारा अस्तित्व आप से अलग नहीं है यह जान लेना आप की उपलब्धि का साधन बन जाता है। जिस दिन आप जान जाते हैं कि दूसरा भी आपका ही रूप है, उस दिन आप भी ब्रह्मज्ञानी बन जाते हो। तब आप यह भी समझ जाते हो कि दूसरों को देना भी अपने आप को ही देना है। इस रूपांतरण के बाद हम परोपकार की बातें नहीं करते, फिर हम दूसरों की भलाई की बातें नहीं करते, फिर हम देकर किसी पर अहसान नहीं जताते, फिर हम त्याग की महिमा नहीं गाते फिर तो हम जान जाते हैं कि दूसरों की सेवा तो हमारा अपना ही सुख है। दूसरों की सेवा को अपना सुख मानने वाला ही महापुरूष होता है।

ब्रह्मज्ञान हम में नम्रता लाता है। इसलिये ब्रह्मज्ञानी अत्यन्त नम्र होता है। ब्रह्मज्ञानी की नम्रता ही उसे महापुरूष बनाती है।

दूसरों की सेवा में लगे हुए हाथ, परमात्मा के जाप में लगी हुई जिह्वा से कहीं अधिक पवित्र हैं।

उन्नसवीं शताब्दी में इंग्लैंड के एक प्रसिद्ध दार्शनिक एवं समाज-शास्त्री थे जॉन रस्किन (१८१९ १९००)। मिस्टर रस्किन महापुरूषों की नम्रता के बारे में इस प्रकार लिखते हैं

किसी भी महापुरूष की पहली पहचान (परख) उसकी नम्रता है। सच्चे महापुरूष को इस बात की विलक्षण अनुभूति होती है कि नम्रता उनकी अपनी नहीं होती, लेकिन उनके भीतर से गुजर कर निकलती है (Humility is not in them, but through them)। फिर उन्हें सारे लोगों में दिव्यता दिखाई देती है। ऐसे महापुरूष हर समय, हर किसी के प्रति अपार करूणा से भरे होते हैं।

देखिये जरा! मिस्टर रस्किन जो बात कह रहे हैं उसका सीधा अर्थ यह है कि आप के रूपांतरण के बाद आप को हर व्यक्ति में परमात्मा का ही रूप नजर आता है। इसलिये आप सब के प्रति नम्र होते हैं।

अपनी दिव्यता देख लेने वाले को हर मनुष्य में देवता नज़र आता है। फिर वह सब के प्रति अत्यन्त नम्र होता है।

ऐसी स्थिति की उपलब्धि किसी को भी हो सकती है साधु-महात्मा को भी, साधारण संसारी को भी। वैसे तो इस स्थिति की प्राप्ति किसी भी उम्र में हो सकती है, किन्तु इस की अधिक संभावना साठ वर्ष के आस पास होती है। उस समय तक हम परिवार की अनेक जिम्मेवारियों से मुक्त होते हैं बच्चे पढ़ लिख जाते हैं, शादी-ब्याह भी हो जाते हैं। फिर हम दूसरों की सेवा के लिये अधिक स्वतंत्र होते हैं। इस चरण में आकर हम अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिये तैयार होते हैं। इस चरण पर आप की महिमा अपनी चरम सीमा पर होती है आप की शोभा अपने शिखर पर होती है। आप का प्रताप किसी देवता से कम नहीं होता।

जीवन का यह चरण हमें परिपूर्ण करता है। सब कुछ परमात्मा का ही तो दिया हुआ है अब हमें उसे लौटाना है। इस लौटाने में हमारी पूर्णता है। हमारा लौटाना हमारा पाना है। लौटाने की प्रक्रिया में हमारी उच्चतम उपलब्धि होती है। जैसे जैसे हम इस चरण में आगे बढ़ते हैं, इस अस्तित्व के साथ हमारा ताल-मेल गहराता जाता है। हमारी ऊच्छा परमात्मा की इच्छा के साथ समायोजित (in tune with) होने लगती है। धीरे-धीरे परमात्मा की इच्छा हमारी इच्छा बन जाती है। फिर तो मृत्यु भी हमारी अपनी इच्छा से ही होती है। इसलिए हमें मृत्यु का भय नहीं रह जाता। मैंऔर तूके पिघल कर एक हो जाने की यह एक व्यवाहारिक उपयोगिता है।

उपनिषदों के दृष्टा ऐसा ही समाज देखना चाहते थे, ऐसा ही देश देखना चाहते थे। वे लोग अपनी संकल्पना को व्यापक रूप से न फैला सके तो क्या हुआआप तो वेदान्त की भव्यता से लाभ उठा सकते हैं!

उपनिषदों का सन्देश है

प्रत्येक व्यक्ति जाग सकता है, प्रत्येक व्यक्ति ब्रह्मज्ञानी हो सकता है।

प्रत्येक व्यक्ति जाग सकता है। प्रत्येक व्यक्ति ब्रह्मज्ञानी हो सकता है।

आपका आत्मज्ञान दूसरों पर नहीं निर्भर करता। दूसरे कैसे हैं समाज कैसा है? ब्रह्मज्ञान के लिये इन बातों का कोई महत्व नहीं है। आप का रूपांतरण तो आपके अपने जागरण से होता है। फिर आप के अपने रूपांतरण से सारा समाज रूपांतरित हो उठता है, सारा संसार रूपांतरित हो उठता है। संसार के रूपांतरण की प्रक्रिया आप के अपने रूपांतरण से शुरू होती है।

लेकिन हम जागना नहीं चाहते। हम अपने आप को नहीं सुधारना चाहते। हर कोई सोचता है कि दूसरे को सुधरने की जरूरत है, उसे नहीं। इसीलिये तो दूसरों को उपदेश देना हर कोई जानता है। सारा संसार यह जानता है कि दूसरों को क्या करना चाहिए। लेकिन जानने वाली बात तो यह है कि हमें स्वयं क्या करना चाहिए।

आपने देखा होगा कि संसार में बड़े-बड़े समाज-सुधारक आते हैं और चले जाते हैं, पर समाज फिर भी वहीं का वहीं रहता है। जानते हो क्यों?

         क्योंकि समाज-सुधारक दूसरों को सुधारना चाहते हैं।

         क्योंकि समाज-सुधारक दूसरों का भला करना चाहते हैं।

         क्योंकि समाज-सुधारक क्रान्ति लाना चाहते हैं।

सारे समाज-सुधारक दूसरों को बदलना चाहते हैं अपने आप को नहीं।

ऐसी ही भूल हमारे महात्मा करते आ रहे हैं वे सब दूसरों को सिखाना चाहते हैं, खुद नहीं सीखते। हम लोग दूसरों को शांति देना चाहते हैं, किन्तु स्वयं शांत नहीं होते। आपने देखा होगा  कि विश्व-शान्ति के लिये न जाने कितने बड़े-बड़े यज्ञ होते रहते हैं, किन्तु आज भी विश्व में शान्ति नहीं, अशान्ति है। किसी भी शांति- यज्ञ से कुछ नहीं हुआ। और हो भी नहीं सकता क्योंकि हम वेदान्त के मूल अर्थ को ही भूल गये हैं। हम तो यह भी भूल गये हैं कि सवाल दूसरों को सुधारने का नहीं अपने आप को सुधारने का है। हम भूल गये हैं कि महत्व दूसरों को बदलने का नहीं अपने आप को बदलने का है। बात विश्व-शांति की नहीं है, हमारे अपने मन की शांति की है। हमारे स्वयं के शांत होने से ही विश्व-शांति की संभावना बनती है। हमारा काम तो अपने स्वयं के प्रेम-प्याले को भरने से शुरू होता है।

विश्व के जागरण का काम हमारे अपने जागरण से बनता है। विश्व का रूपांतरण तो हमारे अपने रूपांतरण से होता है।



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