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01.16.2009
 
२० प्रेम
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

विश्वास से सब कुछ संभव हो जाता है, किन्तु प्रेम से सब कुछ सरल हो जाता है।

रब्बाई सिडनी ग्रीनबर्ग

 

हमारे जागरण से क्या हो जायेगा?

मान लो, हमें यह आभास हो गया कि यह सारा अस्तित्त्व एक है, तो उसके बाद क्या होगा?

संक्षेप में,

ब्रह्मज्ञान से हमें क्या लाभ होगा?

हमारे आत्मज्ञान से संसार का क्या भला होगा?

अपनी भलाई की बात तो समझ में आती है, लेकिन हम दूसरों की भलाई की बातें क्यों करते हैं? हम नहीं जानते कि दूसरों की भलाई किस में है, फिर भी हम दूसरे का भला करना चाहते हैं। हम नहीं जानते कि संसार की भलाई का क्या अर्थ है, फिर भी हम संसार का भला करना चाहते हैं।

संसार की भलाई की अकांक्षा बुरी नहीं है, लेकिन इस अकांक्षा के परिणाम बुरे होते हैं। जार्ज बुश भी दूसरों का भला करना चाहता  है, उसामा-बिन-लदीन भी दूसरों का भला करना चाहता है।

सब दूसरों का भला करना चाहते हैं किन्तु अपने ढंग से, अपने तरीके से, अपनी बुद्धि से, अपनी समझ से। इसीलिये संसार में लड़ाई होती है। हमारे भलाई करने का ढंग ही लड़ाई का कारण बन जाता है। यही हमारी समस्या है। हम दूसरों की भलाई करना तो चाहते हैं, पर कर नहीं पाते। हम जानते ही नहीं कि दूसरे की भलाई किस में है, और कैसे हो सकती है। हम तो यह भी नहीं जानते कि हमारी अपनी भलाई या बुराई किस में है।

किसी की भलाई या बुराई को कौन जान सकता है? इस सम्बन्ध में एक चीनी कथा है

एक किसान की घोड़ी गाँव से भाग कर पड़ोस के राज्य की सीमा के अन्दर गायब हो गई। गाँव के लोग खेद व्यक्त करने आये और  कहने लगे – “हाय! यह तो बड़ा बुरा हुआ! तुम्हारा कितना नुकसान हो गया! पर किसान बड़े शांत भाव से बोला – “कौन जाने, यह बुरा हुआ या भला!

कुछ दिनों के बाद वह घोड़ी वापस आ गई साथ में बढ़िया नस्ल का एक घोड़ा भी था। अड़ोस-पड़ोस के लोग उस किसान को बधाई देने लगे– “अरे, यह तो बहुत भला हुआ इतना शानदार घोड़ा मुफ्त में मिल गया!लेकिन किसान उदासीन भाव से कन्धे उचकाते हुए बोला – “कौन जाने, यह भला हुआ या बुरा!

घोड़ों की इस जोड़ी से कुछ और घोड़े पैदा हुए। समय गुजरता गया और वह किसान घोड़ों का एक बड़ा व्यापारी बन गया।

एक दिन उस का इकलौता बेटा अपने सबसे तेज घोड़े पर सवारी कर रहा था। अचानक घोड़े का पैर एक खड्ड में फिसला  और किसान का बेटा ऐसे गिरा कि उसके कूल्हे की हड्डी टूट गई। पास-पड़ोस के लोग फिर आये अफसोस करने – “हाय, हाय! कितना बुरा हुआ! यह लड़का अपाहिज हो गया! लेकिन किसान फिर भी शांत भाव से बोला – “कौन जाने, यह बुरा हुआ या भला!

अगले साल युद्ध छिड़ गया। उसके सारे घोड़ों पर सेना ने कब्जा कर लिया। सारे स्वस्थ युवकों को फौज में भर्ती कर लिया गया। करीब-करीब सारे लोग लड़ाई में मारे गये, लेकिन टूटी हड्डी के कारण किसान का बेटा बच गया।

 हम लोग तो अपनी भलाई के बारे में भी कुछ नहीं जानते, फिर भी संसार की भलाई की बातें करते हैं। पूछना तो हमें अपनी भलाई के बारे में चाहिए लेकिन हम संसार की भलाई के बारे में प्रश्न पूछते हैं।  हमें ऐसे प्रश्न उचित और तर्क-संगत लगते हैं।

लेकिन, आत्मज्ञान हो जाने के बाद ऐसे प्रश्नों का कोई औचित्य नहीं रह जाता। ब्रह्मज्ञानी ऐसे प्रश्न नहीं पूछता। ब्रह्मज्ञान के बाद तो उसकी दृष्टि बदल जाती है। फिर तो वह भी बृहदारण्यकोपनिषद के दृष्टा की तरह कहता है अहम्र ब्रह्म असमि। ब्रह्मज्ञानी तो जान लेता है कि वह ही ब्रह्म है। ब्रह्मज्ञानी जानता है कि यह संसार हमारे मन का प्रक्षेपण है, इसलिये वह संसार की बातें नहीं करता। हम जिस संसार की बात  करते हैं, ब्रह्मज्ञानी तो उसे अपने अन्दर ही देख लेता है। वह तो ब्रह्म के साथ एक होता है, ठीक वैसे, जैसे भृगुवल्ली कहती है

जो ब्रह्म के आनन्द-स्वरूप को जान लेता है, वह तो स्वयं ही ब्रह्म में स्थित हो जाता है।

ब्रह्मज्ञानी अपनी भलाई की बात करता है क्योंकि ब्रह्मज्ञानी का संसार उससे अलग नहीं होता।

हमारा आत्मज्ञान संसार पर एक नई रोशनी डालता है। जो अपने आप को देख लेता है, उसे अपने और संसार के बीच कोई अन्तर ही नजर नहीं आता।  फिर तो संसार की भलाई का अर्थ भी स्पष्ट हो जाता  है हमारी अपनी भलाई ही संसार की लाई है, हमारा अपना सुख ही संसार का सुख है। फिर सवाल किसी और का नहीं, हमारा अपना हो जाता है। जो जाग जाता है, उसका अपना सुख बड़ा महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

अपना सुख?

अपना भला?

यह कैसा ब्रह्मज्ञान है?

देखने में यह बात बड़ी अटपटी लगती है। इसीलिये हम दोनों से तरह-तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं

आप कैसी बातें करते हो?

क्या अपना सुख चाहना निरा स्वार्थ नहीं है?

इस स्वार्थपूर्ण और संकीर्ण लक्ष्य से किसी को क्या उपलब्द्धि हो सकती है?

अपना सुख ही क्यों? क्या भूखे पड़ौसी के प्रति हमारा कोई दायित्त्व नहीं है?

अपने सुख की कामना तो हमें दुष्टता और क्रूरता के मार्ग पर ले जायेगी! फिर आप इस प्रकार की शिक्षा क्यों देते हो?

जी हाँ, अपना सुख चाहना स्वार्थ है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन, ऊपर से तर्कपूर्ण दिखाई देने वाली बातों में सच्चाई नहीं है। सत्य कई भ्रान्तियों से ढँका हुआ है। इन भ्रान्तियों को विवेक से ही उघाड़ा जा सकता है।

सबसे पहले हम आपका ध्यान कुछ आधुनिक सर्वेक्षणों की ओर आकर्षित करते हैं। समाज-शास्त्रियों ने सुखी लोगों पर कई महत्त्वपूर्ण अध्ययन किये हैं। ये अध्ययन हमें बताते हैं कि सुखी व्यक्ति का सुख उस के साथ ही बंध कर नहीं रह जाता। उस का सुख तो सीमाएँ तोड़ कर बाहर निकलता है। मार्क ट्वेन कहते हैं कि दुख और पीड़ा को तो अकेले में भी सहा जा सकता है किन्तु सुख का भरपूर मजा तो किसी के साथ बाँट कर ही आता है।

सुख की कामना हमें रचनातमक कदम उखने के लिये प्रेरित करती है। सुख पाने की इच्छा हमें सुख को समझने में सहायता करती है। तभी हम जान पाते हैं कि शरीर से भी अधिक हमारे मन, हृदय और आत्मा को पीड़ा देने वाली भावनाओं से मुक्ति ही हमें सुख प्रदान करती है। हमारा अपना सुखी रहना संसार के लिये बड़ा उपयोगी है। आपके सुखी हो जाने से संसार का सुख बढ़ता है एक दुखी तो कम हुआ!

मन, हृदय और आत्मा को पीड़ा देने वाली भावनाओं से मुक्ति हमें सुख प्रदान करती है।

हाँ, तो समाज-शास्त्रियों के जाँच-परिणाम यह बताते हैं कि सुखी लोग मैत्री-पूर्ण होते हैं, मिलनसार होते हैं, समाज-प्रिय होते हैं। सुखी लोग रचनात्मक कार्यों में लीन होते हैं। सुखी लोग ही अधिक क्षमाशील होते हैं, अधिक स्नेह-पूर्ण होते हैं। सुखी लोग ही जीवन की कठिनाइयों के प्रति अधिक सहनशील होते हैं, अधिक धैर्यवान होते हैं।

सुखी व्यक्ति ही अपने पड़ोसी को भूखा नहीं देख सकता। जो स्वयं दुखी है, वह ही अपने भूखे पड़ोसी के प्रति उदासीन रह सकता है। कोई भी दुखी व्यक्ति दूसरों को सुख नहीं दे सकता। जो स्वयं सुखी है, वह ही दूसरों को सुख दे सकता है।

पश्चिम के समाज-शास्त्रियों द्वारा किये गये कई परीक्षण इस बात की भी पुष्टि करते हैं कि सुखी व्यक्ति में उन्मुक्तता होती है, निष्कपटता होती है, सद्भावना होती है। सुखी व्यक्ति उदार होते हैं, सुखी व्यक्ति ही दूसरों की सहायता करने के लिये तत्पर होते हैं।

इस बात को दूसरी तरह से भी देखा जा सकता है। जो उन्मुक्त है, वही सुख पाता है। जो निष्कपट है, उसे ही सुख मिलता है। जिसके हृदय में सद्भावना है, वही सुखी होता है और जो दूसरों की सहायता के लिये तत्पर है, वह ही सुखी रहता है।

जिसके हृदय में सद्भावना है वही सुखी होता है।

यह आवश्यक नहीं कि दूसरों का भला करने से ही कोई सुखी हो जाये, लेकिन जो सुखी है, वह दूसरों का भला ही करता है।

अभी हाल में हुए एक परीक्षण में एक बड़ी दिलचस्प बात सामने आई है। यह परीक्षण अटलाँटा की एमॉरी यूनिवर्सिटी के असोशियेट प्रोफेसर डॉ. ग्रेगरी बर्न्स की देख रेख में हुआ  है। डॉ. बर्न्स ने अपने जाँच-परिणाम के विवरण में लिखा है कि परोपकार की भावना हमारे मस्तिष्क की स्नायु-प्रणाली (Nervous System) से जुड़ी हुई है। परोपकार की यह वृत्ति जीव-वैज्ञानिक (biological) है। दूसरों की सहायता करना हमें अच्छा लगता है, और इसका पूर्वनिर्मित (built-in) प्रावधान हमारे मस्तिष्क की स्नायु-प्रणाली में मौजूद है।

दूसरों की सहायता करने में हमारा अपना सुख है।

जिस बात को उपनिषदों के दृष्टा सदियों से जान चुके हैं, उसे अब आधुनिक वैज्ञानिक भी समझने लगे हैं। हम सब जुड़े हुए हैं गहराई में जाकर हम सब एक हो जाते हैं। वे वेदान्त का अद्वैतवाद विज्ञान की कसौटी पर भी खरा उतरता है।

सुख को बाँट कर ही हम सुखी होते हैं।

अपने सुख को समझना हमारा कर्त्तव्य है। अपना भला करना हमारी जिम्मेवारी है। जो अपना भला जानता है, वही दूसरे का भला कर सकता है। जो अपना ही भला न कर सके, वह किसी और का क्या भला करेगा? देवता स्वयं सुख भोगता है, तभी तो वह इस स्थिति में होता है कि वह संसार को सुख दे सके।

और अपना भला करने के लिये यह आवश्यक है कि हम अपने आप को महत्त्वपूर्ण समझें। इसीलिये हमारा जागना जरूरी है। जागकर ही यह जाना जा सकता है कि हम कितने महत्त्वपूर्ण हैं। जागकर ही हम अपनी महिमा को देख सकते हैं, समझ सकते हैं। जाग कर ही हम देख सकते हैं कि हम ब्रह्म हैं।

जागने का उद्देश्य है अपनी महत्ता को समझना। जागने का तात्पर्य है अपनी सुरक्षा करना। जागने का अर्थ है अपने आप से प्रेम रना। हम अपने को सुरक्षित भी ब रख सकते हैं, जब हम अपने आप को चाहें, अपने आप से प्यार करें।

महात्मा बुद्ध कहते हैं

 

अत्तानं चे पियं अञ्ञआ रक्खेय्य तं सुरक्खितं।

यदि अपने आप को प्रिय समझें, तभी तो अपने को सुरक्षित रखें।

 

अपने आप को प्रिय जानने वाली बात बड़े काम की है। महात्मा बुद्ध के इस छोटे से सूत्र से हमारी बड़ी-बड़ी समस्याएँ हल हो सकती हैं।

आपको अपने आप से प्रेम करना है।

लेकिन हमें जो भी सिखाया जाता है, वह इसके बिल्कुल विपरीत होता है।  हमारे गुरु हमारे महात्मा हमारे बड़े-बूढ़े हम से कहते हैं अपना मत सोचो। दूसरों से प्रेम करो अपने माँ-बाप से, अपने बच्चों से, पड़ोसी के बच्चों से, परमात्मा से। सब आप को दूसरों से प्रेम करने की बात करते हैं, किन्तु कोई आप से यह नहीं कहता कि अपने आप से प्रेम करो। अपने आप के प्रेम को स्वार्थ कह कर तिरस्कृत किया जाता है।

यही सारे फिसाद की जड़ है।

सोचिये जरा! जिसने स्वयं को प्रेम नहीं किया, वह दूसरों को प्रेम कैसे कर सकता है? जिसके अपने जीवन में प्रेम की ज्योति नहीं जली, उस के प्रेम का प्रकाश दूसरों तक कैसे पहुँच सकता है? दूसरों को तो आप तभी प्रेम दे सकते हो, जब आप स्वयं प्रेम से भरे पड़े हों। अपने आप को प्रेम से भरोगे तभी तो दूसरे को प्रेम दे पाओगे। यही तो मजे की बात है जिसने अपने आप को प्रेम किया है, उसने दूसरों को भी प्रेम ही दिया है। और कुछ तो वह दे ही नहीं सकता। और कुछ तो होता ही नहीं उसके पास!

स्वयं प्रेम से भर कर ही हम प्रेम दे सकते हैं प्रेम का लेबल चिपका देने से नहीं। जी, मैं तो दूसरों से प्यार करता हूँ” – यह तो एक लेबल है। वास्तविक प्रेम हमारी भावना में होता है, हमारे कथन में नहीं।

उन्नसवीं शताब्दी में आयरलैण्ड के एक विख्यात लेखक थे ऑस्कर वाइल्ड। ऑस्कर जी लिखते हैं कि अपने आप को चाहने वाले का रोमांस जीवन-पर्यन्त चलता है। अपने आप को प्रेम करने में एक और व्यवहारिक बात छिपी हुई है जो अपने आप को चाहता है, उसका कोई प्रतिद्वन्द्वी ((rival) नहीं होता। जिस स्त्री (या पुरुष) को आप चाहते हैं उसको चाहने वाला कोई दूसरा भी हो सकता है। और तो और, दो भाइयों में भी होड़ हो सकती है कि माँ को अधिक चाहने वाला कौन है। लेकिन अपने आप को चाहने वाले को किसी के साथ प्रतिस्पर्द्धा नहीं करनी पड़ती। अपने आप को चाहने वाला पूरी तरह से प्रेम से भर सकता है।

अपने आप को प्रेम से भर कर ही हम दूसरों को प्रेम दे सकते हैं।

प्रेम से भर जाना और प्रेम से भरे रहना हमारी आवश्यकता है। अपनी इस आवश्यकता की पूर्त्ति करके ही हम दूसरों को प्रेम दे सकते हैं।

 

प्रेम हमें कई मार्गों से मिलता है

सब से पहले तो हमें परमात्मा से प्रेम मिलता है। जब हम माँ के गर्भ में होते हैं, तो परमात्मा ही हमारा एक मात्र अवलम्बन होता है। उसका प्रेम ही हमारी रक्षा करता है, उस का प्रेम ही हमें जीवन देता है।

जन्म के बाद हमारे प्रेम का प्याला भरते हैं हमारे माता-पिता। वे हमें प्रेम से पालते-पोसते हैं, पढ़ाते-लिखाते हैं। इतना ही नहीं, जब हम उदासी से घिरे होते हैं तो वे अपने प्रेम-भरे हाथों से हमें सहलाते हैं। जब हम निराशा में घिरे होते हैं, तो वे हमें अपने प्रेम से प्रोत्साहन देते हैं। जब हम बड़े हो जाते हैं, या जब हमारे माँ-बाप इस दुनिया में नहीं होते, तब भी हम कई ऐसे लोगों के सम्पर्क में आते हैं, जो हमें माँ-बाप जैसा प्यार देने को तत्पर होते हैं। हमारा कर्त्तव्य है कि ऐसे लोगों का हम सत्कार करें, उन्हें अपने जीवन का अंग बना कर रखें।

माता-पिता के बाद हमारे प्रेम का प्याला भरते हैं हमारे भाई-बहिन, हमारे सगे-सम्बन्धी और हमारे मित्र-गण। इनसे हमें  न केवल प्रेम मिलता है, बल्कि इनका साथ हमें आमोद-प्रमोद भी प्रदान करता है।

इस के बाद यह प्याला भरता है स्त्री-परुष के उस अन्तरंग प्रेम से जिस की विस्तृत चर्चा हम पहले कर चुके हैं।

जो प्रेम हम लेते हैं, उसे प्याले में भरना तो पड़ता ही है, लेकिन भर कर उसे रखा नहीं जा सकता। रख देने से प्याले का बन्द प्रेम विकृत हो जाता है, स्वादहीन हो जाता है। प्रेम के रस का आनन्द तो तभी मिलता है, जब यह रस ताजा हो। इसलिये प्रेम का प्याला न केवल भरा होना चाहिए, बल्कि उसे हर दम ताजा भी होना चाहिए। ताजगी बनाये रखने के लिये प्रेम के प्याले को उड़ेलना पड़ता है, और उसे फिर से भरना पड़ता है। इसीलिये प्रेम लेने की और प्रेम देने की क्रिया साथ-साथ चलनी चाहिए। स्वच्छ और ताजी हवा चाहिए तो कमरे में क्रास-वेंटिलेशन होना चाहिए। हवा आने के लिये भी खिड़की खुली रखो हवा जाने के लिए भी । इसी तरह एक तरफ से प्रेम लो और दूसरी तरफ से प्रेम बाँटो। प्रेम देना उतना ही आवश्यक है जितना कि प्रेम लेना।

   अभी तक हमने प्याला भरने के लिये प्रेम लेने की ही चर्चा की है, अब हम प्रेम देने के मार्गों की चर्चा करते हैं। प्रेम देने का पहला मार्ग है हमारी अपनी सन्तान। जब हमारी अपनी सन्तान न हो तो किसी और को गोद लिया जा सकता है। जो हमारे ऊपर आश्रित होता है उसे बिना किसी शर्त के प्रेम देना  हमें तृप्ति देता है। हमारे माँ-बाप ने हमारे लिये जो किया है वह तो हम उन्हें कभी चुका नहीं सकते, इसलिये उनके ऋण से उऋण होने का जो प्रावधान है, वह है अपने बच्चों को पूरी जिम्मेवारी के साथ पाल-पोस कर बड़ा करना, उन्हें उपयुक्त शिक्षा देना, ताकि वे अपना जीवन सुचारू रूप से चला सकें। अपनी सन्तान को देना हमारी पहली जिम्मेवारी है।

जब हमारे बच्चे बड़े हो जाते हैं, या जब हमारे पास परमात्मा का दिया हुआ बहुत होता है, तो उसका कुछ अंश हमें समाज को भी देना चाहिए। आज हम जिस योग्य हैं, उसका श्रेय हमारे समाज को भी जाता है। हम अपना धन, अपना समय उन संस्थाओं को दे सकते हैं, जो किसी महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों से जुड़ी हुई हैं। जो लोग हम से कम भाग्यशाली हैं, उन्हें देने से हम सुख पाते हैं। चाहे किसी गरीब को खाना मिल जाये, चाहे किसी विद्यार्थी को छात्र-वृत्ति मिल जाये, आप के द्वारा दिया गया प्रेम आप को पूर्णता की ओर ले जाता है।

समाज को देने के बाद सारे विश्व को देने की बारी आती है। वास्तव में यह विश्व तो समाज का ही विस्तार है। विश्व को देने का अर्थ है अपनी दृष्टि की संकीर्णता से बाहर निकलना। फिर हमारा प्रेम उन लोगों तक भी पहुँचता है, जो हमारी जाति के बाहर हैं, हमारे धर्म-सम्प्रदाय के बाहर हैं, हमारी संस्कृति के बाहर हैं। विश्व को देने का अर्थ है कि जिन की परम्पराएँ हमारी परम्पराओं से भिन्न हैं, हम उन का भी आदर करते हैं। तब हम कह सकते हैं कि हम ने जो पाया है, उसे हम सारे विश्व के साथ बाँटने को तैयार हैं।

यदि आप प्रेम से भरे पड़े हो, तो फिर प्रेम देने के लिये कोई विशेष प्रयत्न  नहीं करना पड़ता वह तो अपने आप ही बहते हुए चला जाता है। फिर तो वह माता-पिता की ओर भी बहता है, बच्चों की ओर भी। फिर तो आप का प्रेम पड़ोसी की ओर भी बहता है, रिश्तेदार की ओर भी। फिर तो वह मित्र की ओर भी बहता है, शत्रु की ओर भी। लबालब भरे प्याले से छलका प्रेम  तो बह कर कहीं भी जा सकता है। प्रेम देने के लिये अपना प्याला भरा होना चाहिए।

लेकिन क्या दूसरे लोग हमारे प्रेम प्याले को हमेशा भरते रहेंगे? क्या दूसरे लोग हमारे प्याले को हमेशा भरा रखने में सक्षम हैं?

नहीं! हमारे जीवन में ऐसा समय आता है, जब हमारे माता-पिता दुनिया में नहीं होते, हमारे सगे-सम्बन्धी हम से दूर होते हैं। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब दूसरे लोग हमारे प्रेम-प्याले को भरने में असमर्थ होते हैं। हम अपनी इतनी बड़ी आवश्यकता के लिये दूसरों पर निर्भर नहीं रह सकते। लेकिन, हमें निराश होने की जरूरत नहीं है हम स्वयं भी अपने प्याले को प्रेम से भरा रख सकते हैं।

वह कैसे?

हम सब के पास एक ऐसा स्त्रोत है जहाँ से सतत् रूप से प्रेम की धारा बहती चली आ रही है। वह स्त्रोत है

परमात्मा!

ब्रह्म!

यह सारा अस्तित्त्व!

क्या आप जानते हैं कि यह सारा अस्तित्त्व आप को प्रेम देने के लिये उत्सुक बैठा है?

क्या आप जानते हैं कि हमारे पास एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा हम हर समय अपने प्याले को प्रेम से भरा रख सकते हैं?

जिस विधि से हम परमात्मा के प्रेम की धारा को मोडकर अपने प्याले में ला सकते हैं, उस विधि का नाम है

ध्यान!

मनन!

मेडीटेशन!

 ध्यान परमात्मा (ब्रह्म) के साथ हमारे संयोजन (connection) को मजबूत और टिकाऊ बनाने की प्रभावशाली (effective) विधि है। ब्रह्म के साथ जुड़कर हम उस के प्रेम की अनन्त ऊर्जा के साथ जुड़ जाते हैं। फिर हमारी सारी आवश्यकता उस कभी न खत्म होने वाले स्त्रत से पूरी होती है। जिस प्रकार दीवार पर लगे बिजली के प्वाइंट में प्लग लगा देने (जोड़ने) से विद्युत का प्रवाह होने लगता है, इसी प्रकार ध्यान लगाने से परमात्मा की ऊर्जा आप में प्रवाहित होने लगती है। अस्तित्त्व  की ऊर्जा को आप के अन्दर लाने की तारें तो पहले से बिछी हुई हैं, आपको तो केवल स्विच ऑन करना है। ध्यान की प्रक्रिया इस स्विच को ऑन करने की प्रक्रिया है।

ध्यान (meditation ) से परमात्मा के साथ हमारा संयोजन ( connection) मजबूत होता है।

 

ध्यान करना कोई कठिन काम नहीं है आप भी कर सकते हैं। ध्यान करने के लिये आप एक कमरे में कमर सीधी रख कर बैठ जायें। फिर अपने हाथों को थोड़ा सा ऊपर उठावें, अपनी हथेलियों और उँगलियों को खोल कर, आँखें बन्द कर लेवें। गहरी साँसें लें और धीरे-धीरे छोड़ें। किसी एक शब्द या शब्दावली (उदाहरणतः शिव, राम, कृष्ण, जय माता दी) को दस बार बोल कर उच्चारण करें। फिर आँखें बन्द रखे, उसी शब्द का पंद्रह मिनट तक मन में उच्चारण करते रहें। शुरू-शरू में मन भटकेगा, इधर-उधर के विचार आयेंगे, लेकिन चिन्ता की कोई बात नहीं। जब भी ऐसा होने लगे, आप फिर से अपने मन में उस शब्द का उच्चारण शुरू कर देंवें। इस के बाद क्या होता है, इस की चिन्ता मत कीजिये। किसी विशिष्ट अनुभूति की अपेक्षा मत रखिये जो कुछ होगा, अपने आप होगा। ध्यान  में होने वाले अनुभव सब के लिये अलग होते हैं। दूसरों के अनुभव आपके लिये बेकार हैं। दूसरों के दावे आप के लिये किसी काम के नहीं आप का अपना अनुभव ही महत्त्वपूर्ण होता है।

ध्यान का सम्बन्ध मन को वश में करने से है। मन को वश में करने का अर्थ है मन को स्थिर करना, हमारे विचारों की निरन्तर शृंखला का रुक जाना। मन की स्थिरता ही हमें परमात्मा के साथ जोड़ती है।

लेकिन मात्र  हमारे चाहने से मन हमारे वश में नहीं हो जाता। सीधे-सीधे मन को वश में करने की कोशिश में हम सफल नहीं हो सकते। सीधे-सीधे मन को विनियमित करना (regulate) बड़ा मुश्किल काम है। मन तो एक अड़ियल टट्टू के समान है उस पर आप जितना नियंत्रण करोगे, उतना ही वह आप के हाथ से बाहर जायेगा। लेकिन जहाँ सीधी उँगली से घी नहीं निकलता, वहाँ उँगली टेढ़ी करने में नहीं झिझकना चाहिए। मन के विनियमन के लिये भी टेढ़ी उँगली का सहारा लेना पड़ता है।

मन के विनियमन के लिये हमं जरूरत पड़ती है, श्वासों के विनियमन की। ध्यान की प्रारंभिक प्रक्रिया अपने श्वास-प्रश्वास की क्रिया को देखने से ही शुरू हो सकती है। जब भी ध्यान लगाना चाहो, अपनी साँसों का निरीक्षण शुरू कर दीजिये। देखिये साँस अन्दर आ रही है! साँस बाहर जा रही है! श्वासों के अवलोकन से ही श्वासों का विनियमन शुरू हो जाता है। श्वासों का विनियमन ही मन का विनियमन बन जाता है। प्राणायाम की प्रक्रिया ही ध्यान की प्रक्रिया बन जाती है। कितने आश्चर्य की बात है! श्वासों के माध्यम से हम मन को वश में कर लेते हैं।

श्वास-प्रश्वास की क्रिया हमारे जीवन का मूल है। श्वास-प्रश्वास की क्रिया सर्वत्र हो रही है, प्रतिपल हो रही है, निरन्तर रूप से हो रही है। श्वास-प्रश्वास की क्रिया हमारे अस्तित्त्व का अभिन्न अंग है। इस क्रिया में हमारे प्राण हैं... नहीं! यह क्रिया ही हमारे प्राण हैं। आप को याद होगा, भृगु जी ने प्राण को ब्रह्म कहा था। प्राण ब्रह्म से ही आता है। प्रकृति रूपी माया से उतपन्न प्राण हमेशा गत्यात्मक रहता है। यद्यपि स्थूल रूप से हम श्वास-प्रश्वास में वायु को ही प्राण कह देते हैं, परन्तु प्राण वास्तव में ब्रह्म की ऊर्जा है। प्राण की अदृश्य शक्ति से ही सम्पूर्ण विश्व का संचालन हो रहा है। हमारा शरीर प्राण की ऊर्जा से ही क्रियाशील होता है। प्राण शरीर के रोम-रोम में व्याप्त है। अन्नमय कोष हमारा शरीर है पर वह चलता है प्राणमय कोष की अदृश्य शक्ति से। आहार के बिना व्यक्ति वर्षों तक भी जीवित रह सकता है, किन्तु प्राण तत्त्व के बिना कुछ पलों में ही जीवन समाप्त हो जाता है। प्राण-शक्ति ही हमारे जीवन की शक्ति है। जब हम श्वासों पर ध्यान देते हैं तो हमारे प्राणों का पुनः परिचय होता है हमारे शरीर से, हमारे मन से, हमारी बुद्धि से, हमारी आत्मा से। इन का मिलाप होता है एक ऐसे नये स्तर (level) पर जहाँ ये सब एक दूसरे के मित्र बन जाते हैं।

पहले इनमें संघर्ष होता था, विरोध होता था, क्योंकि शरीर भोग चाहता था, आत्मा प्रेम चाहती थी, मन की कामनाएँ बेलगाम होतीं थी, बुद्धि अनिष्ट का होना देखती थी। सब की आवश्यकताएँ अलग-अलग थीं, इस कारण सब में कलह होती थी। मन, बुद्धि, शरीर और आत्मा का संघर्ष ही हमारे तनाव का कारण होता है। ध्यान इन सब में सामंजस्य पैदा करता है, इन में समायोजन (co-ordination) लाता है। फिर ये सब तुष्ट हो जाते हैं एक दूसरे के सहयोगी बन जाते हैं। उन के इस समायोजन से परमात्मा की ऊर्जा का अवतरण होता है, संचार होता है।

ध्यान आपके आन्तरिक तनावों को दूर करता है। 

इसीलिये ध्यान लगाने से आप शांत होते हो, तनाव-रहित होते हो, अपने आप को हल्का महसूस करते हो। कुछ दिन के ध्यान के बाद आप हर्ष-विभोर होने लगते हो। धीरे धीरे आप यह भी जानने लगते हो कि आप अकेले नहीं हैं यह पूरा अस्तित्त्व आप के साथ है। धीरे-धीरे आप को भी यह विश्वास होने लगता है कि यह ब्रह्म आप को अपनी शक्ति देने के लिये तैयार बैठा है। राम इस बात को जानते थे, इसीलिये वे (शिवजी का) ध्यान लगाते थे। शिवजी इस बात को जानते थे इसीलिये वे भी (राम का) ध्यान लगाते  थे।

जब आप कार चलाते हैं तो उसे धक्के नहीं देते आप की कार इंजन की शक्ति से चलती है। आपका काम होता है स्टियरिंग व्हील संभाले मार्ग और दिशा का निर्धारण करना। इसी प्रकार जब आप परमात्मा की शक्ति के साथ जुड़ जाते हैं तो आप की जिन्दगी को धक्कों की जरूरत नहीं रह जाती आप का जीवन तो उस की शक्ति से चलता है। फिर आप यह बात अच्छी तरह से समझ जाते हैं कि हमारे जीवन की गाड़ी को चलाने के लिये परमात्मा हमारा साझेदार है। हाँ, इस साझेदारी का एक नियम है जो काम आप कर सकते हैं, वह काम आप के लिये परमात्मा नहीं करेगा। अपने जीवन को दिशा देना आपका काम है।

एक समय था जब परमात्मा के बारे में कुछ भी सोचना दुश्वार था। सामान्य लोगों के लिये सारे अस्तित्त्व (ब्रह्म) की परिकल्पना असम्भव थी। परमात्मा के सम्बन्ध में कुछ भी विचार करना बड़ा ही विशिष्ट काम था। ऐसी मान्यता थी कि जो लोग परमात्मा के बारे में थोड़ा सा भी विचार करना चाहें, उन्हें घर-बार छोड़ कर जंगल में जाकर एकान्त में रहना चाहिए। घर-गृहस्थी की जिम्मेवारी निभाने वाले को यह काम असम्भव लगता था। इसी काम के लिये ऋषियों का प्रादुर्भाव हुआ, तपस्वियों की आवश्यकता पड़ी, महात्माओं का वर्ग बना। इन का एक मात्र काम था परमात्मा की परिधारणा को समझना और समझाना। यही उन की तपस्या थी।

फिर उन की घोर तपस्या का फल आने वाली पीढ़ियों को मिलने लगा। चेतना का विकास हुआ, विस्तार हुआ। ऋषियों और तपस्वियों का बोध सारी मानवता का बोध बनता गया उनकी चेतना सारी मानवता की चेतना बनती गई।

अब समय बदल चुका है। पहले कुछ इने-गिने लोग ही ध्यान से लाभान्वित होते थे। अब ध्यान का लाभ हम सब को मिल सकता है। पहले सालों-साल गुरु की प्रतीक्षा में ही निकल जाते थे। आज हम जान गये हैं कि ध्यान लगाना उतना कठिन नहीं है जितना पहले माना जाता था। आज ध्यान से मिलने वाली ऊर्जा का अनुभव हर कोई कर सकता है। हर आदमी ध्यान से शांति पा सकता है, हर व्यक्ति अपने तनावों से मुक्त हो सकता है। आप अपने काम के बाद घर आकर केवल पन्द्रह मिनट का ध्यान लगाइये सारे दिन की थकावट उतर जायेगी। ध्यान से मिलने वाली ऊर्जा आपको तुरन्त ही तरोताजा कर देती है।

ध्यान से मिलने वाली ऊर्जा आपको प्रफुल्लित करती है।

हाँ, तो बात हो रही थी अपने आप से प्रेम करने की।

ब्रह्मज्ञान का पहला मंत्र है अपने को प्रेम करो, क्योंकि आप ही ब्रह्म हैं। आत्मज्ञान का पहला सूत्र है स्वार्थ को अपनाओ, तभी आत्मा को उपलब्ध होगे। स्वार्थ का मतलब है स्वयं का अर्थ। जो स्वयं के अर्थ में लीन हो जाता है, वह दूसरों को हानि नहीं पहुँचा सकता। जो स्वार्थ को जान लेता है, वह ही परमार्थ को जान पाता है। जो स्वयं को जान लेता है, वह ही यह जान पाता हे कि दूसरा कोई और नहीं, वह ही है। फिर तो वह यह भी जान जाता है कि स्वार्थ परार्थ से अलग नहीं है, क्योंकि स्वार्थ की भूमि में ही परार्थ के पेड़ उगते हैं। ब्रह्मज्ञानी स्वार्थ की भूमि को सींचता है, क्योंकि इसी भूमि से प्रेम के फूल खिलते हैं। इस भूमि को आप जितना सींचोगे, उतने ही अधिक फूल खिलेंगे। फिर क्या होगा? फिर तो आप के पास फूल ही फूल होंगे प्रेम ही प्रेम होगा। फिर तो आप सब को प्रेम ही देते जाओगे बच्चों को भी, माँ-बाप को भी, पड़ोसी को भी।

यदि प्रेम से भरे पड़े होगे तो आप को प्रेम बाँटना ही होगा। बाँटोगे नहीं तो बोझ बन जायेगा। जिस प्रकार मेघ बरस कर स्वयं ही हल्के होते हैं, इसी प्रकार प्रेम के फूल बाँट कर हम स्वयं ही सुखी होते हैं। ब्रह्मज्ञानी यह बात जानता है कि देकर वह किसी पर अहसान नहीं करता। वह जानता हे कि देना त्याग नहीं है, यह तो उसकी अपनी आवश्यकता है। ब्रह्मज्ञानी का अपना सुख ही संसार का सुख बन जाता है।

लेकिन हम लोग अपने आप को प्रेम नहीं करते। हम तो अपने आप को तनावों (स्तरेस्स्) से भर देते हैं। जब हम स्वयं तनाव-ग्रस्त होते हैं तो दूसरों को भी तनाव ही देते हैं। अपने तनाव दूर करोगे, तो दूसरों को तनाव नहीं दे पाओगे। अपने को सुख से भर दोगे तो दूसरों को दुख नहीं दे पाओगे।

लेकिन, हम अपने को प्यार नहीं करते। इसीलिये सब अपने आप से दुखी हैं। सब अपने आप से परेशान हैं। सब अपने आप से छुटकारा पाना चाहते हैं। तभी तो कोई बोतल का सहारा लेता है, तो कोई घर छोड़कर भाग जाता है। तभी तो कोई जंगल में कुटिया बना कर बैठ जाता है, तो कोई हिमालय की गुफा में छिप जाता है। हमारे अधिकांश साधु-महात्मा इस पलायन की ही पैदावार हैं।

देवता पलायन नहीं करते। वे अपने ज्ञान के साथ यात्रा करते हैं आनन्द तक पहुँचने की। वे स्वयं को सुख से भरते हैं, अपने लिये स्वर्ग का निर्माण करते हैं। तभी तो वे सुख बाँटते हैं, समृद्धि बाँटते हैं। इनके पास देने के लिये और कुछ तो होता ही नहीं।

आत्मज्ञान से मिलने वाली दृष्टि एक और काम करती है। उस दृष्टि से हम यह भी देख लेते हैं कि सुख कहीं बाहर से नहीं आता सुख तो हमारे भीतर है। हम विशुद्ध निर्मल सुख से ही निर्मित हैं हम स्वयं ही सुख हैं। हमारा होना ही सुख है।

तुलसीदास की इस चौपाई को आप पहले भी प चुके हैं

ईश्वर अंस जीव अविनासी।

चेतन अमल सहज सुख रासी।।

 

जी हाँ, आप नश्वर नहीं हैं आप अविनाशी हैं। आप निर्मल हैं, निर्दोष हैं। आप अपार सुख का भण्डार हैं।

आपका प्रेम सारे संसार को सुख से भर देता है।



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