अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
09.07.2008
 
१८ विश्वास
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

जीवन को चलायमान करने की वास्तविक शक्ति आपका विश्वास है।

टाल्स्टाय

  

 

 अपने आप को कैसे पूजा जाता है?

अपनी पूजा का क्या अर्थ है?

 

अपनी पूजा का अर्थ जानने के पहले यह जानना होगा कि परमात्मा की पूजा का क्या अर्थ है।

क्या हम सचमुच परमात्मा की पूजा करते हैं? क्या हमारी पूजा वास्तव में परमात्मा की पूजा होती है? क्या कभी हम से परमात्मा की पूजा हो भी सकती है?

नहीं!

हम कहते अवश्य हैं कि हम ईश्वर की पूजा करते हैं, लेकिन ऐसा होता नहीं है। ऐसा हो ही नहीं सकता। हम से होने वाली पूजा हमारी ही होगी ईश्वर की नहीं। हमारी पूजा में हमारे ही गुण-धर्म (characteristics) होंगे। हमारी पूजा में हमारी ही धारणाएँ होंगी, हमारी ही दृष्टि होगी, हमारा ही दृश्य होगा। स्वयं से हट कर तो कुछ भी नहीं किया जा सकता। अपने को हटा कर तो हम पूजा कर ही नहीं सकते। पूजा तो हम अपनी ही करते हैं ईश्वर का तो नाम होता है।

पूजा तो हम अपनी ही करते हैं ईश्वर का तो नाम होता है।

परमात्मा की पूजा के नाम पर तो हम अपनी नासमझी का प्रदर्शन करते आये हैं। परमात्मा की पूजा के नाम पर तो हम परमात्मा की हँसी उड़ाते हैं। देखिय जरा!

हम हाथ जोड़कर कहते हैं

तू महान है!

सोचिये! हम किससे कह रहे हैं? क्यों  कह रहे हैं?

क्या वह यह बात नहीं जानता? हमें उसे बताने की जरूरत क्यों पड़ती है? फिर एक बार नहीं, हम उसे प्रति दिन याद दिलाते हैं कि वह महान है। क्या परमात्मा को भूल जाने की बीमारी है?

यह परमात्मा की पूजा नहीं है। यह तो हमारी अपनी जरूरत है। हम अपनी जरूरत के लिये ही ये सब करते हैं। इसीलिये हमारी पूजा को स्तुति कहा जाता है। स्तुति का अर्थ है प्रशंसा करना, तारीफ करना बड़ाई करना, मक्खन लगाना। परमात्मा की स्तुति का एक मात्र उद्देश्य होता है कि वह हम से प्रस! रहे, ताकि हम उस से अपना काम करवा सकें। हमारा उद्देश्य पूजा का नहीं होता, हम तो उस से अपना मतलब निकलवाना चाहते हैं।

फिर हम यहीं पर ही नहीं रुकते हम आगे बते हैं। हम कहते हैं

तू सर्वज्ञ है! तू अन्तर्यामी है!

जब वह सर्वज्ञ है तो फिर वह यह भी जानता होगा कि वह सर्वज्ञ है। हमें बताने की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या हम उस से अधिक जानते हैं?

नहीं!

हमारे कहने का अर्थ होता है कि जब तू सब जानता है तो फिर मेरे मन की इच्छा भी जान ले! मैं क्या चाहता हूँ, जरा उसे भी तो जान के दिखा!

हम परमात्मा की पूजा नहीं करते। हम तो परमात्मा से अपनी पूजा करवाना चाहते हैं। हम कहते कुछ हैं, चाहते कुछ और हैं हमारी मंशा तो कुछ और ही होती है। और यह मन्शा तब सामने आती है, जब हम कहते हैं

तू सर्वशक्तिमान है!

क्योंकि हमारे कहने का अर्थ होता है तेरे पास इतनी शक्ति है, मेरी एक इच्छा पूरी नहीं कर सकता क्या?

अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैंड़ में एक महान लेखक और कवि हुए हैं सेमुअल जॉ्सन। मिस्टर जॉ्सन कहते हैं

भाषा विचार के वस्त्र हैं। महत्व भाषा का नहीं है, उस भाषा से ढके हुए विचार का है।

परमात्मा के प्रति कही गई हमारी भाषा कुछ और होती है, उसके अन्दर लिपटा हुआ विचार कुछ और होता है। हम कहते कुछ हैं, पर चाहते कुछ और हैं।

पूजा के नाम पर हम शिकायत करते हैं। हमारे लच्छेदार शब्दों में शिकायत ही भरी होती है सजी-सँवरी भाषा में हमारी कामना ही लिपटी होती है। पूजा के नाम पर हम चाहते हैं कि परमात्मा हमारा काम कर दे। हम परमात्मा को अपना सेवक बनाना चाहते हैं।

परमात्मा की पूजा हमारी चालाकी है!

परमात्मा की पूजा हमारी  होशियारी है!

फिर हम कहते हैं 

तुम हमारे अवगुण पर ध्यान मत देना। तुम हमारी गल्तियों को माफ कर देना।

पूजा के नाम पर हम परमात्मा को आदेश देते हैं। पूजा के नाम पर हम उसे बताते हैं कि उसे क्या करना चाहिए।

लेकिन हमें इतने से ही तसल्ली नहीं होती। हम आगे बढते हैं

तू हमारे पापों को हरने वाला है!

क्या हम जानते हैं कि हम कह क्या रहे हैं? हम सीधे-सीधे यह कह रहे हैं कि हमारे पापों को धोना तुम्हारा काम है। जब तक धोने वाला बैठा है, हमें पाप करने में क्या आपत्ति हो सकती है?

हम चाहते हैं कि मैला तो हम करें पर सफाई करे परमात्मा।

यह कैसी पूजा है?

फिर हम कहते हैं

तू पतित-पावन है!

वास्तव में तो हम कह रहे हैं कि जब तक तू है, हमें पतित रहने में कोई संकोच नहीं है हम पतित नहीं होंगे तो तुम्हें पतित-पावन कौन कहेगा?

ऐसी करते हैं हम परमात्मा की पूजा!

अद्वैतवाद कहता है

बहुत कर चुके परमात्मा की पूजा! कितनी पूजा और करोगे? कब समझोगे?

परमात्मा की पूजा के नाम पर हम अपना पतन करते आ रहे हैं। हमें इस पतन को रोकना है इसलिये हमें अपनी पूजा करनी है।

अपनी पूजा का अर्थ है

किसी का गुणगान मत करो। अपना काम आप करो।

अपनी पूजा का अर्थ है

परमात्मा को अपना सेवक मत बनाओ।

अपनी पूजा का अर्थ है

पाप धोने की बात मत करो, पाप न करने की बात करो।

अपनी पूजा करने का अर्थ है

पतित पावन को मत खोजो, पतित न होने का उपाय खोजो।

जो अपनी जिम्मेवारी निभाने के लिए तत्पर है, वह पाप तो कर ही नहीं सकता। और जिसे दूसरों को दोष देने की आदत है वह पाप से मुक्त नहीं हो सकता। मुक्ति का तो एक ही रास्ता है जब कभी भूल करें, उसे स्वीकार करें। भूल के सुधार का पहला चरण है अपने उत्तरदायित्व का स्वीकार। उत्तरदायित्व की भावना में विश्वास की भावना होती है।

आत्म-निर्भरता और आत्म-विश्वास साथ-साथ रहते हैं।

अपनी पूजा का अर्थ है अपने आप में विश्वास। आप की सच्ची पूजा आपके विश्वास में है।

सन १९५० के दशक की बात है। यह सच्ची कहानी अमरीका के एक मेडिकल जर्नल में छपी थी जिसे विख्यात लेखक डॉ. दीपक चोपड़ा ने अपनी एक पुस्तक में भी उद्धृत किया है। यह हिन्दी अनुवाद इसी कहानी पर आधारित है

कैंसर का एक मरीज अस्पताल में भर्ती था। उस की कई ग्रंथियों (lymph nodes) में  भी प्राणघातक सूजन आ गई थी जिस के कारण उसका पूरा शरीर विकृत हो चुका था।

उन दिनों कीमो-थेरेपी का इतना विकास नहीं हुआ था जितना कि आज है। मस्टर्ड गैस (mustard gas) के द्वारा की जाने वाली कीमो-थेरेपी बड़े ही अपरिष्कृत(crude) ढंग की होती थी। बहुत सारे मरीज तो इस कीमो-थेरेपी से ही मर जाते थे (या अधमरे तो हो ही जाते थे)। इसलिये कैंसर के इलाज के लिये जब क्रिबियोजन (Krebiozen) नाम की एक नई दवा निकली तो चिकित्सा जगत में तहलका मच गया। क्या डाक्टर, क्या मरीज, सब की आशाएँ क्रिबियोज़न पर टिक गईं।

अस्पताल में भर्ती उस मरीज ने अपने डाक्टर से कहा, “मुझे भी क्रिबियोज़न का इंजेक्शन लगा दो, डाक्टर साहब!लेकिन डाक्टर नहीं चाहता था कि इतनी बेशकीमती दवाई एक ऐसे मरीज पर बर्बाद की  जाये जिसकी जीवन-लीला दो-चार दिन में समाप्त होने वाली है। डाक्टर यह बात भी अच्छी तरह जानता था कि क्रिबियोज्न के एक इंजेक्शन से कुछ नहीं होने वाला। फिर भी मरीज के प्रति हमदर्दी के नाते उसने क्रिबियोज़न का एक इंजेक्शन उसे लगा ही दिया। वह शुक्रवार का दिन था। डाक्टर का ख्याल था कि सोमवार को जब वह अस्पताल आयेगा तो  वह मरीज तब तक चल बसा होगा।

लेकिन सोमवार तक तो चमत्कार हो चुका था। डाक्टर जब अस्पताल आया तो उसने देखा कि मरीज बड़ा ही प्रफ-ल्लित है। चैकुअप से मालूम हुआ कि वह मरीज पूरी तरह से भला-चंगा हो गया है और कैंसर का कहीं नामोनिशान भी नहीं है। डाक्टर एकदम हक्का-बक्का रह गया उसे कुछ समझ में ही नहीं आया कि यह सब क्या हो गया! कैसे  हो गया? चूँकि वह मरीज अब पूरी तरह से ठीक हो गया था, इसलिये डाक्टर ने उसे अस्पताल से छु्टी दे दी।

लेकिन, यह कहानी यहीं पर खत्म नहीं होती आगे जाकर और भी विलक्षण रूप लेती है।

कुछ समय गुजर गया। एक दिन उस मरीज ने अखबार में पढा कि क्रिबियोजन के परीक्षण असफल हो गये हैं और यह दवाई कैंसर के इलाज के लिये उपयोगी नहीं सिद्ध हुई।

फिर क्या था? कुछ दिन के बाद वह मरीज फिर अस्पताल आ पहुँचा कैंसर की उसी गंभीर और मरणास! (terminal) स्थिति में। अब तो डाक्टर के पास उसे देने के लिये कोई दवाई भी नहीं थी क्रिबियोज़न तो बेकार साबित हो चुकी थी। पर, डाक्टर ने हिम्मत करके एक बड़े झूठ का सहारा लिया। उसने मरीज से कहा, “देखो, चिन्ता करने की कोई बात नहीं है। अब बाजार में नई और परिष्कृत (new & improved) क्रिबियोज़न आ गई है, कल से तुम्हें इस नई दवाई के इंजेक्शन दिये जायेंगे।पर वास्तव में उसे नमकीन पानी (saline water) के ही इंजेक्शन दिये जाते रहे। कुछ दिनों बाद वह मरीज दोबारा ठीक हो गया और उसे फिर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

कुछ दिन गुजर गये। एक दिन फिर उसने अखबार में पढ़ा — “क्रिबियोज़न से सारी आशाएँ समाप्त हो चुकी हैं। इस दवाई में कैंसर ठीक करने की कोई क्षमता नहीं है। अब क्रिबियोज़न की शोध-परियोजना को बन्द कर दिया गया है।

इस खबर को पने के बाद तीसरी बार फिर उस की ग्रंथियों में प्राणघातक सूजन हुई और शीघ्र ही उस की मृत्यु हो गई।

बेशक, विश्वास का यह प्रकरण बड़ा असाधारण है, लेकिन एक बात निश्चित है जीवन में हमारे अपने विश्वास की बहुत बड़ी भूमिका है। हमारे विश्वास में बहुत बड़ी शक्ति है। विश्वास की इस शक्ति के प्रति उदासीन नहीं रहा जा सकता।

चलिए, अब हम साधारण लोगों के दैनिक जीवन में काम  आने वाले विश्वास की बात करते हैं

बहुत पुरानी बात है। हमारे एक मित्र थे श्री दयानन्द जी पाठक। अमेरीका में डिट्रोयट नामक शहर में बसे थे। हम लोग टोरोंटो में रहते थे, केनेड़ा में। लेकिन हम लोगों का आना जाना, मिलना-जुलना बना रहता था। केनेड़ा और अमेरीका दो अलग-अलग देश अवश्य हैं, किन्तु इन दोनों देशों में बसे हुए लोगों को सीमा पार आने-जाने में कोई दिक्कत नहीं होती थी।  कभी हम दयानन्द जी पाठक के पास जाया करते थे, कभी वे अपने परिवार सहित हमारे पास आ जाया करते थे।

दयानन्द जी हिन्दू धर्म के बड़े अच्छे प्रचारक थे। किसी धार्मिक संस्था से जुड़े हुए तो नहीं थे, परन्तु हिन्दू होने में और भारतीय होने में उनको बड़ा गर्व था। परमात्मा में उन की बड़ी आस्था थी। परमात्मा की चर्चा उनके घर में हुआ करती थी। कुछ अमरीकन गोरे भी उन के परिचित थे और कभी-कभी वे लोग भी पाठक साहब का प्रवचन सुनते थे और थोड़ा बहुत विचार-विमर्श भी करते थे, धर्मों के बारे में।

अधिकांश अमेरिकन और केनेडियन लोग बड़े सभ्य, सुशील और नम्र होते हैं। वे लोग भी पाठक साहब की बात बड़े ध्यान से सुनते थे, समझते थे। हाँ, कभी-कभी कुछ टेढ़े-मेढ़े लोगों से भी उनका पाला पड़ जाता था।

एक बार हम दोनों पाठक साहब के घर में बैठे हुए थे। एक अमेरिकन गोरा भी मौजूद था। उस के बात करने के ढंग से ही लगता था कि वह कोई धृष्ट व्यक्ति है। उस की बातों में शरारत के साथ बद-मिजाजी भी मिली हुई थी। जब कोई बात बोलते थे तो ऐसा लगता था कि उनको कुछ जानने की जिज्ञासा तो कम थी, हिन्दू-धर्म का मजाक उड़ाने का इरादा ज्यादा था। बातें हो रही थीं तो बीच में ही वह बोल पड़ा, “पाठक साहब, बाकी सब तो ठीक है लेकिन एक बात समझ में नहीं आती। आप हिन्दू लोग पत्थर को कैसे भगवान समझ लेते हो? क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि हिन्दुओं के विचार बड़े पिछड़े हुए हैं?” यह कहते हुए वह पाठक साहब की ओर देखकर मुस्कराने लगा। उन की मुस्कराहट में कुटिलता झलक रही थी।

मुझे भी लगा कि यह व्यक्ति पाठक साहब पर प्रहार करना चाहता है। पाठक साहब की टाँगें खींचने के अलावा उसका और कोई उद्देश्य नहीं था। पत्थर की पूजा के सम्बन्ध में कोई जानकारी पाने की इच्छा कहीं भी नजर नहीं आ रही थी। हमें बड़ी बुरी लग रही थी उस व्यक्ति की यह हरकत।

लेकिन पाठक साहब ने उन की बात बड़े ध्यान से सुनी। जरा भी जाहिर नहीं होने दिया कि वे उन के प्रश्न से, उन के पूछने के तरीके से या उन की कुटिल मुस्कान के कारण अप्रसन्न हैं। चुप-चाप उनकी बात सुनी। कुछ सोचा, कुछ समझा और फिर धीरे से उन से पूछा, “महाशय, यह पत्थर दुख में हमारी बड़ी सहायता करता है। इसलिये हम इसे भगवान मानते हैं। क्या मैं आप से पूछ सकता हूँ कि दुख या मुसीबत की घड़ियों में आप लोग क्या करते हो?”

वे सज्जन थोड़ी देर सोच कर बोले, “हम दुख के समय किसी अच्छे मनोचिकित्सक के पास जाते हैं जो हमें उस दुख से उबारने के लिये उचित सलाह देते हैं। उनकी सलाह-मश्विरे से और अपनी कोशिशों से हम उस मुसीबत से छुटकारा पाते हैं।

बात उस की ठीक थी। मनोवैज्ञानिक चिकित्सा पाश्चात्य देशों में काफी प्रचलित है। कई लोग इस का लाभ उठाते हैं। शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी बल दिया जाता है। यह भी दुख कम करने और सुख को बढाने का एक अच्छा तरीका है।

आपने बिल्कुल ठीक कहा”, पाठक साहब बोले, “अब आप यह बताइये कि आप कैसे जानते हैं कि कौन मनोचिकित्सक अच्छा है? उसकी सलाह आप के लिये उपयोगी हो सकती है या नहीं?”

अब बातचीत ने एक नया मोड़ लिया

एक अच्छे मनोचिकित्सक की क्या पहचान है? उसमें कौन कौन सी गुण-विशषताएँ होनी चाहिए? यह बात ठीक है कि बहुत से लोग अपने फेमिली डाक्टर की सलाह से, उन के निर्देशन (reference) से किसी अच्छे मनोवैज्ञानिक के पास जाते हैं। लेकिन हमारी भी जिम्मेवारी है कि हम कोशिश करके एक अच्छे चिकित्सक को खोजें, जिस पर हम पूरा भरोसा कर सकें।

अब उन दोनों की बातचीत होने लगी कि एक अच्छा मनोचिकित्सक किस को कहा जाये। फिर चर्चा होने लगी एक अच्छे मनोवैज्ञानिक चिकित्सक की गुण-विशेषताओं पर। काफी देर की परिचर्चा के बाद वे दोनों इस निष्कर्थ पर पहुँचे कि एक अच्छे मनोचिकित्सक में अन्य गुणों के सार्थसाथ निम्नलिखित तीन गुण-विशेषताएँ नितांत आवश्यक हैं

      १।  आप का मनोचिकित्सक न केवल आप की बात ध्यान से सुने, बल्कि आप की बात को, आप की समस्या को अपने तक ही सीमित रखे। हमारी समस्या की गोपनीयता एक दम अनिवार्य है। हमारी व्यक्तिगत बात किसी दूसरे तक नहीं पहुँचनी चाहिए।

 

      २।  वह चिकित्सक सुलभता से प्राप्य हो। ऐसा न हो कि दुखी तो आज हैं, दिल तो आज टूटा हुआ है, लेकिन देखने का समय (appointment) तीन हफ्ते बाद मिले। दुख के समय तो हम तुरन्त ही किसी से बात करना चाहते हैं हफ्तों के बाद नहीं।

 

      ३।  उस चिकित्सक की फीस मुनासिब (reasonable) हो। ऐसा न हो कि अत्याधिक फीस के कारण वह आप की पहुँच के बाहर हो जाये।

 

जब उन दोनों में यह एकमानता और सहमति हो गई कि उपरोक्त तीन गुण-विशेषताएँ एक अच्छे मनोचिकित्सक की प्राथमिक आवश्यकता हैं तो पाठक साहब बड़े संयत स्वर में बोले

देखिये सर, हमारा पत्थर हमारे दुख इसलिये दूर कर सकता है, क्योंकि  इस पत्थर में ये तीनों विशेषताएँ बड़ी खूबी के साथ भरी हुई हैं आप उस पत्थर के आगे रोएँ, गिड़गिड़ाएँ, उसे अपने मन की व्यथा सुनाएँ, या कुछ और कहें, फिर भी आप पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं कि यह पत्थर आप की बात को अपने तक ही सीमित रखेगा, किसी और से नहीं कहेगा। गोपनीयता (confidentiality) के मामले में पत्थर से कोई खतरा नहीं है।

रही सुलभता से प्रापित की बात उसकी भी कोई समस्या नहीं। जब भी आपको जरूरत हो, वह तैयार बैठा है वह हाजिर है। वह आप की इंतजार में बैठा है चौबीसों घंटे। दिन हो या रात, यह पत्थर आप की सेवा के लिये तत्पर है। यह बना ही इसीलिये है।

अब आती है फीस की बात! कम ज्यादा का कोई प्रश्न ही नहीं! फीस की समस्या भी बिल्कुल नहीं है। दो तो ठीक, न दो तो भी ठीक। कम दो, ज्यादा दो यह भी आप के ऊपर निर्भर करता है। आपके देने से वह खुश नहीं, न दने से वह नाराज नहीं।

अब, आप बताइये, हम इस पत्थर को भगवान क्यों न मानें?”

उस अमरीकन गोरे की आँखों में लज्जा की झलक नजर आई, लेकिन एक बार फिर वह जोर से बोल पड़ा, “हाँ, लेकिन हमारा मनोचिकित्सक तो हमें सलाह देता है, मशवरा देता है, आगे चलने का रास्ता दिखाता है, लेकिन आप का पत्थर वह काम कैसे कर सकता है?”

पाठक साहब, जो अभी तक बड़े शांत और संयत थे, अचानक जोश में आकर बोलने लगे

देखिये जनाब, आप का मनोचिकित्सक आप को कोई राह नहीं दिखाता। आप उस को जो कुछ बताएँगे उस का मार्ग दर्शन उसी पर निर्भर होगा। उसकी सलाह उतनी ही मूल्यवान होगी, जितनी कि आप  में अपनी समस्या को समझने और समझाने की क्षमता। यदि आप अपनी समस्या को सच्चाई और ईमानदारी के साथ समझ सकते हैं और समझा सकते हैं, तब तो ठीक है वरना मनोचिकित्सक का मार्ग-दर्शन गलत भी हो सकता है, घातक भी सिद्ध हो सकता है। यदि आपने कुछ छुपाया, कुछ बताना भूल गये या ठीक से समझा नहीं पाये तो वह आप को गुमराह भी कर सकता है। आपका मनोचिकित्सक आपको सही राह तभी दिखा सकता है जब आप स्वयं अपने अन्दर पूरी खोज कर उसे एक-एक सच्चाई से अवगत करायें। यदि आप इतना सब कर सकते हैं तो आप को किसी मनोचिकित्सक के पास जाने की जरूरत ही नहीं है।

जब कोई हिन्दू पत्थर के आगे रो लेता है तो उसका मन हल्का हो जाता है। फिर जब वह इस हल्के, शांत मन से अपने अन्दर झाँक कर देखता है तो रास्ता उसे अपने आप ही नजर आने लगता है। आखिर उस के अन्दर भी परमात्मा बैठा हुआ है जो उसक मार्ग-दर्शन करता है।

क्या आप इस बात का मूल्य समझ सकते हैं? नहीं! हमें यदि इतनी बड़ी सहायता अपने घर में बैठकर ही मिल सकती है और मिल रही है, तो इस में आप को क्या कष्ट है?”

 

पाठक साहब की बात को वे सज्जन कितना समझ सके, यह तो हम नहीं जानते, किन्तु हम दोनों पाठक साहब से बड़े प्रभावित हुए। एक पत्थर पर हमारे विश्वास का यह विश्लेषण बड़ा तर्कपूर्ण और व्यवहारिक था।

हमारे विश्वास में हमारा परमात्मा है।

हमारा अपना विश्वास ही हमारा परमात्मा है। अपने पर विश्वास हो तभी परमात्मा पर विश्वास हो सकता है। अपने पर सन्देह हो तो परमात्मा पर भी सन्देह होता है। अपने पर सन्देह हो तो परमात्मा की पूजा पर भी सन्देह होता है। हम दृष्टा को भी अपनी दृष्टि से देखते हैं। जब अपनी दृष्टि पर विश्वास नहीं तो दृष्टा पर कैसे विश्वास हो सकता है। परमात्मा को देखने वाली आँख भी तो हमारी ही आँख है। जिसे अपनी आँख पर सन्देह होता है, उसे दिखाई देन वाले हर दृश्य पर सन्देह होता है।

हम लोग मानते हैं कि प्रेम के ऊपर कोई शास्त्र नहीं प्रेम के ऊपर कोई सत्य नहीं। इसीलिये तो प्रेम की पहली शर्त भी यही है कि सन्देह नहीं होना चाहिए। जहाँ सन्देह है, वहाँ प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम का महल तो विश्वास की बुनियाद पर ही खड़ा हो सकता है।

अन्ततः अपने ही विश्वास पर सब कुछ निर्भर करता है।

अद्वैत का सन्देश है सन्देह हटाओ, विश्वास जगाओ।

अपनी पूजा का उद्देश्य है अपने विश्वास को पा लेना, अपने आप को पा लेना। अपने आप को पाना ही एक मात्र पाना है। दूसरे को नहीं पाया जा सकता। जो दूसरा है वह तो छूट जाता है। धन छूट जाता है, घर छूट जाता है, मन्दिर छूट जाता है, यश छूट जाता है, प्रतिष्ठा छूट जाती है। भाई छूट जाता है, बेटा-बेटी छूट जाते हैं। पति छूट जाता है, पत्नी छूट जाती है। जो दूसरा है, वह अपना नहीं है। जो पर है, वह आपका नहीं हो सकता। परमात्मा को भी यदि पर पाया तो वह भी छूट जायेगा। परमात्मा को भी यदि दूसरा समझा तो वह आपका नहीं हो सकता।

और जो अपना है उसे पकड़ कर नहीं रखना पड़ता। जिसको हमें पकड़ कर रखना पड़े वह हमारा नहीं हो सकता। जिस ईश्वर को पकड़ कर रखना पड़ता है, वह ईश्वर नहीं हो सकता। जिसने ईश्वर को पकड़ कर रखा है तो समझो वह ईश्वर नहीं, कुछ और ही पकड़े हुए है। जिस ईश्वर के हम देखते हैं, वह  ईश्वर नहीं, हमारी अपनी धारणा होती है। जिस ईश्वर की हम चर्चा करते हैं, वह ईश्वर नहीं, हमारी अपनी कल्पना का प्रक्षेपण होता है। इसलिये हमें ईश्वर नहीं, अपने आप को देखना है। जिस आनन्द के आप सपने लेते हो, वह आनन्द आप स्वयं ही हो। सब कुछ आप के भीतर है, आपके ऊपर नहीं। मनुष्य को यदि ऊपर जाना है, तो उसे अपने भीतर जाना होगा। भीतर जाकर ही वह ऊपर जा सकता है। इसलिये जो स्वयं को देखता है, वही ईश्वर को देख सकता है। जो स्वयं को जानता है, वही ईश्वर को जान सकता है।

अद्वैतवाद में ईश्वर तो होता है, पर उस का नाम नहीं होता। यह बात ध्यान देने योग्य है। अद्वैतवाद हम से ईश्वर नहीं छीनता केवल उसका नाम छीनता है। अद्वैत की भावना ईश्वर को हटाती नहीं है। यह भावना तो हमें ईश्वर दिखाती है अपने आप में।

अद्वैतवाद हम से परमात्मा का नाम तो छीन लेता है, पर हमें सच्चा आस्तिक बना देता है

हमारे बहुत सारे धर्मगुरु, “मैंको मिटाने की बातें करते रहते हैं, लेकिन फिर भी मैं नहीं मिटता। मैंको मिटाने के लिये हम चाहें जितने गोरख-धंधे कर लें पर मैं नहीं मिटता। किसी में इतनी शक्ति नहीं है कि वह हमारे मैं को मिटा सके। हमारे पास इस संसार में जो कुछ है वह सब हम से छीना जा सकता है, लेकिन हमारे मैं कहने की प्रभुता को कोई नहीं छीन सकता। ब्रह्म की देन में मिला हुआ मैं और कुछ नहीं, “तूका ही दूसरा रूप है। इसलिये मैंअपने आप कभी मिट ही नहीं सकता। मैंमिटाने के लिये तूभी मिटाना पड़ता है। जब तक तूरहेगा, तब तक मैं भी रहेगा। मैंऔर तूएक साथ ही होते हैं। मैंऔर तूएक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मैंको मिटाने का एक ही उपाय है — “तूको भी मिटा देना। तूको मिटाये बिना मैंको नहीं मिटाया जा सकता। मैंऔर तूतो तभी मिटते हैं, जब वे दोनों पिघल कर एक हो जायें।

मैंऔर तूका मिटना एक साथ ही होता है। मैंऔर तूके पिघल कर एक हो जाने में अद्वैत का अवतरण होता है। इस उपलब्धि में हमारा धर्म है। एक होकर ही हम अपनी दिव्यता को देख सकते हैं। हमारे खोने में ही हमारा पाना छिपा हुआ है। इस बात का ज्ञान ही ब्रह्मज्ञान है।

मैं अपने आप कभी नहीं मिट सकता। मैं को मिटाने का तो एक ही उपाय है — “तूके साथ मिल कर एक हो जाना।

धर्म ज्ञान की कोरी बातों में नहीं है। धर्म ईश्वर की पूजा में नहीं है। धर्म मन्दिर की घंटियों में नहीं है। धर्म महात्मा के प्रवचनों में नहीं है। धर्म त्याग की महानता में नहीं है। धर्म तो मैं के खो जाने में है। धर्म तो मैंऔर तूके मिल जाने में है धर्म तो एक हो जाने में है। धर्म तो अपनी दिव्यता देख लेने में है। इस धर्म को ब्रह्मज्ञान कहते हैं।

ब्रह्मज्ञान की प्रक्रिया दूसरों को नहीं, अपने आप को देखने से शुद्ध होती है। अपने आप को देखकर ही हम अपने आप को समझ सकते हैं। अपने आप को समझ कर ही हम अपने आप को पा सकते हैं।

उठो!

जागो!

अपनी गरिमा को समझो!

अपनी गरिमा को संभालो!!

अपने आप में विश्वास जगाओ!!!



अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें