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07.01.2008
 
१७ — अद्वैतवाद
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

अहम  ब्रह्मं असमि।

मैं ब्रह्म हूँ

बृहदारण्यकोपनिषद

 

अद्वैत वेदान्त कहता है —

ब्रह्म एक है। आत्मा भी एक है। हम, आप और यह सारी सृष्टि एक ही अनन्त शाश्वत अस्तित्व हैं।

स्वामी विवेकानन्द जी कहते हैं —

आत्मा एक है — चोर की भी वही है, सन्त की भी वही है। छोटे कीड़े से लेकर ब्रह्मा तक सब की आत्मा एक है..... यह सारा अस्तित्व एक है। यह सारा अस्तित्व शाश्वत है।

 

उस शाश्वत अस्तित्व को कैसे जाना जा सकता है?

उसे नहीं जाना जा सकता — परमात्मा अग्राह्य? है।

उस अटल अस्तित्व को कैसे समझा जा सकता है?

उसे नहीं समझा जा सकता — परमात्मा अचिन्त्य है।

उस अनन्त अस्तित्व को कैसे देखा जा सकता है?

उसे नहीं देखा जा सकता — परमात्मा अदिष्ट है।

 

आत्मा एक है, शाश्वत है, स्थिर है। इस अपरिवर्तनीय आत्मा को नहीं देखा जा सकता, क्योंकि उस पर हमेशा परिवर्तन शील प्रतिबिम्ब बनते रहते हैं। उस पर तो सारी माया की प्रतिच्छाया (reflection) पड़ती रहती है।

इस बात को समझने का थोड़ा प्रयत्न करते हैं —

आप सिनेमा देखने जाते हैं। फिल्म चलती रहती है और आप चलते-फिरते सारे दृश्य देख सकते हैं। आप प्रकाश और ध्वनि के सारे खेल देख सकते हैं, लेकिन उन दृश्यों के पीछे जो परदा होता है, उसे आप नहीं देख सकते। यदि फिल्म सदा ही चलती रहे तो उस परदे को आप कभी भी नहीं देख पाते। और तो और, तब तो किसी को यह आभास ही नहीं होता कि इन सारे दृश्यों पीछे परदा नाम की कोई चीज भी है। लेकिन फिर भी तथ्य यह है कि जो कुछ भी होता है, उस परदे पर ही होता है। जिस परदे पर नृत्य-संगीत होता है, उसी परदे पर लड़ाई-झगड़े होते हैं। जिस परदे पर शराब की महफिल जमती है, उसी परदे पर ईश्वर का भजन-पूजन होता है। आप सब कुछ देख सकते हैं किन्तु इन सब के पीछे परदा नहीं देख सकते। आप प्रतिबिम्बों के सारे परिवर्तन देख सकते हैं, किन्तु उन परिवर्तनों के पीछे जो स्थिरता है, वह नहीं देख सकते।

इसी प्रकार यह सारा अस्तित्व एक है — एक अनन्त परदा, एक अटल स्थिरता, एक मूक स्तब्धता। एक ही अस्तित्व पर सारे प्रतिबिम्ब बनते आ रहे हैं — सनातन से। इसी एक अनन्त अस्तित्व को ही स्वामी विवेकानन्द आत्मा कहते हैं।

कठोपनिषद कहता है — आत्मा स्थिर है, फिर भी दूर तक की यात्रा करती है। वह एक स्थान पर है, फिर भी सब जगह पहुँच जाती है.... आत्मा परिपूर्ण है — उसमें कोई दोष नहीं, कोई त्रुटि नहीं।

लेकिन हम आत्मा को नहीं देख पाते। हम प्रतिबिम्बों को देखते हैं और भ्रमित होते हैं। एक भ्रान्ति दूसरी भ्रान्ति पर टिकी होती है — सत्य पर नहीं! आप भ्रान्ति नहीं हैं, आपके सामने भ्रान्तियाँ हैं। बादलों के हटते ही नीला आकाश नजर आता है। लेकिन, वहाँ तो बादलों से पहले भी नीला आकाश था। बादल आते जाते हैं, नीला आकाश तो वहीं पर ही होता है।

आप नीले आकाश की तरह हो — निर्मल हो, विशुद्ध हो, पूर्ण हो!

आप ही सृष्टि के सच्चे देवता हो!

आप ही सृष्टि हो!

अद्वैतवाद पर स्वामी विवेकानन्द ने विदेशों में कई प्रवचन दिये हैं। ये प्रवचन अंग्रेजी भाषा में हैं, किन्तु हम उनके विचारों की एक श्रृंखला हिन्दी भावार्थ  में प्रस्तुत कर रहे हैं। ध्यान दीजिये इन पर —

 

मनुष्य को जो संसार नजर आता है, देवता को वही स्वर्ग नजर आता है। परन्तु आत्मा एक है — केवल एक। वह कहीं से आती नहीं, कहीं जाती नहीं, वह कभी जन्मती नहीं, वह कभी मरती नहीं। उसका न तो अवतरण होता है न ही कोई पुनर्जन्म। वह मर ही कैसे सकती है?... मर कर जायेगी कहाँ?... वह कौन सी जगह है जहाँ पर वह अभी नहीं है?...

आत्मा सर्वत्र है — आप भी सर्वत्र हैं!...

आत्मा शाश्वत है — आप भी शाश्वत हैं!...

हम मर ही नहीं सकते। ... मर कर कहाँ जायेंगे? कहाँ पर हम नहीं हैं?...

आप को कहीं भी नहीं पहुँचना — यहीं रहना है...

मनुष्य (और यह सारी सृष्टि) इसीलिये नहीं बने कि वह उसकी कृपा पाकर उस के पास पहुँच जायें, बल्कि सच्चाई यह है कि मानवता ही वह दिव्यता है जो अपनी माया से कभी इस रूप में और कभी उस रूप में प्रकट होती है।

 

अद्वैतवाद, वेदान्त का उत्कृष्ट व्यवहारिक दर्शन है। और, अद्वैतवाद का मूल सूत्र है —

आप दिव्य हैं।

आप साधारण तो हो ही नहीं सकते!

बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में एक प्रसिद्ध दार्शनिक हुए हैं जिनका नाम था — पियर टीलहार्ड डिः शार्डिन। मिस्टर डिः शार्डिन १८८१ ें —फ्राँस में पैदा हुए थे। उन्होंने धर्म और परमात्मा को विज्ञान की दृष्टि से देखा, समझा, उसका विश्लेषण किया और उसके बारे में लिखा। ईसाई धर्म के सत्ताधारियों ने उसे धर्म-द्रोही करार दिया और उनकी रचनाओं के प्रकाशित होने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद जब उनकी पुस्तकें प्रकाशित हुईं तो संसार का शिक्षित वर्ग बड़ा प्रभावित हुआ। अमरीका के भूतपूर्व उपराष्ट्रपति एल. गोर भी टीलहार्ड के बहुत बड़े प्रशंसक हैं। टीलहार्ड की रचनाओं में से लिये गये इस उद्धरण (excerpt) पर जरा नजर डालिये —

ऐसा नहीं है कि हम मानव हैं और अपने अन्दर ईश्वरीय गुणों की अनुभूति करते हैं। वास्तविकता तो यह है कि हम दिव्य हैं, हम ईश्वरीय हैं और जीवन में मानव गुणों की अनुभूति करते हैं।

कितनी सुन्दर बात कही है डिः शार्डिन साहब ने!

हाँ, ईसाइयों ने तो उसे धर्म-द्रोही कहना ही था — उनकी बात तो ईसाई धर्म से नहीं, हमारे वेदान्त से मेल खाती है।

अद्वैती भी यही कहता है —

आप दिव्य हैं। आप सृष्टि हैं। आप सृष्टा हैं।

फिर भी हम लोग पूछते हैं कि परमात्मा कहाँ है।

जिसे हम पहाड़ पर ढूँढते हैं, जिसे हम नदी में ढूँढते हैं, जिसे हम झरने में ढूँढते हैं, जिसे हम मन्दिर में ढूँढते हैं, जिसे हम सपनों में ढूँढते हैं वह कहीं और नहीं, हम में ही है —

नहीं, वह हम ही हैं!

मैं ही  वह है!

वह ही मैं हूँ!

उसमें और हम में कोई अन्तर नहीं है, इसलिये उसे हम नहीं देख सकते। प्रो. सत्यव्रत सिद्धान्तलंकार उपनिषद की इस बात को ऐसे समझाते हैं —

वह दीखता कैसे है, उसे मानें तो कैसे मानें? किसी वस्तु के न दीखने के दो कारण हो सकते हैं। या वह इतनी दूर हो कि दीख न सकती हो, या इतनी पास हो कि न दीख सकती हो। सैमेटिक धर्म के लोग कह सकते हैं कि क्योंकि ईश्वर सातवें आसमान में रहता है इसलिये दूर होने के कारण नहीं दीखता, परन्तु दूर  होने के कारण न दीखने पर उसका भौतिक शरीर मानना पड़ता है जो उसके सर्वव्यापक होने में शंका खड़ी कर देता है। उपनिषद के आस्तिक ऋषि का कहना है कि क्योंकि वह सब जगह मौजूद है इसलिये वह दीख नहीं सकता। वही वस्तु दीख सकती है जो सब जगह मौजूद न हो — वह तो ईशावास्यं इदं सर्वम्’ — सब जगह मौजूद है, अणु-अणु में, जहाँ अणु नहीं वहाँ भी मौजूद है, फिर दीखे कैसे? देखने के लिये फासला चाहिये। जिस वस्तु को हम देखना चाहें वह अलग और देखनेवाला अलग — ऐसा होना चाहिे। आँख, आँख को नहीं देख सकती, क्योंकि मेरी देखने वाली आँख और मेरी दिखने वाली आँख में कोई फासला नहीं। मैं अपनी आँख को दर्पण में देख सकता हूँ क्योंकि दर्पण में दिखनेवाली मेरी आँख में फासला पैदा हो जाता है। जब परमात्मा और मेरे में कोई फासला ही नहीं, तब वह दीखे कैसे?”

पाना तो उस का होता है जो आपके पास पहले से न हो। दौड़ा तो उसके लिये जाता है जो दूर हो। जब उसके और हमारे बीच में कोई दूरी ही नहीं है तो फिर दौड़-धूप किस बात की? इसीलिये तो उपनिषद कहते हैं कि बाहर ढूँढने से वह नहीं मिलता। जिस अज्ञात को आप पाना चाहते हैं, वह कहीं खोया नहीं है। जिस अज्ञात की आप पूजा करते हो, वह तो आपके साथ है। आप उसका ही जीवन जी रहे हो।

छान्दोग्योपनिषद भी यही कहता है —

तत् त्व असि, अर्थात वह तुम हो।

जो वह है, वही आप हैं।

वास्तव में आप अपने को ही ढूँढ रहे हो — आप अपने को ही पाना चाहते हो। आप शांति चाहते हो, स्थिरता चाहते हो। सारे शोर-गुल के पीछे जो स्तब्धता है, आप उसे चाहते हो — वास्तव में आप अपने प्रतिबिम्ब के पीछे के पर्दे को देखना चाहते हो।

लेकिन उसे आप देख नहीं सकते। हाँ, उसका बोध हो सकता है, उसका अनुभव हो सकता है। इसी को तत्त्व-बोध कहते हैं।

हमारा यह बोध ही आत्म-ज्ञान है। हमारा यह बोध ही ब्रह्म का बोध है। हमारा यह बोध ही परमात्मा का बोध है।

हम आपको एक और ईसाई धर्म-द्रोही की बात बताते हैं। तीसरी शताब्दी के इस अज्ञात ईसाई धर्म-द्रोही ने कहा था —

अपने आप को परमात्मा के समतुल्य बनाये बिना आप को परमात्मा का बोध नहीं हो सकता।

द्वैतवाद में हम परमात्मा को अपने स्तर पर लाकर देखते हैं। लेकिन अद्वैतवाद का संदेश है — अपने आप को उठाकर परमात्मा के स्तर पर ले जाओ। हमारे उपनिषद हमें परमात्मा के समतुल्य बनने का ही मार्ग दिखाते हैं।

 अपने आप को परमात्मा के समतुल्य देखने की विधि है — बुद्धि से परे निकल जाना। अपनी बुद्धि को पीछे छोड़े बिना यह काम नहीं हो सकता। जिस किसी को परमात्मा का बोध हो जाता है, उसे बुद्धि के अखाड़े में उतरने की आवश्यकता नहीं रह जाती। जिस किसी को आत्मज्ञान हो जाता है, उसे तर्क की युक्तियों की जरूरत नहीं पड़ती। उस व्यक्ति को धर्म की सारी बातें व्यर्थ लगने लगती हैं। ऐसे व्यक्ति को भाग्य और नियति की बातें हास्यास्पद लगने लगती हैं — क्योंकि अब वह जान लेता है कि उसकी अनन्त स्वतंत्रता तो इन सब के पार है।

केनोपनिषद कहता है —

भाग्यशाली है वह जिसे इस जीवन में ब्रह्म का बोध हो जाता है... इस बोध का न होना ही दुर्भाग्य है। हमारी शक्ति कहाँ से आ रही है, इस बात को जानकर हम भाग्यवान हो जाते हैं।

जिस किसी को ब्रह्म का बोध हो जाता है, वह धर्म की बड़ी-बड़ी बातों से दूर हो जाता है। फिर वह न तो गीता पर भाषण देता है और न ही उसे किसी से गीता की विवेचना सुनने की जरूरत रह जाती है। फिर तो उसे सारी गीता अपने अन्दर ही समाई नजर आती है — फिर तो वह स्वयं गीता में जीता है। उस के हाथ में तो वह तत्व आ जाता है, जो हमारे जीवन का जीवन है।

फिर वह अधूरा नहीं रह जाता, वह पूरा हो जाता है —

 

कहता है खुदा, जो खुद से जुदा, जानो अधूरा है।

दिखला दे जो खुद ही में खुदा पीरउसे कहते हैं।।

 

अद्वैत का वेदान्ती अपने आप को पा जाता है — वह पूर्ण हो जाता है।

अपने आप को देख लेने में ही आप की पूर्णता है। जो अपने आप को देख लेता है, वह तुरन्त सहमत हो जाता है, बृदारण्यकोपनिषद  की इस बात से —

अहम ब्रह्म असमि, अर्थात मैं ब्रह्म हूँ।

 

जी हाँ, आप ही ब्रह्म हैं!

आप ही ब्रह्माण्ड हैं!

महात्मा वह नहीं जो यह कहता है कि मैं परमात्मा को जानता हूँ। महात्मा वह है जो यह कह सके कि मैं अपने आप को जानता हूँ। सच्चा धर्मगुरु वह नहीं है जो आपको परमात्मा दिखाने की बातें करता  है, सच्चा धर्मगुरु तो वह है जो आप से यह कहने का साहस रखता है कि आप स्वयं परमात्मा हो — अपने आप को ही देख लो।

विश्वास कीजिये — अपने आप पर!

जो अपने आप को जानता है, वही परमात्मा को जान सकता है।

अधिकांश लोग अपने आप को निर्बल समझते हैं। यह मनुष्य का स्वभाव है। हम लोग किसी और का सहारा चाहते हैं। जैसे कमजोर पौधा किसी लकड़ी के सहारे खड़ा होना चाहता है, ऐसे ही हम सब किसी और का सहारा चाहते हैं। हम लोग अपने दम पर खड़ा होने का साहस नहीं रखते। हम लोग सत्य को देखने का साहस नहीं रखते। हम आप से कहते हैं कि आप निर्बल नहीं, सबल हैं। विश्व की सारी शक्ति आप की शक्ति है। हम लोग अपनी आँखों पर हाथ रख कर कहते हैं — अन्धेरा है! आप हाथ तो हटाओ — अन्धेरा अपने आप गायब हो जायेगा। कहीं अन्धेरा नहीं है, कोई अशक्त नहीं है, कोई निर्बल नहीं है। निर्बलता का रोना रोने से कोई सबल नहीं बनता। अपने अन्दर की सबलता को देखकर ही हम सबल बनते हैं।

लेकिन हम अपने अन्दर की सबलता देखने से डरते हैं। हम अपनी ही शक्ति से भयभीत होते हैं।

अमेरीका के टेनिसी राज्य में एक शहर है — ब्राउन्सविल्ल। मेरिेन विलियम्स वहाँ के एक गिरजाघर की डीकन  (चर्च-अधिकारी) हैं। श्रीमती विलियम्स कहती हैं —

मनुष्य अपनी निर्बलता से नहीं अपनी सबलता से डरता है। हमारा भय यह नहीं कि हम अक्षम हैं — हमारा भय तो हमारी वह शक्ति है, जिसका कोई हिसाब नहीं। अपनी असीम शक्ति को देखना ही हमारा गहनतम भय है। जो हमें सर्वाधिक डराता है, वह हमारा अन्धकार नहीं, बल्कि हमारे अन्दर का प्रकाश है।

बहुत कम लोग इस सत्य के बारे में पूछते हैं। उन से कम लोग सत्य को जानने का प्रयत्न करते हैं। फिर उन से भी कम लोग सत्य के पीछे जाने का साहस करते हैं।

हर नया विचार एक खलबली पैदा करता है — हम उससे डरते हैं। इसीलिये अद्वैतता का विचार हमें भयभीत करता है। लेकिन, वास्तव में तो अद्वैतता को जान लेने वाला अभय हो जाता है।

विश्वास कीजिये — अपने आप पर!

विश्वास कीजिये — अपनी आत्मा की दिव्यता पर! ठीक वैसे, जैसे स्वामी विवेकानन्द जी कह रहे हैं —

सबसे बड़ा झूठ यह है कि हम साधारण मनुष्य हैं... वास्तव में हम ही देवता हैं — हम सब ब्रह्माण्ड के देवता हैं...

   “मैं एक साधारण मनुष्य हूँ” — यह कहना ही गलत है। मैं एक नश्वर प्राणी हूँ”— ऐसा सोचना ही पाप है... और आप पापी नहीं हैं...आप निर्मल हैं, निर्दोष हैं, परिपूर्ण हैं, शाश्वत हैं। बस, आप को संसार की दासता से उठना है।

 

संसार में रहो, लेकिन दास बन कर नहीं —

आप दास नहीं, स्वामी हैं!

 

क्या आप जानते है कि इन्द्र कौन है? वरुण कौन है?

वेदान्त कहता है कि ये सब तो पदों के नाम हैं — ये सब कुर्सियाँ हैं। ऐसे पद करोड़ों आत्माओं को बारी बारी से मिलते रहते हैं। आप भी कई बार इन्द्र के पद पर आसीन हो चुके हो।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी अनेक ब्रह्माण्डों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि सब ब्रह्माण्डों में ब्रह्मा हैं, विष्णु हैं, महेश हैं। ऐसे हजारों ईश्वर ब्रह्म से प्रकट होते हैं, फिर उसी में लीन हो जाते हैं।

 

नेति नेति जेहि बेद निरुपा।

निजानन्द निरुपाधि अनूपा।।

संभु विरंचि विष्नु भगवाना।

उपजहिं जासु अंस तें नाना।।

... जो उपाधि रहित और अनुपम है, एवं जिनके अंश से अनेकों शिव, अनेकों ब्रह्मा और अनेकों विष्णु भगवान प्रकट होते हैं...

 

हजारों देवता? हजारों ईश्वर?

जी, हाँ!

इसीलिये नानक जी पूछते हैं —

तुम किस इन्द्र की बात कर रहे हो? न जाने कितने इन्द्र हैं।

   तुम किस महेश की बात कर रहे हो? न जाने कितने महेश हैं!

 

देखिये! जपुजी साहब में नानक जी क्या कह रहे हैं —

 

पउड़ी ३५

धरम खंड का एहो धरमु।

ज्ञान खंड का आखहु करमु।।

केते पवन पाणि बैसंतर केते कान महेस।

केते बरमे घाड़ति घड़अहि रूप रंग के वेस।।

केतिआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस।

केते इन्द चंद सूर केते केते मंडल देस।।

केते सिध बुध नाथ केते केते देवी वेस।।

केते देव दानव मुनि केते केते रतन समुंद।

केतिआ खाणी केतिआ वाणी केते पात नरिंद।

केतिआ सुरति सेवक केते नानकअंत न अंत।।

कितने पवन हैं! कितने पवन देवता हैं! कितने जल देवता हैं! कितने अग्नि देवता हैं! कितने महेश हैं! कितने ब्रह्मा हैं! कितनी उनकी रचनाएँ हैं! कितने उनके रंग रूप हैं! कितने उन के वेश हैं! कितनी उनकी कर्म भूमियाँ हैं! कितने सुमेरु पर्वत हैं! कितने ध्रुव हैं! कितने उपदेश हैं! कितने इन्द्र हैं! कितने सूर्य हैं! कितने चंद्रमा हैं! कितने सौर-मंडल हैं! कितनी आकाश गंगाएँ हैं! कितने सिद्ध हैं! कितने बुद्ध हैं! कितने नाथ हैं! कितनी देवियाँ हैं! कितने देवता हैं! कितने दानव हैं! कितने मुनि हैं! कितने रत्न हैं! कितने समुद्र हैं! कितनी योनियाँ हैं! कितनी वाणियाँ हैं! कितने बादशाह हैं! कितने बादशाहों के बादशाह हैं! कितने शहन्शाह हैं! कितने सेवक हैं!

 

इनका तो कोई अन्त ही नहीं है! यही तो परेशानी है।

हमने ही ब्रह्मा को बनाया है, हमने ही विष्णु को बनाया है, हमने ही महेश को बनाया है। ये सब मनुष्य के मस्तिष्क की उपज हैं। मनुष्य ने सोचा — परमात्मा अकेले सारे काम कैसे करता होगा? अवश्य ही उसके पास सहायक (assistants) होंगे जिन्हें वह अपना कार्य-भार सौंपता होगा (delegation)। फिर हम ने एक को संसार उत्प! करने का जिम्मा दे दिया, दूसरे को संसार के पालन-पोषण का जिम्मा दे दिया, तीसरे को लोगों की मृत्यु के लिये जिम्मेवार ठहरा दिया।

नानक जी जपुजी साहब में कहते हैं —

 

एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु।

इकु संसारी इकु भंड़ारी इकु लो दीवाणु।।

एक ही माँ ( एक ही माया) से तीन प्रबल चेलों का जन्म हुआ है। एक संसारी (ब्रह्मा) है, एक भण्डारी (विष्णु) है और एक दीवान लगाये बैठे हैं।

 

नानक जी ने ब्रह्मा को संसारी कहा है — संसार पैदा करने वाला। विष्णु जी को वे भण्डारी कहते हैं। वे भण्डारा खोल कर बैठे हैं — आओ, खाओ और जीवित रहो। जो अपना दीवान (अदालत) लगाये बैठे हैं, वे महेश हैं। महेश अपने न्यायलय में बैठ कर सब मनुष्यों से अपने कर्मों का हिसाब माँगते हैं और उसी के अनुसार न्याय करते हैं।

वास्तव में — ब्रह्मा, विष्णु और महेश उन तीन शक्तियों के नाम हैं जो सारे ब्रह्माण्ड में निरन्तर रूप से एक साथ स्फ-रित हो रही हैं। ये शक्तियाँ हैं —

 

   सृजन की शक्ति (creation),

   रक्षण और संवर्धन की शक्ति (maintenance), और

   विनाश या संहार की शक्ति (destruction)

 

एक छोटी सी कोशिका (cell) हो या सारी पृथ्वी, चाँद हो या तारे, एक सूर्य हो या सारा सौर्य-मण्डल, एक आकाश गंगा (galaxy) हो या सारा ब्रह्माण्ड — हर समय सृजन हो रहा है, हर समय संरक्षण हो रहा है, संहार हो रहा है।

जहाँ सृजन है, वहाँ माया है, वहाँ उद्‌भव (evolution) है, वहाँ ये तीनों शक्तियाँ हैं। यही वह त्रिमुखी चेतना है जिस की हम पूजा करते हैं — त्रिमूर्त्ति के रूप में। लेकिन, मनुष्य की हर पूजा उस की अपनी आवश्यकता के अनुसार होती है।

आपने कहीं ब्रह्मा का मन्दिर देखा है? ब्रह्मा का मन्दिर खोजना मुश्किल होता है — शायद एकाध कहीं नजर आ जाये। ब्रह्मा का काम हो चुका है। हम संसार में आ गये हैं, अब उस की पूजा की क्या जरूरत है? हाँ, विष्णु के मन्दिर बहुत हैं — हमें उस से बहुत कुछ माँगना है। शिव के मन्दिर भी बहुत हैं — सभी मृत्यु से डरते हैं।

हाँ, तो बात त्रिमूर्त्ति की हो रही थी। सृजन, रक्षण, और विनाश — ये तीनों माया की भौतिकता हैं। प्रकृतिका यह ज्ञान हमें अपनी क्षण-भंगुरता से अवगत कराता है। लेकिन इन तीनों का एक साथ होना हमारी अमरता का प्रतीक है। हमारी क्षण-भंगुरता के पीछे हमारी शाश्वतता छिपी हुई है। एक ओर मृत्यु है, तो दूसरी ओर अमरता है। एक ओर भौतिकता है तो दूसरी ओर अध्यात्मिकता है। एक ओर विज्ञान है तो दूसरी ओर आत्मज्ञान है। वेद कहते हैं कि हमें इन दोनों की ही आवश्यकता है। यजुर्वेद की इस ऋचा पर नजर डालिये —

 

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयऽऽसह।

अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्रुते।।

जो आत्मज्ञान तथा प्राकृतिक ज्ञान दोनों को उपयुक्त जानता है वह प्रकृति विज्ञान से मृत्यु को दूर करके आत्मज्ञान से अमरत्व प्राप्त करता है।

आत्मज्ञान से हम शांति पाते हैं और प्राकृतिक विज्ञान से ऐहिक उत्कर्ष के साधन पाते हैं। जहाँ प्राकृतिक विज्ञान से हमें अपनी भौतिकता की रक्षा करते हुए, सांसारिक यात्रा को सुखपूर्वक चलाना है, वहीं हमें आत्मज्ञान से अपनी अमरता को देखना है।

अंत में फिर हम स्वामी विवेकानन्द के विचारों की कुछ और झलकियाँ आपके सामने रखते हैं —

सभी देवताओं को मनुष्यों ने ही बनाया है। सारे देवता मनुष्य की ही मूलाकृति (prototypes) हैं। देवताओं ने मनुष्य नहीं बनाये — मनुष्य ने देवताओं को बनाया है... क्या ब्रह्मा, क्या महेश! क्या इन्द्र, क्या वरुण! ये सब हमारे ही बनाये हुए हैं। ये मौलिक नहीं हैं — ये तो हमारे प्रतिरूप (double) हैं। मौलिक तो हम मनुष्य हैं — असली देवता...

जिसे मनुष्य के चेहरे में देवता नहीं दिखाई देता, उसे बादलों में भी नहीं दिखाई देगा, और कपोल-कल्पित कथाओं में भी नहीं...

अद्वैतवाद सब देवताओं को पदच्युत करता है और उस के स्थान पर आत्मा को बैठाता है। आत्मा स्वर्ग से ऊँची है। आत्मा सूर्य से बड़ी है, चन्द्रमा से बड़ी है, ब्रह्माण्ड से बड़ी है...

आप के रूप में दिखाई देने वाली आत्मा की महिमा को कोई ग्रंथ नहीं जान सकता। आपकी शोभा को कोई शास्त्र नहीं जान सकता। आपके गौरव को कोई विज्ञान नहीं जान सकता।

 

अपने आप में ईश्वर देखना ही उपनिषदों का उपदेश है। इसीलिये अद्वैत का वेदान्ती कहता है —

मुझे अपने आप को देखना है, अपने आप को जानना है, अपने आप को समझना है — अपने आप को पूजना है।


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