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05.31.2008
 
१६ वेदान्त
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

 ईश्वर अंस जीव अविनासी।
चेतन अमल सहज सुख रासी।।

  

जीव ईश्वर का ही अंश है।  इसलिये वह अविनाशी है इसलिये उसमें चेतना है इसलिये वह निर्मल है और इसीलिए वह सुख का अम्बार  है।

गोस्वामी तुलसीदास

 

 

 

 परम्परागत हिन्दू-दर्शन की छः प्रणालियाँ हैं

१. वैशेषिक

२. न्याय

३. साँख्य

४. योग

५. पूर्व मीमांसा और

६। उत्तर मीमांसा

पूर्व मीमांसा में वेदों की प्रारम्भिक विवेचना है और उत्तर मीमांसा में बाद की। उपनिषदों का विवेचनात्मक निरीक्षण करने वाली उत्तर मीमांसा को वेदान्त के नाम से जाना जाता है। वेदान्त के प्रचलित अर्थ में उपनिषदों के अतिरिक्त दो अन्य ग्रंथ भी शामिल हैं। एक तो है श्रीमदभागवत गीता, और दूसरा है बदरायण द्वारा रचित वेदान्त सूत्र। वेदान्त सूत्र को ब्रह्म सूत्र भी कहा जाता है।

सारे उपनिषद, वेदान्त सूत्र और श्रीमदभागवत गीता ये वेदान्त-दर्शन के पाठ्य-ग्रंथ माने जाते हैं। संयुक्त रूप से इन्हें प्रस्थान-त्रेयके नाम से जाना जाता है।

वेदान्त हिन्दू-धर्म का हृदय है, लेकिन हम उसकी धड़कन को नहीं सुनते। वेदान्त का मार्ग हमें अपनी दिव्यता तक ले जाता है, लेकिन हम उस पर चलते नहीं। गीता को हम लोग व्याख्यानों और प्रवचनों का विषय बना कर बैठ गये हैं। उपनिषदों को हमने पुरातन सिद्धान्तों का पुलिन्दा समझ कर अलमारी में बन्द कर के रखा हुआ है। लेकिन, वेदान्त पुरातन दर्शन-शास्त्र का कोई अवशेष नहीं है वह तो एक भव्य सत्य है जो आज भी जीवित है, सचेत है, क्रियाशील (active) है। वेदान्त का सम्बन्ध पंडितों और महात्माओं से ही नहीं है, इसका सम्बन्ध तो हम सब से है। हर व्यक्ति का परमात्मा के साथ सीधा और सुस्पष्ट सम्बन्ध है जो प्रतिपल बना रहता है। इसलिये वेदान्त को जानना और समझना हम सब के लिये उपयोगी है।

प्रत्येक व्यक्ति का सीधा सम्बन्ध परमात्मा के साथ है। उस का यह सम्बन्ध प्रतिपल बना रहता है।

वेदान्त के तीन भेद हैं

१.  द्वैतवाद,

२.  विशिष्ट अद्वैतवाद, और

३.  अद्वैतवाद।

तीनों वेदान्ती जिन मुख्य बातों पर सहमत हैं, वे हैं

 

१.  परमात्मा शाश्वत है।

२. सृजन के लिये दो आधार-भूत आवश्यकताएँ हैं आकाश (matter) और प्राण (energy)। सारे द्रव्य-पदार्थ (materials) आकाश के अन्तर्गत आते हैं। स्वाद, गंध आदि गुण भी आकाश की ही अभिव्यक्ति हैं। प्राण का अर्थ ऊर्जा है।

३.  प्राण का आकाश के साथ मिलने से (by the reaction of matter & energy) ब्रह्माण्ड बना है।

४.  प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाली हर चीज माया है। जिस का रूप है, आकार है, नाम है, वह माया के अन्तर्गत आती है। हम और आप भी माया हैं।

ये तो हुईं इन तीनों की समानताएँ। अब देखते हैं कि तीनों प्रकार के वेदान्त में क्या भिन्नताएँ हैं।

द्वैतवाद का वेदान्ती कहता है

परमात्मा ब्रह्माण्ड का सम्राट है। वह शाश्वत रूप से प्रकृति से अलग है। वह जीवात्मा से भी अलग है।

प्रकृति और जीवात्मा प्रत्यक्ष हैं और परिवर्तनशील हैं। परमात्मा परोक्ष में है और अपरिवर्तनीय है।

परमात्मा का शरीर तो नहीं होता, परन्तु उस में गुण होते हैं। वह सर्वशक्तिमान है, दयालु है, न्यायकर्त्ता है। उसे पाया जा सकता है, उस की पूजा की जा सकती है, उस के साथ प्रेम किया जा सकता है। परमात्मा में मनुष्यों वाले दुर्गुण नहीं होते वह तो केवल शुभ-मंगल और कल्याणकारी  गुणों का भण्डार है। वह ब्रह्माण्ड का सृजन करता है। इस सृजन के लिये उसे प्रकृति (materials) की आवश्यकता होती है। इसलिये परमात्मा के पास अनन्त प्रकृति है।

द्वैतवाद का वेदान्ती कहता है कि हर आत्मा जन्म और मरण के बन्धन में है, किन्तु एक दिन वह इस बन्धन से बाहर आ जायेगी। कभी न कभी उसे इस बन्धन से छुटकारा मिल जायेगा। सुख-दुख के अनेक परिर्वतनों के बाद अन्ततः हर आत्मा को मक्त होना है। इसीलिये बहुत साे लोग कहते हैं एक दिन हम इस झूठे संसार से निकल कर उस असली संसार में आ जायेंगे, जहाँ केवल सुख ही सुख है, जहाँ कोई पैदा नहीं होता, जहाँ कोई मरता नहीं। वहाँ पर तो परमात्मा के साथ सुख ही सुख भोगना है।

हर आत्मा के लिये परमात्मा एक आकर्षण का केन्द्र है। यों समझो जैसे परमात्मा एक चुम्बक है और जीवात्माएँ छोटी छोटी सुइयाँ हैं। आप जानते हैं कि मिट्टी से भरी सुई चुम्बक की ओर नहीं खिंच पाती, लेकिन मिट्टी के हटा देने से वह चुम्बक के पास खिंची चली जाती है। इसी प्रकार आत्मा जब निर्मल हो जाती है तो वह परमात्मा के पास पहुँच जाती है और सुखी हो जाती है हमेशा के लिये। जैसे चुम्बक के साथ लग जाने के बाद भी सुई चुम्बक से अलग ही होती है, इसी प्रकार परमात्मा के पास हो जाने के बावजूद सारी जीवात्माएँ परमात्मा से अलग होती हैं।

द्वैतवाद का वेदान्ती एक और बात कहता है आप को यदि कुछ माँगना हो तो उसे देवताओं से माँगो। इसके लिये परमात्मा को कष्ट मत दो। परमात्मा को केवल प्रेम करना है। कुछ माँगना हो, तो देवताओं की पूजा करो, और मुक्ति चाहिए हो तो परमात्मा की पूजा करो।

इन सब बातों को मानने में हमें कोई आपत्ति नहीं है, पर यह द्वैतवाद कुछ प्रश्न उत्पन्न करता है

परमात्मा यदि दयालु है तो संसार में इतने दुख क्यों हैं?

परमात्मा यदि कल्याणकारी है तो संसार में इतने त्रास क्यों हैं?

परमात्मा यदि अच्छा ही है तो संसार में इतनी बुराई क्यों है?

जो लोग ईसाई धर्म से परिचित हैं, वे जानते हैं कि ईसाई धर्म में सारी बुराइयों के लिये शैतान (satan) को जिम्मेवार ठहराया गया है। ईसाई धर्म कहता है कि परमात्मा तो सुन्दर है, दयालु है, कल्याणकारी है, किन्तु शैतान उस के कामों में विघ्न डालता है। मनुष्य शैतान के बहकावे में आकर परमात्मा को भूल जाते हैं जिसके कारण वे दुख पाते हैं।

पर, हिन्दू धर्म में शैतान की कोई परिकल्पना (concept) नहीं है। हिन्दुओं में दुख और बुराई का सारा दोष मनुष्य पर डाल दिया गया है। हिन्दू कहते हैं

सब हमारे अपने कर्मों का फल है। हम जो आज करेंगे, कल वही पायेंगे। कल जो करेंगे, उसका फल परसों मिलेगा। इस प्रकार से हमारा भविष्य आज के कर्मों का ही प्रक्षेपण (projection) होगा। ठीक इसी तरह से हम भूत काल में जाते हैं। आज का दुख हमारे पिछले कर्मों का फल है इसके लिये कुछ नहीं किया जा सकता।

इस प्रकार हम अनन्त जीवन को टुकड़ों में बाँटते हैं, फिर समझाते हुए कहते हैं हम स्वयं ही अपनी नियति के लिये जिम्मेवार हैं, कोई दूसरा नहीं। सारी बुराई हमारे द्वारा ही निर्मित होती है। अपने बुरे कर्मों के कारण ही हम दुख पाते हैं। इस में परमात्मा का कोई दोष नहीं है वह तो शाश्वत रूप से कृपालु है, दयालु है, पिता है।

अब प्रश्न उठता है

यदि हमारी नियति के लिये हम स्वयं ही जिम्मेवार हैं तो फिर परमात्मा की क्या भूमिका है? फिर उसके कृपालु होने का क्या मतलब है? उसके दयालु होने का क्या अर्थ है? फिर वह कल्याणकारी क्यों कहलाता है?

द्वैतवाद से इसका उत्तर पाना कठिन हो जाता है।

फिर भी विश्व के अधिकांश लोग द्वैतवाद की परिकल्पना (concept) को मानते हैं। अधिकांश भारतीय भी द्वैतवादी हैं। द्वैतवाद में हम परमात्मा को अपने स्तर पर लाते हैं, और फिर अपनी बुद्धि से उसे समझने का प्रयत्न करते हैं। इसलिये सारी अच्छी-अच्छी बातों को हम परमात्मा में भर देते हैं। मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है उसकी बुद्धि इससे आगे नहीं सोच सकती। इसीलिये अधिकांश लोग द्वैतवाद की धारणा को पकड़ कर बैठे हैं।

लेकिन वेदान्त का वास्तविक दर्शन विश्ष्टि अद्वैतवाद से शुद्ध होता है। विशिष्ट अद्वैत का वेदान्ती कहता है कर्म (कारण) और फल (परिणाम) अलग नहीं हैं। फल कर्म का ही दूसरा पहलू है परिणाम कारण का ही दूसरा रूप है। यदि सृष्टि परिणाम है तो परमात्मा उसका कारण है। वह ही सृजनहार है और वह ही आकाश (material) है जिस से सारी प्रकृति निकली है। जैसे मकड़ी अपने ही शरीर से धागा निकालते हुए बुनती है, वैस ही सृष्टा ने सृष्टि की रचना की है।

विशिष्ट अद्वैतवाद का परमात्मा भी सगुण होता है। वह सर्वत्र होता है, सब में होता है और वह भी सारे सद्‌गुणों का भण्डार होता है।

लेकिन यह परिकल्पना (theory) भी दुविधा उत्पन्न करती है।

क्यों?

क्योंकि सृष्टि और सृष्टा में तो कोई मेल ही नहीं नजर आता। यदि परिणाम कारण की ही प्रस्तुति है तो फिर सृष्टि के गुण-धर्म सृष्टा के गुण-धर्म के अनरूप होने चाहिए। लेकिन ऐसा है नहीं। देखिये जरा

परमात्मा अनन्त चेतना है संसार में जडता है।

परमात्मा सर्वशक्तिमान है जीवात्मा निर्बल है।

परमात्मा निर्मल है हम पर मैल चढ़ी हुई है।

परमात्मा दिव्य है मनुष्य साधारण है।

परमात्मा अनन्त सुख का भण्डार है संसार दुखों से भरा पड़ा है।

परमात्मा पूर्ण है सृष्टि में अपूर्णता है।

परमात्मा सर्वज्ञ है जीव अल्पज्ञ है।

सृष्टा और सृष्टि की भिन्नता को समझाने के लिये विशिष्ट अद्वैतवाद इस प्रकार का स्पष्टीकरण देता है

परमात्मा, आत्मा और प्रकृति अलग-अलग हैं तो क्या हुआ, इन तीनों का अस्तित्व तो एक साथ होता है। सनातन काल से ही ये तीनों एक साथ रहते आये हैं। परमात्मा ही भौतिक सृष्टि का कारण है। जीवात्मा  और प्रकृति परमात्मा का ही अंश हैं। जिस प्रकार दधकती आग में से निकली लाशों चिनगारियाँ उसी आग का अंश होती हैं, इसी प्रकार सारी  जीवात्माएँ अलग-अलग होते हुए भी परमात्मा का ही अंश हैं। इसीलिये भगवान कृष्ण कहते हैं जीवात्मा मेरा ही अंश है, सनातन अंश है।

  

विशिष्ट अद्वैती कहता है कि सभी जीव ईश्वर के अंश हैं सनातन काल से ही। हमारी आत्मा परमात्मा का शरीर है। आत्मा देह है, परमात्मा उसका दैही है। श्रीमदभगवदगीता कहती है जिस प्रकार मछली का प्राण जल है, उसी प्रकार सभी जीवों का प्राण परमात्मा है। और, जिस प्रकार शरीर आते जाते हैं, पर आत्मा वहीं की वहीं होती है, इसी प्रकार जीवात्मा और प्रकृति के आने जाने से परमात्मा में कोई परिवर्तन नहीं होता। सृष्टि में होने वाले परिवर्तनों से परमात्मा पर कोई असर नहीं पड़ता।

लेकिन तुलसीदास जी थोड़ा और आगे जाते हैं

जीव न केवल परमात्मा का अंश है, बल्कि उसके गुण-धर्म भी वही हैं जो परमात्मा के हैं। यह बात शिवजी ने पार्वती को बताई थी। रामचरित मानस में तुलसीदास जी इसे समझा रहे हैं अपनी उस कथा में जिसे काक भुसण्डी गरुड़ जी को सुनाते हैं

 

सुनहु तात यह अकथ कहानी।

समुझत बनई न जाई बखानी।।

ईश्वर अंस जीव अविनासी।

चेतन अमल सहज सुख रासी।।

हे तात! यह अकथनीय कहानी सुनिये। यह बात बस समझते ही बनती है, इसे कहा नहीं जा सकता। (वह बात है—) जीव ईश्वर का अंश है। इसीलिए उसमें चेतना है, इसलिये वह अविनाशी है, इसीलिए वह निर्मल है और इसीलिए वह स्वभाव से ही सुख की राशि है।

यह तो हुई विश्ष्टि अद्वैतवाद की बात। पर वास्तविक अद्वैतवाद इससे भी ऊपर उठता है। अद्वैतवाद कहता  है

हम में परमात्मा के सारे गुण इसलिये हैं क्योंकि हम परमात्मा से अलग नहीं हैं। जो परमात्मा है, वही हम हैं।

करीब तीन हजार वर्ष पूर्व जन्मे अद्वैतवाद का सिद्धान्त है

हम, आप और यह सारी सृष्टि एक ही हैं। प्रकृति हम से अलग नहीं है, सृष्टि हम से अलग नहीं है, सृष्टा हम से अलग नहीं है। जो सृष्टा है, वही सृष्टि है।

सन् ८०० ई० के आसपास पैदा होने वाले शंकराचार्य को वेदान्त-दर्शन का सम्राट माना जाता है। अपने अद्वैतवाद के लिये प्रसिद्ध कुशाग्र तर्क-शास्त्री शंकराचार्य कहते हैं

 “ब्रह्म एक है.. ब्रह्म निर्गुण है.. विभिन्न आकारों वाली माया हमारा ध्यान ब्रह्म की अविभाजितता से हटाती है.... सगुणता माया है... सारे विरोधी गुणधर्म माया हैं... यह तो उस ब्रह्म का चमत्कार है जो एक होते हुए भी अनेक रूपों में नजर आता है...

 “एक तिनके से लेकर प्रत्यक्ष रूप में नजर आने वाले सारे देवी-देवता माया के अन्तर्गत आते हैं।

अद्वैतवाद कहता है अन्ततः सब एक है। गहराई में जाकर सब एक हो जाता है आत्मा, प्रकृति, परमात्मा, ब्रह्म। जो विशुद्ध चेतना है, वह ही माया है। जो प्राण है, वह ही आकाश है। जो ऊर्जा है, वह ही पदार्थ है।

कितने आश्चर्य की बात है! आज विज्ञान भी यही कह रहा है जो आकाश (matter) है, वह ही प्राण (energy) है। जो ऊर्जा है वही पदार्थ है। इतना ही नहीं, विज्ञान ने इन दोनों के सम्बन्ध को जोडने वाला समीकरण भी हमें दिया है। आइन्स्टीन ने अपने इसी समीकरण (E=mc2)के लिये ही तो इतनी ख्याति पाई है।

अद्वैतवाद की परिधारणा (concept) मानव-बुद्धि की पराकाष्ठा पर पहुँचती है और फिर उस के बाहर (परे) निकल जाती है। क्योंकि परमात्मा बुद्धि से नहीं जाना जा सकता, इसलिये बुद्धि से परे जाना आवश्यक हो जाता है। यह काम कठिन है, दुरूह है और साधारण जनता की समझ के बाहर है। इसीलिये भारत में जन्मी अद्वैतवाद की परिधारणा इतने वर्षों के बाद भी आम जनता तक नहीं पहुँच पाई।

लेकिन आप आम जनता नहीं हैं। आप साधारण लोग नहीं हैं। आप पढ़े-लिखे हैं, समझदार हैं, विज्ञान की आधुनिक परिकल्पनाओं (theories) से भी परिचित हैं। आप अद्वैतवाद की परिधारणा पर विचार कर सकते हैं। इसीलिये अद्वैतवाद के अद्वितीय सिद्धान्त को आपके समक्ष प्रस्तुत करने में हमें संकोच नहीं है। हमें विश्वास है कि हमारे उपनिषदों के ऋषियों की तपस्या-फल से आप लाभान्वित हो सकते हैं।



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