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03.21.2008
 
१५ शिष्यत्त्व और जागृति
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

रयिं जागृवांसो अनुग्मन।

जागरूक रहकर प्रयत्न करने वाले

ऐश्वर्य को पाते हैं।

ऋग्वेद

 

एक किसान को गरुड़ का अंडा मिला। अंडे को उठाकर उसने अपने मुर्गीखाने में रख दिया। एक मुर्गी उस अंडे को सेंतती रही। कुछ दिनों के बाद  उसमें से गरुड़-शावक (छोटा बच्चा) निकल आया। अन्य मुर्गियों और चूज़ों के साथ वह भी वहाँ पर बड़ा होने लगा।

बड़ा होकर भी वह गरुड़ अपने आप को मुर्गी समझता था। वह वही करता था जो अन्य मुर्गे-मुर्गियाँ किया करते थे। उन्हीं की तरह वह जमीन खरोंच कर कीड़े-मकोड़े खाता था, उन्हीं की तरह वह कुड़कुड़ाता था। कभी-कभी अन्य मुर्गियों की तरह वह हवा में फड़फड़ा कर दो-तीन फुट उड़ भी लेता था।

समय गुजरता गया गरुड़ बूढ़ा हो गया। एक दिन उसने एक सुन्दर पक्षी को आकाश में उड़ते हुए देखा। जिस शालीनता के साथ अपने मजबूत सुनहरे पंखों को फैलाकर वह हवा में तैर रहा था (gliding) उसे देख कर बूढ़ा गरुड़ मुग्ध रह गया। वह उस भव्य पक्षी की शान से बड़ा प्रभावित हुआ।

कौन है वह?” उत्सुकतावश उसने पास में बैठी मुर्गी से पूछा।

वह गरुड़ है पक्षीराज गरुड़”, मुर्गी ने उत्तर दिया। फिर वह अपने ज्ञान का बखान करते हुए कहने लगी

जानते हो! यह गरुड़ सारे आकाश में उड़ता है। हम मुर्गियाँ तो जमीन पर ही पड़ी रहती हैं।

उसकी बात सुनकर बूढ़ा गरुड़ मन मसोस कर रह गया — “काश, मैं भी उस की तरह आकाश में उड़ता!

पक्षीराज गरुड़ ने अपना सारा जीवन एक मुर्गी की तरह व्यतीत किया, और फिर एक दिन मुर्गी की तरह ही मर गया।

वह अपने आप को मुर्गी जो समझता रहा!

हम लोगों के साथ भी यही होता है। हैं तो हम पक्षीराज, किन्तु अपने आप को मुर्गी समझे बैठे हैं। सारा आकाश हमारा साम्राज्य है लेकिन फिर भी हम जमीन की धूल चाटते रहते हैं। उड़ने वालों को हम हसरत की नजर से देखते हैं फिर अपने भाग्य का रोना शुरू कर देते हैं। देवताओं को हम महान घोषित कर देते हैं फिर उन के आगे हाथ फैला देते हैं।

हम जानते ही नहीं कि वास्तव में हम स्वयं ही देवता हैं।

क्यों नहीं जानते?

क्योंकि हम सोये हुए हैं। हम नींद में हैं। हमें जागना है।

 

किसी ने महात्मा बुद्ध से पूछा

क्या आप परमात्मा हैं?”

नहीं।

क्या आप देवदूत हैं?”

नहीं।

तो फिर आप कौन हैं?”

मैं जागृत हूँ!महात्मा बुद्ध का उत्तर था।

 

जागकर ही हम कुछ कर सकते हैं।

गुरु के पास जाकर एक शिष्य बोला — “गुरुजी मुझे ज्ञान की दीक्षा दीजिये।

उस दिन गुरु का मौन व्रत था, इसलिए उसने एक कागज उठाया और उस पर लिख दिया — “जागो!

शिष्य बोला — “इसे थोड़ा विस्तार से बताइये।

गुरु ने विस्तार कर दिया — “जागो! जागो! जागो!

अब जरा इस का अर्थ भी समझाइये”, शिष्य ने फिर विनती की।

गुरु ने फिर कागज उठाया और उस पर लिख दिया — “जागो, जागो, जागो का अर्थ है जागो।

लेकिन हम स्वयं जागकर नहीं देखते हम दूसरों से पूछ कर जानना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि कोई दूसरा हमें सब बता दे। पर, ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि सबकी दृष्टि अलग है। आप केवल अपनी दृष्टि से ही देख सकते हैं दूसरों की दृष्टि से नहीं। आपके अपने जागने से ही काम बनता है।

और जो जागना चाहते हैं वे यह नहीं जानते कि जागना क्या होता है। वे सोचते हैं कि जागने के लिये कुछ करना पड़ता है जिसके बारे में पता लगाने के लिये वे यहाँ-वहाँ भटकते रहते हैं। उन में जागने की उत्कण्ठा तो होती है लेकिन वे जागने का अर्थ नहीं समझते। और समझें भी कैसे? सब तरफ तूतियाँ बज रही हैं। कोई आप से कहता है निरंकारी बन जाओ, तो कोई कहता है राधास्वामी का पल्लू पकड़ लो। कोई कहता है ब्यास जी चले जाओ, तो कोई कहता है आनन्दपुर पहुँच जाओ। कोई कहता है कि ब्रह्मकुमार बन जाओ तो कोई कहता है कि महर्षि महेश का मार्ग अपनाओ। सब कहते हैं कि आप उन के मार्ग पर चलें। सब कहते हैं कि उन के मार्ग पर चलने से आप का जागरण जल्दी होता है। जागरण के इस व्यवसाय में जिस भ्रान्ति का प्रचार हो रहा है, वह यह है कि जागने के लिये कुछ करना पड़ता है। लेकिन जो वास्तव में जागा हुआ है, वह ऐसा कभी नहीं कहता।

महात्मा बुद्ध को जब बुद्धत्त्व प्राप्त हुआ तो उन के आस-पास बैठे हुए लोग चिल्ला पड़े

महाराज, हमें भी बताओ। क्या रहस्य है? क्या करना पड़ता है?”

महात्मा बुद्ध शांत भाव से बोले, “कुछ नहीं करना पड़ता।

जी हाँ, जागरण का और कुछ करने का कोई स्बन्ध नहीं है। जागरण के लिये कोई विशेष काम नहीं करना पड़ता। हाँ, जागरण के बाद आप जो भी काम करेंगे, वह विशेष ही होगा।

जागने के लिए कुछ विशेष नहीं करना पड़ता।
हाँ
, जागकर आप जो भी करते हैं, वह विशेष हो जाता है।

हम सब में असाधारण शक्ति छिपी हुई है। जब हम जाग जाते हैं, तो हमें उस शक्ति की अनुभूति होती है। जब हम जाग जाते हैं तो अपने आप को सारे अस्तित्त्व के साथ जुड़ा पाते हैं। जब हम जाग जाते हैं तो हम देख लेते हैं कि हम परमात्मा के साथ एक हैं। ये सब विशेष बातें हैं। जब हम जाग जाते हैं तो हम अपनी यथार्थता से अवगत हो जाते हैं, हम अपनी स्वाभाविक दशा (natural state of being) को जान लेते हैं। हम जान जाते हैं कि मानव-मात्र का मूल स्वभाव एक है।

लेकिन, यह सब नहीं होता। हमारा मन जागना नहीं चाहता।

हमारा मन आदत से जीता है। जैसी हमें आदत पड़ जाती है, हम वैसा ही करते हैं। आदत हमारी जिन्दगी बन जाती है। एक ही ढर्रे से चलते रहना हमें सरल लगता है। कुछ सोचना नहीं पड़ता सब काम आदत से हो जाते हैं।

कन्फ्यूशस कहते हैं कि सारे मनुष्यों का स्वभाव एक हैं, उन की आदतें ही उन्हें पृथक करती हैं।

हमारी आदत हमें अपना सच्चा स्वभाव नहीं पहचानने देती। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि हम अपनी आदत के बारे में कुछ भी नहीं जानते हम तो आदत को ही अपना स्वभाव समझ बैठते हैं। इसीलिए हम सारे समझौतों के लिये तैयार होते हैं, किन्तु अपनी आदत बदलने के लिये नहीं। हम आदत पर ही रुक जाते हैं। इस के आगे हम नहीं जाना चाहते। फिर, यदि हम किसी दुख से परेशान हैं तो सारी जिन्दगी अपने दुख का रोना रोते रहते हैं, लेकिन अपनी परेशानी से उबरने के लिय कोई उपाय नहीं करते। हमारी आदत हम से कहती है कुछ नहीं  हो सकता!

आदत हमारी विवशता बन जाती है।

जागरण आदत के  विपरीत है। जागरण का अर्थ है सुरति बनाये रखो। ध्यानपूर्वक देखो! क्या हम अपना लक्ष्य जानते हैं? क्या हमें अपना लक्ष्य याद है? क्या हम इस लक्ष्य की ओर अग्रसर हो रहे हैं? यदि नहीं, तो तुरन्त ही हमें कुछ करना है लेकिन, रोते नहीं रहना।

जागरण का अर्थ है आदत से ऊपर उठो। हमारी उपलब्धि आदत से ऊपर उठने में ही है। जो जागा हुआ है उसकी जिन्दगी रोने-धोने में नहीं कटती। जागा हुआ व्यक्ति अपनी जिन्दगी दुख में नहीं गुजारता क्योंकि उसकी सुरति बनी हुई है। वह होश में है बेहोश नहीं।

जो जागा हुआ है, वह अपनी आदत से ऊपर उठ जाता है।

आदत हमारी बेहोशी है। जागरण हमारा होश है। जेकृष्णामूर्त्ति हमें बताते हैं कि होश में जीने वाला हमेशा सीखता रहता है।

 कृष्णामूर्त्ति की यह बात समझने वाली है। जो होश में है, वह हमेशा सीखता रहता है। जो जागा हुआ है वह सदा शिष्य बना रहता है। जागे रहने का खेल शिष्य बने रहने का खेल है। जागृत व्यक्ति मरते दम तक सीखने में लीन रहता है।

मोटरकारों के उद्योग के विख्यात उद्योगपति हेनरी फोर्ड कहते हैं

जो सीखना बंद कर देता है, वह बूढ़ा हो जाता है। फिर वह बीस वर्ष का हो, या अस्सी वर्ष का, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जो सीखता रहता है, वह सदैव युवा बना रहता है। अपने चित्त (प्रवृत्ति) को युवा (उत्साही) बनाये रखना हमारी बहुत बड़ी उपलब्धि है।

सीखना और सीखते रहना ही देवता बनने की यात्रा है।

आपको याद होगा हमने आप को छन्दोग्योपनिपद से ली गई एक कहानी सुनाई थी जिस में इन्द्र देवता और विरोचन दैत्य प्रजापति के पास जाते हैं। प्रजापति दोनों को शरीर पर छोड़ देता है। विरोचन शरीर को सत्य मान कर बैठ जाता है, लेकिन इन्द्र जागकर स्वयं देखता है। वह अपने शरीर को संवारता है, उसे स्वस्थ रखता है किन्तु वहीं पर ही नहीं रुक जाता। वह इससे आगे भी जानना चाहता है, इस के आगे भी सीखना चाहता है। इसलिये वह फिर प्रजापति के पास जाता है और प्रजापति उस का मार्ग-दर्शन करता है। इस प्रकार वह एक एक कदम आगे बढ़ता है और आनन्द तक पहुँच जाता है।

इस पूरी यात्रा में उसे १०१ साल लग जाते हैं।

सीखने के लिये हमारे पास इतना है कि हम लोग सारी जिन्दगी सीखने में ही लगा देवें तो भी हमारे पास बहुत, बहुत कुछ बच जाता है। जो जागृत है वह जानता है कि सीखने का तो कोई अन्त ही नहीं है।

सीखने का पहला चरण है यह मानना कि हम नहीं जानते। जब तक हम यह नहीं मानते कि हम नहीं जानते, तब तक हम कुछ नहीं सीख सकते। लोग कहते हैं कि हम अनुभव से सीखते हैं, लेकिन यह बात एकदम गलत है। हमें अनुभव कुछ नहीं सिखाता, हमें अनुभव-हीनता सिखाती है। और जो यात्रा करता है, वह तो हमेशा अनुभव-हीनता की कगार पर खडा होता है। हम अनुभव से नहीं, गल्तियों से सीखते हैं।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अपने सारे जीवन में हम जितना सीखते हैं उसका नब्बे प्रतिशत के करीब तो हम पांच साल की उम्र के पहले ही सीख लेते हैं। उस के बाद की सारी जिन्दगी में हम केवल दस प्रतिशत ही सीखते हैं।   

अनुभव से कोई नहीं सीखता। अनुभव का तो अर्थ ही है कि हम जानते हैं। और जो जानता है, वह कैसे सीख सकता है? अनुभव का अर्थ है हमें रास्ता दिखाई दे गया है, लेकिन हम उस पर चले नहीं। अनुभव का  जो उपदेश हम दूसरों के देते हैं, वास्तव में तो वह हमारे अपने ही काम का होता है। इसलिये अनुभव की बातें करना हमारी नादानी है। अनुभव तो रुक जाने का नाम है। महत्त्व चलते रहने का है, महत्त्व यात्रा का है।

जो जागा हुआ है, वह हमेशा ही सीखता रहता है अपनी गल्तियों से भी, दूसरों की गल्तियों से भी। जो जागा हुआ है वह तो ज्ञानी से भी सीखता है, अज्ञानी से भी। जो जागा हुआ है वह अपने बडों से भी सीखता है, छोटों से भी। यह आवश्यक नहीं कि हम अपने बच्चों को सिखाने में ही लगे रहें यदि चाहें तो हम उनसे भी बहुत कुछ सीख सकते हैं।

जो जागा हुआ है, वह हमेशा सीखता रहता है।

लेकिन हम लोग सीखना नहीं चाहते। हम सब तो सिखाना चाहते हैं। हम शिष्य नहीं बनना चाहते, हम सब तो गुरु बनना चाहते हैं। हम सोचते हैं हमें सब आता है। हम सोचते हैं हम सब जानते हैं। यही हमारी निद्रा है, यही हमारी बेहोशी है।

महत्त्व जानने का नहीं है, महत्त्व सीखने का है। महत्त्व गुरु होने का नहीं, महत्त्व शिष्य होने का है। इसलिये गुरु होने के योग्य वही है जिसका अपना शिष्यत्त्व हमेशा बना हुआ है। जो अन्तिम क्षण तक सीखने के लिये तत्पर है, वही गुरु बनने का अधिकारी है। जिसका अपना शिष्यत्त्व चरम सीमा पर पहुँचता है, वही गुरु बनने के योग्य हो सकता है।

सारा महत्त्व सीखते रहने का है। जो सीखता रहता है, वही विकसित होता रहता है।

हम कहते हैं कि इक्कीस वर्ष की उम्र में हम व्यस्क हो जाते हैं हमार विकास पूरा हो जाता है। तो फिर उस के बाद हमारा क्या होता है? इस सृष्टि में कुछ भी स्थिर नहीं है। जैसे ही हमारा विकास पूरा हो जाता है, वैसे ही हमारा नाश शुरू हो जाता है। नाश की प्रक्रिया से बचना है तो विकास की  प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती रहनी चाहिए। और विकास तो शिष्य का होता है गुरु का नहीं। इसीलिए सारी महत्ता शिष्य होने में है।

हमें सीखते रहना है!

जो लोग जागे हुए हैं, वे जानते हैं कि मनुष्य इतना ही नहीं है जितना वह ऊपर से नजर आता है। जो बुद्ध पुरुष हैं वे कहते हैं कि मनुष्य के पास बहुत बड़ी सम्पदा है, जो उसके भीतर छिपी हुई है। वह इस सम्पदा का उपयोग तो क्या, उसे उघाड़ कर भी नहीं देखता।

 

सड़क के किनारे एक भिखारी आते-जाते लोगों से भीख माँगा करता था। लकड़ी की एक पेटी पर बैठकर न जाने कितने सालों से वह भीख माँगने का काम कर रहा था। हमेशा की तरह एक दिन वह किसी अजनबी के सामने यंत्रवत हाथ फैलाकर बोला, “बाबू जी, इस गरीब को कुछ पैसे दे दो।

 “मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं हैं”, कहते हुए वह व्यक्ति आगे बढा। फिर एकाएक वह रुक गया और पीछे मुड़ कर उसने भिखारी से पूछा,

इस पेटी में क्या है?”

 “कुछ नहीं सा”, भिखारी ने उत्तर दिया, “लकड़ी की पुरानी पेटी है। रोज इसी पर बैठकर मैं भीख माँगता हूँ।

 “तुमने इसे कभी खोल कर देखा है?” उस व्यक्ति ने भिखारी से पूछा।

 “देखने की क्या जरूरत है? क्या हो सकता है इस पुराने खोखे में”,       भिखारी के उत्तर में लापरवाही थी।

 “अरे भाई! एक बार खोलकर तो देख लो”, कहते हुए वह व्यक्ति आगे निकल गया।

जिज्ञासावश भिखारी ने उस पेटी को खोल ही दिया। यह क्या? उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं उस पुराने खोखे के अन्दर सोना भरा पडा था।

 

आज हम आप से एक बात पूछना चाहते हैं — “क्या आपने कभी अपने अन्दर झाँक कर देखा है?”

नहीं! तो फिर आप जानते ही नहीं कि इस सृष्टि का सबसे अनमोल खजाना आपके अपने ही अन्दर है।

हम इस खजाने को अपने साथ लेकर आते हैं। हमारी यह सम्पदा  हमारे अन्दर दबी हुई आती है। हमारे जागने से इस सम्पदा का उद्‌घाटन होता है, अन्यथा वह ऐसे ही दबी हुई चली जाती है।

जो जाग जाता है, वह अपने अन्दर की अनन्त सम्पदा को देख लेता है।

मनुष्य हर प्रकार से स्वतंत्र है। उसकी मर्जी के विरुद्ध उसे कोई कहीं नहीं ले जा सकता। जागने के लिये भी उसकी मर्जी चाहिए। कोई उसे जबरदस्ती नहीं जगा सकता। जो नहीं जागना चाहता उसे जगाना कठिन ही नहीं, असम्भव है।

फिर एक बात और है हम लोग जगाने वालों के प्रति कोई अच्छा व्यवहार भी तो नहीं करते। जो हमारी नींद तोड़ता है, उस पर हम बौखलाते हैं। जो हमारे सपनों को झंझोड़ता है, उस पर हम झुँझलाते हैं।  जगाने वाले के प्रति हम ऐसा ही व्यवहार करते आये हैं। यह भी हमारी आदत है।

सोने वाले तो सोना ही चाहते हैं। फिर भी जागे हुए यही कहते आये हैं

तुम ही देवता हो, तुम ही परमात्मा हो। परम सुख और परम शांति तुम्हारी नियति है।

लेकिन हम इस बात को नहीं जानते। हम इस बात को नहीं मानते। हम नींद में जो हैं!

फारसी के एक प्रसिद्ध सूफी कवि हुए हैं मौलाना जलालुद्दीन रूमी।

देखिये जरा! हजरत रूमी क्या कह रहे हैं

मनुष्य जानता ही नहीं कि वह क्या है!

वह एक बड़ी इमारत का मालिक है, लेकिन फिर भी वह झोंपड़ी में दुबका हुआ बैठा है।

मखमल का थान बगल में दबाए हुए है, फिर भी चीथड़ों का लबादा पहने घूमता है।

सिर पर खाद्य-व्यंजनों से भरा टोकरा रखे हुए है, फिर भी वह दर-दर भटकते हुए रोटी के टुकड़े माँगता फिरता है।

घुटनों तक पानी में खड़ा है फिर भी वह आने जाने वालों से पीने के लिये पानी माँगता है।

 

क्या मौलाना जलालुतीन रूमी हमें कोई नई बात बता रहे हैं?

नहीं!

जो बात हजरत रूमी हमें समझा रहे हैं वह तो हमारे वेदान्त का ही सार है। हमारे उपनिषदों का भी यही सन्देश है

आप साधारण मनुष्य नहीं हैं!

आप दिव्य हैं!

जब बात निकल ही पड़ी है तो क्यों न फिर वेदान्त का एक संक्षिप्त पाठ पढ़ लिया जाये?


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