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03.21.2008
 
१४ — सम्पन्नता
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

धनार्जने यथा बुद्धेरपेक्षा व्यय कर्मणि।

ततोऽधिकैव सापेक्ष्या तत्रौ चित्सस्य निश्चये।।

 

धन कमाने में जितनी बुद्धिमत्ता की आवश्यकता होती है उससे कई गुनी बुद्धिमत्ता उसके व्यय के औचित्य का निर्धारण करते समय लगनी चाहिए।

ऋषि पिप्प्लाद

 

इन्द्रिय-संयम आपकी सम्पन्नता है, समय-संयम आपकी सम्पन्नता है। इन दोनों की सम्पन्नता आपको धन-सम्पन्न बनाती है। अर्थ-संयम आपकी सम्पन्नता में वृद्धि करता है।

धन कमाने की न तो उपेक्षा की जाये और न ही धन कमाने में अनीति बरती जाये। खर्च करने में सादगी बरती जाये और परिणामों की जाँच-पड़ताल रखी जाये। इसीलिए प्रज्ञा पुराण के ऋषि पिप्पलाद मितव्ययता की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं। धन का अपव्यय रोकना आवश्यक है, इसीलिये मितव्ययता को प्रधानता दी गई है।

लेकिन मितव्ययता को आप कंजूसी न समझें। मितव्ययता और कंजूसी में अन्तर है। कंजूस न तो अपने आप को देता है न दूसरे को। कंजूस न तो उपभोग करता है और न ही दान देता है। वह तो खर्च ही नहीं करता — केवल धन का संचय करता है। मितव्ययी अपनी प्राथमिकताओं को समझता है। वह खर्च तो करता है, परन्तु देख-भाल कर, सोचविचार कर। मितव्ययी अपने धन के उपभोग से सुख चाहता है। वह एक सावधानी बरतता है — कहीं ऐसा न हो जाए कि वह अपने ही धन से दुख खरीद लेवे।

बुद्धिमानी की यही परख है कि जो भी कमाया जाय, उसका न तो अपव्यय हो और न ही उसका अनावश्यक संचय हो। जहाँ लक्ष्मी का सदुपयोग होता है, लक्ष्मी उसी घर में बसती है, फलती है, फूलती है।

लेकिन अपव्यय की रोकथाम तो केवल एक पक्ष है — महत्त्वपूर्ण काम तो इस बचत के सुनियोजन की है। जो धन आप बचाते हैं, उसे उचित प्रयोजन के लिये नियोजित भी करना होता है। संयम निषेधात्मक नहीं, विधेयात्मक गुण है। सामर्थ्य को अस्त-व्यस्त होने से इसलिये बचाया जाता है ताकि उसका उपयोग सृजनात्मक प्रयोजन के लिये किया जा सके। आपका सृजन ही आपके सामर्थ्य की सार्थकता है। जब तक सम्पन्नता सृजनात्मक कार्यों में नहीं लगती, तब तक सम्पन्नता का कोई मूल्य नहीं।

सृजनात्मक कार्य हमें सुख देते हैं। सृजन परमात्मा का चारित्रिक गुण-धर्म है। सृजन आनन्द है। सृजन हमारा धर्म है। मनुष्य अपनी सृजनात्मक शक्ति के कारण ही वह पद-गौरव पा सका है जो अन्य प्राणियों को नहीं मिला है। अपने क्रिया-कौशल से आपने इस धरती को सुव्यस्थित करना है। अपनी सृजनशीलता से आपने इस धरती को सुन्दर बनाना है। मनुष्य इस धरती को नष्ट करने के लिये नहीं आया।

लेकिन हम इस मूल तथ्य को भूल गये हैं। आज विनाश के उपकरण तैयार करने की होड़ लगी हुई है। बड़े-बड़े विध्वंस कर देने वाली सामग्री आज एक ब्रीफकेस में पैक की जा सकती है। विनाश के साधनों को हम प्रगति का प्रतीक समझने लगे हैं। हम समझते हैं कि इस पृथ्वी पर हमारे आधिपत्य का अर्थ है कि हम इसे ध्वस्त करने की मनमानी कर सकें। फिर भी तुर्रा यह है कि हम मिथ्यापूर्ण दावा करते हैं कि हम तो संसार की रक्षा करते हैं।

महत्त्व सृजन का है, विनाश का नहीं।

 

भगवान बुद्ध एक बार निविड़ वन को पार करते हुए कहीं जा रहे थे। रास्ते में उसे एक डाकू मिला। डाकू का नाम था अंगुलिमाल। वह निर्दोष लोगों का वध करता था। उनके अंगुलियों की माला बना कर गले में धारण करता था। ऐसे वह अनेक वध कर चुका था। आज सामने से आते हुए साधु को देख कर उसकी बाँछें खिल उठीं।

 आज आप मेरे पहले शिकार होंगे, अंगुलिमाल ने बुद्ध से कहते हुए अपनी पैनी तलवार म्यान से बाहर निकाल ली।

तथागत मुस्कराये, उन्होंने डाकू से कहा—

 वत्स! तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा। मैं कहीं भागने वाला नहीं हूँ। दो क्षण की देरी सह सको तो  मेरी एक बात सुन लो।

डाकू ठिठक गया — उसने अपने शिकार को इस तरह मुस्कराते हुए कभी नहीं देखा था। वह तो हमेशा उन की आँखों में भय ही देखता था। वह तो उन के मुँह से निकली हुई चीखों के सुनने का ही आदी था। इसलिये वह आश्चर्य-चकित होकर वहीं खडा रहा। तथागत ने उससे कहा—

   सामने वाले पेड़ से एक पत्ता तोड़ कर जमीन पर रख दो।

   डाकू ने वैसा ही किया। तथागत ने फिर कहा—

   अब उसे पुनः पेड़ में जोड़ दो।

   यह कैसे संभव है? डाकू बोला, तोड़ना तो सरल है, लेकिन उसे जोड़ा नहीं जा सकता।

बुद्ध ने गंभीर मुद्रा में कहा, वत्स! इस संसार में मार-काट, तोड़-फोड़, उपद्रव और विनाश ये सभी काम बड़े सरल हैं। इन्हें तो कोई तुच्छ व्यक्ति भी कर सकता है। तुम भी करते हो तो कौन सी बड़ी बात है। इस काम में तुम्हें ऐसी कौन सी विशेषता नजर आती है? किस बात का इतना अभिमान करते हो? बडप्पन की बात निर्माण है — विनाश नहीं। तुम विनाश के तुच्छ आचरण को छोड़कर निर्माण का महान कार्य क्यों नहीं अपनाते?

तथागत के शब्द अंगुलिमाल को तीर की तरह बेध गये — उसने डाकू का काम छोड़ दिया।

हम लोग इस सृष्टि को नष्ट करने नहीं आये — इस मूल तथ्य को समझ लेने में हमारी गरिमा है। आप का गौरव सृजन में है — विनाश में नहीं। अपनी इस जिम्मेवारी को समझ लेने में हमारा देवत्व है।

हम संसारी सृजन की ही अनेक जिम्मेवारियों से घिरे हुए हैं — हमें अपने शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा करनी है, परिवार का पालन-पोषण करना है, बच्चों को पढ़ाना लिखाना है, समाज के ऋण चुकाने हैं, संस्कृति और शालीनता की रक्षा करनी है। इन सब का संतुलन बना कर रखना एक दैवीय गुण है। सन्तुलन बनाकर अपनी जिम्मेवारियों को निभाना हमारी कर्त्तव्य-परायणता है। यह कर्त्तव्य-परायणता ही हमारी धार्मिकता है। पंडित श्री राम शर्मा जी आचार्य  कहते हैं कि धर्मवेत्ताओं द्वारा की गई धार्मिकता की यही परिभाषा उत्तम है। इसलिये धर्म और धार्मिकता का विषय संसारिकता का विषय है। धर्म की रक्षा करने का भार हम संसारियों पर है, महात्माओं पर नहीं।

हमारी कर्त्तव्यपरायणता ही हमारी धार्मिकता है। धार्मिकता की इस परिभाषा को सबसे उत्तम माना गया है।

इस बात को ध्यान-पूर्वक समझना है। धर्म की रक्षा देवता करते हैं, महात्मा-गण नहीं। महात्माओं की रक्षा भी देवतागण करते हैं। देवता संसार के साथ चलते हैं, संसार से हट कर नहीं। हम संसारी ही देवता बन कर धर्म की रक्षा कर सकते हैं।

धार्मिकता मन्दिरों में नहीं है। धार्मिकता सत्संगों में नहीं है। धार्मिकता समागमों में नहीं है। धार्मिकता प्रवचनों में नहीं है। यह सब तो हमारे देश में बहुत हो रहा है, फिर भी धार्मिकता नहीं, अधार्मिकता बढ़ती जा रही है। धार्मिकता तो हमारी कर्त्तव्य-परायणता में है। और कर्त्तव्य-परायणता आँशिकुसमय का काम (part-time job) नहीं है, यह तो पूरे समय का काम (full-time job) है। धर्म प्रवचनों का विषय नहीं है — धर् तो सफल जीवन का ढंग है, धर्म तो सुख से भरे रह कर जीने की कला है।

धर्म शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ध्रशब्द से हुई है, जिसका अर्थ है — धारण करना, पकड़ कर रखना, पालन करना, बनाये रखना। वे सारे गुण, वे सारे विश्वास, वे सारी परम्परायें, वे सारी व्यवहार-संहिता और वे सारे दायित्त्व जो मानव जीवन की शांति, व्यवस्था और समरसता (harmony) को बनाये रखते हैं — वे सब धर्म के अन्तर्गत आते हैं। जो अपने जीवन को शांति और व्यवस्था के साथ चलाता है, वही धार्मिक है। अपने इस दायित्त्व को निभाना धार्मिकता है।

सुव्यवस्थित ढंग से, शांति के साथ जीने वाला हर व्यक्ति धार्मिक है।

जो अपने कर्त्तव्यों से विमुख होता है, वह धार्मिक नहीं होता। चाहे कोई गेरुउ कपड़े पहन ले, चाहे कोई साधु का रूप बना ले, चाहे कोई महात्मा का चोला डाल ले पर उसे धार्मिक नहीं कहा जा सकता। हम और आप अनेक संसारी कई महात्माओं और धर्मात्माओं से कहीं अधिक धार्मिक हैं।

आप की वेश-भूषा आपको धार्मिक या अधार्मिक नहीं बनाती। वेश-भूषा का धार्मिकता से कोई सम्बन्ध नहीं। कपड़ों से धार्मिकता को नहीं समझा जा सकता। कपड़ों से धार्मिक व्यक्ति की पहचान नहीं होती।

एक समय था जब ऋषि, मुनि, तपस्वी या महात्मा को कर्त्तव्य-परायणता का स्वरूप माना जाता था। कर्त्तव्य और निष्ठा का पालन करने वाले इन लोगों की वेश-भूषा उनकी पहचान होती थी। महत्त्व तो उस समय भी कर्त्तव्य-परायणता का था — वेश-भूषा का नहीं। लेकिन आज के युग में तो वेश-भूषा किसी के साधु या असाधु होने की कोई पहचान नहीं रह गई है। वेश-भूषा छलावा भी हो सकती है, वेश-भूषा दिखावा भी हो सकती है। वेश-भूषा का सहारा लेने वाले महात्मा नकली भी हो सकते हैं। रामचरित मानस में तुलसीदासजी ने ऐसे लोगों से सावधान रहने के लिये अनेक चेतावनियाँ दी हैं। उनकी यह चौपाई तो मात्र एक उदाहरण है —

 

निराचार जो श्रुति पथ त्यागी।

कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी।।

जाके नख अरु जटा बिसाला।

सोइ तापस प्रसिद्ध कलि काला।।

जो आचारहीन हैं, जो वेद-मार्ग को छोड़े हुए हैं, कलियुग में वे ही ज्ञानी कहलाते हैं, वे ही वैरागी कहलाते हैं। जिसके बड़े-बड़े नख और लम्बी-लम्बी जटायें होती हैं, उसी को कलियुग में बड़ा तपस्वी समझा जाता है।

 वेशभूषा का कोई महत्त्व नहीं है। आप साधारण कपड़े पहनकर भी कर्त्तव्य-परायण हो सकते हैं। आप सूट-बूट पहन कर भी देवता हो सकते हैं। आप टाई लगाकर भी धार्मिक हो सकते हैं।

देवता का सामर्थ्य उसके अन्दर की ऊर्जा में होता है, बाहर  के आवरण में नहीं। जीवन-देवता की ऊर्जा उसके संयम से आती है, वेशभूषा से नहीं। सारा महत्त्व संयम का है।

संयम में दिशा है। यह वही दिशा है, जिसे आपने चुना है। संयम में गन्तव्य है। यह वही गन्तव्य है जहाँ आप पहुँचना चाहते हो। फिर तो इस गन्तव्य के विपरीत जो भी हो, उसे छोड़ने का साहस जुटाना पड़ता है। एक मार्ग पर चलने के लिये, अनेक मार्ग छोड़ने पड़ते हैं। जो यात्रा करता है, उसे बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है। जो लक्ष्य की ओर बढ़ता है, उसे बहुत कुछ खोना पड़ता है। लेकिन आप यह सब अपनी मर्जी से करते  हैं। संयम आपका चुनाव है, आपकी विवशता नहीं।

संयम आपका चुनाव है — आपकी विवशता नहीं।

संयम की जरूरत उसी को पड़ती है,जो यात्रा करता है। जो चलता है, उसी को सारे निर्णय लेने पड़ते हैं। कारागर में बन्द व्यक्ति को कोई उलझन नहीं होती। न उसे कोई निर्णय लेना है, न ही कोई दिशा निर्धारण करना है। पिंजरे में बन्द पक्षी को संयम की जरूरत नहीं पड़ती। उसे तो कोई अड़चन नहीं है — न कहीं जाना है, न ही कहीं जाने की हिम्मत जुटानी है। पिंजरे में रहने की आदत पड़ जाये तो खुला आकाश देखकर घबराहट होती है — अरे, यह क्या हो गया? पहले घर था, सींकचे थे, सीमा थी। बाहर के आकाश में तो इतनी दिशाएँ हैं! कैसे चुनें? कहाँ जायें? फिर तो खुला आकाश भयावह लगता है। हम संयम से इसलिये डरते हैं, क्योंकि हम मुक्त होने से डरते हैं। फिर हमें बँधे रहना ही सरल लगता है।

संयम साहस है, आप की अपनी मर्जी है। संयम आप को मुक्त करता है, असंयम आपको बाँधे रखता है। आपका संयम आपके सुख को आपके अपने हाथ में रख देता है।

संयम के बिना आदमी ऐसा है जो सब तरफ भाग रहा हो। वह जानता ही नहीं कि उसे कहाँ जाना है। वह जानता ही नहीं कि उसे क्या पाना है। उसे लक्ष्य का बोध नहीं — उसे जीवन का बोध नहीं। तभी तो धीरे-धीरे वह विक्षिप्त हो जाता है। जिसके जीवन में दिशा नहीं होगी तो फिर क्या होगा उसका? उसका मन सब तरफ दौडता है। तभी तो वह  खण्डित हो जाता है — टुकड़े टुकड़े हो जाता है। संयम आपको टूटने नहीं देता — संयम आपको बिखरने नहीं देता। आप अखण्ड होकर जाते हो — आप एक ही दिशा में जाते हो।

आपका संयम आपको अखण्ड बनाता है।

फिर, आप भी देवता की तरह यात्रा करते हो।

मार्ग, दिशा और लक्ष्य — जब इन तीनों का ताल मेल हो जाता है तो समझो, काम बन गया। अब आप कहीं जा रहे हो — यहाँ वहाँ भटक नहीं रहे। जो यह बात समझ लेता है, उसकी तो चाल ही बदल जाती है। अब वह ठीक वैसे ही चलता है जैसे जानीवाकर व्हिस्की की बोतल पर बना हुआ आदमी चलता है।

आपने शायद जानीवाकर की बोतल पर या उसके किसी विज्ञापन में उस आदमी की तस्वीर देखी होगी। अमरीका के पत्र-पत्रिकाओं में जानीवाकर के जो विज्ञापन छपते हैं उनमें इस आदमी की तस्वीर के नीचे बड़े पते की बात लिखी  होती है —

जो व्यक्ति जानता है कि वह कहाँ जा रहा है, उसके लिये सारा संसार रास्ता छोड़ देता है।

जी हाँ, जो संयम के साथ जीता है, सारा संसार उसके कदमों पर गिरता है।

यदि आपको दिशा का बोध है, यदि आप सीधे लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं तो आप एक तीर बन जाते हो — एक ऐसा तीर जिसमें गति होती है, जिस में भेदने की क्षमता होती है।

ऐसा तीर बनकर जब आप चलते हो तो सारा संसार पीछे छूट जाता है — आपके कदमों से उठती हुई धूल के अम्बार से आच्छादित होकर।

आप आगे निकल जाते हो —

बहुत आगे।

देवता बन कर!


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