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01.19.2008
 
१२ इन्द्रिय-शक्ति
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

जिम्या जिन बस में करी, तिन बस कियो जहान।

नहिं तो औगुन ऊपजै, कहि सब सन्त सुजान।।

 

जो अपनी जिह्वा को वश में कर ले तो समझो कि सारा संसार उसके वश में हो गया। सभी विवेकी सन्त कहते हैं कि जिह्वा के असंयम से (शरीर और मन में) अनेक अवगुण उत्पन्न होते हैं।

                                                                                                                                               कबीर दास

 

जीवन-देवता की दी हुई सम्पदा हमारी चार प्रकार की शक्तियों में है इन्द्रिय-शक्ति (शरीर), समय-शक्ति (जीवन), विचार-शक्ति (बुद्धि) और साधन-शक्ति ( धन-सम्पत्ति)। इसीलिये संयम और असंयम की सारी बातें इन्हीं चार शक्तियों पर लागू होती हैं।

हमारी दस इन्द्रियों में से दो इन्द्रियाँ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। वे हैं जिह्वा और जननेन्द्रिय। इन दोनों इन्द्रियों को दो दो काम करने होते हैं। जिह्वा आहार को जाँच-परख कर गले के नीचे उतारने के काम भी आती है, तथा वार्तालाप के लिये शब्दोच्चारण के काम भी आती है। इसी प्रकार हमारी जननेन्द्रियाँ भी दो काम आती हैं। पहला काम है स्रावों का परित्याग और दूसरा काम है रतिक्रिया। इन दोनों इन्द्रियों के काम बड़े महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिये इनका संयम भी बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है। इन्द्रियों का संयम हमें सुख देता है और इनका असंयम हमें दुख देता है।

जीभ का असंयम हमारे कई दुखों का कारण बनता है। जीभ का असंयम दो प्रकार से होता है एक रसना का असंयम और दूसरा वाणी का असंयम।

जीभ को अधिक महत्त्व देकर हम लोग ऐसे पदार्थ खाते हैं जो अनावश्यक ही नहीं, हानिकारक भी होते हैं। फिर हमें अपच होती है, बीमारी होती है, दुर्बलता होती हे। हम कई रोगों के शिकार होते हैं। हमारी अधिकांश बीमारियों की जड़ पेट की बीमारी है और इसका सीधा सम्बन्ध हमारे आहार से है।

वैद्य धन्वन्तरि एक बार पक्षी बन कर काशी में वाग्भट्ट को उपदेश देने आये थे। जब उन्होंने पूछा— “कोऽरुक?” (स्वस्थ कौन रहता है?) तब पक्षी रूप में धन्वन्तरि ने उत्तर दिया

मितभुक, ऋतुभुक, हितभुक।

कम खाने वाला, ऋतु के अनुकूल खाने वाला और पौष्टिक आहार खाने वाला स्वस्थ रहता है।

 

मिताहार का महत्त्व आरोग्य विज्ञान से भी है और अध्यात्म विद्या से भी। आहार से केवल रक्त, माँस-हाड़ ही नहीं बनते, इससे विचार संस्थान और अन्तःकरण भी प्रभावित होता है। जैसा खाये अन्न, वैसा बने मनकी उक्ति आपने सुनी होगी। मनोविकार को उभारने और अनीति की ओर बढ़ने में अनुपयुक्त आहार की भी एक बड़ी भूमिका है।

सुख की ओर बढ़ने का पहला कदम निरोगी काया है, र निरोगता की ओर बढ़ने का पहला कदम उत्तम आहार है। आप क्या खाते हैं, कितना खाते हैं, यह आपके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। रसना का असंयम, आपकी सुख-प्राप्ति में बाधा है एक बहुत बड़ी बाधा।

उपयोगी, पौष्टिक और सुपाच्य आहार तो आवश्यक है ही आपके लिये, लेकिन जब आप अपने आहार को एक साथी दे देते हैं तो आप न केवल देवताओं की तरह चिरायु बन सकते हैं बल्कि उनके जैसा चिरयौवन भी प्राप्त कर सकते हैं। बस, आपके उत्तम आहार को एक उत्तम मित्र चाहिये। आहार के इस मित्र का नाम है व्यायाम! आहार और व्यायाम की जोड़ी बड़ी कारगर है। यह जोड़ी ऐसी जोरदार है जैसे एक जमाने में अमिताभ बच्चन और धर्मेन्द्र की जोड़ी हुआ करती थी। आपको शायद याद होगा कि जहाँ ये दोनों मिलते थे, वहीं जादू चल जाता था, वहीं तालियाँ गूँजने लगती थीं। आप उपयुक्त आहार के साथ उपयुक्त व्यायाम को अपने जीवन का अंग बनाकर देखिये, और स्वयं अनुभव कीजिये।

उपयुक्त आहार और उपयुक्त व्यायाम आपको देवता जैसा स्वस्थ और सुन्दर बना सकते हैं।

भारतीय धर्मवेत्ता बहुत पहले से शारीरिक व्यायाम की महत्ता  को समझते थे। व्यायाम के महत्त्व के कारण ही योगासन हमारी पुरातन धर्म-पद्धति का एक हिस्सा बने हुए हैं। विभिन्न प्रकार के व्यायामों की तुलना में आज भी योगासनों को श्रेष्ठ समझा जाता है।  पश्चिमी देशों में योगासनों की लोकुप्रियता बढ़ने का यही कारण है।

 आज पश्चिम के चिकित्सा-शास्त्री भी व्यायाम की महत्ता को समझने लगे हैं, स्वीकार करने लगे  हैं। अब तो नवीन शोधकर्त्ता पिछले कई सालों से मुक्त-कण्ठ से व्यायाम के गुण गाने में लग गये हैं। यू.एस.नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन एजिंग के भूतपूर्व डायरेक्टर डा. राबर्ट बटलर का यह कथन ध्यान देने योग्य है

व्यायाम को यदि गोली बना कर शीशी में पैक किया जा सकता तो सारे डाक्टर सबसे ज्यादा इस गोली का ही नुस्खा (prescription) लिखते क्योंकि यह नुस्खा ही सबसे अधिक प्रभावशाली है।

सबसे अच्छी बात यह है कि शारीरिक व्यायाम सबके लिये आसानी के साथ उपलब्ध है। ऐसा नहीं है कि आपको फैंसी जूते पहन कर और फैंसी कपड़े पहन कर हेल्थ क्लब में घंटों घंटों पसीना बहाना है। आधा घंटा रोज पैदल चलने जैसे हल्के -फुल्के व्यायाम से भी कई बीमारियों में लाभ मिलता है। थोड़े से, और सरल व्यायाम भी आप को अनेक खतरनाक बीमारियों से बचा सकते हैं।

अमरीका और केनेडा में पिछले बीस-पच्चीस साल से मधुमेह (diabetes) के रोगियों की संख्या दुगुनी हो गई है। इस खतरनाक वृद्धि का सीधा सम्बन्ध लोगों की बढ़ती हुई तोन्द से है। विशेषज्ञों का कहना है कि टाइप II मधुमेह की रोकुथाम आहार और व्यायाम से ही हो जाती है।

यही बात अन्य रोगों पर भी लागू होती है। अमरीका के एक डाक्टर का कहना है कि हृदय-रोग से बचने के सबसे आसान, सब से सुरक्षित और सबसे किफायती तरीके की ही सब से अधिक अवहेलना की गई है। आप जान गये होंगे कि यह तरीका और कुछ नहीं, शारीरिक व्यायाम ही है।

फिर भी बहुत से लोग शारीरिक व्यायाम से कतराते हैं। सबके पास अलग-अलग तर्क होते हैं। इन में जो एक लोकुप्रिय तर्क है, वह है हमारे पास समय नहीं है। समयाभाव शारीरिक व्यायाम न करने का सामान्य तर्क बना हुआ है। पर वास्तव में यह हमारी प्राथमिकता की बात है, समयाभाव की नहीं। इस बात को समझने के लिये हम आपको अपने दैनिक जीवन से लिया गया एक किस्सा सुनाते हैं।

हमारे शहर वाटरलू में आमोद-प्रमोद, खेल-कूद और शारीरिक क्रियाशीलता (physical activity) के लिये एक काफी बडा काम्पलेक्स (Recreational Complex) है। इसमें तरण-पुष्कर (Swimming pools) हैं, हाकी आदि खेलोंके लिये रंग-स्थली (Stadium) हैं, तथा पैदल चलने और दौड़ने के लिये ट्रैक है। इस ट्रैक पर बहुत से लोग पैदल चलने (Walking) के उद्देश्य से आते हैं। क्योंकि ये सारी सुविधाएँ आभ्यन्तर (indoor) हैं इसलिये कड़ी ठंड और बर्फीले मौसम में भी इस स्थान पर बहुत से लोग आते हैं युवा, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सभी। हम दोनों भी वहाँ जाते हैं ट्रैक पर चलने के लिये भी, और तैरने के लिये भी। वैसे तो वहाँ पर अधिकांश लोग गोरे होते हैं, पर थोड़े-बहु हिन्दुस्तानी चेहरे भी नज़र आते हैं।

कुछ दिन पहले की बात है। मैं ट्रैक पर चल रहा था, तो मुझे छरहरे बदन वाली एक बड़ी सुन्दर भारतीय महिला नज़र आईं। देखने में करीब ३७-३८ वर्ष की लगती थीं और उन का पूरा ध्यान अपने चलने की तेज रफ्तार पर था। जब उन से नज़र मिली तो मैं ने शिष्टाचार के नाते उन्हें हैलो किया और फिर हम अपने-अपने मार्ग पर चलते गये। उस दिन के बाद भी वे महिला कई बार मिलीं, किन्तु एक औपचारिक हैलोके अलावा कभी कोई और बात नहीं हुई। हम ने देखा कि वे सुबह छः बजे ट्रैक पर आती थीं और एक घंटे की तेज रफ्तार की सैर (swift-walk) करके चली जाती थीं।

एक दिन कुछ ऐसा मौका बना कि मेरी उनसे दो-चार मिनट की बात हो गई। नाम मालूम हुआ डाक्टर श्रीमती जयश्री सहगल। इसी शहर में उनकी मेडिकल प्रैक्टिस है। बाद में यह भी पता चला कि वे अपने मित्रों और रिश्तेदारों के बीच जया के नाम से जानी जाती हैं।

काफी दिनों तक जया जी के साथ हमारा परिचय यहीं तक सीमित रहा। हाँ, मुझे यह जिज्ञासा अवश्य होती थी कि केनेडा में रहने वाली व्यस्त डाक्टर कैसे समय निकाल कर रोज सुबह छः बजे यहाँ पहुँच जाती थीं। हम लोग तो कई बार आने में देर भी कर देते थे, या कोई-कोई दिन चूक भी जाते थे, लेकिन जया जी की अनुपस्थिति यदा-कदा ही होती थी। एक दिन मैंने तय किया कि आज पूरे समय तक जया जी के साथ-साथ ही चलेंगे ताकि उनके बारे में कुछ और जाना जा सके। मौका मिलने पर मैं ने उन से पूछा

बहुत से डाक्टर तो हमेशा अपनी व्यस्तता की तूती बजाते रहते हैं, फिर आप यहाँ आने के लिये कैसे समय निकाल लेती हैं?”

जया जी ने मेरी ओर देखा और मुस्करा कर बोलीं

भाई साहब, समय की कमी शारीरिक व्यायाम न करने का एक बहाना है। मैं नहीं मानती कि व्यायाम से समय बर्बाद होता है। हर आदमी इस दुनिया में व्यस्त है, लेकिन फिर भी हमें अपनी प्राथमिकताओं को समझना पड़ता है। यदि हम व्यायाम के महत्त्व को समझ लें तो समय अपने आप निकल आता है। समय की कमी तो तब तक रहती है, जब तक हम शारीरिक क्रियाशीलता (Physical Activity) का महत्त्व नहीं समझते। फिर एक बात और है आज यदि कोई थोड़ा सा समय नहीं निकाल सकता तो कल उस को बहुत सा समय निकालना पड़ेगा डाक्टरों और अस्पतालों के चक्कर लगाने के लिये।

जया जी एक मिनट के लिये चुप रहीं, फिर बोलीं

देखने में लगता है कि मैं प्रतिदिन यहाँ पर समय बर्बाद करती हूँ, पर वास्तविकता यह है कि सुबह का यह घंटा मेरे समय को कम नहीं करता, बल्कि मेरे समय को बढ़ाता है।

वह कैसे?” मैं ने आश्चर्य व्यक्त किया।

वह ऐसे कि यह एक घंटा मेरी कार्य-क्षमता और उत्पादनशीलता (Capacity & productivity) को बढ़ा कर मुझे कई अतिरिक्त घंटों का फल देता है”, जया जी ने अपनी बात पूरी की।

फिर जया जी ने अपने बारे में और भी कई बातें बताईं। पहली बात तो यह है कि जया जी अढ़तीस वर्ष की नहीं, बल्कि बावन वर्ष की हैं। दिल्ली की रहने वाली जया जी लेडी हार्डिंग्स मेडीकल कालेज से पढ़ कर सन् १९७६ में केनेडा आई थीं। उनके दो बच्चे हैं पच्चीस साल का बेटा, और बीस साल की बेटी। एक बात और है जया जी के वृद्ध सास-ससुर भी इनके साथ रहते हैं, जिनकी वे पूरी देखभाल करती हैं। इनके ससुर जी ९१ वर्ष के हैं। साधु-स्वभाव वाले श्री श्याम सुन्दर लाल सहगल इस शहर के आदरणीय वयोवृद्ध हैं।

जया जी प्रतिदिन सुबह ५:३० बजे उठती हैं। छः बजे वे ट्रैक पर होती हैं। सात बजे घर जा कर सब के लिये खाना बनाती हैं, फिर तैयार होकर नौ बजे अपने क्लिनिक पहुँच जाती हैं। शाम को छः बजे घर आती हैं। फिर, घर के काम खत्म करते करते रात के दस बज जाते हैं।

जया जी कहती हैं — “यह सुबह के इस एक घंटे का कमाल है जिसके कारण मैं सारा दिन ऊर्जा से भरी रहती हूँ। फिर यह कोई दो चार दिन की बात नहीं है, सालों सालों से मेरी यही दिनचर्या चली आ रही है।  मैं कई सालों से कभी बीमार नहीं पड़ी। मैं आपको एक बात यह भी बता दूँ कि शारीरिक व्यायाम न केवल रोग-प्रतिशोधक क्षमता (Immune System) को बढ़ाता है, बल्कि इससे मानसिक तनाव भी कम होता है।

मैं अपने मरीजों को भी यही सलाह देती हूँ कि वे किसी न किसी ढँग से अपने आप को सक्रिय बनाये रखें, तथा अपने आहार पर पूरा ध्यान दें। मेरे आधे से ज्याद मरीज आहार और व्यायाम के प्रति जागरूक हैं।

जया जी की बात ठीक है। आहार और व्यायाम की बातें तो बहुत से डाक्टर करते हैं, लेकिन जो लोग स्वयं अमल करते हैं, उनकी बात में कुछ और ही दम होता है।

देखिये, चाचरा साहब”, थोड़ी देर रुक कर जया जी फिर बोलीं, “हम डाक्टर भी इन्सान हैं। हम भी चाहते हैं कि लोग बीमारियों से बचे रहें। यह ठीक है कि हमारा काम आप लोगों का इलाज करना है, लेकिन हमारा काम यह भी है कि हम आप को बीमारियों से बचने की शिक्षा दें। अंग्रेजी की कहावत है — Prevention is better than cure (इलाज से ज्यादा अच्छा है कि बीमारियों की रोक-थाम की जाय)। यह रोक-थाम सरल है, किफायती है और काम कष्टदायक है।

लेकिन हम बीमारियों की रोक-थाम तभी कर सकते हैं जब हम इस बात को समझ लें कि हमारे शरीर की रक्षा की मूल जिम्मेवारी  (primary responsibility) हमारी अपनी है डाक्टरों की नहीं। डाक्टर तो हमारी सहायता के लिये हैं। जहाँ सुख भोगना हमारा अधिकार है, वहीं अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना हमारा कर्त्तव्य है। हर अधिकार के साथ एक कर्त्तव्य जुड़ा रहता है।

व्यायाम न केवल आपको बीमारियों से बचाकर आपको युवा बनाये रखता है, बल्कि इस की उपयोगिता खोये हुए यौवन को पुनः प्राप्त करने के लिये भी सिद्ध हो चुकी है। बढ़ती उम्र के प्रभावों (aging) पर बहुत से शोध-कार्य हुए हैं और पिछले कई सालों में इनके बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। यह सारी जानकारी देना इस पुस्तक का विषय नहीं है। फिर भी हम आप को इतना और बतलाना चाहते हैं कि व्यायाम कोई बोझ नहीं है। यह तो आपकी बीमारियों के बोझ को हल्का करता है। व्यायाम आपकी व्याधियों से होने वाले दुख को कम करता है। व्यायाम आप को स्वस्थ और युवा बनाये रखता है।

आपका व्यायाम आपको देवता बनने में सहायता करता है।

        

अब हम जिह्वा के दूसरे काम की चर्चा करते हैं

जहाँ हमारी जीभ रसना का काम करती है, वहीं हमारी जीभ वाणी की भूमिका भी निभाती है। वाणी का स्तर हमारे गुण, हमारे कर्म और हमारे स्वभाव का परिचायक है। जहाँ एक ओर जीभ का असंयम हमारे बोलने में कटुता लाता है, हृदय में कुत्सा लाता है, वहीं दूसरी ओर जीभ हृदय के साथ मिलकर मधुर भाषण और सुसंस्कृत आचरण का अनुदान बन जाती है।

पुराने समय की बात है

एक राजा वन-विहार के लिये आये हुए थे। जहाँ उनका पड़ाव था, उसी के पास एक कुआँ था। वहाँ पर एक अन्धा रहता था। कुएँ से पानी निकालता था और आने जाने वालों को पानी पिलाता था। राजा को जब प्यास लगी तो सेनापति ने सिपाही को पानी लाने भेजा। सिपाही वहाँ जाकर बोला

 ओ रे अन्धे, एक लोटा जल इधर दे।

अन्धे ने उत्तर दिया— “जा भाग, तेरे जैसे मूर्ख नौकर को मैं पानी नहीं देता। सिपाही खीज कर वापिस लौट गया। अब सेनापति स्वयं वहाँ पहुँचे और उस अन्धे से बोले— “अन्धे भाई, एक लौटा जल शीघ्रता से दे दो।

अन्धे ने उत्तर दिया— “कपटी मीठा बोलता है। लगता है, पहले वाले के ही सरदार हो।  मेरे पास तेरे लिये पानी नहीं है।

दोनों चल पड़े वापस राजा के पास। शिकायत की— “महाराज, बुड्ढा पानी नहीं देता।

राजा उन दोनों को लेकर स्वयं कुएँ पर पहुँचे। नमस्कार किया और कहा— “बाबा जी! प्यास से गला सूखा जा रहा है। थोड़ा सा जल दें तो प्यास बुझायें।

महाराज! बैठिये, अभी जल पिलाता हूँ”, अंधा बोला।

राजा ने जी भर के जल पिया, सिपाही और सेनापति ने भी। राजा ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की, “महात्मन्! आपकी आँखें न होते हुए भी कैसे जाना कि मैं राजा हूँ? एक नौकर है और दूसरा सरदार?”

अन्धे बूढ़े व्यक्ति ने हँस कर उत्तर दिया, “महाराज, व्यक्ति की वाणी से ही उसके व्यक्तित्व का पता लग जाता है।

सुसंस्कृत वाणी देवता का शृंगार है।

मधुर भाषी के लिये कोई पराया नहीं है।

 

वाणी की मधुरता के लिये वेदों में भी प्रार्थना की गई है

वाचस्पतिर्वाज नः स्वदतु स्वाहा।

                                                                                                          यजुर्वेद

वाणी का अधिपति हमारी वाणी को मधुर बनावे।

 

मा वो वचांसि परिचक्ष्याणि वोचं।

                                                                                                        सामवेद

         हे देवो, भद्रपुरुषो! तुम्हारे न सुनने योग्य वचनों को मैं न बोलूँ।

जीभ को संयत रखने के दो तरीके हैं उपवास, जिसका प्रभाव शरीर पर पड़ता है और मौन, जिसका प्रभाव मन पर प्ड़ता है। शारीरिक बल और मनोबल दोनों ही आप के सामर्थ्य में वृद्धि करते हैं। ज़ेन गुरु दोगन कहते हैं

जिसका मुँह उसकी नाक की तरह शांत हो जाता है, वह अनेक प्रकार के दुखों से बच जाता है।

जीभ के बाद जननेन्द्रियों का नम्बर आता है। रतिक्रिया एक सामान्य प्राकृतिक क्रिया है जिसे सीमाबद्ध रखकर जीवन शक्ति की रक्षा की जाती है। जननेन्द्रियों का दुरुपयोग मानसिक उत्तेजना और कामुकता के कारण होता है।

 कामुकता, काम का विकृत रूप है, असंयमित रूप है। काम स्वीकार्य है, कामुकता नहीं। किसी भी समय, किसी भी स्त्री से, (किसी भी पुरुष से) संभोगरत होने की इच्छा मानसिक कष्ट तो देती ही है, इसके कारण  शारीरिक कष्ट भी बढ़ने लगते हैं। बढ़ती हुई यौन-सम्बन्धी बीमारियाँ जैसे हरपीज़, गिन्नौरिया, सिफलिस आदि असंयम का परिणाम हैं। ये बीमारियाँ कितनी कष्टदायक और कितनी दुखदायी होती हैं ये तो आप उनसे पूछिये जो इनका शिकार हैं और जिनका जीवन नर्क बनकर रह गया है।

असंयमी न केवल गिरते-पड़ते, रोते-धोते ही जीता है, बल्कि कई बार तो शर्मनाक और तिरस्कार भरा जीवन जीने के लिये विविश हो जाता है। संयम की सहायता से आप भरपूर जीवन जीते हैं।


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