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12.26.2007
 
११ - संयम
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

यत्संयमो न वि यमो यन्न संयमः।

जिस को संयमित किया है, उस को अधिक दबाव में  न रखो, परन्तु जिसे दबाव में नहीं रखा है उसे अच्छी प्रकार संयमित करो।

                                                                                                            -- अथर्व वेद

 

  

जीवन-देवता ने हमें वह सारी सम्पदा दी हुई है जो देवताओं के पास है। फिर देवताओं वाले सारे सुख हम लोगों को क्यों नहीं मिल पाते?

इसका एक ही कारण है

हम अपनी सम्पदा को नष्ट कर देते हैं। हमें इस की उपयोगिता की समझ नहीं होती। हम अपनी सम्पदा को असंयम के  कारण व्यर्थ में  गँवा देते हैं। हमें संयम की आवश्यकता है।

लीजिये, यह क्या हो गया?

संयम और असंयम की बातें कहाँ से आ टपकीं? आप पूछेंगे कि अभी तक तो हम आपको सुख भोगने के सपने दिखा रहे थे अब संयम और असंयम की बातों पर कैसे उतर आये?

घबराइये नहीं! हम आपको यह बताने जा रहे हैं कि संयम भोग के विरोध में नहीं है। संयम तो सुख भोगने में सहायता करता है। लेकिन, बहुत से लोग इस बात को नहीं जानते वे दमन को ही संयम समझते हैं। वे सोचते हैं कि संयम का अर्थ है

        सुख-भोग पर रोक लगाना,

        अपने आप को सुख से वंचित रखना,

        इच्छा की पूर्त्ति न होने देना,

        कामना का दमन करना,

        मन को मारना आदि-आदि।

इसी प्रकार अधिकांश लोग सोचते हैं कि असंयम का अर्थ है

        सुख भोगने की खुली छूट,

        कामना पूर्त्ति की पूर्ण स्वतंत्रता,

        भोग करने की मुक्त स्वीकृति,

        मजे लेने की खुली इजाजत,

        हर काम की पूरी आजादी, बिना किसी रोक टोक के।

संयम और असंयम के ये अर्थ बिल्कुल गलत हैं भ्रांतिपूर्ण हैं। समझने की इस भूल के कारण हम धोखा खाते चले आये हैं।

सबसे पहले तो हम आपको यह बताना चाहते हैं कि संयम का अर्थ दमन नहीं है। संयम का अर्थ तो दमन के अर्थ से बिल्कुल विपरीत है। संयम में आप अपने मन को नहीं मारते मन को मारना तो दमन है। संयम में आप इन्द्रियों को वंचित नहीं करते वंचित करना तो दमन का काम है संयम का नहीं। संयम कामना का दमन नहीं करता। संयम कामना को दिशा देता है।

संयम आपकी कामना को दिशा देता है।

कामना में हमारी ऊर्जा होती है। ऊर्जा को दबाया नहीं जा सकता। यदि उसे दबा दिया तो वह किसी और मार्ग से बाहर निकलेगी किसी अवांछित मार्ग से किसी विकृत रूप में। यदि काम-वासना का बुखार चढ़ा हुआ है तो दमन से कुछ नहीं होगा। हमें उस वासना को समझना होगा उसे अनुशासित करना होगा उसका रूपांतरण करना होगा। ब्रह्मचर्य का अर्थ यह नहीं कि आप काम वासना से लड़ने लगो। ब्रह्मचर्य का अर्थ है कि आप काम वासना को समझो। शांति पाने का यह तरीका कदापि नहीं हो सकता कि आप क्रोध से झगड़ने लगो। शांति पाने का तरीका है कि आप क्रोध की जड़ तक पहुँचो। शांति तो अशांति को समझ कर ही मिल सकती है। इसी प्रकार वासना को समझ कर ही उसे अनुशासित किया जा सकता है।

दमन से हमें बचना है। कामना का दमन विनाशकारी है। दमन कोई उपलब्धि नहीं है। दमन कोई प्राप्ति नहीं है। कामना का दमन हम लोगों की एक बड़ी भूल है।

दमन हमें खण्डित करता है हम हिस्सों में बँट जाते हैं। फिर एक हिस्सा दबा रहा है दूसरा हिस्सा दब रहा है। याद रखिये! शरीर भी आपका है, मन भी आपका है, हृदय भी आपका है, आत्मा भी आपकी ही है! सोचिये जरा! कौन किसको दबा रहा है? यदि आप अखण्ड रहना चाहते हो तो दमन का सहारा मत लीजिये।

दमन में निन्दा है आप का एक हिस्सा निन्दा कर रहा है दूसरा हिस्सा निन्दित हो रहा है। जो निन्दा कर रहा है वह भी आप हैं और जो निन्दित हो रहा है वह भी आप ही हैं। अपनी निन्दा करके तो हम अपने बनाने वाले की ही निन्दा करते हैं।

दमन में विनाश है लड़ने वाले दोनों हिस्से आप के ही हैं। इन के संघर्ष में आपकी ही ऊर्जा का नाश हो रहा है। दमन से आपकी ऊर्जा व्यर्थ जाती है!

दमन में झूठ है अन्दर से तो आप चाहते हैं पर मानने से कतराते हैं।

दमन में आडम्बर है अन्दर कुछ और घट रहा है बाहर कुछ और दिखाया जा रहा है। अन्दर क्रोध भरा पड़ा है लेकिन उसे दबा कर शांत बने दिख रहे हैं। अन्दर काम वासना सता रही है लेकिन ऊपर से ब्रह्मचारी बने बैठे हैं।

दमन में अहंकार है दमन करने वाला अपने अहम को ही मह्त्त्वपूर्ण समझता है।

दमन में भय है दमन वाला चित्त डरता है कि जिसे दबाया है उसे ढीला छोड़ देने पर वह फिर उठ खड़ा हो जायेगा।

दमन में यात्रा नहीं हो सकती। दमन वाला चित्त आगे नहीं बढ़ सकता। वह जिसका दमन करता है उसी के साथ बंध जाता है।

लेकिन देवता तो यात्रा करते हैं। इसीलिये दमन करने वाला कभी देवता नहीं बन सकता। देवता कामना का दमन नहीं करते।

देवता कामना का दमन नहीं करते। 

संयम इसके बिल्कुल विपरीत है जहाँ दमन आपकी ऊर्जा का नाश करता है वहाँ संयम आपकी ऊर्जा की रक्षा करता है।

हाँ तो जीवन-देवता हर मनुष्य के भीतर बैठा है लेकिन हम लोग इसका महत्त्व नहीं समझते। जिस अमृत को हम अपने अन्दर धारण किये हैं उसका मूल्य नहीं जानते उसे हम सतत गँवाते रहते हैं। फिर अपने दुर्भाग्य पर रोते हैं।

यह असंयम के कारण होता है।

यह अमृत हमें इसलिये मिला है कि हम इसे संचित करके रखें, उसका सुनियोजित उपयोग कर अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त करें सुख पायें, आनन्द पायें, ऐश्वर्य पायें।

यह संयम होता है।

जीवन कामधेनु गाय है। हमें उसका दूध पीना है। परमात्मा ने जीवन-रूपी कामधेनु गाय हमें दी ही इसीलिये है। उसका दूध पीना तो हमारा अधिकार है। लेकिन साथ में एक जिम्मेवारी भी है हम इस दूध को छेदों वाले बर्तन में न दुहें तथा उसे दुह कर बेकार न जाने दें।

इस जिम्मेवारी को समझना और निभाना संयम है।

और इस जिम्मेवारी को नजर-अन्दाज करना असंयम है।

अपने कर्त्तव्य की उपेक्षा करना असंयम है।

सुख का मार्ग खुला रहे ऐसी व्यवस्था करना संयम है। इस व्यवस्था के प्रति उदासीन रहना असंयम है।

संयम सुख के ऊपर कोई रो नहीं है। संयम सुख के ऊपर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। संयम आपके ऐश्वर्य में बाधा नहीं है। संयम तो ऐश्वर्य की रक्षा करता है। संयम तो आप के भोग को बनाये रखता है। संयम तो आप के भोग को प्रमाद बनने से रोकता है। संयम आपके सुख को दुख में बदलने से रोकता है। संयम के कारण ही आप दूध पी लेते हो अन्यथा वह तो छिद्रों से निकल कर बह जाता।

सुख का भोग हमारा अधिकार है। स्वयं महर्षि पतंजलि इस बात की पुष्टि करते हैं

 

सम्राट पुष्यमित्त का अेवमेध यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हुआ। दूसरी रात को अतिथियों की बिदाई के उपलक्ष में नृत्योत्सव रखा गया। महर्षि पतंजलि भी उस उत्सव में सम्मिलित हुए थे।

महर्षि के शिष्यों को पतंजलि महाराज का नृत्योत्सव में शामिल होना अच्छा नहीं लगा। ये कैसे गुरु हैं जो सुन्दरियों के नृत्य में रुचि रखते हैं! उनके शिष्यों में एक शिष्य था चैत्र। नृत्योत्सव में महर्षि की उपस्थिति चैत्र के बहुत खली। लेकिन वह बोला कुछ नहीं। उसने अपनी खिन्नता को छुपा कर रखा।

एक दिन महर्षि योग-दर्शन पढ़ा रहे थे तो चित्त और वृत्तियों की चर्चा होने लगी। मौका मिलते ही चैत्र ने उपालम्भपूर्वक पूछा — “गुरुवर क्या नृत्य-संगीत के रास रंग चित्त वृत्तियों के निरोध में सहायक होते हैं?”

महर्षि शिष्य का अभिप्राय समझ गये। वे जानते थे कि उनका नृत्य-समारोह में जाना शिष्यों को अच्छा नहीं लगा था। वे भी चाहते थे कि शिष्यों के संशय का समाधान करें। मन में सोचा अच्छा हुआ चैत्र ने यह प्रश्न पूछ लिया।

फिर महर्षि पतंजलि बड़े प्रेम से बोले

 सोम्य! आत्मा का स्वरूप रसमय है। रस में उसे आनन्द मिलता है और तृप्ति भी। रसपान करना तो बिल्कुल उचित है। हाँ, वह रस विकृत न होने पाये और वह रस अपने शुद्ध स्वरूप में बना रहे, इसके लिये सावधानी की आवश्यकता पड़ती है। इस सावधानी का नाम संयम है। विकार की आशंका से रस का परित्याग कर देना उचित नहीं है। क्या कोई किसान फसल के पशुओं द्वारा चर लिये जाने के डर से खेती करना छोड़ देता है? यह तो संयम नहीं पलायन हुआ। यह तो ऐसे हुआ जैसे जल को तरलता से वंचित रखा जाये और अग्निको ऊष्मा से। सो हे भद्र! भ्रम मत करो।

जीवन को नीरस बना कर किया गया संयम व्यर्थ है निरर्थक है।

जैसे कि आप जानते हैं महर्षि पतंजलि ने हमें योगशास्त्र का अनुपम ग्रंथ दिया है। संयम की विवेचना के लिये उनसे बढ़ कर अधिकृत विद्वान (authority) और कोई नहीं है।

भोग त्याज्य नहीं है लेकिन भोग को विकृत नहीं होने देना। वेद कहते हैं रसो वै सः, अर्थात रस ही परमात्मा है। रसपान तो कभी त्याज्य हो ही नहीं सकता। हमें तो इतना करना है कि इस रस का स्वाद बना रहे। संयम रस को स्वादिष्ट बनाये रखता है। असंयम में रस स्वादहीन होने लगता है छिद्रों में से बहकर बिखर जाता है। फिर हम निचोड़े गये नींबू की तरह छूँछ बनकर रह जाते हैं और अपनी दरिद्रता का रोना रोते हैं।

हमें अपना यह रोना ही तो बन्द करना है!

हमारा संयम हमें रोने से बचाता है।



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