अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
11.23.2007
 
१० - जीवन-देवता
जागिये -- आप देवता हैं !
चाचरा दम्पति

 

 विश्वमेष जो उयं शिवाभिमर्शनः।

 

यह मेरा हाथ भाग्यवान है। यह मेरा हाथ अधिक प्रभावशाली है। यह मेरा हाथ रोगों का निवारक है। यह मेरा हाथ शुभ मंगल बढ़ाने वाला है

-- ऋग्वेद

 

प्रज्ञा पुराण में एक कहानी है -

दो राजाओं में युद्ध ठन गया। दोनों राजा एक ही महंत के शिष्य थे और एक ही देवता के पुजारी। युद्ध में विजय का आशीर्वाद लेने दोनों ही महन्त के पास पहुँचे।

महन्त अन्दर देवता के पास गया, फिर वापस आकर पहले राजा से बोला, तेरी जीत होगी।

वह राजा निश्चिन्त होकर चला गया।

जब दूसरे राजा ने महंत से आशीर्वाद माँगा तो उसने कहा, आपका जीतना कठिन है।

अब दूसरे राजा ने जोर-शोर से तैयारियाँ शुरू कर दीं। उसने सब से कहा, हारना है तो क्या हुआ, हम फिर भी शान के साथ लड़ेंगे और दुनिया को दिखला देंगे कि लड़ने का जौहर कैसे होता है।

जब युद्ध छिड़ा तो उसका परिणाम महंत के कथन के विपरीत निकला। जिसे जीतने की आशा दिलाई गई थी, वह हार गया। जिसे हारने का भय दिखाया गया था, वह जीत गया।

युद्ध समाप्त होने के बाद दोनों अपने महंत गुरु को उलाहना देने गये। उन दोनों की शिकायत सुनकर महन्त ने बड़ी गंभीर मुद्रा बना कर कहा -

 देवता से अधिक महत्त्व आपके सामर्थ्य का है। आशीर्वाद से अधिक महत्त्व आपके पराक्रम का है।

आप की सार्थकता आपके अपने सामर्थ्य में है।

महत्त्व आपके सामर्थ्य का है, किसी के आशीर्वाद का नहीं।

देवताओं की साधन-सम्पन्नता भी उनके अपने सामर्थ्य में होती है। लेकिन, देवतागण इसके बारे में आपको कुछ नहीं बताते। हाँ, हम एक ऐसे देवता को जानते हैं जो आपको अपने अन्दर सामर्थ्य पैदा करने का रहस्य बतलाने को तैयार है। उस देवता का नाम है -

जीवन-देवता!

        

स्वर्ग के देवता एक बार पृथ्वी पर विचरण करने आये। उन्हें आशा थी कि धरती के निवासी अर्थात साधारण मनुष्य उनका अच्छा स्वागत करेंगे, उनका खूब सत्कार करेंगे। देवताओं ने सोचा था कि उनको देखते ही इस पृथ्वी के लोग उनको पलकों पर बैठायेंगे। इसी कामना से वे धरती पर घूमने फिरने आये थे।

लेकिन ऐसा कुछ न हुआ।

जब देवतागण धरती पर विचरण कर रहे थे, उस समय शीत ऋतु का अन्त हो रहा था। वसन्त ऋतु आने के लिये उत्सुक बैठी थी। खेतों में अनाज के पौधे लहलहा रहे थे। गेहूँ में बालें निकली हुई थीं। सब तरफ फूल खिल रहे थे। कई वृक्षों पर फल भी आने लगे थे। सब लोग प्रकृति की छटा को देखकर फूले नहीं समा रहे थे। किसीने देवताओं की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा। देवता बड़े निराश हुए।

स्वर्ग के देवताओं ने धरती से जाकर पूछा- तुम्हारे पुत्र किस उपलब्धि में इतने हर्ष-विभोर हो रहे हैं? ये हमारी तरफ क्यों नहीं देख रहे? हम से कुछ माँगने क्यों नहीं आते?

धरती ने बताया-तात! हमारे बच्चों का जीवन स्वतः ही देवता है। इन्हें जिस किसी चीज़ की आवश्यकता होती है, वह उसी देवता से ले लेते हैं।

 सो कैसे? देवताओं ने आश्चर्य प्रकट किया।

तब धरती देवताओं को एक स्थान पर ले गई, जहाँ पर कुछ कृषक खेत में काम कर

देखो, इसके हाथ इसे अन्न देते हैं। फिर इसके हृदय में उमंग उमड़ती है। इसका मन प्रसन्नता से भर जाता है। आप लोग और क्या देते हैं? जब ये अपने आप सब कुछ पा सकते हैं, तो फिर वे आपके पास क्यों आवें? क्यों करें आप से याचना? फिर एक बात और है! अपनी मेहनत के साथ इन्हें और भी बहुत कुछ मिलता है - इन्हें स्वास्थ्य और आरोग्य मिलता है, इन्हें सौन्दर्य प्राप्त होता है, इनमें सहयोग और सहकारिता की भावना जाग्रत होती है। इन्हें आप लोगों से कुछ माँगने की जरूरत नहीं है।

देवतागण अपना छोटा सा मुँह लेकर चले गये।

गायत्री ज्ञानपीठ के आचार्य श्रीराम जी शर्मा इस कथा में आगे लिखते हैं कि तब से देवताओं ने धरती पर आना छोड़ दिया है। अब देवताओं ने पृथ्वी का साम्राज्य मनुष्य को ही सौंप दिया है - उन्होंने जीवन-देवता का सामर्थ्य समझ लिया है।

जब देवताओं ने आपके सामर्थ्य को समझ लिया है तो फिर आपको अपने देवत्व को समझने में क्या आपत्ति हो सकती है? आप का जीवन ही आपका देवता है। जीवन-देवता ही सच्चा देवता है।

अब आप अन्य देवताओं को भूल जाइये - अपने आप को याद रखिये। प्रमुखता आप की है - देवताओं की नहीं।

प्रज्ञा पुराण कहता है कि देवता यदि कहीं हैं तो वे हमारे ही जीवन में हैं, हमारे ही अन्दर हैं, हमारी ही सत्प्रवृत्तियों में हैं। महत्त्व आपके जीवन का है - देवताओं के जीवन का नहीं। अपने जीवन-काल में देवताओं वाले सारे सुख आप ने ही भोगना है - स्वयं देवता बनकर। जीवन-देवता ही आपका अभीष्ट है। आपके अपने हाथ ही आपके जीवन के देवता हैं। आप का सामर्थ्य, आप के हाथों में है। इन्हीं के उपयोग से आपके सुख का मार्ग खुलता है।

देवता हमारे जीवन में है, हमारे ही अन्दर है, हमारी ही सत्प्रवृत्तियों में है।

परमात्मा की सत्ता हम सब में जीवन-देवता के रूप में विराजमान है। फिर यह जीवन-देवता उपासना, साधना और आराधना करने पर समुचित परिणाम देता है। वह आपको इसी जीवन में सामर्थ्य का अनुदान देता है। आप स्वयं अपने जीवन को सार्थक होते हुए देख सकते हो - अपने आप को देवता बनते हुए देख सकते हो। प्रज्ञापुराण यह भी बताता है कि जीवन-देवता प्रत्यक्ष फल दायक है। इस देवता के साथ किया गया व्यवहार तुरन्त ही अपना असर दिखाता है।

हमारा जीवन अनेक अनुदानों से भरा पड़ा है। उनके सदुपयोग करने से उत्साह-वर्धक परिणाम मिलते हैं। जीवन-देवता हर मनुष्य के अन्दर बैठा हुआ है। आप कोई अपवाद नहीं हैं।

हमारे जीवन की सारी सम्पदा हमें जीवन-देवता की कृपा से मिली है। यह सम्पदा हमें उस की शक्ति के रूप में मिलती है। शक्ति रूपी इस सम्पदा के चार क्षेत्र हैं - इन्द्रिय-शक्ति, समय-शक्ति, विचार-शक्ति और साधन-शक्ति। पहली तीन सम्पदाएँ हमें बिना माँगे ही मिली हैं। चौथी सम्पदा हम इन तीन शक्तियों के संयुक्त प्रयत्न से अर्जित करते हैं।

तन, मन और समय की उपयुक्त संयुक्ति आपको साधन-सम्पन्न बनाती है।

श्रम, समय और मनोयोग - तीनों प्रकार की सम्पदा हमें जीवन-देवता ने दी हैं। धन एक साधन-शक्ति है, जो इन्हीं तीनों के संयुक्त प्रयत्नों का प्रत्यक्ष और स्थूल फल है। धन को श्रम देवता और काल देवता का सम्मिलित अनुदान भी कहा जा सकता है। जीवन-देवता द्वारा प्रदत्त इन तीन सम्पदाओं से हम सारे साधन जुटा सकते हैं। यदि हम जीवन-देवता की दी हुई तीनों शक्तियों का समुचित उपयोग करें तो हम भी साधन-सम्पन्न बन सकते हैं - बिना किसी के माँगे, बिना किसी के आगे हाथ फैलाये।

अपनी इन्द्रिय-शक्ति, समय-शक्ति और विचार-शक्ति को जोड़कर हम भी देवता बन सकते हैं - हमारे पास भी देवताओं वाले सारे सुख हो सकते हैं।

लेकिन ऐसा होता नहीं है।

क्यों?

क्योंकि इस के लिये हमें कुछ करना होता है।    

 


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें