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01.18.2009

चरागे-दिल
रचनाकार
: देवी नागरानी

अपने मक़्सद से हटा कर तू नज़र
देवी नागरानी

अपने मक़्सद से हटा कर तू नज़र
क्यों भटकता फिर रहा है दरबदर।

चार दिन की ज़िंदगी हँसकर गुज़ार
इस हक़ीक़त से न रहना बेख़बर।

बात करने के कई अंदाज़ हैं
दिल पे लेकिन सब नहीं करते असर।

हम तो अपनों में रहे ता-ज़िंदगी
अब अकेले में नहीं होती बसर।

मीठी बातें क्यों भली लगने लगी
ज़हर भी मुझको लगा है बेअसर।

नक्शे -पा ‘देवी’ मिलें जो राह में
मुश्किलें आसान आएँगी नज़र।


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