अन्तरजाल पर साहित्य
प्रेमियों की विश्राम स्थली
मुख्य पृष्ठ
06.28.2008

चरागे-दिल
रचनाकार
: देवी नागरानी

बुझे दीप को जो जलाती रही है
देवी नागरानी

बुझे दीप को जो जलाती रही है
यही रौशनी है, यही रौशनी है।

जो बेलौस अपने ख़ज़ाने लुटा दे
यही सादगी है,यही सादगी है।

रहे दूर सुख मेँ, मगर पास दुख में
यही दोस्ती है, यही दोस्ती है।

पिया हो मगर प्यास फिर भी हो बाक़ी
यही तिशनगी है, यही तिशनगी है।

बिना कुछ कहे बात आए समझ में
यही आशिकी है, यही आशिकी है।

कभी शांति में ख़ुश, कभी शोर में ख़ुश
यही बेदिली है, यही बेदिली है।

जो चाहा था वो सब न कर पाई ‘देवी’
यही बेबसी है, यही बेबसी है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें