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06.28.2008

चरागे-दिल
रचनाकार
: देवी नागरानी

ख़ता अब बनी है सजा का फ़साना
देवी नागरानी

ख़ता अब बनी है सजा का फ़साना
बताऊँ तुम्हें क्या है दिल का लगाना।

हवा में न जाने ये कैसा नशा है
पिये बिन ही झूमे है सारा ज़माना।

यहाँ रोज सजती है खुशियों की महफ़िल
मचलता है लब पर खुशी का तराना।

सदा घूमते हैं सरे-आम खतरे
बहुत ही है दुश्वार खुद को बचाना।

करें कैसे अपने-पराये की बातें
दिलों ने अगर दिल से रिश्ता न माना।


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