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06.08.2008

चराग़े - दिल
रचनाकार
: देवी नागरानी

गर्दिशों ने बहुत सताया है
देवी नागरानी

गर्दिशों ने बहुत सताया है
हर क़दम पर ही आज़माया है।

दफ़्न हैं राज़ कितने सीने में
हर्फ़ लब पर कभी न आया है।

मुझको हँस हँस के मेरे साक़ी ने
उम्र भर ज़हर ही पिलाया है।

ज़ोर मौजों का खूब था लेकिन
कोई कश्ती निकाल लाया है।

मुस्कराया है इस अदा से वो
जैसे ख़त का जवाब आया है।

बनके अनजान उसने फिर मेरे
दिल के तारों को झन-झनाया है।

मुझको ठहरा दिया कहाँ ‘देवी’
सर पे छत है न कोई साया है।


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