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06.08.2008

चराग़े - दिल
रचनाकार
: देवी नागरानी

तारों का नूर लेकर ये रात ढल रही है
देवी नागरानी

तारों का नूर लेकर ये रात ढल रही है
दम तोड़ती हुई इक शम्अ जल रही है।

नींदों की ख़्वाहिशों में रातें गुज़ारती हूँ
सपनों की आस अब तक दिल में ही पल रही है।

ऐसे न डूबते हम पहले जो थाम लेते
मौजों की गोद में अब कश्ती सँभल रही है।

तुम जब जुदा हुए तो सब कुछ उजड़ गया था
तुम आ गए तो दुनियाँ करवट बदल रही है।

इस ज़िंदगी में रौनक़ कम तो नहीं है ‘देवी’
बस इक तेरी कमी ही दिन रात खल रही है।


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