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| 12.08.2007 |
| चंदन-पानी रचियता : दिव्या माथुर |
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तेरे जाने के बाद |
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जब शाम को तुम घर आते थे
दिल की धड़कन थम जाती थी झट दौड़ के मुन्नी कमरे के किसी कोने में छिप जाती थी अब टूटे-फूटे दरवाज़े चौखट तो हैं खिड़कियाँ नहीं कुछ टेढ़े मेढ़े बर्तन हैं पर मार नहीं झिड़कियाँ नहीं आँखों के आगे धरती भी न जाने कब से घूमी नहीं न ही दिन को तारे दिखते हैं अब नींद में डरके उठती नहीं नन्ही सी एक आहट पर दिल अब सहम नहीं जाता लोगों से नज़र मिलाने में आड़े संदेह नहीं आता अक्कड़ बक्कड़ से खेल हैं अब न सही जो टूटे खिलौने नहीं चेहरों पे हमारे शरारत है उँगलियों के तेरी निशान नहीं सामान बिक गया सारा पर घर भरा-भरा सा लगता है भोजन भर-पेट मिले न मिले मन हरा-भरा सा रहता है. |
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