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| 12.08.2007 |
| चंदन-पानी रचियता : दिव्या माथुर |
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प्रस्तावना |
|
कवि
स्वाभावतः अति संवेदनशील होते हैं,
और
कवियित्री उनसे भी अधिक। दिव्या माथुर ने संवेदना की हद को स्पर्श किया
है,
और
काव्य संकलन
‘चंदन
पानी’
में
सुगंध और प्यास की चाहत एवं अहसास को शब्दों के नक्काशीदार कटोरे से
कागज़ पर जगह जगह उड़ेलने का साहस दिखाया है। इसी कोशिश में उन्होंने
‘चंदन
पानी’
में
दोनों के बीच का लगाव-अलगाव,
अपनी
अनुभूतियों,
अनुभवों,
दृष्टि से पकड़ने जानने का प्रयास किया है। परिणामस्वरूप,
उनकी
भिन्न अनुभूतियाँ,
उनके
भिन्न अनुभव एवं उनकी भिन्न दृष्टि अलग अलग काव्य रूपों के सौंदर्य का
स्वमेव आकार ग्रहण करती नज़र आती हैं।
दिव्या माथुर की रचनाधर्मिता की क्षमता को आत्मीयता से मैंने तब जाना
जब मैं लंदन स्थित नेहरु सेंटर में प्रवास कर रहा था और वह मेरे साथ
कार्यरत थीं। वहाँ मैंने
अनेक प्रवासियों के अंदर अपनी संस्कृति को जीने की ललक तथा उसे बटोरने
की उत्कट आकांक्षा देखी। कवयित्री दिव्या भी अपनी संस्कृति को सहेजने
में अनवरत रूप से जुटी हैं,
और इस
क्रम में लोगों को लोगों से,
भारत
को भारतीयता से और सभी को संस्कृति से,
अलग
अलग उपक्रमों द्वारा जोड़ रहीं हैं। इस शैली में वह अधिकारी से अधिक
समर्पित संस्कृतिकर्मी नज़र आती हैं। उनका काव्य सृजन संस्कृति को
सहेजने का एक ख़ूबसूरत माध्यम है और
‘चंदन
पानी’
उसी
का सार्थक प्रतिफल है।
रिश्तों पर आधारित रचनाओं के इस संग्रह में,
कोई
ऐसा रंग नहीं है जिसे दिव्या पकड़ने में सफल न रही हो। जहाँ एक ओर
दिव्या ने
‘सब
में मैं उसकी छब देखूँ हँसते लोग लुगाई जी/याद आये वो यूँ जैसे दुखती
पाँव बिवाई जी’
और
‘काली
बदरिया आई घिर,
इक
हूक उठी ओ माई फिर’
जैसे
गीत लिखे हैं,
वहीं
‘कैसे
कह दें कि वो पराया है,
उसके
ख्वाबों में हम सँवरते हैं/हमारे दरमियाँ हूँ मैं भी नहीं,
हो
कहीं और कोई डरते हैं’
अथवा
‘ग़ुंचों
की तबाही का क्या कीजे/आँधी की गवाही का क्या कीजे’
अथवा
‘कुछ
आग और लगानी होगी,
चंद
लपटें ये जलायेंगी नहीं’
जैसी
सशक्त ग़ज़लों की भी रचना की है। वास्तव में उनके मिज़ाज़ के इंद्रधनुष में
सात से भी अधिक रंग है,
वह
कैफ़ियत देती ही नहीं (‘नज़र
चुरा के समझ बैठे हो तुम खुद को खुदा/खयालों में खलल डालना तहज़ीब नहीं’
अथवा
‘न
सुने तो कोई क्या कीजे/दस्तक देने में हर्ज़ है क्या’),
बल्कि
लेती भी हैं (‘क्यूँ
बँधी हूँ मैं तुझसे अब तक/जब छोड़ के तू घर बार गया/मेरे हिस्से कर्तव्य
हैं क्यूँ/क्या हैं मेरे अधिकार बता’
अथवा
‘कल
संपूर्ण तुम्हारा था/संपूर्ण ही कल तुम मुझको दोगे’)।
उनकी तुनकमिज़ाज़ी के तो कई क़िस्से मिल जाएँगे,
‘खुदा
जब बुलाएगा,
सोचूँगा तब ही/जल्दी में उठने का क़ायल नहीं हूँ’
अथवा
‘तुम्हें
हम याद अब नहीं करते/वक्त बरबाद अब नहीं करते’)।
दिव्या के कुछ बिंब देखिए,
‘नदी
किनारे बैठ कोई पानी में फेंके ज्यूँ ढेले/खयाल तेरे मन में मेरे बना
रहे हैं यूँ घेरे’
अथवा
‘पानी
के बुलबुले सी तेरे हाथों से फिसल जाऊँगी/चंद लमहों में सुबह के तारों
सी बिखर जाऊँगी’,
अथवा
‘एक
बेसिर और बेनाम पुरुष/हर रात मेरा पीछा करता है/अपने सिर के बारे में
वह पूछताछ किया करता है।’
‘नभ
की सैर को चली पतंग/माँझे को अपने ले संग’
अथवा
‘सुबह-सुबह
होली खेला/सूरज धरती के संग/भरी धूप से पिचकारी तो धरती रह गई दंग’
आदि
आदि रचनाओं में रचनाकार की दृष्टि की व्यापकता के साथ साथ उसके मर्म के
फ़लक का भी अनायास ही पता चल जाता है।
फिर
उसी बेवफ़ा पे मरते है,
फिर
वही ज़िंदगी हमारी है
बेख़ुदी बेसबब नहीं ग़ालिब,
कुछ
तो है जिसकी पर्दादारी है |
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