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12.08.2007
चंदन-पानी
रचियता : दिव्या माथुर

मेरी ख़ामोशी
दिव्या माथुर


मेरी ख़ामोशी
एक गर्भाशय है
जिसमें पनप रहा है
तुम्हारा झूठ
एक दिन जनेगी ये
तुम्हारी अपराध भावना को
मैं जानती हूँ कि
तुम साफ़ नकार जाओगे
इससे अपना रिश्ता
यदि मुकर न भी पाये तो
तुम उसे किसी के भी गले मढ़ दोगे
कोई कमज़ोर
तुम्हें फिर बरी कर देगा
पर तुम
भूल के भी न इतराना
क्यूँकि मेरी ख़ामोशी
एक गर्भाशय है
जिसमें पनप रहा है
तुम्हारा झूठ.


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