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12.30.2007
चंदन-पानी
रचियता : दिव्या माथुर

कुछ आग और लगानी होगी
दिव्या माथुर


आग कुछ और लगानी होगी
चंद लपटें तो जलायेंगी नहीं

है अजब आग कि जिसका न धुआँ
रोशनी, शोले न चिंगारी कहीं

जला चुकी है मेरे जिस्म को ये
क्यों मेरा दिल ये जला पाई नहीं

धधक रहा है लहू लावे सा
आग को आग बुझाती है कहीं

मरहम लगाने की जुर्रत है किसे
छूत के डर से पास कोई नहीं

सँभल के चूमना, चाहो तो हमें
ख़ुदारा लब न जला लेना कहीं

हाले दिल पूछते हो क्या हमसे
जलते हैं सुबह कहीं शाम कहीं

सफाई माँगता है कौन यहाँ
दी जाती इश्क में दुहाई नहीं।


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