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12.30.2007
चंदन-पानी
रचियता : दिव्या माथुर

जुर्म
दिव्या माथुर


इक वादे पर था एतबार
मैं बँधी तुम्हारी कसमों में
झूल रही हूँ अधर में अब
जकड़ी दुनिया की रस्मों में

ख़ंजर का होता भर जाता
किया घायल तेरे लफ़्जों ने
क़तरा-क़तरा, धीमे-धीमे
रिसता रहता है जज़्बों में

बड़े तीरंदाज़ कहाते हो
करो अपने इज़ाफ़ा तमग़ों में
सब्र-ओ-क़रार आ जाए मुझे
नश्तर ही लगाओ ज़ख़्मों में

जीवन भर भुगतूँगी मैं सज़ा
ये लिखा है मेरे कर्मों में
अनजाने दिल का दर्द मेरा
आता है उतर मेरे नग़्मों में

दिल को तड़पाना ठीक नहीं
ये लिखा है सारे धर्मों में
ख़ुद चाक करूँ अपना सीना
हो कमी तुम्हारे जुर्मों में।


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