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| 12.08.2007 |
| चंदन-पानी रचियता : दिव्या माथुर |
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हूक |
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लो काली बदरिया आई घिर
इक हूक उठी ओ माई फिर कदम्ब पे कोयल आ बैठी अब देगी कूक सुनाई फिर आँगन में एक साये सा लो दिखा वही हरजाई फिर तन मन सिकोड़ कर बैठी हूँ अब देगा कष्ट सौदाई फिर दीवारों से फोड़ रही है मेरी ही परछाईं सिर चाँद है चुप, तारे गुमसुम देगा कौन गवाही फिर मेरे ही मन ने न सुनी तो सुनता कौन दुहाई फिर परदेसी की नज़र फिरे तो कहाँ होगी सुनवाई फिर भेजेगा वह प्यार ढेर और ख़त में देगा सफ़ाई फिर साँझ हुई है बाँझ मेरी और रूह मेरी बौराई फिर लो काली बदरिया आई घिर इक हूक उठी ओ माई फिर. |
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