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12.08.2007
चंदन-पानी
रचियता : दिव्या माथुर

दोष
दिव्या माथुर


बेवजह राम ने छोड़ा जब
कोई मित्र आग लगा गया था
चाहा था कि धरती फट जाए
और बस वह उसमें जाए समा

कृष्ण की बेवफ़ाई पर
वह ज़ार ज़ार यूँ रोई थी
अच्छा होता इससे तो वह
मर जाती पैदा होते ही

यौवन भी न उसका रोक सका
सिद्धार्थ ने जब प्रस्थान किया
धन दौलत से भरपूर था घर
किंतु उसका मन म्लान हुआ

फिर टॉम, डिक और हैरी की
अनियमिता में भी वह तैरी
कुछ ठिठके, कुछ केवल ठहरे
कुछ बने जान के बैरी भी

अब बनता है संबंध कोई
कब टूटेगा वह सोचती है
कुछ नया पालने की उसको
टूटे तो खुजली होती है

इक स्थाई मित्रता की यूँ तो
वह आज भी इच्छा रखती है
आदर्श पुरुष की खातिर वह
अपना सब कुछ तज सकती है

ये दुनिया न जाने हर दम
क्यूँ दोष उसे ही देती है
क्यूँ राम, कृष्ण और विष्णु को
आड़े हाथों नहीं लेती है

क्यूँ नज़रअंदाज़ करती है सदा
पुरुषों की सरासर ज्यादती को
उसके विरुद्ध शह देती है
क्यूँ टॉम डिक या हैरी को?


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