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12.08.2007
चंदन-पानी
रचियता : दिव्या माथुर

चंदन पानी
दिव्या माथुर


हम चंदन-पानी न हो पाये
चंदन-पानी न हो पाये

कोल्हू के बैल से घूमे गए
गले में रस्सी लटकाये
दिन रात पसीना बहा कर भी
इक बूँद भी तेल की न पाये
तैरा किए सतहों पर ही
चंदन-पानी न हो पाये

पहल करे कब कैसे कौन
तोड़ न पाए कभी मौन
कभी संग बैठे न सपने सजाए
नियति के भरोसे पछताए
ताउम्र रहे दिन रात हों ज्यूँ
चंदन-पानी न हो पाये

नज़रें चुरा लीं कभी जो मिलीं
गलबहियों की तो खूब कही
उँगलियाँ हमारी न उलझीं कभी
मुँह बाएँ निभाते रहे रस्में
दिल की थाह बिना पाए
चंदन-पानी न हो पाये

सरकारी चक्की में पिसे
अफसर बनने की चाह लिए
अपने बच्चों का पेट काट
रिश्वत में लाखों रुपये दिए
आँखों से अपनी अलग गिरे
चंदन-पानी न हो पाये

बढ़ा पिता का रक्तचाप
माँ के गठिए का दर्द बढ़ा
मनमानी बच्चों की बढ़ी
फ़ासला हमारे बीच बढ़ा
बस रहे दूरियाँ तय करते
चंदन-पानी न हो पाये

समय कतर कैंची से हम
अब जीवन फिर से शुरू करें
थामो, लो पतवार तुम्हीं
अपने रंग में रंग डालो मुझे
पानी और तेल नहीं रहें
अब चंदन-पानी हो जाएँ.


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