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12.08.2007
चंदन-पानी
रचियता : दिव्या माथुर

अँगारे तुम्हारे शब्द
दिव्या माथुर


गालों पे
गुलाब खिलाती हैं
तुम्हारी सुर्ख साँसें
मेरे होंठों पे उभर आतीं हैं

सावन की बूँदों से तुम्हारे चुम्बन
कुछ ऐसा ख़ुमार लाते हैं
मुँद जाती हैं आँखें बरबस
जब वे पलकों पे बैठ जाते हैं

पंखा झलती तुम्हारी बातें
देतीं हैं भड़का
मन में लगी चिन्गारी को
देकर हवा

अँगारे हैं
तुम्हारे शब्द
जलती रहती हूँ
मैं निशःब्द.


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