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12.30.2007
चंदन-पानी
रचियता : दिव्या माथुर

अलविदा
दिव्या माथुर


मरघट की जैसी ख़ामोशी
यूँ दिल में आके समाई है
मेरा यहाँ अब कोई नहीं
केवल मेरी तन्हाई है

प्रेमगीत मेरे लेखे नहीं
स्वप्न सलोने देखे नहीं
हिस्से में मेरे केवल
रुसवाई ही रुसवाई है

मैं जानती हूँ इस दुनिया में
मेरा अपना अब कोई नहीं
क्यूँ मचल उठी है रूह मेरी
क्या ये भी हुई पराई है

याद तेरी साँसों से मेरी
खेल रही है लुका-छुपी
अब हारेंगे ये दोनों ही
ये सोच मौत इतराई है

कहनी थी अलविदा मुझे
सीने में अपना दर्द छिपा
कमबख्त आँख लेकिन मेरी
न जाने क्यूँ भर आई है।


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